Sunday, 10 August 2014

वन्दे मातरम्


भारत की आजादी से पूर्व अनेक देशभक्त अपने-अपने प्रयासों से जातिय बंधनो से मुक्त होकर भारत माता को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने का हर संभव प्रयास कर रहे थे। उसी दौरान आजादी के संघर्ष में वन्दे मातरम् जन-जन की आवाज था।  गीता का ज्ञान, कुरान की आयते तो गुरु ग्रन्थ साहिब की वाणीं को एक उदद्घोष में भारत माता के वीर सपूत गुंजायमान कर रहे थे। वन्दे मातरम् अनेक लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत रहा। इस राष्ट्रीय उद्घोष का इतिहास एक सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। सबसे पहले इस गीत का प्रकाशन 1882 में हुआ था और इस गीत को सर्वप्रथम 7 सितम्बर 1905 के कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त हुआ था। 

वन्दे मातरम् गीत की रचना प्रख्यात उपन्यासकार बंम्किमचंद चटोपाध्या ने की थी। उन्होने 19वीं शताब्दी के अन्त में बंगाल के मुस्लिम शासकों के क्रूरता पूर्वक व्यवहार के विरोध में आन्नद मठ नामक एक उपन्यास लिखा। जिसमें पहली बार वंदे मातरम् गीत छपा जो पूरे एक पृष्ठ का था। इस गीत में मातृभूमि की प्रशंसा की गई थी। ये गीत संस्कृत और बंगला भाषा में प्रकाशित हुआ था। 

वन्दे मातरम् का उद्घोष सबसे अधिक 1905 में हुआ जब तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड कर्जन ने "बाँटो और राज करो" की नीति का अनुसरण करते हुए बंगाल को दो टुकङों में विभाजित करने की घोषङा की और इस विभाजन को बंग-भंग का नाम दिया। लार्ड कर्जन की इस नीति का जबरदस्त विरोध हुआ। उस समय विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी आन्दोलन के साथ-साथ वन्दे मातरम् को व्यापक रूप से जन-साघारण ने अपनाया। इसके बाद अंग्रेजों के विरुद्ध जो भी आन्दोलन हुआ उसमें वंदे मातरम् जन-जन की वाणी बना। बंगाल से शुरु हुआ ये उद्घोष पूरे देश में फैल गया।


अखिल भारतिय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी वंदे मातरम् उद्घोष को अपनाया। समय के साथ-साथ और परिस्थितियों के अनुसार वंदेमातरम् गीत में अनेकों बार संशोधन किय गये। अंत में इसके विस्तार को हठाकर चार पंक्तियों तक सिमित कर दिया गया। कांग्रेस के अधिवेशनों का प्रारंभ इसी गान के गायन से प्रारंभ होता था और समाप्त होता था। अतः ये गीत राष्ट्रीयता के रंग में रंग गया। 


सन् 1896 में  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कलकत्ता के अधिवेशन में रविन्द्रनाथ टैगोर ने वन्दे मातरम् गीत गाया था। 1905 में बनारस के अधिवेशन में इस गीत को सरला देवी चौधरानी ने स्वर दिया। अधिवेशन में सभी धर्म के लोग होते थे, वे सभी इस गीत के प्रति खङे होकर अपना सम्मान व्यक्त करते थे। अंततः ये हमारा राष्ट्रीय गीत बना। 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तब 14 से 15 अगस्त की मध्य  रात्रि में सत्ता के हस्तांतरण के लिए तत्कालीन केन्द्रिय असेम्बली का गठन किया गया जिसका प्रारंभ वंदे मातरम् के गायन से हुआ। ये गीत सुमधुर तरीके से सुचेताकृपलानी द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस विशेष अधिवेशन का सामापन भी वन्दे मातरम् गीत से हुआ। असेम्बली के कक्ष में उपस्थित सभी सदस्यों ने इस गायन में श्रद्धा पूर्वक भाग लेकर उद्घोष के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया। पूरा कक्ष वंदे मातरम् की गुंज से गुंजायमान हो गया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त जब भारत का संविधान निर्मित हो रहा था, तब ये प्रश्न उठा कि वंदे मातरम् गीत को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया जाये या किसी अन्य गीत को। उस दौरान तत्कालीन संगीतकारों का ये मानना था कि,  वंदेमातरम् गीत को लयबध करना कुछ कठिन है। अतः इसके अतिरिक्त किसी अन्य गीत को राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया जाये। अंत में  रविन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित 'जन  मन गण' को अपनाया गया।


वैसे तो संविधान सभा के अधिकांश सदस्य वंदे मातरम् को ही राष्ट्र गीत मानते थे क्योंकि ये गीत जनता के मानस पटल पर छाया हुआ था। परंतु जवाहरलाल नेहरु के आग्रह पर 'जन मन गण' को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया और साथ ही साथ वन्दे मातरम् को भी अनिवार्य माना गया। केवल तत्कालीन मुस्लिम लीग इस गीत का विरोध करती रही। परंतु स्वतंत्रता प्राप्ती के बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी 1950 को वन्दे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने सम्बन्धि एक व्यक्तव्य पढा जिसे सभा द्वारा स्वीकार किया गया। 


इस गीत की प्रसिद्धी का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि, 2003 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक सर्वे में शीर्ष दस गीतों में वन्दे मातरम् गीत दूसरे स्थान पर था। इस सर्वे में लगभग 150 देशों ने मतदान किया था। 

ये अजीब विडम्बना है कि पिछले कुछ समय से वन्दे मातरम् पर विवाद उत्पन्न हो रहा है। विवाद मुख्यतः ये है कि इस गायन से मुर्ती पूजा का भाव प्रकट होता है। इस कारण मूर्ती पूजा के विरोधी सम्प्रदाय इसकी उपेक्षा करने लगे हैं। जबकि स्वतंत्रता से पूर्व मौलाना अबुल कलाम आजाद और सिमान्त गाँधी यानि की खान अब्दुल्ल गफ्फार खाँ जो की पाँचो समय की नमाज पढते थे, वे भी वन्दे  मातरम् के प्रति खङे होकर सम्मान व्यक्त करते थे। परंतु आज कुछ अलग तरह की राजनितिक वातावरण के कारण मातृ भूमी को नमन करता वन्दे मातरम् गीत उपेक्षित हो रहा है। जबकि सैकङों देशभक्त इस उद्घोष को बोलते-बोलते फांसी के फंदे पर झूलकर शहीद हो गये। 

