Wednesday, 19 March 2014

हिन्दी बनाम अंग्रेजी


हिन्दी हैं हम वतन है, हिन्दोस्ताँ हमारा कहने वाले देश की ये विडंबना है कि, यहाँ कुछ लोग अंग्रेजी को सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए नाना प्रकार के हथकंडे अपना रहे हैं। जबकि हिन्दी, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन हो या बंगाली, तेलगु, कन्नङ, जापानी इत्यादि ये सभी भाषाएं हैं। भाषा तो अभिव्यक्ति का माध्यम होती हैं। ये एक ऐसी शक्ति है जो मानव को मानवता प्रदान करती है। हम भाषा के माध्यम से ही अपने मन के भावों और विचारों को शाब्दिक रूप देते हैं।

परन्तु सेंटर फॉर रिर्सच एंड डिवेट्स इन डेवलप पॉलिसी की रिर्पोट के अनुसार फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले ज्यादा कमाते हैं। सवाल ये उठता है कि जब आजकल हर तरफ अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा कार्य चल रहा है तो भारत में बेरोजगारी की समस्या क्यों है? यदि फर्राटेदार अंग्रेजी से ज्यादा तनख्वाह मिल सकती है तो अंग्रेजी शिक्षा से तो रोजगार की गारंटी होनी चाहिए। किन्तु हकिकत में आज अधिकांश बच्चे बरोजगारी के शिकार हैं। सर्वे करने वाले न जाने किस आधार पर सर्वे करते हैं, वो ये भूल गये हैं कि रोजगार और अच्छी तनख्वाह के लिए हुनर होना चाहिए। जिस क्षेत्र में कार्य करना है उसका तकनिकी ज्ञान उस क्षेत्र की कामयाबी का प्रथम सोपान है। भारत में हिन्दी फिल्मों के क्षेत्र की विधाओं से जुङे लोग अत्यधिक कमाई करते है वनस्पत अन्य भाषाओं के, फिर भी भारत में अंग्रेजी को ही श्रेष्ठ मानना ये किसी त्रासदि से कम नही है।  
कबीर के अनुसार, "संस्कारित है कूप जल, भाषा बहता नीर।"

प्राचीन भारत के इतिहास का यदि अवलोकन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि, अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में आर्यभट्ट, चिकित्सा के क्षेत्र में चरक एवं धनवंतरि आदि वैज्ञानिकों ने तकनिकी ज्ञान के जटिलतम रहस्यों को भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्त किया है। विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली 10 भाषाओं में हिन्दी को दूसरा स्थान मिला है।

गाँधी जी ने कहा था, देशी भाषा का अनादर राष्ट्रीय आत्महत्या है।

आज भले ही अंग्रेजी की वाकालत की जा रही है परन्तु 200 वर्ष पूर्व अंग्रेजी दोयम दर्जे की भाषा थी। उस समय फ्रेंच और जर्मन भाषा का वर्चस्व था। उस दौरान माइकल फैराडे ने अंग्रेजी को उबारने के लिए एक पहल की, उन्होने अपने मित्रों के साथ अंग्रेजी को प्रचारित करना शुरू किया जिससे अंग्रेजी भाषा का विकास होने लगा। कहने का आशय ये है कि, किसी भी भाषा को यदि प्रसारित किया जाए तो उसका विकास संभव है। अर्थात हिन्दी का उपयोग यदि अधिक से अधिक कार्यो में होने लगे तो उसका भी विकास संभव है। अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र, और कानून आदि के क्षेत्र में नए ज्ञान का सृजन, मौलिक कार्य और अनुवाद से हिन्दी को भी रोजगार और व्यवसाय की भाषा बनाई जा सकती है।

परन्तु हम ऐसे दुर्भाग्यशाली हैं, जहाँ मातृभाषा दम तोङ रही है और अंग्रेजी हमें अपना गुलाम बना रही है। अंग्रेजी को अच्छी नौकरी का पैमाना बनाकर भ्रम फैलाया जा रहा है। सोचिए! देश का आधार कहा जाने वाला वर्ग यानि की किसान को खेती करने के लिए क्या अंग्रेजी बोलना जरूरी है?  भारत के कस्बों, गॉवों और शहरों में करोङों लोग ऐसे हैं जिन्हे अंग्रेजी पल्ले नही पङती, उनके साथ व्यपारिक बातें अंग्रेजी में कैसे संभव है। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, भाषा को बोली में परिर्वतित करने की ये सोची समझी साजिश है, जो आजादी के 60 दशक बाद भी हमें अंग्रेजी दासता से जकङे हुए हैं।आज हम भाषाई शुद्धता खो रहे हैं, न तो हिन्दी शुद्ध बोल रहे हैं और न ही अंग्रेजी, एक अलग ही अपभ्रंश भाषा 'हिंग्लिश' का प्रयोग कर रहे हैं। जबकि देश की आशा है; हिन्दी भाषा। हिन्दी हमारी मातृभाषा है; मात्र एक भाषा नही है।

अतः हमें भाषाई विवादों को छोङकर अपने ज्ञान और कौशल का विकास करते हुए सफलता अर्जित करनी चाहिए। हिन्दी हो या फिर अंग्रेजी,  इससे फर्क नही पङता। भाषा कोई भी हो, वह तो हमेशा एक दूसरे को जोङती है और तरक्की के रास्ते खोलती है, सफलता की गारंटी नही देती  है।

Friday, 14 March 2014

नव उल्लास का त्योहार है, होली



भारत के सभी त्योहारों की एक विशेषता है कि सभी पर्व समाज को महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। होलिका दहन का पर्व भी सामाजिक बुराईंयों के विनाष का प्रतीक है। होलीकोत्सव को वैदिक काल में नव सस्येष्टि यज्ञ कहा जाता था, उस समय खेत के अध पके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान प्रचलित था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पङा। होली एक सामाजिक पर्व है जिसे समाज के सभी लोग साथ मिलकर मनाते हैं। ये त्योहार, समाज में समरसता, सौजन्यता, समानता और सामाजिक विकास का संदेश देता है।
भारत वर्ष में होली का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन शाम को होलीका जलाकर उसकी पूजा की जाती है एवं अगले दिन सुबह रंगो से होली खेली जाती है। उत्सव के ये दोनो ही दिन प्रेरणा, ऊर्जा तथा उत्साह के प्रतीक हैं। रंगों के इस त्योहार में लोग एक दूसरे को रंग एवं गुलाल लगाते हैं और गले मिलकर बधाई देते हैं। रंगो के इस त्योहार में व्यक्ति विशेष की पहचान नही रहती, सभी लोग भाषा, धर्म एवं जाति से परे एक ही रंग यानि की इसानियत के रंग में रंग जाते हैं। परन्तु वर्तमान समय में कुछ विकृत मानसिकता वाले लोग बदला लेने की भावना से रंगो में कैमिकल मिला देते हैं, जो त्वचा के लिए हानिकारक होता है। पैसे कमाने की होङ में कुछ लोग होली की मिठाइयों में कुछ ऐसी चीजों की मिलावट कर देते हैं जिससे इंसान के जीवन को भी खतरा हो जाता है। इस कारण आज-कल कई लोग स्वंय को घरों में ही कैद कर लेते हैं और होली के उल्लास से दूर हो जाते हैं।

