Tuesday, 13 March 2018

सोशल मिडिया के माध्यम से शिक्षा की नई मुहीम


"मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया"

2011 से शिक्षा के माध्यम से दृष्टीबाधित साथियों को आत्मनिर्भर बनाने का उद्देश्य लेकर शुरू हुआ सफर अपने दृष्टीदिव्यांग साथियों को आत्मनिर्भरता की मुस्कान प्रदान करते हुए 2018 में प्रवेश कर गया है। 2011 में अकेले चले थे आज लगभग 400 कार्यकर्ताओं का कारवां बन गया है। आज भारत के विभिन्न शहरों से जुङे अनेक लोगों के निःशुल्क और निःस्वार्थ योगदान से अपने अनेक दृष्टीबाधित छात्र बैंक, रेल, अध्यापन तथा प्रशासनिक सेवा में कार्य करते हुए सम्मान से अपना और अपने परिवार का जीवन यापन कर रहे हैं।

Voice For Blind द्वारा शुरू किया गया अध्यापन कार्य सोशल मिडिया के माध्यम से भारत में ही नही वरन भारत के बाहर भी दृष्टीदिव्यांग साथियों को शिक्षित कर रहा है। 2012 से इंदौर तथा भारत के अन्य शहरों के बच्चे Voice For Blind द्वारा प्रदान किये गये सामान्य ज्ञान से अत्यधिक लाभान्वित हुए हैं। 2012 से YouTube पर अपलोड किये गये सामान्यज्ञान और करंट अफैयर से कुछ ऐसे बच्चे भी लाभान्वित हुए जिनको प्रत्यक्ष तौर पर हम लोग नही जानते। आज वाट्सएप के माध्यम से Voice For Blind अधिक से अधिक बच्चों तक सामान्य ज्ञान और प्रतिदिन समाचार को ऑडियो के माध्यम से पोस्ट कर रहा है। इस प्रयास से लगभग 10,000 बच्चों को लाभ हो रहा है। कुछ लोग Voice For Blind से प्रत्यक्ष जुङे हैं तो, कुछ हमारे दृष्टीदिव्यांग साथियों द्वारा बनाये वाट्सएप ग्रुप से समाचार तथा सामान्य ज्ञान का लाभ ले रहे हैं।

वाट्सअप के माध्यम से समाचार का प्रकाशन तो भारत में अपने आप में एक नया ही विचार है, जिसे अत्यधिक प्रोत्साहन भी मिल रहा है। ये समाचार प्रतिदिन विभिन्न समाचार पत्रों से संकलित करके ब्रॉडकास्ट के माध्यम से सुबह 8 बजे तक अपने दृष्टीबाधित साथियों तक भेज दिया जाता है। समाचार में इस बात का खयाल रखा जाता है कि कोई नकारात्मक खबर न हो और प्रतियोगी परिक्षा में क्या आ सकता है उसपर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। साथ ही कुछ रोचक तथ्य, आज का इतिहास एवं ट्वीट्स समाचार को रोचक बना देते हैं। आलम ये है कि, यदि समाचार पोस्ट करने में देरी हो जाये तो मेरे व्यक्तिगत नम्बर पर संदेश आ जाता है जानने के लिये कि, समाचार अब तक क्यों नही आया।