मित्रों, सवतंत्रता दिवस की 68वीं वर्षगाँठ पर हम सब ये संक्लप लें कि शहिदों की शहादत को याद करते हुए वन्दे मातरम् को सम्पूर्ण भारत में गुंजायमान करेंगे। 


वन्दे मातरम्।
सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलाम् मातरम्। वन्दे मातरम्।। 

शुभ्रज्योत्सना पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीम् सुमधुरभाषिणीम्,
सुखदाम् वरदाम् मातरम्। वन्दे मातरम्।। 

अर्थात, हे भारत माँ मैं आपकी वंदना करता हुँ। स्वच्छ और निर्मल पानी, अच्छे फलों,  सुगन्धित सुष्क समीर (हवा) तथा हरे भरे खेतों वाली माँ, मैं आपकी वंदना करता हूँ। सुन्दर प्रकाशित रात,  सुगंधित खिले हुए फूलों एवं घने वृक्षों की छाया प्रदान करते हुए, सुमधुर वाणी के साथ वरदान देने वाली भारत माता मैं अपकी वंदना करता हूँ। मैं आपकी वंदना करता हूँ।  

जय भारत












Saturday, 9 August 2014

रक्षाबंधन की हार्दिक बधाई

बंधन स्नेह और विश्वास का

पवित्र रिश्ते को केवल धागे से न जोङो, हर दिन रक्षा बंधन समझो।
मूक दर्शक न बन मानव,  सब बेटी और बहनों की रक्षा का मन में प्रण हो। 
मानवता की रक्षा का संक्लप लिए रक्षाबंधन का ये पर्व समस्त सजीव जगत के लिए शुभ और सुरक्षित हो। 


                                     रक्षाबंधन की बहुत बहुत बधाई 

नोटः- रक्षाबंधन पर मेरे द्वारा लिखे लेख को पढने के लिए लिकं पर क्लिक करें।

Tuesday, 29 July 2014

प्रेमचंद जी की कहानी 'मंत्र'


प्रेमचंद के उपनाम से लिखने वाले धनपत राय हिन्दी और उर्दु के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। मुशी प्रेमचंद और नवाब राय तथा उपन्यास सम्राट के नाम से अविभूत प्रेमचंद एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक विरासत हैं। ठेठ देहाती धोती-कुर्ता ग्रामीण वेष-भूषा में गोरी सूरत, घनी काली भौहें, छोटी-छोटी आँखें, नुकीली नाक और बङी-बङी गुछी हुई मूँछों वाला मुसकराता चेहरा मुंशी प्रेमचंद के व्यक्तित्व को परिलाक्षित करता है। बचपन से ही रोने-खीजने वाली परिस्थितियों को हंसी में उङाने वाले प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस के पास लमही नामक गॉव में हुआ था।

आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के पक्षधर मुशी प्रेमचंद जी अपनी इस मनोवैज्ञानिक धारणा को प्रतिष्ठित करके पाठकों के सम्मुख रखते हैं। मंत्र कहानी का रूप भी इसी प्रकार का है जिसमें यथार्थ और आदर्श का गहरा द्वन्द है और अंत में विजय आदर्श की होती है। कहानी में भगत अपने आर्दशत्मक व्यवहार से पाठकों पर गहरी छाप छोङता है। वहीं डॉ. चढ्ढा का भी चरित्र कहानी के अंत में आदर्श को स्पर्श करता है।

                           मंत्र
डॉ. चढ्ढा गोल्फ खेलने जा रहे थे। उसी समय एक ग्रामीण बिमार पुत्र को लेकर आता है। परन्तु डॉ.साहब उसको एक नजर भी देखने का कष्ट नही उठाते। वो बेचारा ग्रामीण उनसे लाख विनती करता है, अपनी पगङी तक उतार कर रख देता है और ये भी कहता है कि यदि उन्होने रोगी को नही देखा तो वो मर जायेगा। परंतु डॉ. चढ्ढा पर उसकी याचना का कोई प्रभाव नही पङता। डॉ. साहब मोटर में बैठकर चले जाते हैं। उसी रात उस वृद्ध ग्रामीण का एक मात्र सहारा उसका 7 वर्ष का पुत्र मर जाता है।

वहीं दूसरी ओर डॉ. साहब के पुत्र का नाम कैलाश था, जो कॉलेज में पढता था। इस घटना को कई वर्ष बीत चुके थे। कैलाश की बीसवीं सालगिरह थी। उसकी प्रेमिका और सहपाठिनी मृणालीनी भी इस अवसर पर उपस्थित थी। कैलाश को साँप पालने का शौक था। उसने सर्पों के बारे में एक सपेरे से बहुत कुछ सीखा था। जन्मदिन के उपलक्ष पर मृणालिनी ने कैलाश से सांप दिखाने का आग्रह किया। पहले तो उसने मना कर दिया किन्तु आग्रह बढने पर दिखाने के लिए राजी हो गया। मित्रों ने कटाक्ष किया कि दाँत तोङ दिया होगा। कैलाश ने कहा कि सबके दाँत सुरक्षित हैं। इसपर लगभग कई दोस्त कहने लगे दिखाओ तो सच माने। कैलाश इस बात से तिलमिला गया और एक काले साँप को पकङ कर बोला कि ये मेरे पास सबसे विषेला साँप है, मैं इसके दाँत दिखाता हुँ। इस क्रिया में कैलाश ने उस साँप की गरदन दबा दी। दबाव के कारण विषधर ने मुहँ खोल दिया जिससे दाँत साफ दिखाई देने लगे। परंतु ज्यों ही कैलाश ने साँप की गरदन ढीली की उसने कैलाश को काट लिया। जङी-बूटी लगाई गई, झाङ-फूक वाले को बुलाया गया। सारे उपाय व्यर्थ हो गये कैलाश की हालत बिगङती गई। आनंद का माहौल दुःख में बदल गया। पूरे गॉव में आग की तरह ये खबर फैल गई कि डॉ.चढ्ढा के बेटे को साँप ने काट लिया।