मित्रों, होली तो अनेका में एकता का प्रतीक है। इसे दुषित भावों से नही मनाना चाहिए बल्कि इस दिन सभी बैर-भाव भूलकर दोस्ती के रंग में रंग जाना चाहिए। होली तो अपनी खुशियों को व्यक्त करने का माध्यम है। होली के इस सामाजिक पर्व पर आत्मियता का रंग इस तरह चढे कि नीरस दिलों में भी उल्लास का सृजन हो सके और सब मिलकर बोलें Happy Holi.

नोट-( पूर्व पोस्ट पढने के लिए निचे दिये लिंक पर क्लिक करें)
http://roshansavera.blogspot.in/2013/03/blog-post_25.html

Thursday, 6 March 2014

Women in Freedom Struggle



विश्व में भारत ही ऐसा देश है, जिसकी स्वतंत्रता के लिए पुरूषों के साथ महिलाओं ने भी कंधे से कंधा मिलाकर अपना पूरा योगदान दिया। गाँधी जी के आह्वान पर अनेक महिलाओं ने विभिन्न क्रांतिकारी गतिविधियों में अपने प्राणों की परवाह किये बिना स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। जिन महिलाओं ने कभी घर से बाहर कदम भी नही रखा था, उन्होने भी भारत माता की आजादी के लिए अनेक महिलाओं को नेतृत्व प्रदान किया। हजारों महिलाओं ने स्वतंत्रता के यज्ञ को अपनी आहुती से सफल बनाया। सत्याग्रह के दौरान लगभग 15000 से भी ज्यादा महिलाएं जेल गईं। उन्होने जेलखानों को आराधना गृह का नाम दिया। लाठियों या गोलियों की परवाह न करते हुए अनगिनत महिलाओं ने इस देश की बेटी एवं बहु होने का फर्ज हँसते-हँसते अदा किया। ये महिलाएं नारी शक्ति के लिए प्रेरणा स्वरूप हैं, इन्होने अपने अदम्य साहस से भारत माता को गुलामी की जंजीर से मुक्त कराकर स्वतंत्रता का शंखनाद किया..............

मैडम भिकाजी कामाः-  ये भारत की प्रथम क्रान्तिकारी महिला थीं। विदोषों में निष्काशित जीवन व्यतीत करते हुए भारत की लङाई को जिवित रखा। 24 सितंबर 1861 को बंब्ई में एक पारसी परिवार में जन्म हुआ था। विदोषों में रहते हुए ये प्रमुख रूप से श्यामा जी, लाला  हरदयाल, वीर सावरकर, आदि के साथ सक्रिय रहीं। 1907 में जर्मनी में अंर्तराष्ट्रिय समाजवादी सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए इन्हे राष्ट्रिय ध्वज फैराने का गौरव प्राप्त हुआ था। इंग्लैण्ड में इन्हे अपराधी घोषित किया गया और वहां से निकल जाने का हुक्म दिया गया। ये इंग्लौण्ड से फ्रांस आ गईं, वहां से इन्होने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखा। 13 अगस्त 1936 को आपका निधन हो गया।

श्रीमति एनीबेसेन्टः-  एक अक्टुबर 1847 को लंदन में जन्मी एनीबेसेन्ट एक आइरिश महिला थीं। परन्तु भारतिय दर्शन एवं संस्कृति से प्रभावित होकर भारत आईं। उन्होने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनी। 1919 में होमरूल लीग की स्थापना की। कांग्रेस के अधिवेशनो में वे सदैव पूर्ण स्वराज की मांग उठाती रहीं। एनीबेसेन्ट गरमदल की प्रमुख नेता थीं। 1916 में बनारस हिंदुविश्वविद्यालय की स्थापना में इनका महत्वपूर्ण योगदान था। 86 वर्ष की आयु में 20 सितंबर1933 को मद्रास में उनका निधन हो गया।

कु. प्रीती लता:-    यह एक सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी महिला थीं। प्रीती लता का जन्म 8 मई 1911 को चटगॉव में हुआ था, जो अब बंगाला देश में है। चटगॉव शस्त्रागार काण्ड में आपने भाग लिया था। ये इस काण्ड में गंभीर रूप से जख्मी हो गीई थी। अंग्रेज सिपाहियों ने उन्हे घेर लिया था। अंग्रेजो के हाँथ वे न लगें इसलिए उन्होने सायनाइड खाकर अपने को देश के लिए बलिदान कर दिया।


कस्तूरबा गाँधीः- राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की पत्नी, कस्तूरबा गाँधी का जन्म 1869 में पोरबंदर में हुआ था। स्वतंत्रता के कार्यक्रमों में वे सदैव गाँधी जी के साथ रहीं और अनेक बार जेल गईं अंतिम बार 9 अगस्त 1942 को उन्हे गाँधी जी के साथ आगा खाँ जेल में नजरबंद कर दिया गया था, वहीं बन्दी जीवन में ही 22 फरवरी 1944 को उनका निधन हो गया।

कु. खुर्शिद बैन नौरोजीः-  राष्ट्रीय नेता दादा भाई नौरोजी की पोती कु. खुर्शिद बैन नौरोजी का जन्म 1894 में हुआ था। विदेषों से शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद इनपर वहाँ का रंग नही चढा। भारत की स्वतंत्रता के लिए लोगों को जागरूक करती रहीं और आजादी के आन्दोलन में 8 बार जेल गईं। सन् 1966 में आपकी मृत्यु हुई।

 कमला देवी चट्टोपाध्याः-  3 अप्रैल 1903 समाज सेविका कमला देवी चट्टोपाध्या का जन्म बंगौलर में हुआ था। राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा स्वतंत्रता संग्राम के लिए चलाए गये सभी आन्दोलनो में उन्होने हिस्सा लिया और अनेकों बार जेल भी गईं। आजादी के दौरान सोशलिष्ट पार्टी की स्थापना में उनका प्रमुख योगदान रहा।