कुछ लोग मुझसे पूछते हैं कि, अब तक आपके द्वारा किये गये प्रयासों से कितने बच्चे लाभांवित हुए?
मित्रों प्रश्न उचित है परंतु सोशल मिडिया उस सूरज के समान है जिसे पता नही होता कि, उसकी रौशनी से किस-किस को लाभ हो रहा है। सोशल मिडिया तो उस बारिश के समान है जिसकी बूंद से कितने खेत लहलाहाते हैं उसे पता नही होता। उसी तरह मेरे द्वारा YouTube, Tweeter, Whats app, Facebook इत्यादि सोशल मिडिया के माध्यम से भेजे गये सामान्य ज्ञान और समाचार का हिसाब रखना संभव नही है क्योंकि इन माध्यम में बहुत से लोग अप्रत्यक्ष तौर से भी जुङे होते हैं। फिलहाल समाचार के लिये वाट्सएप पर तीन ब्रॉडकास्ट ग्रुप हैं जिससे प्रत्यक्ष तौर पर हजारों बच्चे जुङे हैं। इसके अलावा हमारे दृष्टीदिव्यांग साथियों द्वारा बनाये गये उनके वाट्सअप ग्रुप में भी उनके माध्यम से मेरे द्वारा रेकार्ड किया गया समाचार तथा सामान्य ज्ञान पोस्ट किया जाता है, जहाँ किसी ग्रुप में 200 तथा किसी में 250 सदस्य हैं। YouTube पर मेरी पोस्ट Publicly है जहाँ वर्तमान में लाखों         व्यू हैं तथा 17,793  सब्सक्राइबर हैं। मित्रों, कई बार मिडीया से जुङे लोग और समाज के अन्य लोग भी मुझसे पूछते हैं कि, आपने शिक्षा को ही माध्यम क्यों बनाया? मेरा मानना है कि, एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पाता है।शिक्षा तो वो सशक्त हथियार है,जिससे आप दुनिया को बदल सकते हैं। शिक्षा कारोबार और व्यपार को बढाती है। एक कहावत है कि, यदि आप किसी को एक मछली देते हो तो उसे एक दिन का भोजन देते हो, लेकिन यदि आप उसे मछली पकङना सिखाते हो तो, उसे उम्रभर का भोजन देते हो। इसी कहावत को ध्यान में रखते हुए हमने शिक्षा को माध्यम बनाया जिससे शिक्षित होकर हमारे साथी आत्मनिर्भर हो जायें और उम्रभर के लिये अपने भोजन का इंतजाम कर सकें।

हमारे दृष्टीदिव्यांग साथियों में से जो प्रत्यक्ष जुङे हैं उनमें से अकेले इंदौर में ही सैकङों बच्चे विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं। ये वो बच्चे हैं जिनकी स्नातक से लेकर प्रतियोगि परिक्षा तक की तैयारी मेरे द्वारा कराई गई है। Mangaldas patil -Govt. high sec.school , Gorelal Kushwah-Govt. Polytechnic college (sanawad), Phoolsingh Kushwah education department (janpad), Rajesh Parma Railway (Jabalpur), Ajay Railway (Bhopal), Manoj central school kolkata, इसके अलावा.निम्न सदस्य  बैंक में राज्य भाषा अधिकारी के रुप में कार्यरत हैं।
Rajani Sharma Andhra Bank,
Shiv vankhede BOB
Shiva Wankhede BOB
Vikesh Gurjar Oriental Bank of Commerce
Sonu Chouhan
Abha Rajoriya BOI


निम्नलिखित बैंक में लिपिक के पद पर कार्यरत हैं-
Rashmi choure UNB
Kalpana choure BOI
Rashmi Gurjar Central Bank
Ankita Bargal PNB
Bilal Ahmad PNB
Geetesh Gahlot SBI
Monika BOA
Sindhu Parmar UNB assistant manager
Narendra sejkar- BOI
mulayam singh Narmada jhabua gramin bank
Jiyalal Kol- Bank of Baroda
Bilal Ahmad PNB
Geetesh gahlot SBI
Harsh SBI

इंदौर के बाहर भी भारत के अनेक राज्यों से कई दृष्टीबाधित बच्चे निःशुल्क अध्ययन सामग्री से लाभान्वित होकर आज आत्मनिर्भर हो गये हैं। । सबका विवरण देना संभव नहीं है इसलिए कुछ एक नाम यहां लिख रहे हैं-
Mitul SBI Gujarat
Kamal Sharma Lucknow
Kiran maharashtra
Sandeep Gohati
Navneet Raj.
Neelesh Gujarat
Ashish Gujarat
Sanjay Gujarat
Ajay jammu kashmir
Prince Panjab
Kishor Asam
Mahendra Hariyana
Mohammad Hedrabaad
Mangilal Raj.
Sourabh Jain Meerut
Suneel Nagpur
Mithilesh jharkhand
Agashtha Nepal
Kulvant singh Rajasthan इन्होंने तो UPSC की सभी परिक्षाएं पास की है, इंटरव्यू के रिजल्ट का इंतजार है।
हरियाणा के अजय का तो UPSC में सलेक्शन भी हो गया है।