उस समय जोर की ठंड पङ रही थी, बुढा ग्रामीण भगत अपनी झोपङी में आग ताप रहा था उसे भी ये समाचार मिला।  80 साल के जीवन में अभी तक यदि कहीं भी साँप काटने की बात भगत सुनता तो दौङा चला जाता था क्योंकि जहरीले से भी जहरीले साँप का जहर वो उतार सकता था। परंतु इसबार उसके मन में प्रतिक्रिया का भाव जागा। उसे उपने बेटे का दम तोङता चेहरा याद आ गया। उसने सोचा अब डॉ. चढ्ढा को पता चलेगा कि बेटे का दर्द क्या होता है। लेकिन कुछ पल बाद ही भगत के मन में ख्याल आया कि जीवन तो अमुल्य है उसे बचाना पुन्य काम है। उसके मन में आक्रोश और कल्याण भावना में द्वन्द होने लगा। अंत में कल्याण की भावना भगत पर हावी हो गई क्योंकि वो बहुत नेक इंसान था। गरीब होते हुए भी इंसानियत का धनी था।

डॉ. के उदासीन व्यवहार के बावजूद भगत चढ्ढा की कोठी पर गया। उस समय रात्री के 2 बज रहे थे, भयंकर ठंड पङ रही थी। भगत ने कैलाश को देखा और डॉ. से बोला की अभी कुछ नही बिगङा है, कहांरो से पानी भरवाओ। कैलाश के ऊपर पानी डाला जाने लगा और वृद्ध भगत मंत्र पढने लगा। प्रातः काल होते-होते कैलाश ने आँखे खोल दी। उसे ठीक करके भगत चुप-चाप वहाँ से चला गया। सुबह भगत का चेहरा देखकर डॉ. चढ्ढा को याद आया कि ये वही बुढ्ढा है जो एकबार अपने बेटे को इलाज के लिए लाया था, लेकिन तब तक भगत अपने घर जा चुका होता है। डॉ. चढ्ढा को अपने किये पर पछतावा होता है। वो भगत से क्षमा माँगने के लिए उसे ढूढते हैं। डॉ. अपनी पत्नी से कहते हैं कि, गरीब और अशिक्षित होते हुए भी इस वृद्ध ने सज्जनता और कर्तव्य का आदर्श प्रस्तुत किया है।


प्रस्तुत कहानी में प्रेमचंद जी ने इंसानियत और कर्तव्य की शिक्षा देते हुए ये समझाया है कि बदले की भावना को कभी भी सच्चे आर्दशों पर हावी नही होने देना चाहिए और कैलाश के चरित्र के माध्यम से ये समझाया है कि शेखी बघारने से कितना बङा नुकसान हो सकता है। जन-मानस में भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर को भगत के व्यवहार से ये बोध हो जाता है कि, समाज में हर किसी को एक दूसरे की आवश्यकता हो सकती है। कोई बङा या छोटा नही होता। प्रेमचंद जी की सभी कहानियाँ सामाजिक पहलु को साकार करते हुए जन-मानस को सकारात्मक संदेश देती हैं। 

Monday, 28 July 2014

ईद मुबारक



ऐ खुदा दुनिया से बैर को मिटा दे,
नेकी और अमन की खुशबु से, चमन मेहका दे।

सदभावना और भाईचारे के साथ, ईद मुबारक हो

Monday, 21 July 2014

रुढीवादी सोच को अलविदा कहें


10 जुलाई को 2014 के आम बजट में वित्तमंत्री ने घोषङा की कि, 100 करोङ रूपये बेटी बचाओ, बेटी पढाओ पर खर्च किया जायेगा। 10 जुलाई को ही केन्द्र सरकार सी सबसे छोटी ईकाइ ग्राम पंचायत ने ऐसा तुगलकी फरमान जारी किया कि इंसानियत भी शर्मसार हो गई। करोङों की योजनाओं को ग्राम पंचायत के संवेदनाहीन फैसले ने धज्जियां उङा दी। साल दर साल योजनाएं बनती हैं, ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नही है 2013 को ही देखें निर्भया कांड में अनेक आन्दोलन हुए। सरकार द्वारा बेटीयों की सुरक्षा हेतु निर्भया कोष भी बनाया गया। आज देश में ही नही पूरे विश्व में नारी सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है जिसके मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी कई योजनाएं शुरू की। महिलाओं के सम्मान और उनके संरक्षण हेतु देश के पहले एकीकृत संकट समाधान केन्द्र 'गौरवी' का 16 जून 2014 को भोपाल में आरंभ हुआ। फिर भी NCRB ( National Crime Records Bureau) के अनुसार भारत में  प्रतिदिन 93 महिला हैवानियत का शिकार होती है। मन में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इतनी सजगता के बावजूद आज बेटीयां सुरक्षित क्यों नही हैं????????????

भारत भूमी पर कहा जाता है कि,  "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"  यहाँ तो कन्या को देवी मानकर नौ दिन पूजा भी की जाती है। विचार किजीए फिर भी  महिलाओं और बेटीयों के प्रति अभद्रता क्यों ??

सुरक्षा, इंसाफ, न्याय, योजनाएं ये सिर्फ शब्द मात्र हैं ज़मीनी हकीकत तो ये है कि आज हमारा समाज मानवता से परे संवेदनाहीन नजर आ  रहा है। सरे आम बेटीयों के साथ बदसलुकी और तमाशबीन बेबस लाचार समाज सिर्फ मूकदर्शक रह गया है। हमारी मानवीय सामाजिक सोच को जैसे लकवा मार गया है। ऐसी बेमेल धार्मिक परंपराएं जहाँ माताएं बेटे की लंबी उम्र के लिए उपवास और धार्मिक अनुष्ठान करती हैं वहीं बेटी की खुशहाली या लंबी उम्र के लिए कोई व्रत या अनुष्ठान नही होता। जन्म से ही भेद-भाव का असर दिखने लगता है बेटीयों को उपेक्षित तथा बेटों को आसमान पर बैठा दिया जाता है। भेद-भाव का बीज हम सब बोते हैं और बाद में चाहें कि बेटा बेटी का सम्मान करे ये क्या स्वाभाविक हो सकता है ! जब बीज ही असमानता को बोयेंगे तो फल समानता का कैसे मिलेगा।