सरोजनी नायडु:-  प्रथम श्रेणीं की राष्ट्रीय नेता एवं सुप्रसिद्ध कवित्री सरोजनी नायडु का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था। ओजस्वी कविताओं के कारण भारत कोकिला के नाम से प्रख्यात सरोजनी नायडु को  1925 के कानपुर राष्ट्रीय अधिवेशन में कांग्रेस की अध्यक्ष चुना गया था। एतिहासिक दांडी यात्रा में गाँधी जी के साथ थीं। गाँधी इरविन पैक्ट के अर्न्तगत दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गाँधी जी के साथ लंदन गईं थीं। सभी राष्ट्रीय आन्दोलन में उन्होने हिस्सा लिया और अनेक बार जेल यात्राएं की। आगा खाँ जेल में नजर बंदी के दौरान ये भी गाँधी जी के साथ थीं। भारत की स्वतंत्रता के बाद सरोजनी नायडु को पहली महिला गर्वनर नियुक्त किया गया था।

कु. कल्पना दत्तः-  एम.ए. तक शिक्षा प्राप्त कल्पना दत्त का जन्म चटगॉव में हुआ था। चटगॉव शस्त्रागार काण्ड में सूर्यसेन के नेतृत्व में  क्रियाशील रहीं किन्तु उस समय पुलिस उन्हे गिरफ्तार नही सकी। 1933 में कङे संघर्ष के बाद सूर्यसेन के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। 12 फरवरी 1934 को आजीवन कारावास की सजा दी गई।

विजय लक्ष्मी पंडितः- मोती लाल नेहरु की पुत्री विजय लक्ष्मी का जन्म 1900 में इलाहाबाद में हुआ था। सदैव स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहते हुए नमक सत्याग्रह में हिस्सा लेने के साथ ही विदेशी कपङों की दुकानो पर धरने दिये। 1937 में जब प्रांतिय सरकारों की स्थापना हुई तब उत्तर प्रदेश के मंत्रीमंडल में पहली महिला मंत्री का कार्यभार संभाला।

डॉ. सुशिला नैय्यरः-  इनका लगभग समस्त परिवार स्वतंत्रता संग्राम से जुङा हुआ था। बङे भाई प्यारे लाल नैय्यर गाँधी जी के सचिव थे। ये प्रायः सेवा ग्राम में रहती थीं। 1942 में नजरबंद के दौरान आगा खाँ जेल में 21 महिने रहीं। इन्होने सेवा ग्राम में कस्तूरबा हेल्थ सोसाइटी की स्थापना की जिसके माध्यम से आपने, आस-पास के गाँवों के लोगों के लिए उपाचार की व्यवस्था की। सेवाग्राम में ही गाँधी जी की स्मृति में महात्मा गाँधी साइंस इन्सटीट्यूशन की स्थापना की थी। 3 जनवरी 2001 को सुशिला नैय्यर जी का निधन सेवाग्राम में हुआ।

अरुणा आसफ अलीः-  राष्ट्रीय नेता आसफअली की पत्नी अरुणा आसफ अलि का जन्म 1906 में हुआ था। लाहौर और नैनिताल में शिक्षा प्राप्त अरुणा, नमक सत्याग्रह और असहयोग आन्दोलन  में प्रमुख रूप से सक्रिय रहीं। 1942 के भारत छोङो आन्दोलन में आपका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनिय है। 9 अगस्त 1942 को जब अनेक बङे नेताओं को गिरफ्तार किया गया तो इन्होने भुमिगत रहकर राष्ट्रीय आन्दोलन को गतिशील बनाए रखा। तत्कालीन सरकार ने इनकी गिरफ्तारी के लिए 5000 नकद पुरस्कार की घोषित किया था, लेकिन ये अंत तक पुलिस के हाँथ नहीं आईं इसलिए अरुणा आसफ अलि को 1942 की हिरोइन कहा जाता है। जब 26 जनवरी 1946 को अंग्रेज सरकार ने इनके वारंट को रद्द करने की घोषणा की तभी ये सार्वजनिक रूप से सामने आईं। 

राजकुमारी अमृत कौरः-  सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और गाँधी जी की निकट सहयोगिनी थीं। 2 फरवरी 1889 को कपूरथला में जन्मी राजकुमारी अमृत कौर ने ऐशो आराम का जीवन त्यागकर देश की स्वतंत्रता हेतु अनेकों बार जेल गईं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात ये प्रथम केन्द्रिय मंत्रीमंडल में स्वास्थ मंत्री बनी।

लेडी अब्दुल्ल कादिरीः- 1883 में लाहौर में जन्मी लेडी अब्बदुल कादिरी ने 1922 से खिलाफत आन्दोलन और सविनय अवज्ञा आनदोलन में प्रमुख रूप से हिस्सा लिया था। लेडी अब्दुल्ल कादिरी का कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश में लखनऊ में था।

अम्तु सलाम बेनः-  गाँधी जी के सभी प्रमुख रचनात्मक कार्यो में निकट से जुङी रहीं। 1942 के आन्दोलन में रेहाना बहन के साथ सक्रिय रहीं। 1946 में नोआखली के सामप्रदायिक दंगो के शिकार लोगों की सहायता हेतु शान्ति यात्रा में गाँधी जी के साथ थीं।

दुर्गा बाई देशमुखः-  सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और समाज सेविका दुर्गा बाई देशमुख का जन्म 1909 में आन्ध्रप्रदेश में हुआ था। एल.एल.बी तक शिक्षा प्राप्त की थी। स्वदेशी आन्दोलन में इन्होने अपने विवाह के समय के सभी विदेषी कपङों को जला दिया था। अपने किमती आभूषणों को देश हित के लिए गाँधी जी को समर्पित कर दिया था। राष्ट्रीय कार्यक्रमों के आन्दोलन में ये तीन बार जेल गईं थीं। 9 मई 1981 को आपका निधन हैदराबाद में हुआ था।

दुर्गा भाभीः-  दुर्गा का जन्म 7 अक्टुबर 1907 को लाहौर में हुआ था। इनके पति भगवति चरण बोहरा सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी थे। दुर्गा भाभी ने लगभग सभी क्रान्तिकारी गतिविधियों में अपना योगदान दिया। दुर्गा भाभी क्रान्तिकारियों के छिपने के लिए गुप्त व्यवस्था करती थीं। चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, यशपाल आदि क्रान्तिकारियों की गतिविधियों से निकट से जुङी हुईं थीं।  