हम लोगों का मकसद है कि अधिक से अधिक बच्चों तक ये पाठ्य सामग्री पहुँचे ताकि कोई भी प्रिंट दिव्यांग साथी पाठ्य सामग्री के अभाव में पीछे न रह जाये। Voice For Blind ने अब तक सैकङों बच्चों के लिए परिक्षा के समय स्क्राइब की व्यवस्था की है। इंदौर के बाहर भी अनेक शहरों में VFB के सदस्य अपनी सेवायें दे रहे हैं। पुस्तकों को रेकार्ड करने में भी हमारे कई साथी अपनी निरंतर सेवा दे रहे हैं। अब तक बैंक, रेल, प्रशासनिक परिक्षा, संविदा शिक्षा तथा यू.जी.सी नेट की तैयारी हेतु पाठ्य सामग्री मेरी आवाज में रेकार्ड की जा चुकी है। प्रतिदिन लगभग 4 से 5 घंटे रेकार्डिंग करने के बावजूद कार्य का आगमन इतना है कि, कई बार हम असमर्थ हो जाते हैं हालांकि मुझे मना करना अच्छा नही लगता फिरभी कार्यकर्ताओं की कमी के कारण ना भी करना पङता है। अतः मित्रों आप सबसे आह्वान करते हैं, दूर बैठकर सरकार और समाज को कोसने के बजाय आइये हम सब मिलकर समाज में नई संरचना का गठन करें, जिससे हमारे दिव्यांग साथियों को भी सम्मान का आधार मिले। आप सबके साथ से निःश्चय ही एक दिन अपने सभी प्रिंटदिव्यांग साथी शिक्षा के माध्यम से अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करने में सक्षम हो जायेंगे। 

मित्रों जैसा कि, आप लोगों को विदित है कि Voice For Blind द्वारा पाठ्य सामग्री निःशुल्क प्रदान की जाती है, किंतु हम लोग बच्चों से ये वादा जरूर लेते हैं कि आप सफल होने के लिये ईमानदारी से मेहनत करेंगे। ऑडियो पुस्तक हम दे दिये अब याद करने की बारी आपकी है। यकीन मानिये बच्चे भी पूरी शिद्दत से पढाई करते हैं और अच्चे नम्बरों से पास होते हैं। उनकी सफलता ही हम लोगों का अमूल्य पारिश्रमिक है। उनके चेहरे पर सफलता की जो मुस्कान होती है वो हम लोगों की सबसे बङी पूंजी है। 

समाज से मेरी एक और अपील है कि, हमारे जो साथी कम्प्युटर में दक्ष हैं उनको अपने यहाँ नौकरी दें, आज कम्प्युटर हर जगह है और उसपर काम प्रिंट दिव्यांग साथी आराम से कर सकते हैं। मेरा मानना है कि कम्प्युटर उनकी आँखें हैं इसलिये इंदौर में हम एक कम्प्युटर सेंटर खोलना चाहते हैं जहाँ दृष्टीबाधित छात्र-छात्राओं को निःशुल्क कम्प्युटर सिखाया जा सके, इसके लिये हम समाज के प्रतिष्ठित लोगों से आर्थिक सहयोग की अपील करते हैं। हमने तो अपना उद्देश्य बना लिया है इन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का। आप लोगों का सहयोग मिलेगा तो अधिक से अधिक दृष्टीबाधित बच्चों को ज्ञान के प्रकाश से रौशन कर सकेगें। आपके सहयोग की कामना रखते हुए निम्न शब्दों से कलम को विराम देते हैं।

ना पूछो कि मेरी मंजिल कहाँ है

अभी तो सफर का इरादा किया है

ना हारूंगा हौंसला उम्र भर

ये मैंने किसी से नहीं खुद से वादा किया है


(लिंक पर क्लिक करके मेरा इंटरव्यु देखें.......)

सोशल मिडिया के माध्यम से शिक्षा की नई मुहीम

धन्यवाद 😊

Saturday, 30 December 2017

Happy new year 2018





Dear All,

May this New year illuminate your life and bless you with prosperity and joy, today and always 
Happy New year 2018 
Voice for blind 