सोचिए ! जिस दुनिया में बेटीयों को जन्म लेते ही पक्षपात का शिकार होना पङता हो वहाँ बेटीयाँ कितनी भी काबिल हों जाएं उन्हे लङकों से कमतर ही माना जायेगा क्योंकि हमारी बुनियादी सोच ही दोहरी मानसिकता के साथ फल-फूल रही है। आज भी अनेक परिवारों में भले ही लङकी डॉक्टर या इंजिनीयर हो वो लङके से ज्यादा कमाती हो फिर भी उसे सुन्दरता और दहेज की कसौटी पर कसा जाता है। विवाह के लिए लङके वालों के समक्ष नुमाईश की तरह पेश किया जाता है, जहाँ पसंद नापसंद का अधिकार लङकों को दिया जाता है। हमारी विषाक्त सामाजिक सोच से लङके को शंहशाह बना दिया जाता है वो जो चाहे कर सकता है। जिसका असर 21वी सदी के भारत पर भी छाया हुआ है। आज भी पुरूष प्रधान समाज की तूती बजती है, जहाँ 5 साल की बच्ची हो या 50 साल की महिला कोई सुरक्षित नही है। 

समाज का लगभग आधा भाग यानि की स्त्री वर्ग की भूमिका को भी अनदेखा नही किया जा सकता। हमारी माताओं की भी जिम्मेदारी है बेटीयों को भेद-भाव मुक्त समाज देने की किन्तु कई बार वो स्वयं ही इस दकियानुसी सोच का हिस्सा होती हैं। कहते हैं कि, औरत ही औरत की दुश्मन होती है। इस बात की गहराई हाल ही में घटी बोकारो की घटना से समझी जा सकती है।   10 जुलाई को झारखंड के बोकारो की एक ग्राम पंचायत के तुगलकी  फरमान  को  यथावत एक महिला ने ही आगे बढाया। सोचकर ही मन सिहर जाता है कि 10 साल की बच्ची को एक महिला ने ही हैवानियत की अग्नी में कैसे ढकेल दिया ! 

यदि हमें स्वस्थ भारत और बेटीयों के लिए भयमुक्त भारत बनाना है तो समाज में बेटीयों का सम्मान जन्म से ही होना चाहिए। सामाजिक ढांचे के सभी पहलुओं पर संजीदगी से विचार करना चाहिए। जहाँ स्त्री को केवल एक उपभोग की वस्तु ही समझा जाता है, ऐसे माध्यमों पर सख्ती से रोक लगानी चाहिए। नारी को बाजारवाद की वस्तु न मानकर उसे भी समाज का सम्मानित हिस्सा मानना चाहिए। स्वस्थ समाज के लिए मनोरंजन की आङ में फैल रहे अश्लील कार्यक्रमों और विज्ञापनों को कठोर कानून से बन्द करना भी एक आवश्यक कदम है। विकास का मतलब ये कदापी नही है कि हम पाश्चात्य के खुलेपन को भी स्वीकारें। समाज में जागरुकता से  पक्षपात की अमानवीय सोच को समाप्त किया जा सकता है। 

रूढीवादी विषाक्त सोच भले ही आज सुरासा के मुहँ की तरह है फिर भी उसका अन्त किया जा सकता है। यदि समाज के दोनों आधार स्तंभ (नर और नारी )  मिलकर बेटी और बेटा को एक नजर से देखेंगे और समाज में व्याप्त रूढीवादी सोच को अलविदा कहेंगे तो, समभाव के दृष्टीकोंण से जलाई अलख से बेटीयों के सम्मान का सूरज जरूर उदय होगा।  

स्वामी विवेकानंद जी कहते हैंः-  हम वो हैं जो हमारी सोच ने हमें बनाया है, इसलिए इस बात का ध्यान रखिये कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौंण हैं, विचार दूर तक यात्रा करते हैं। 

अतः सुसंस्कारों और सकारात्मक सोच से भ्रमित लोगों के मन में सामाजिक रिश्तो के प्रति आदर की भावना को जागृत करके महिलाओं और बेटीयों के साथ हो रहे दुराचार को रोका जा सकता। सुसंस्कृत शिक्षा से बेटी बचाओ, बेटी पढाओ योजनायें अवश्य सफल होंगी। 

मित्रों, यदि आपको लगता है कि इसके अलावा भी कुछ और पहलु  हैं जिसमें भी सुधार होना चाहिये तो अपने विचार अवश्य लिखें। सभ्य सामज का आगाज हम सब की नैतिक जिम्मेदारी है। 
धन्यवाद















Friday, 18 July 2014

HAPPY RAINY DAY



गर्मी की तपिश के बाद बारिश की बूंदे जीवनदायनी होती हैं। मुरझाए हुए पेङ-पौधों में जान आ जाती है। चारो तरफ की हरियाली देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानो पेङ-पौधे बारिश का स्वागत कर रहे हों। नाचते हुए मोर,  कोयल की बोली तथा पक्षियों का कलरव मौसम के ताल को और भी संगीतमय कर देते हैं। किसान के लिए बारिश ईश्वरीय वरदान की तरह होती है, तो वहीं  धरती के सभी सजीव जगत के मन को सावन की बूंदे हरा-भरा कर देती है। 

बरखा रानी आई कर सोलह श्रंगार।
मेघों की काली साङी और बिजली की पायल पहने लगती अति सुंदर।
रह-रह कर वह बरसाती ऐसी रसधार कि मगन हो नाच उठे सारा संसार।

भारतीय सिनेमा ने भी  बरसात को और भी मनोहारी बना दिया है। बारिश की बूंदो से तरबतर लोग स्वतः ही बरसात के गानो को गुनगुनाने लगते हैं। बच्चों के लिए तो मानो मौज-मस्ती की बरसात हो जाती है, अधिक बारिश से स्कूल की छुट्टी और फिर कागज की नाव बनाकर पानी में तैराना कितना खुशनुमा नजारा होता है, जहाँ न कोई चिन्ता न कोई फिकर बस फुल टू मस्ती।

रिमझिम बारिश के साथ अदरक की चाय और पकोङे का कॉम्बिनेशन तो हर दिल अजीज होता है। कई जगहों पर तो सिर्फ बरसात में बनने वाले झरने लोगों के लिए पिकनिक स्पॉट बन जाते हैं। हर तरफ प्रकृति अपनी रिमझिम फुहार से गमों की तपिश को भी राहत दे देती है और त्योहारों की भी खुशनुमा शुरुवात हो जाती है। सावन में  राखी, तीज, कजरी और हर-हर महादेव की गूंज वातावरण को पवित्र उल्लास से तरबतर कर देती है।