कु. बिना दासः-  24 अगस्त 1911 में बंगाल में जन्मी बिना दास ने बी.ए. तक की शिक्षा प्राप्त की थी। अध्ययन के दौरान ही ये क्रान्तिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गईं थीं। 6 फरवरी 1932 को कॉलेज के एक समारोह में बंगाल के गर्वनर स्टेनले जेक्सन पर गोली चला दी, लेकिन गर्वनर बच गये तब इन्हे पकङ लिया गया और 9 वर्ष की कङी कैद की सजा दी गई। 1942 के आन्दोलन में भी सक्रिय रहीं किन्तु तब इनको अंग्रेज गिरफ्तार न कर सके।

श्रीमति जानकी देवी बजाजः-  प्रसिद्ध उद्योगपति जमना लाल बजाज की पत्नि श्रीमति जानकी देवी बजाज ने अपने घर की सभी विदेशी वस्तुओं को जला दिया था। सरकार विरोधी भाषणों के कारण उन्हे अंग्रेज सरकार ने कुछ समय तक जेल में रखा था।

श्रीमति सुचेता कृपलानीः-  1908 में अम्बाला में जन्मी सुचेता कृपलानी देशभक्त, आचार्य जे बी कृपलानी की पत्नी थीं। श्रीमति सुचेता कृपलानी भारत छोङो आन्दोलन में अरुणा आसफ अलि के साथ भुमिगत रहकर आन्दोलन का संचालन करती रहीं। इन्होने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. की परिक्षा पास की थी। आजादी के उपरान्त अनेक बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुईं।  अक्टुबर 1963 से 1967 तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। ये स्वतंत्र भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं।  आजादी के बाद देश में कई जगह साम्प्रदायिक दंगे भङक उठे थे, सुचिता कृपलानी ने दंगा पिङीत लोगों को राहत पहुँचाने का कार्य किया था।

बहन सत्यवतिः-  दिल्ली की सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी तथा समाज सेविका सत्यवति का जन्म 1906 में दिल्ली में हुआ था। लगभग सभी आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी देते हुए, खराब स्वास्थ के बावजूद कई बार जेल भी गईं।  उस समय की टी.बी. जैसी गंभीर बिमारी के बावजूद उन्होने अपने प्रयासो से दिल्ली में महिलाओं के मन में स्वतंत्रता के प्रति जागरुकता का शंखनाद किया।  सत्यवति जी की प्रेरणा से हजारों महिलाओं ने उनका अनुसरण करते हुए स्वतंत्रता के आंदोलन में अपना योगदान दिया।


मृदुला सारा भाईः-  1911 में अहमबदाबाद में जन्मी मृदुला सारा भाई का समस्त परिवार स्वतंत्रता के आन्दोलनो में सक्रिय रहा। स्वतंत्रता के लिए अनेकों बार जेल गईं और जब भारत विभाजन में साम्प्रदायिक दंगे भङके तो दंगा पिङीत लोगों की सहायता में सक्रिय रहीं।

लाडो रानी जुत्सीः-  लाडो रानी जुत्सी ने पंजाब में महिलाओं का जागरुक किया और महिलाओं को एकत्र कर शराब की दुकाने बंद कराने एवं विदेषी वस्तुओं के बहिष्कार में महत्वपूर्ण भुमिका का निर्वाह किया। 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान इन्हे एक वर्ष तक के लिए जेल में बंद कर दिया गया था। 1932 में निषेधाग्या भंग करने के आरोप में पुनः 18 महिने के लिए जेल गईं।

सरला बहनः-  5 अप्रैल 1900 में लंदन में जन्मी कु. कैथलिन 1938 में समाज सेवा के लिए भारत आईं। गाँधी जी से प्रभावित होकर उनके अनेक कार्यक्रमें से जुङी रहीं। 1942 के भारत छोङो आन्दोलन में विशेष रूप से सक्रिय रहीं। ये जीवन पर्यन्त अलमोङा में समाज सेवा का कार्य करती रहीं। इस क्षेत्र में रचनात्मक कार्यो को बढाने हेतु कौशानी आश्रम की स्थापना की। 40 वर्षों तक निरंतर देश सेवा के उपरान्त 8 जुलाई 1962 को उनका निधन हो गया।

रानी गाइनडिल्युः-  जॉन ऑफ आर्क नाम से प्रख्यात रानी गाइनडिल्यु का जन्म 26 जनवरी 1915 को नागालैण्ड में हुआ था। ये सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी महिला थीं। रानी गाइनडिल्यु ने 17 वर्ष की अल्प आयु में ही अपने हजार अनुयाइयों के साथ अंग्रेजों के प्रति गोरिल्ला युद्ध छेङ कर उन्हे पराजित किया। 17 अक्टूबर 1942 को इन्हे अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया तथा गंभीर प्रताङना दी गई। आजिवन कारावास का दंड मिला। जब प्रान्तिय शासन आरंम्भ हुआ तब अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को छोङा गया किन्तु जवहारलाल नेहरु के प्रयासों के बावजूद इन्हे रिहा नही किया गया। भारत की आजादी के उपरान्त ही इनको जेल से रिहाई मिली, तद्पश्चात ये जीवन भर लोकप्रिय नागानेता के रूप में सामाजिक सुधार के कार्यक्रमों में सक्रिय रहीं।

सुशिला दीदीः-  प्रसिद्ध क्रान्तिकारी महिला सुशिला दीदी का जन्म 5 मार्च 1905 को गुजरात में हुआ था।  काकोरी कांड के केस में खर्च हो रहे रूपये हेतु इन्होने अपने सारे जेवर दान कर दिये थे। अपने अध्ययन काल के दौरान से ही ये चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, भगवतिचरण वोहरा एवं दुर्गा भाभी के साथ क्रान्तिकारी गतिविधियों में सदैव सक्रिय रहीं। दिल्ली में वायसराय लार्ड इरविन की ट्रेन उङाने की जो योजना बनाई गयी थी। उसमें इन्होने क्रान्तिकारियों तक सभी सुचनाएं पहुँचाने का दायित्व निभाया था।

स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्य न्यौछावर करने वाली अमर बलिदानी महिलाओं को कभी भी भुलाया नही जा सकता, उनके बलिदान को महिला दिवस पर नमन करने का प्रयास है। भारत की स्वतंत्रता से लेकर स्वयं की एवं समाज तथा देश की रक्षा करने में भारतीय नारी सक्षम है, सिर्फ उसे अपनी शक्ति को आज के परिपेक्ष में नई पहचान की जरूरत है। जिससे कोई भी उसके साथ अराजकता का व्यवहार न कर सके।
   Everyday remind yourself that You are the best.
               Happy Women's Day 