Sunday, 17 September 2017

मेरी लाडली कायरा



मित्रों, आज हम आप सबसे अपनी खुशी के ऐसे पल को शेयर कर रहे हैं जिसे शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त करना आसान नही है फिरभी मेरा प्रयास होगा कि हम अपनी भावनाओं को शब्द प्रदान कर सकें। खुशी के उस लम्हे को  16 सितंबर को एक माह पुरा हो गया। ये एक माह कब और कैसे बीत गया पता ही नही चला।  मित्रो,  16 अगस्त 2017 की सुबह  सूरज की किरणों पर सवार मेरे घर-आँगन में मुझे  नानी कहने वाली एक परी का आगमन हुआ। गोद में लेते ही, उसके सुंदर नाजुक और कोमल हांथों के स्पर्श से अनुठे आनंद का एहसास अंतरमन को अद्भुत खुशी में रंग गया। उसकी किलकरी से मन के तार  झूम झूम कर गुनगुनाने लगे........छोटी सी प्यारी सी नन्ही सी आई कोई परी, भोली सी न्यारी सी, अच्छी सी आई कोई परी। उसे देखकर दुआओं की सरिता का प्रवाह स्वतः ही प्रस्फुटित हो कहने लगा... गाते मुस्कुराते  खुशियों की बहारों में स्वस्थ रहे मस्त रहे और झूमती रहे संगीत की तरह। उसकी बंद खुलती आँखें और अलसाई सी मुस्कान को देखकर, हमें अपनी बिटिया का बचपन बरबरस ही याद आ गया।  माँ से नानी माँ बनकर मेरी खुशी को चार चाँद लग गया। अपने आदरणिय बुजर्गों द्वारा कही बात कि, "मूल से ज्यादा सूद प्यारा होता है" इसके अर्थ का स्वतः ही एहसास हो गया। अभी मेरी लाडली परी कायरा सिर्फ एक माह की है, मन नानी माँ सुनने के लिये व्याकुल है जबकी पता है बच्चे 9माह के बाद ही बोलते हैं फिरभी 😊

सच्चाई तो यही है दोस्तों, बच्चों की प्यारी प्यारी हरकतें स्वयं को भी बच्चा बना देती हैं, जो प्राकृतिक नियम को दरकिनार करके बच्चों संग बातें करने और खेलने के लिये हर पल उत्सुक रहता है। विगत एक माह का समय लाडली कायरा की बालसुलभ हरकतों में यूँ खो गया कि पता ही नही चला। नानी के पद पर आसीन मन! कायारा की मुस्कान पर प्रफुल्लित हो हर पल यह गुनगुनाता है ...

जूही की कली मेरी लाडली नाज़ों की पली मेरी लाडली। कोमल तितली सी मेरी लाडली, हीरे की कनी मेरी लाडली, गुड़िया-सी ढली मेरी लाड़ली, मोहे लागे भली मेरी लाडली। चिराग आकांक्षा की लाडली कायरा जुग-जुग तू जिये, मेरी लाडली नन्ही-सी परी ओ मेरी लाडली...


मुझे नानी बनाकर दुनिया की सबसे बङी खुशी देने के लिये चिराग और आकांक्षा तुम दोनों को दिल से अंनत आशिर्वाद। हमें विश्वास है कि, तुम दोनों हमसे भी बेहतर अभिभावक बनकर, अपनी कायारा को ऊँचाइयों का एक नया आसमान दोगे। कायरा के सुखद भविष्य को अपने प्यार और दुलार के रंग से पल्लवित करोगे। नाना-नानी और दादा-दादी के  आशिर्वाद संग कायरा तुमको ढेरसारा प्यार और दुलार 😊😊

Thank you God for all your blessing to me and my family





Wednesday, 13 September 2017

हिंदी दिवस पर विशेष.........हिंदी अपनी पहचान है


सत्तर वर्ष बीत गये, ये कैसा जनतंत्र है मित्रों, अब भी जनता अंग्रेजी की गुलाम है।  अंग्रेजी में सारा तंत्र चल रहा है। स्वभाषा के बिना ये कैसी स्वतंत्रता है और जन भाषा के बिना ये कैसा जनतंत्र है।  स्वतंत्र भारत में आज हिंदी की स्थिती को देखकर कौन कह सकता है कि भारत वास्तव में स्वतंत्र है। संविधान में राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त हिंदी आज भी एकराष्ट्र एकभाषा के रूप में जनमानस की आवाज नही बन सकी है।  क्षैत्रिय राजनीति, एकराष्ट्र एकभाषा के विकास में सबसे बङा अवरोध है। अपनी भाषाओं की उपेक्षा का दुष्परिणाम यह भी है कि, हम अपनी भाषाओं के माध्यम से अनुसंधान नहीं करते।  भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान का खजाना उपलब्ध है लेकिन हम लोग उसकी तरफ से बेखबर हैं।  हम प्लेटो और चोम्सकी के बारे में तो खूब जानते हैं लेकिन हमें पाणिनी, चरक, कौटिल्य, भर्तृहरि और लीलावती के बारे में कुछ पता नहीं। हमारे ज्ञानार्जन के तरीके अभी तक वही हैं, जो गुलामी के दिनों में थे। जब तक हमारे देश की सरकारी भर्तियों, पढ़ाई के माध्यम, सरकारी काम-काज और अदालातों से अंग्रेजी की अनिवार्यता और वर्चस्व नहीं हटेगा,  तबतक भारत का विकास श्रेष्ठता के शिखर पर नही पहुंच सकता।