ये बारिश की बूंदे एक तरफ तो हरियाली तो दूसरी तरफ प्रेम का संदेश भी देती हैं। किसी को चुङी में तो किसी को पायल में अपने साथी की आवाज सुनाई देने लगती है। धरती पर पङने वाली बूंदो से सोंदी-सोंदी मिट्टी की खुशबु वातावरण को अपने आने का एहसास करा देती है। कहते हैं कुदरत के कणं-कंण में संगीत बसता है, ये बातें बरसात में शत् प्रतिशत सच हो जाती हैं जब बादलों की गरज और बिजली की चमक के साथ पानी की बूंदे नृत्य करती हुई झरनों के माध्यम से प्रकृति को और भी मनोहर बना देती हैं। कवियों की कलम तो बारिश की बूंदो से ऐसी सम्मोहित हो जाती हैं कि कवि की कल्पना को कविताओं में अभिव्यक्त करने को आतुर हो जाती हैं। किसी ने सच कहा है कि,  "Rain is not only drops of water, It is the Love of Sky for Earth."

Enjoy the Love of Nature
Happy Rainy Day 





Saturday, 12 July 2014

जातिय, धार्मिक और भाषाई बंधनो से मुक्त भारत हो



पुरातन काल से भारत वर्ष सदा ही ज्ञान का आधार रहा है। भारत की धरती पर अनेक जाति, धर्म और सम्प्रदाय तथा भाषा के लोग इस प्रकार रहते हैं जैसे कि, एक वाटिका में अनेकों सुगंधित पुष्प। भारत की धरती हमेशा 'अतिथी देवो भवः' को आत्मसात करते हुए अनेक नामों से पहचानी जाती है। कोई इसे हिन्दोस्तान कहता है तो कोई इण्डिया जिसमें हिंदुज़म, जैनिज़म,  बौधिज़म, सिखीज़म, इस्लाम तथा ईसाइ धर्म समाया हुआ है। ऐसे अद्भुत भारत देश को 11 सितंबर 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद जी ने गौरवान्वित किया। भारत की श्रेष्ठ धार्मिक छवी से प्रभावित होकर 'न्यूयार्क हेरल ट्रिबूट्स' ने लिखा था कि, भारत जैसे देश में धार्मिक मिशनरियों को भेजना कितनी बङी मूर्खता थी।


आज उसी धरती पर धर्म, जाति और भाषा, विवाद का विषय बनता जा रहा हैं। कहने को तो हम विकासशील देश से आगे कदम बढाते हुए विकसित राष्ट्र की ओर अग्रसर हो रहे हैं। नई-नई तकनिकों का आविष्कार कर रहें हैं। फिर भी धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले महानुभावों के असंवेधानिक वचनो के जाल में उलझ जाते हैं। जबकि हम सब ही नही वरन् विज्ञान भी इस बात को मानता है कि, कोई शक्ति है जो पूरे ब्रह्माण्ड को  चला रही है। उस सर्वशक्ति को हम सभी ने अपने-अपने अुनसार एक रूप और नाम दे दिया है। ये रूप हमारी आस्था के प्रतीक हैं। किसी ने सच कहा है कि मानो तो ईश्वर न मानो तो पत्थर। हमारी आस्था के प्रतीक राम, रहीम, शिव, ईसामसीह हों या पैगंबर साहेब, गुरू नानक या साई बाबा हों या कृष्ण  ये सभी उस शक्ति का मूर्त रूप हैं जहाँ मनु्ष्य अपनी परेशानियों से निजात पाने के लिए अरदास ( प्रार्थना ) करता है। जिस दर पर सुकून और खुशियाँ मिल जाती हैं वही उस व्यक्ति के लिए पूजित हो जाता है।


कबीर दास जी कहते थे कि, 
"हिन्दु कहत है राम हमारा, मुसलमान रहमान।
आपस में दौऊ लङै मरतु हैं, मरम कोई नही जाना।।"

अर्थातः- हिन्दु कहते हैं कि हमारे राम सब कुछ हैं और मुसलमान कहते हैं कि रहीम ही सबकुछ हैं। इस तरह से ये आपस में लङते मरते रहते हैं। जबकि  सच तो यही है कि राम और रहीम एक ही हैं।


प्रकृति भी हमें धार्मिक, भाषाई और जातिय सिमाओं में नही बाँधती। सूरज सबको एक समान धूप देता है, हवा हिन्दु, मुस्लिम, सिख्ख या ईसाइ नही देखती। पेङ सभी के लिए फल देता है। परन्तु सबसे बुद्धिमान कहा जाने वाला प्राणी मनुष्य ही शान्ति के चमन को भेद-भाव की दुषित मानसिकता से नष्ट कर रहा है।  सोचिए ! यदि किसान जातिय और धार्मिक बंधनो में बंध जाये तो जिवन उपयोगी मूलभूत आवश्यक्ताओं की पूर्ती क्या संभव हो पायेगी ?

जब कोई व्यक्ति जिंदगी और मौत से जूझ रहा होता है तब उसे एवं उसके परिजन को डॉक्टर ही भगवान नजर आता है  तब वो ये नहीं देखते कि डॉक्टर किस जाति या धर्म को मानने वाला है। डॉक्टर भी इन बंधनो से मुक्त मरीज के इलाज को ही प्रथमिकता देते हैं। कल्पना किजीए यदि डॉक्टर भी भेद-भाव करने लगे तो क्या होगा ?  वहीं दूसरी तरफ परेशानी की इस घङी में परिजन अपने अस्वस्थ प्रियजन की सलामती के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। अपने मित्रों के परामर्श पर अन्य विपरीत धर्म के प्रतीकों से मन्नत माँगने में भी परहेज नहीं करते क्योंकि यहाँ प्रियजन की सलामती प्रमुख होती है और प्रियजन के ठीक हो जाने पर आस्था की एक नई ज्योति प्रज्वलित होती है, जो धार्मिक एवं जातिय बंधनो से मुक्त होती है। 