Friday, 28 February 2014

प्रतिकूलताएँ भी वरदान बन सकती हैं


प्रकृति हमारी जननी है, जो हमें सदैव ऐसी परिस्थिती प्रदान करती है, जिसमें हम सभी का विकास होता है। जीवन में धूप-छाँव की स्थिती हमेशा रहती है। सुख-दुख एवं रात-दिन का चक्र अपनी गति से चलता रहता है। ये आवश्यक नही है कि, हर पल हमारी सोच के अनुरूप ही हो। प्रतिकूलताएँ तो जीवन प्रवाह का एक सहज स्वाभाविक क्रम है। सम्पूर्ण विकास के लिए दोनो का महत्व है। दिन का महत्व रात्री के समय ही समझ में आता है।
मनोवैज्ञानिक जेम्स का कथन है कि, ये संभव नही है कि सदैव अनुकूलता बनी रहे प्रतिकूलता न आए।

कई बार जीवन में ऐसी परिस्थिती आती है, जब लगता है कि सफलता की गाङी सही ट्रैक (रास्ते) पर चल रही है, परन्तु स्पीड ब्रेकर (गति अवरोधक) रूपी प्रतिकूलताएं लक्ष्य की गति को धीमा कर देती हैं। कभी तो ऐसी स्थिती भी बन जाती है कि सफलता की गाङी का पहिया रुक जाता है। अचानक आए अवरोध से परेशान होना एक मानवीय आदत है जिसका असर किसी पर भी हो सकता है। परन्तु जो व्यक्ति मानसिक सन्तुलन के साथ अपनी गाङी को पुनः गति देता है, वही सफलता की सीढी चढता है।

डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल्ल कलाम साहब का मानना है कि,
“Waves are my inspiration, not because they rise and fall,
But whenever they fall, they rise again.”

विपरीत परिस्थिती में निराशा का भाव पनपना एक साधरण सी बात है, किन्तु निराशा के घने कुहांसे से वही बाहर निकल पाता है जो अदम्य साहस के साथ अविचल संकल्प शक्ति का धनि होता है। ऐसे लोग पर्वत के समान प्रतिकूलताओं को भी अपने आशावादी विचारों से अनुकूलता में बदल देते हैं।

रविन्द्र नाथ टैगोर ने कहा है कि, हम ये प्रर्थना न करें कि हमारे ऊपर खतरे न आएं, बल्कि ये प्रार्थना करें कि हम उनका सामना करने में निडर रहें

विपरीत परिस्थितियों में भी अपार संभावनाएं छुपी रहती है। अल्फ्रेड एडलर के अनुसार, मानवीय व्यक्तित्व के विकास में कठिनाइंयों एवं प्रतिकूलताओं का होना आवश्यक है। लाइफ शुड मीन टू यु पुस्तक में उन्होने लिखा है कि, यदि हम ऐसे व्यक्ति अथवा मानव समाज की कल्पना करें कि वे इस स्थिती में पहुँच गये हैं, जहाँ कोई कठिनाई न हो तो ऐसे वातावरण में मानव विकास रुक जायेगा।

अनुकूल परिस्थिती में सफलता मिलना कोई आश्चर्य की बात नही है। परन्तु विपरीत परिस्थिती में सफलता अर्जित करना, किचङ में कमल के समान है। जो अभावों में भी हँसते हुए आशावादी सोच के साथ लक्ष्य तक बढते हैं, उनका रास्ता प्रतिकूलताओं की प्रचंड आधियाँ भी नही रोक पाती। अनुकूलताएं और प्रतिकूलताएँ तो एक दूसरे की पर्याय हैं। इसमें स्वंय को कूल (शान्त) रखते हुए आगे बढना ही जीवन का सबसे बङा सच है।


Thursday, 20 February 2014

लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन, जिम्मेदार कौन??




विश्व के सबसे बङे लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र का आशय एक ऐसी शासन प्रणाली से है, जिसमें प्रभुसत्ता का अंतिम स्रोत जनता होती है। शासन नीतियों के निर्माण में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जनता भागीदारी करती है और सभी महत्वपूर्ण निर्णय जनसहमति से ही लिए जाते हैं। लोकतंत्र की व्यवस्था संविधान के अनुसार क्रियान्वित होती है और संविधान देश की जनता की आकांक्षाओं, भावनाओं, विचारों और मान्यताओं का प्रतिबिम्ब है। परन्तु विगत सप्ताह में जो कुछ लोकसभा में या राज्यसभा में हुआ उससे तो यही प्रतीत होता है कि लोकतांत्रिक एवं संवेधानिक अधिकार, 'पिंजरे में बंद पक्षी' की तरह हैं जो जिन्दा तो हैं किन्तु उङ नही सकते।


लोकसभा एवं राज्यसभा तथा विधान सभा में वर्तमान में हो रही अराजकता आज ऐसी विकृत मानसिकता को बढावा दे रही है जिसके लिए संविधान या लोकतंत्र का कोई महत्व ही नही दिखाई देता। तेलांगना का विरोध कर रहे सीमांध्र के समर्थक सांसदों द्वारा लोकसभा में तोङ-फोङ और मिर्चीस्प्रे जैसी अमानवीय घटना ने छः दशक पुराने लोकतंत्र के मंदिर लोकसभा में लोकतंत्र की मर्यादा को तार-तार कर दिया। तत्कालीन सरकार ने तो एक कदम और बढाकर सूचना के अधिकार को अनदेखा करते हुए, असंवेधानिक तरीके से आंध्रप्रदेश पुनर्गठन विधेयक पास करवा दिया तथा लोकतांत्रिक भावनाओं पर अराजकता का बुलडोजर चला दिया। जबकि संवेधानिक नियमों के अनुसार जब राज्यों के स्वरूप, गठन, कार्यक्षेत्र एवं अधिकारों का निर्धारण होता है तब नागरिकों के अधिकारों तथा कर्त्तव्यों एवं राज्य और नागरिकों के पारस्परिक सम्बन्धों का भी निर्धारण होता है।
जैलिनेक ने कहा है कि, संविधानहीन राज्य की कल्पना नही की जा सकती। संविधान के अभाव में राज्य, राज्य न होकर एक प्रकार की अराजकता होगी।

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि जिन राज्यों का गठन अराजकता के आधार पर हुआ हो, उससे ये उम्मीद लगाना कि पङौसी राज्य का सहयोग करेगा किसी छलावे से कम नही है।