एकबार महात्मा गाँधी जी ने कहा था कि, "ये क्या किसी जुल्म से कम है कि अपने देश में मुझे इंसाफ पाना हो, तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना पङता है। बैरिस्टर होने पर मैं स्वभाषा न बोल सकुँ! ये गुलामी नही है तो क्या है?  इसमें मैं अंग्रेजों का दोष निकालुं या अपना ? हिंदुस्तान को गुलाम बनाने वाले हम अंग्रेजी बोलने वाले लोग ही हैं।"

मित्रों, राष्ट्रभाषा से ही राष्ट्र की पहचान बनती है। भाषा में हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति समाहित होती है। हम सब की आकांक्षाओं के स्वप्न भाषा में ही अपनी आंखें खोलते हैं। गौरतलब है कि, किसी भी दूसरे देश की वास्तविक नागरिकता उस देश की भाषा के जानकार होने पर ही संभव होती है। यही कारण है कि किसी भी दूसरे देश की संस्कृति को जीने और जीतने का सुख उस देश की भाषा सीखने पर ही संभव हो पाता है। जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, नार्वे, डेनमार्क और पोलैंड जैसे देशों की अपनी राष्ट्रभाषा है और उन्हीं भाषाओं में इन देशों का राजकाज और शिक्षा संचालित होती है। यद्यपि इन देशों में विश्व के कई देशों के धर्म, जाति, संप्रदाय और संस्कृति के लोग रह रहे हैं फिरभी वह उसी देश की राष्ट्रभाषा को अपनाए हुए अपना जीवन जीते हैं, इसलिए वह राष्ट्र भी अपने राष्ट्र परिवार के नागरिक की तरह उन्हें अपनाए रहता है। नीदरलैंड सहित यूरोप के किसी भी देश में अंग्रेजी का कोई प्रवेश नहीं है। कोई अख़बार और पत्रिका अंग्रेजी में प्रकाशित नहीं होती है। सड़क, बस, रेल यात्रा आदि की सारी सूचनाएं उस देश की अपनी राष्ट्रभाषा में लिखी रहती हैं। कई राष्ट्रों के नाम में ही वहाँ की भाषा समाहित है। उदाहरण के लिए स्पेन की स्पेनिश, फ्रांस की फ्रेंच, जर्मनी की जर्मन रूस की रशियन। स्थिति यह है कि राष्ट्र भाषा से ही राष्ट्र की पहचान होती है। लेकिन हिंदुस्तान ने अपना नाम इंडिया रख कर अपनी राष्ट्रभाषा की पहचान भी खो दी है।

स्वामी विवेकानंद जी ने तो, अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को माँ का सम्मान दिया है। उनका कहना था कि, यदि किसी भी भाई बहन को अंग्रेजी बोलना या लिखना नहीं आता है तो उन्हें किसी के भी सामने शर्मिंदा होने की जरुरत नहीं है बल्कि शर्मिंदा तो उन्हें होना चाहिए जिन्हें हिंदी नहीं आती है क्योंकि हिंदी ही हमारी राष्ट्र भाषा है, हमें तो इस बात पर गर्व होना चाहिए की हमें हिंदी आती है.....


मित्रों, वास्तविकता तो यही है कि, राष्ट्रभाषा के वजूद से ही राष्ट्र के एकत्व की छवि बनती है। भाषा के दर्पण में संगठित राष्ट्र का दिव्य स्वरूप उभरता है। अनेकता में एकता की पहचान लिये अपने देश में हिंदी भाषा ही पूरे राष्ट्र को एक संस्कृति प्रदान कर सकती है। आज देश को एकरूपता के बंधन में बाँधने के लिये एक राष्ट्रभाषा हिंदी को वास्तविक बोलचाल और प्रशासनिक कार्यों में अधिकाधिक प्रयोग करने की आवश्यकता है।देश के विकास में आज हम सबका ये कर्तव्य बनता है कि, हम हिंदी को एक दिवस की जंजिरो से मुक्त करके जीवन भर के संवाद का माध्यम बनायें। सब मिलकर प्रण करें, भारत के भाल पर हिंदी की बिंदी सदा चमकती रहे। हम सब मिलकर हिंदी का वंदन करें, हिंद और हिंदी की जय-जयकार करें, भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें.........