हमारे संविधान में भी प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने अनुसार धर्म, जाति एवं भाषा मानने को स्वतंत्र है। फिर क्यों कभी मौलवियों का फरमान तो कभी मठाधीशों के कट्टर अस्वभाविक बयानों से देश की शान्ति को भंग करने का प्रयास किया जाता हैं। जबकि हमारी पवित्र पुस्तकें कुरान, गीता, रामायण या बाइबल में इंसानियत की सीख दी गई है।  फिर भी इस अमुल्य सीख से बेखबर हमारे धर्माधिकारी विवादस्पद बयान दे देते हैं जिसका सबसे ज्यादा नुकसान उस निरिह जनता का होता है जिसके घर में दिन की आमदनी से रात का चुल्हा जलता है।  इस बात पर विचार करना चाहिए कि, क्या धार्मिक और जातिय प्रतिबंधो से विकास की इबारत लिख सकते हैं?   ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, स्वयं का या देश-दुनिया का विकास सभी के सहयोग से ही संभव है।


स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि,  "सभी धर्मों का गंतव्य स्थान एक है। जिस प्रकार विभिन्न मार्गो से बहती हुई नदियां समुंद्र में जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार सब मत मतान्तर परमात्मा की ओर ले जाते हैं। मानव धर्म एक है, मानव जाति एक है।" 

मित्रों, हम सब मिलकर विकास के इस दौर में जातिय, भाषाई और धार्मिक बंधनो से मुक्त भारत का पुनरुथान करें। जहाँ की धरती पर युगों-युगों से सभी धर्मों तथा जातियों और अत्याचार पिङित मनुष्यों को आश्रय  मिलता रहा है, ऐसी पवित्र भुमि भारत देश में भारतीयता हमारी जाति हो और इंसानियत ही हमारा धर्म हो। 

जय भारत 







Friday, 27 June 2014

विवाह जैसे पवित्र बंधन पर तलाक का ग्रहणं क्यों???

हिन्दु धर्म में प्रचलित सोलह संस्कारों में से एक संस्कार है विवाह, जिसके गठबंधन से दो लोगों यानि की वर एवं वधु ही नही बल्की दो परिवारों, दो संस्कारों का भी मिलन होता है। मानव समाज की महत्वपूर्ण प्रथा विवाह के अंर्तगत वर एवं वधु अग्नि को साक्षी मान कर तन, मन और आत्मा के पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हमारे पुराणों, वेदो एवं साहित्यों में भी विवाह की मर्यादा को स्थापित किया गया है।समाज में  हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाने वाला वैवाहिक बंधन का कार्यक्रम दो दशक पहले तक 10 - 12 दिन तक चलता था। समय के साथ 5 दिन का हो गया फिर तीन दिन में ही विवाह कार्यक्रम संपन्न होने लगे। आज आलम ये है कि समाज का अति महत्वपूर्ण संस्कार महज तीन घंटे में संपन्न हो जाता है। समय की कमी का रोना रोने वालों के लिए वो दिन दूर नही जब विवाह जैसा पवित्र बंधन "रेडी टू ईट" की तरह दो मिनट में ही पूर्ण हो जायेगा। 

कहते हैं "सोना तप कर ही कुन्दन बनता है" उसी प्रकार वैवाहिक बंधन भी अपनी-अपनी रीति-रिवाजों के अनुसार हवन की वेदी पर अग्नि के समक्ष किये गये वादों से मजबूत होता है। समय के परिवर्तन ने और आधुनिकता की आँधी से इस पवित्र संस्कार में बदलाव की बयार बह रही है। जहाँ गोत्र, जाति, धर्म एवं गुण आदि का कठोरता से पालन होता था वहाँ अब लङके लङकियों की राय और पसंद को महत्व दिया जा रहा है। पूराने जमाने की मान्यताओं, उपजाति, योग्य वर, सुशील दुल्हन जैसी कसौटियों से हट कर पालक की सहमति से अंर्तजातिय विवाह को सहमति मिल रही है। जाति तो अब केवल राजनैतिक उपकरण रह गई है।  

शादी को लेकर अब लचीला और व्यवहारिक रवैया अपनाया जा रहा है। वैचारिक सामजस्य पर अधिक जोर दिया जा रहा है। वर-वधु की तलाश पंडितों या रिश्तेदारों की बजाय वैवाहिक विज्ञापनो तथा इंटरनेट के माध्यम से की जा रही है। मन में प्रश्न ये उठना स्वाभाविक है कि आज अधिक लचिलापन, वैचारिक महत्व और उच्च शिक्षा के बावजूद वैवाहिक बंधन तलाक जैसी कुप्रथा की अग्नि में पहले से ज्यादा क्यों सुलग रहे हैं?

विज्ञान की नित नई टेक्नोल़ॉजी जहाँ विकास के नये आयाम खोल रही है वहीं, वैचारिक सामजस्य के बावजूद विवाह जैसे पवित्र बंधन को विच्छेद भी कर रही है। एक सर्वे के अनुसार विगत एक साल में तलाक का कारण आधुनिक परिवेश में व्याप्त फेसबुक और वाट्सअप जैसी सुवधाएं भी हैं। कई बार नेटवर्क प्रॉब्लम की वजह से कुछ ऐसी गलतफहमी हो जाती है कि बात तलाक तक पहुँच जाती है। वास्तव में हम सभी आज आधुनिकता के रंग में इस कदर रंग गये हैं कि एक दूसरे की बातों को धैर्य से सुनने की शक्ति को कहीं खोते जा रहे हैं। एक तरफ तो हमारी नई टेक्नोल़ॉजी और दूसरी तरफ सामाजिक दुषित मान्यता रिश्तों को तोङने में "आग में घी" का काम करती हैं। 

आज हम कितने भी आधुनिक होने का परचम फैलाएं किन्तु अभी भी सिर्फ लङकियों को ही अच्छी पत्नी एवं अच्छी बहु बनने की नसीहत दी जाती है। कोई भी अभिभावक अपने बेटे को एक अच्छा पति एवं अच्छा दामाद बनने की नसिहत क्यों नही देते?  21वीं शदी में लङका और लङकी की बराबरी की बात करते हैं। हिन्दु अधिनियम 955 के तहत दोनों को बराबरी का दर्जा देते हैं। वेदों के अनुसार भी पत्नि को आधा अंश कहते हैं। "ताली तो दोनो हाँथ से ही बजती है" फिर सिर्फ एक को नसिहत देने से विवाह जैसे पवित्र बंधन को कब तक टूटने से बचाया जा सकता है। 