लोकतंत्र के मंदिर में मार-पीट आम बात होती जा रही है। जनता के प्रतिनिधी जनता की बातें सदन में कहते हैं। अपनी बात रखना संवेधानिक अधिकार है और अपनी बात को मर्यादित तरीके से कहना सभ्यसमाज का सूचक है। परन्तु आज आलम ये है कि चुनाव जीत के लिए राजनेता अराजकता और अनैतिक तरीके से अपनी बात कहने में शर्म महसूस नही करते। विधायक विधानसभा में कपङे उतार कर किस सभ्यसमाज का प्रतिनीधित्व करते हैं??  उनके लिये तो लोकतंत्र केवल वोटतंत्र का ही परिचायक है। ऐसे नेता तो साम, दाम, दंड, भेद की नीति से राजनैतिक पद पर विराजमान रहना चाहते हैं।

इतिहास गवाह है कि विधानसभा में मार-पीट लगभग दो दशक पहले शुरू हो चुकी थी। महाराष्ट्र विधानसभा में एक विधायक ने माइक व्यवस्था संभालने वाले का सिर फोङ दिया। बिहार में एक विधायक ने दूसरी पार्टी के विधायक की अंगुली काट ली। अब तो लोकसभा एवं राज्यसभा में भी लोकतंत्र के रक्षक कहे जाने वाले नेता लोकतंत्र की गरिमा को कलंकित करने में शर्म महसूस नही करते। उनके लिए तो राजनैतिक महत्वाकांक्षा, संविधान और लोकतंत्र की भावनाओं से भी ऊपर है।

जब भी देश में ऐसी कोई घटना घटती है सभी पार्टियां एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगती हैं, जबकि सभी एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। और तो और जनता भी नेताओं को दोष देना शुरू कर देती है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि, इन अपराधिक मानसिकता वाले व्यक्तियों को अपना प्रतिनिधी बनाया किसने???

यदि समय रहते इस जहरीली मानसिकता वाले लोगों को न रोका गया तो ये चन्द लोग, लोकसभा एवं राज्यसभा तथा विधानसभा को तो गरिमाहीन करेंगे ही साथ में पूरे देश की हवा को भी मिर्चस्प्रे जैसी जहरीली मानसिकता से जहरीला कर देंगे। लोकतंत्र और संवेधानिक नियम केवल इतिहास के पन्नों में न सिमट जाए, उसके पहले ही लोकतंत्र को अपने वोट के अधिकार से सभ्य भारत का भाग्य विधाता बनना होगा…………



Thursday, 13 February 2014

करुणा की प्रतिमूर्ती (महाप्रांण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)

दीनदुखियों पर अपना सर्वस्य न्यौछावर करने वाले निराला जी हिन्दी साहित्य के सिरमौर हैं। सरस्वती के वरद पुत्र माने जाने वाले निराला जी का जन्म बसंत-पंचमी को हुआ था। उनकी कहानी संग्रह लिली में उनकी जन्मतिथि 21 फरवरी 1899 अंकित की गई है। वसंत पंचमी पर उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा 1930 से प्रारंभ हुई। सरस्वती के साधक निराला जी ने हिंदी में माँ सरस्वती पर जितनी कविताएँ लिखी हैं शायद ही किसी और कवि ने लिखी हो। उन्होंने माँ सरस्वती को अनेक अनुपम एवं अभूतपूर्व चित्रों में उकेरा है। महाप्राण निराला जी का जीवन निष्कपट था, जैसा वे कहते, वैसा ही उनका आचरण था।

वह तोङतीएवं पेट-पीठ मिलकर हैं दोनो एक जैसी कविताएं उनके अन्तः स्थल से उपजी कविताएँ थीं। उनके जीवन के अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जब उन्होने समाज के जरूरतमंद लोगों की सहायता पूरे दिल से की। ऐसे ही कुछ प्रसंग जो उनकी दरिया दिली को प्रकट करते हैं।

कलकत्ता के सेठ महादेव प्रसाद निराला जी को प्राण प्रण की तरह मानते थे। एक बार उन्होने जाङे के दिनों में निराला जी के लिए बहुत सुन्दर और शानदार शाल बनवाई और उसे निराला जी को सप्रेम भेंट की। निराला जी उसे पहन कर बहुत खुश हुए और सेठ जी की प्रशंसा भी किये। परन्तु एक दिन जब वे सेठ जी के दफ्तर जा रहे थे तो रास्ते में एक भिखारी मिला जिसके तनपर कोई कपङा नही था। निराला जी ने वो शाल ठंड से काँपते उस भिखारी को दे दी। जब सेठ जी को पता चला तो वे भिखमंगे के पीछे भागे किन्तु तबतक वे भिखारी वहाँ से जा चुका था। निराला जी ने सेठ जी से कहा क्यों परेशान हो रहे हैं? जाने दीजिए उसको, उसका जाङा ठीक से कट जायेगा। सेठ जी निराला जी से बोले कि धन्य हैं, महाराज आप !”

निराला जी का मन किसी का कष्ट देखकर उसकी सहायता को बेचेन हो जाता था। उनकी उदरता का एक और किस्सा है, एकबार निराला जी अपने एक प्रकाशक से तीन सौ रूपये लेकर इलाहाबाद में अपनी मुँहबोली बहन  महादेवी वर्मा के घर जा रहे थे। रास्ते में निराला जी को एक भिखारन मिली उसने कहा-  बेटा, इस भूखी-प्यासी भिखारन को कुछ दे दो।

निराला जी उसकी आवाज सुनकर रुक गये और उन्होने उससे पूछा कि यदि मैं तुम्हे पाँच रूपये दूँ तो कितने दिन भीख नही माँगोगी। बुढिया बोली एक हफ्ते तक। तब निराला जी ने कहा यदि मैं तुम्हे तीन सौ रूपये दूँ तो कितने दिन भीख नही माँगोगी, भिखारन बोली क्यों मजाक करते हो बेटा इतने रूपये मुझे कोई क्यों देगा। निराला जी ने कहा तुमने मुझे बेटा कहा है, निराला की माँ भीख माँगे ये तो मेरे लिए शर्म की बात है। मैं तुम्हे तीन सौ रूपये दूंगा, तब बुढिया भिखारन बोली मैं जिंदगी भर भीख नही माँगुगीं उस पैसे से कोई रोजगार करुंगी। ये सुनते ही निराला जी ने अपने सारे पैसे उसे दे दिये और महादेवी वर्मा जी के यहाँ चले गये जहाँ रिक्शेवाले को पैसा महादेवी वर्मा जी ने दिये।