धन्यवाद 😊

पूर्व के लेख पढने हेतु ...

Monday, 14 August 2017

आजादी के सत्तर वर्ष! क्या खोया क्या पाया

भारत के नागरिक होने के नाते हम आज आजादी के 70 वर्ष का सफर पूरा कर चुके हैं। हमें 200 साल पुरानी अंग्रेजों की दासता से मुक्ति मिल गई लेकिन क्या हम अपनी रुढीवादी सोच से आजाद हो सके?  क्या हम मैकाले द्वारा रोपित अंग्रेजी मानसिकता से मुक्त हो सके हैं?
  
हम विकासशील देश से उन्नति करके विकसित देश के साथ कदम मिलाने को तत्पर हैं। मंगल पर पहुँचकर इतिहास बनाने की क्षमता रखते हैं। नई टेक्नोलॉजी के साथ विकास के नित नये पन्ने लिखे जा रहे हैं,  लेकिन ऑनर किलिंग के पन्नों से देश में आज भी दहशत पढाई जा रही है। बेटी बचाओ - बेटी पढाओ जैसे अभियान भी बेटियों को वो सम्मान नही दिला सके जहाँ बेटीयां निडर होकर स्वछंद आकाश में विचरण कर सकें। निर्भया कांड के बाद लगा था कि, ऐसा कानून बनेगा जिसकी दहशत से बेटियों तथा महिलाओं का मान सम्मान सुरक्षित रहेगा किंतु आज भी बेटियों को सरे राह रोकना, उन पर भद्दे कमेंट करना तथा उनके मान सम्मान पर कुठाराघात करना  फैशन सा बन गया है, गलती किसी और की, किंतु अंगुलियां बेटियों के परिधान एवं रात्री विचरण पर ही ऊठती  हैं। 

प्रथम महिला आई पी एस  किरण बेदी कहती हैं, "आज़ादी का मतलब है मैं बिना डरे कहीं भी घूम सकूं, मर्ज़ी से अपना जीवनसाथी चुन सकूं. ऑनर किलिंग जैसी घटनाएं युवाओं को डरा देती हैं. मानसिकता को ग़ुलाम बना देती हैं और डरा हुआ आदमी भला देश के किस काम आएगा?"

दक्षिण अफ्रिका के पूर्व राष्ट्रपति नेलसंन मंडेला का कहना है कि, "स्वतंत्र होने का मतलब सिर्फ जंजीरों से मुक्ति पाना नही है बल्की इस तरह जीवन जीना है जिसमें दूसरों की स्वतंत्रता का भी सम्मान हो और उसे बढावा मिले।" 

हम आज मेक इन इंडिया, स्वच्छ एवं भ्रष्टाचार मुक्त भारत को नई दिशा देने का प्रयास कर रहे हैं। नोटबंदी , तो कहीं एक राष्ट्र एक टैक्स यानि जीएसटी का अनुमोदन कर रहे हैं। लेकिन इससे इतर भ्रष्टाचार की वजह से  कई मासूम परलोक सिधार गये। स्वच्छता का असर दिख रहा है 2017 की लिस्ट में मध्य प्रदेश  का इंदौर शहर स्वच्छता अभियान  में नम्बर एक पर रहा किंतु इंदौर जैसे तमाम शहरों में आज भी कचरे के निपटारे का सुचारु प्रबंध एक बङी समस्या है।  ट्रैफिक सिंगनल पर विदेशी कैमरों की नज़र मेक इन इंडिया के सपनों को साकार होने से रोक रही हैं। 

आज हम इतनी आजादी तो महसूस कर सकते हैं कि राष्टध्वज, राष्ट्र गान तथा राष्ट्र गीत का सम्मान आधुनिक माहौल में भी कर सकते हैं। लेकिन इससे इतर विशेष अवसर पर  राष्ट्र ध्वज को उलटा दिखाने तथा ज़मीन पर बिखेरने जैसी मानसिकता वाले लोग भी नज़र आते हैं।