कुछ लङके प्यार  को समझते हुए भावनात्मक भावनाओं से युक्त यदि अपनी पत्नी की काबलियत का आदर करते हैं और उनकी कही बात को  अहमियत देते हैं तो, हमारे अपने कहे जाने वाले रिश्ते ही इस भावना को "जोरू का गुलाम" जैसी उपाधी दे देते हैं। कई बार ऐसे आघातों से दामपत्य जैसा मधुर रिश्ता धाराशायी हो जाता है। 

विवाह संबन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए काउनसलर (सलाहाकारों) की बढती बयार यही दर्शाती है कि हमारे समाज में आज हम भले ही अधिक शिक्षित हो गये हों, अधिक आर्थिक संपन्न हो गये हों परन्तु भावनात्मक रिश्तों को आपस में सुलझाने में असर्मथ हैं। ये सलाहकार मनोवैज्ञानिक दृष्टीकोंण से समझा जरूर सकते हैं किन्तु रिश्ते सदैव मधुर रहें इसकी गारंटी नही देते। अतः वैवाहिक युगल को अपनी समस्याओं को आपसी बातचीत और धैर्य के साथ स्वविवेक से हल करना चाहिए, जिससे आधुनिकता के परिवेश में भी  हम अपनी संस्कृति जो की भावनात्मक रिश्तों की नींव है, उससे दूर न हों सकें। 

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, विवाह जैसे पवित्र संस्कार को जिस पर सृष्टी  को आगे बढाने का दायित्व भी है ऐसे पवित्र बंधन को अपने प्यार, समर्पण और आपसी समझदारी से इतना मजबूत करना चाहिये कि आधुनिकता और सामाजिक दुषित सोच  इस बंधन को तोङ न सकें। 

Marrige is a thousand little things.... 
It's giving up your right to be right in the heat of an argument. It's forgiving another when the let you down . It's loving someone enough to step down so they can shine. It's frindship. It's being a cheerleader and trusted confidant. It's place of forgiveness that welcomes one home and arms they can run to in the mist of a storm. 
It's grace. 

Wednesday, 25 June 2014

उत्तराखण्ड के पाँच प्रयाग



भारत वर्ष में पवित्र नदियों के संगम को प्रयाग कहा जाता है। इलाहाबाद में गंगा, जमुना एवं सरस्वती के संगम को प्रयाग राज कहा जाता है। ऐसे ही उत्तराखण्ड के पाँच प्रयागों का हमारे धर्मों में विषेश महत्व है। जो इस प्रकार हैः-


देवप्रयागः- अलकनंदा तथा भगीरथ नदियों के संगम पर देवप्रयाग नामक स्थान स्थित है। इसी संगम स्थल के बाद इस नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है । यह समुद्र सतह से १५०० फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। देवप्रयाग में शिव मंदिर तथा रघुनाथ मंदिर हैजो की यहां के मुख्य आकर्षण हैं। रघुनाथ मंदिर द्रविड शैली से निर्मित है। देवप्रयाग को सुदर्शन क्षेत्र भी कहा जाता है। देवप्रयाग में कौवे दिखायी नहीं देतेजो की एक आश्चर्य की बात है।



रुद्र प्रयागः- रुद्र प्रयाग मंदाकिनी और अलकनंदा के संगम पर स्थित है। अलकनंदा का उद्गम स्थल बद्रीनाथ धाम है एवं मंदाकिनी शिव के क्षेत्र केदारनाथ से प्रवाहित होती है। रुद्र प्रयाग में ही नारद जी ने रुद्र रूप शिव से संगीत का ज्ञान प्राप्त किया था। यहाँ शिव के रुद्र अवतार का दर्शन होता है। यहीं पर भगवान रुद्र ने श्री नारदजी को `महतीनाम की वीणा भी प्रदान की थी। यहीं से केदारनाथ के दर्शन हेतु यात्रा मार्ग आरंभ होता है। यहाँ की संध्या आरती का सौभाग्य हम दोनों को भी प्राप्त हुआ जो अति आनंदमय क्षण था।

कर्ण प्रयागः-  कर्ण प्रयाग में अलकनंदा तथा पिंडर नदी का संगम स्थल है। पिण्डर का एक नाम कर्ण गंगा भी हैजिसके कारण ही इस तीर्थ संगम का नाम कर्ण प्रयाग पडा। यहीं पर महादानी कर्ण द्वारा भगवान सूर्य की आराधना और अभेद्य कवच कुंडलों का प्राप्त किया जाना प्रसिद्ध है। कर्ण की तपस्थली होने के कारण भी इस स्थान को कर्णप्रयाग कहा जाता है।

नंद प्रयागः- नंदाकिनी एवं अलकनंदा के संगम को नंद प्रयाग कहते हैं। कर्णप्रयाग से उत्तर में बदरीनाथ मार्ग पर 21 किमी आगे नंदाकिनी एवं अलकनंदा का पावन संगम है। पौराणिक कथा के अनुसार यहां पर नंद महाराज ने भगवान नारायण की प्रसन्नता और उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए तप किया था। यहां पर नंदादेवी का भी बड़ा सुंदर मन्दिर है। नन्दा का मंदिरनंद की तपस्थली एवं नंदाकिनी का संगम आदि योगों से इस स्थान का नाम नंदप्रयाग पड़ा। संगम पर भगवान शंकर का दिव्य मंदिर है। यहां पर लक्ष्मीनारायण और गोपालजी के मंदिर दर्शनीय हैं। यह सागर तल से २८०५ फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है।है।

विष्णु पुराणः- विष्णु पुराण धौली गंगा तथा अलकनंदा का संगम स्थल है। यहाँ विष्णु जी की प्रतिमा से सुशोभित मंदिर और विष्णुकुण्ड दर्शनिय है। यहीं से सूक्ष्म बदरिकाश्रम प्रारंभ होता है। इसी स्थल पर दायें-बायें दो पर्वत हैंजिन्हें भगवान के द्वारपालों के रूप में जाना जाता है। दायें जय और बायें विजय हैं। स्कंद पुराण में इसका वर्णन वर्णित है।