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि निराला जी के मन में गरीब एवं असहाय लोगों के लिए करुणा की गंगा बहती थी। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिनका संर्पूण जीवन धन-दौलत की माया मोह से परे समाज के हित में ही व्यतीत हो जाता है। निराला जी ऐसी ही महान आत्मा थे।  15 अक्टुबर सन् 1961 को करुणा की प्रतिमूर्ती महाप्रांण सूर्यकांत त्रीपाठी निराला जी भले ही इहलोक छोङकर परलोक सिधार गये। परन्तु अपने जीवन की सार्थकता को अपनी रचनाओं से एवं अपनी करुण भावना के माध्यम से जन-जन के ह्रदय में ऐसी अमिट छाप छोङ गये, जिसे जब तक सृष्टी है उन्हे कोई भुला नही सकता। 

 




Thursday, 6 February 2014

बेटी है तो कल है



हमारे देश में दिन-प्रतिदिन कन्याभ्रूण हत्या में इजाफा हो रहा है। सेंटरफॉर रिसर्च के अनुसार लगभग बीते 20 वर्षों में भारत में कन्याभ्रूण हत्या के कारण एक करोङ बच्चियां जन्म से पहले काल की बली चढा दी गईं हैं। लङकियों के प्रति अवहेलना की मानसिकता सिर्फ अनपढ लोगों में नही है बल्की पढे-लिखे वर्ग में भी व्याप्त है। कुछ समय पूर्व स्टार प्लस पर सत्यमेव जयते नामक कार्यक्रम प्रदर्शित हुआ था जिसमें कन्याभ्रूण पर भी एक परिचर्चा थी। उसमें कई ऐसी महिलाओं की आपबीती थी जिससे पता चला कि बेटी पैदा होने पर एक माँ के साथ हैवानियत जैसा व्यवहार किया गया। पेशे से डॉ. महिला को भी कन्याभ्रूण हत्या जैसी क्रूर मानसिकता का शिकार होना पङा। बालिकाओं के प्रति संवेदनाहीन एवं तिरस्कार जैसी भावना किसी भी देश के लिए चिंताजनक है।

युनिसेफ के अनुसार 10%  महिलाएं विश्व जनसंख्या से लुप्त हो चुकी हैं। भारत एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ भी बेटियों की हो रही कमी से चिंतित है। भारत सरकार द्वारा देशभर में 24 जनवरी  को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने 11 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा वर्ष 2012 में की। बच्चियों के प्रति समाज में जागरूकता और चेतना पैदा करने के लिए यह दिवस प्रति वर्ष मनाया जाता है। इन दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि समाज में हर बालिका का सम्मान हो, उसका भी महत्व हो और उसके साथ बराबरी का व्यवहार किया जाए।

वर्ष 1991 मे हुई जनगणना से लिंग-अनुपात की बिगड़ती प्रवृत्ति को देखते हुए, कई राज्यों ने बेटीयों के हित के लिये योजनाएं शुरू की। जैसे कि- मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना एवं लाडली लक्ष्मी योजना,  भारत सरकार द्वारा धन लक्ष्मी योजना, आंध्र प्रदेश  द्वारा बालिका संरक्षण योजना, हिमाचल प्रदेश  ने बेटी है अनमोल योजना शुरू की तो पंजाब में बेटियों के लिए रक्षक योजना की शुरूवात की गई। ऐसी और भी योजनाएं अन्य राज्यों में चलाई जा रही है। बेशक आज बेटियों के हित में अनेक योजनाएं चलाईं जा रही हैं,  किंतु भारतीय परिवेश में बेटियों के प्रति विपरीत सामाजिक मनोवृत्तियों ने बच्चियों के लिए असुरक्षित और असुविधाजनक माहौल का ही निर्माण किया है। योजनाएं तो बन जाती हैं परन्तु उनका क्रियान्वन जागरुकता के अभाव में सिर्फ कागजी पन्नो में ही सिमट कर रह जाता है। बेटीयों का अस्तित्व, शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास, सुरक्षा और कल्याण, समाज में व्याप्त रुढीवादिता और संकीर्ण सोच की बली चढ जाता है।

मंदिरों में देवी पूजा, नवरात्रों में कन्या पूजा महज चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात को ही चरितार्थ करती है क्योंकि अधिकांशतः तो बेटीयाँ उपेक्षा की ही शिकार होती हैं। आज हम चाँद से भी आगे जाने की बात करते हैं, दुनिया को मुठ्ठी में बंद करने की तकनिक का इजात कर रहे हैं। आधुनिक सोच का ढोल बजाते हैं लेकिन जब बेटे और बेटी की बात आती है तो, सारी उम्मीद बेटे से लगाते हैं। अपनी सारी जमापूंजी बेटे की शिक्षा ओर विकास पर खर्च कर देते हैं। बेटी को पराया धन कहकर उसकी शिक्षा पर अंकुश लगा देते हैं। ये दोहरा मापदंड बेटीयों के लिए किसी त्रासदी से कम नही है।  

कई बुद्धीजीवी वर्ग बेटी बचाओ का अभियान चला रहे हैं, जो नुक्कङ नाटकों के माध्यम से समाज में जागरुकता लाने का प्रयास कर रहे हैं। अभी हाल में अमर उजाला समाचार पत्र के माध्यम से एक नये नारे के आगाज हुआ बेटी ही बचायेगी इसमें कोई शक नही क्योंकि आज शिक्षा और हुनर को हथियार बनाकर बेटीयां भारतीय प्रशासनिक सेवा से लेकर सेना में, शिक्षा के क्षेत्र से लेकर अंतरिक्ष तक में अपना एवं देश का नाम रौशन कर रही हैं। यहाँ तक कि पुरूष प्रधान क्षेत्र जैसे कि- रेलवे चालक, बस चालक एवं ऑटो चालक में भी अपनी उपस्थिती दर्ज करा रहीं हैं। फिरभी कुछ विपरीत सोच उसके अस्तित्व को ही नष्ट कर रहीं हैं।  

बेटी बचाओ जैसी योजनाएं और अनेक कार्यक्रम इस बात की पुष्टी करते हैं कि आज अत्याधुनिक 21वीं सदी में भी हम लिंगानुपात के बिगङते आँकङे को सुधार नही पा रहे हैं। पोलियो, कैंसर, एड्स जैसी बिमारियों को तो मात दे रहे हैं किन्तु बेटीयों के हित में बाधा बनी संकीर्ण सोच को मात नही दे पा रहे हैं। आज भी सम्पन्न एवं सुशिक्षित परिवारों में लङकी होने पर जितनी भी खुशी मनाई जाती हो, लेकिन लङके की ख्वाइश उनके मन से खत्म नही होती। जबकी आज माँ-बाप को कंधे देने का काम बेटी भी कर सकती है, अन्त समय में माँ-पिता के मुँह में वो भी गंगाजल डाल सकती है। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि ऐसा कोई काम नही है जो बेटी नही कर सकती।

वक्त के साथ यदि हम सब अपनी सोच में भी परिवर्तन लांए, बेटी को भी बेटे जैसा अवसर दें तो यकिनन बेटी ही बचाएगी हमारी संस्कृति को एवं आने वाले कल को क्योंकि वे न केवल समाज को शिक्षा देने में सबल है बल्कि देश सम्भालने की भी हिम्मत रखती है। हम सब यदि ये प्रण करें कि लिंग भेद को मिटाकर बेटे को भी ऐसे संस्कार देंगे जिससे वे बहनों का सम्मान करें, दहेज जैसी कुप्रथाओं का अंत करें, बचपन से ही बेटों को नारी के सम्मान और आदर की घुट्टी पिलाएं जिससे बेटीयों के प्रति हो रही विभत्स घटनाओं का अन्त हो सके।
सोचिये! यदि बेटी न होगी तो बहन नही होगी, न माँ, न समाज, न देश होगा, न दुनिया होगी, फिर किस चाँद पर जायेंगे और और कौन सी दुनिया बसाएगें ????
मित्रों, सच तो ये है कि, बेटी है तो कल है, वरना विराना पल है। 



Monday, 3 February 2014

जय माँ शारदे


शुक्लां ब्रह्म-विचार-सार-परमामाद्यां जगद्व्यापिनी
विणा पुस्तक-धारिणीम् भयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धीप्रदा शारदाम्।।


Thursday, 30 January 2014

सीखना सफलता की कुंजी है (Learning)



सीखने की कोई उम्र नही होती है। जो ताउम्र सीखने में यकीन रखते हैं, वही बुलंदियों पर पहुँचते हैं। डार्विन के सिद्धान्त को यदि आज के माहौल में सोचे तो उसकी महत्ता और भी बढ जाती है। आज वही सरवाइव कर सकता है जो नए माहौल के अनुसार अपना विकास करता है। सीखना किसी भी विकास की सतत प्रक्रिया है। परिस्थिती के अनुसार नित नई चीजों को सीखना और स्वयं को उमसें ढाल देना सफलता की कुंजी है। कुछ नया सीखने की ऊर्जा हम सभी में छुपी होती है, जो इस ऊर्जा को इस्तेमाल कर लेते हैं वे सफलता की इबारत लिखते हैं तथा देश एवं विदेश में भी सम्मानित किये जाते हैं। उम्र की बाधाओं को तोङकर भारत की एक नारी आशा खेमका ने ब्रिटेन में भारत को गौरवान्वित किया।  

आशा खेमका का जन्म बिहार के सीतामढ़ी जिले में हुआ था। उनकी शादी महज 15 साल की उम्र में हो गई थी। 1975 में अपने पति और तीन बच्चों के साथ 25 वर्ष की उम्र में आशा खेमका ब्रिटेन चली गईं। उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, पर उन्होंने सांस्कृतिक और भाषाई बाधाओं को पार किया।  1980 के दशक में आशा ने स्वयं को सुशिक्षित बनाने की शुरूआत की। दृण इरादों वाली आशा खेमका ने बच्चों के टीवी शो को देखकर और युवा माताओं से बात कर अंग्रेजी सीखी। नई चीजों को सीखना और ईमानदारी से शिक्षा ग्रहण करने का ही परिणाम है कि उन्हे ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार डेम कमांडर ऑफ द आर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही आशा खेमका अपने समुदाय से यह सम्मान प्राप्त करने वाली प्रथम व्यक्ति बन गई। यह ब्रिटिश साम्राज्य के महिला नाइटहुड सम्मान के बराबर है।  उन्हें यह सम्मान पिछले आठ वर्ष से वेस्ट नोटिंघमशायर कॉलेज में बतौर प्राचार्य वेस्ट मिडलैंड के पिछड़े इलाके में सेवाएं देने को लेकर सम्मानित किया गया।


प्रथम महिला आई. पी. एस. किरण बेदी का कहना है कि- "जिंदगी का हर पल कुछ न कुछ सिखाता है। यदि निरंतर कुछ नया नही सीखेंगे, तो जल्दी ही बेकार साबित हो जायेंगे।"
ज्यादातर महिलाओं की सोच होती है कि शादी हो गई, बच्चे हो गये बस दुनिया यहीं खत्म, उन्हे आशा खेमका से सबक लेना चाहिए। कहते हैं फिल्मो का असर समाज पर पङता है और फिल्में समाज का आइना होती हैं। यदि दोनो ही बातों पर ध्यान दें तो 2012 में प्रर्दशित फिल्म इंग्लिश विंग्लिश में श्री देवी द्वारा अभिनित रोल महिला के उस पक्ष को सबल बनाता है जो कुछ सीखना चाहती हैं। विपरीत परिस्थिती में भी अवसर को समझते हुए विदेशी धरती पर इंग्लिश सीखती है। कहने का आशय ये है कि, परफैक्ट कोई नही होता इसलिए जो नही आता है उसे सीखने में संकोच नही करना चाहिए। किसी कार्य का न आना इतने शर्म की बात नही होती बल्कि उस कार्य को न सीखने की चाह शर्म की बात होती है।

दोस्तों, नए लोग और नई जमीं पर आशा खेमका ने अपने सीखने के जुनून को आगे बढाया। सीखने का पैशन ही इंसान को जीवन में आगे बढने में मददगार होता है। यदि मनुष्य सीखना चाहे, तो अपनी भूल से भी सबक ले सकता है। बच्चों से लेकर बङों तक, विद्यार्थियों से लेकर सेवानिवृत्त लोगों तक हर किसी को जीवन का प्रत्येक क्षेत्र हर दिन कुछ न कुछ सबक सिखाता है। ये हमपर निर्भर करता है कि हम सीखने की आदत को कितना दृण रखते हैं। सफल व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण सबक है सीखना, जिसको अपनाते हुए हमसब अपने जीवन को रचनात्मक और सकारात्मक बना सकते हैं।
ए.पी.जे.अब्दुल्ल कलाम का कहना है कि,  

      Learning gives creativity,
            Creativity leads to thinking,
            Thinking provides knowledge,
            Knowledge makes you great.