भारत की संस्कृति में नदियों को देवी रूप प्रदान किया गया है, अतः उपरोक्त प्रयागों का दर्शन धार्मिक यात्रा में विशेष महत्व रखता है। इन पाँच प्रयागों के पश्चात ही देव प्रयाग के बाद से ही इस धरती पर माँ गंगा का अवतरण होता है। ऋषिकेश से अलकनंदा मंदाकिनी नंदाकिनी धौली गंगा पिंडर नदी तथा भागीरथी माँ गंगा के नाम से इस धरती पर पूज्यनिय हैं। पवित्र पावनी जीवनदायनी मोक्षदायनि माँ गंगा को निमर्ल एवं स्वच्छ रखने का प्रण करते हुए शत् शत् नमन करते हैं।

                

Tuesday, 24 June 2014

केदारनाथ धाम


हिमालय की गोद में तपस्वियों, ऋषियों की तपो भूमि केदारनाथ शिव धाम समुन्द्र तल से 11735 फिट की ऊँचाई पर स्थित अत्यन्त शोभायमान स्थान है। यहाँ परम् पिता महादेव का ग्यारहवाँ ज्योर्तिलिंग श्री केदारेश्वर के रूप में विद्यमान है। पौराणिक कथानुसार केदारनाथ से संबंधी प्रचलित कथा इस प्रकार हैः-

कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद गोत्र हत्या के पाप का प्रायश्चित्त करने के लिए पांडव काशी गये परन्तु वहाँ वे भोले भंडारी विश्वनाथ का दर्शन कर प्रायश्चित्त नहीं कर सके। ऐसा मानना है कि शिव शंकर उन्हे दर्शन देना नहीं चाहते थे, अतः वे हिमालय पर चले गये। पांडव महादेव को ढूढंते हुए हिमालय पहुँचे किन्तु शिव वहाँ से भी अदृश्य हो गये। इस स्थान को गुप्त काशी कहा जाता है। पांडव गौरी कुण्ड आदि स्थानों पर शिव को ढूंढते हुए आगे बढ रहे थे कि तभी नकुल और सहदेव को एक नर भैंसा दिखा जिसका रूप विचित्र था। विचित्र भैंसे को देखकर भीम उसके पीछे दौङे अत्य़धिक भागम-भाग के कारण भीम थक गये परंतु भैंसा भीम के हाँथ नहीं लगा। तभी भैंसे को दूर खङे देख भीम ने उसपर गदा से प्रहार किया तब भी वो भैंसा जमीन में मुख छिपाए बैठा रहा। भीम ने उसकी पूंछ पकङ कर जोर से खींचा तो भैंसे का मुख नेपाल में प्रकट हुआ जिसे पशुपतीनाथ के नाम से जाना जाता है। भैंसे का पार्श्वभाग वहीं रह गया, उसमें से दिव्य ज्योति प्रकट हुई। इस ज्योति में भगवान शिव शंकर प्रकट हुए और उन्होने पांडवों को दर्शन दिये। महादेव के आशिर्वाद से पांडव गोत्र हत्या के पाप से मुक्त हुए। पांडवों की प्रार्थना पर भगवान भोले नाथ त्रीकोंणिय आकार में भक्तों के कल्यांण हेतु वहीं विराजमान हो गये। नर भैंसे का पश्च भाग त्रीकोंणी था अतः शिव का ये रूप त्रीकोंणिय आकार में पूज्यनिय है।
नर भैंसे के रूप में प्रत्यत्क्ष शिवजी पर गदा से प्रहार करने की वजह से भीम बहुत दुःखी हुए तथा भोलेभंडारी शिव से क्षमा याचना माँगी तथा उनकी पीठ की घी से मालिश किये। आज भी केदार नाथ में पानी से अभिषेक करने के बजाय घी से अभिषेक किया जाता है। केदार नामक हिमालय चोटी पर स्थित होने के कारण इस ज्योर्तिलिंग को केदारेश्वर ज्योर्तिलिंग के रूप में पूजा जाता है।

केदारनाथ मंदिर एक ऊँचे चबूतरे पर बङे पत्थरों से बना मंदिर है। ऐतिहासिक साक्ष्य के अनुसार 1019 में राजा भोज ने इसे बनवाया था। 1800 में अहिल्लयाबाई होल्कर ने इसका जिर्णोद्वार करवाकर मंदिर पर स्वर्ण कलश स्थापित करवाया। मंदिर के सभामंडप में नंदी, पांडव, द्रोपदी, कुंती तथा कृष्ण भगवान की मूर्तियां भी स्थापित हैं। ज्योर्तलिंग का आकार त्रीकोंणिय होने के कारण इस पर जालाभीषेक नहीं किया जाता। केदार नाथ की प्रातः कालीन पूजा को निर्वाण दर्शन कहा जाता है तथा सांयकालीन पूजा को शृगांरदर्शन कहा जाता है। केदारनाथ धाम की महिमा का वर्णन गरुण पुराण,  शिव पुराण, सौर पुराण तथा पद्म पुराण आदि में वर्णित किया गया है। कार्तिक मास में जब जोर की हिम वर्षा होती है तो श्री केदारेश्वर का भोगसिंहासन निकालकर मंदिर का द्वार बंद कर दिया जाता है। चैत्र मास तक केदारनाथ जी का निवास उखीमठ में होता है।

वर्ष 2013 में आई प्राकृतिक सुनामी में जहां संपूर्ण बस्ती का विनाश हो गया वहीं केदार नाथ मंदिर का सुरक्षित रहना ईश्वरीय चमत्कार ही है। शिव की अद्भुत महिमा का ऐसा असर हुआ कि एक चट्टान पता नहीं कहाँ से आकर मंदिर के लिए सुरक्षा कवच बन गई। इस रहस्य की गुत्थी विज्ञान भी सुलझाने में असर्मथ है। गौरी कुण्ड में भी केवल माता भगवती का मंदिर, सुरक्षित बचा रहना आस्था के विश्वास को और भी मजबूत करता है। सर्व शक्तिमान बाबा केदारनाथ का आशिर्वाद हम सभी पर रहे तथा विश्वास और आस्था की अलख हम सभी के मन में जलती रहे। ऐसी पवित्र मनोकामना के साथ सब मिलकर प्रेम से बोले ऊँ नमःशिवाय