आज राजनीति के इतिहास में देश के उच्च पदों पर (राष्ट्पति, उप राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री तथा लोक सभा अध्यक्ष ) ऐसी पार्टी विद्यमान है जिनके कभी सिर्फ तीन सांसद थे। विकास की इस बेला में यदि ये पदाधिकारी लोक प्रशासन को स्वच्छता और कर्तव्य का बोध कराने में सफल होते हैं तो काफी हदतक भ्रष्टाचार से भारत को आजादी मिल सकेगी। एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का सपना साकार हो सकेगा। 

आइये हम सब मिलकर 70 वर्ष पूर्ण किये आजाद भारत में नई उमंग और नये जोश का शंखनाद करें। जहाँ नारी सिर्फ देवी रूप में मंदिरो में ही सम्मानित न हो बल्की भारत की सम्पूर्ण धरा पर सम्मानित हों। आजादी के इस पर्व को गौरव के शिखर पर ले जायें।  शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करें। स्वर्ण दिवस के लिए आज से संकल्प करें जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका नूतन  निर्माण करें। 
आप सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई 
पूर्व के लेख अवश्य पढेंः-----

Women in Freedom Struggle




Sunday, 13 August 2017

जन्माष्टमी की शुभकामनाएं



कृष्ण जहां भी होते हैं, आशा की एक लहर चलती है जो सबको छूती है और सबका जीवन बदल देती है। कृष्ण की मुरली की धुन जीवन के सुर को मधुर कर देती है। ऐसे मुरली मनोहर श्याम को नमन करते हुए प्रार्थना करते हैं कि श्री कुष्ण की कृपा हम सबपर सदैव बनी रहे। 

आप सबको जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं

Monday, 3 July 2017

Vivekanand ji thoughts (Strength is life , Weakness is Death)



विश्व धर्म सभा में भारत को गौरवान्वित करने वाले स्वामी विवेकानंद जी के विचार आज भी हम सभी के लिये महत्वपूर्ण हैं। अपने लक्ष्य को हासिल करने में स्वामी जी के विचार ऑक्सीजन की तरह हैं जो विपरीत परिस्थिती में जीवन को उर्जा प्रदान करते हैं। स्वामी जी कहते हैं...

"यदि परिस्थितियों पर आपकी मजबूत पकङ है तो , जहर उगलने वाले भी आपका कुछ नही बिगाङ सकते।"

विचारों में बहुत शक्ति है. विचार करते समय हम जिन भावों का चयन करते हैं , उनका हमारे जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव पडता है. मनोवैज्ञानिक भी निराशा के छणों में स्वयं से सकारत्मक संवाद करने पर जोर देते हैं ।
Talk to yourself Once in a day ... otherwise you have missing meeting an Excellent person in this world.

आप अपने लक्ष्य को अपनी काबलियत के स्तर से नीचे न रखें, बल्की अपनी काबलियत के स्तर को अपने लक्ष्य के जितना बङा बनाइये क्योंकि संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरिका है, असंभव से आगे निकल जाना।

मित्रों, हम जो बोते हैं वही काटते हैं, हम स्वंय अपने भाग्य के विधाता हैं। हवा का कार्य तो बहना है, जिन नावों के पाल खुल जाते हैं हवा उनकी दिशा अपने अनुसार बदल देती है, लेकिन जिनके पाल बंधे होते हैं वो अपनी मर्जी से अपनी दिशा में बढते हैं और सफलता पूर्वक अपने गंतव्य पर पहुँचते हैं इसलिये भाग्य भरोसे न रहते हुए अपनी मदद स्वंय करो तुम्हारी मदद कोई और नही कर सकता। तुम खुद के सबसे बङे दुश्मन हो और खुद के ही सबसे अच्छे मित्र हो। अतः Believe in yourself and the world will be at your feet.

एकबार स्वामी जी से किसी ने पुछा कि, सब कुछ खो देने से भी बुरा क्या है, स्वामी जी ने उत्तर दिया , "उस उम्मीद को खो देना जिसके भरोसे हम सब कुछ वापस पा सकते हैं।" इसलिये उम्मीद का दिया हमेशा जलना चाहिये और दृण इच्छाशक्ति के साथ एक समय में एक काम करो , ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ। उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जायें। सभी शक्ति तुम्हारे अंदर है, तुम सब कुछ कर सकते हो।

Strength is life , Weakness is Death

प्रिय पाठकों नमस्कार, आप सब मंगलमय होगें और आशा करते हैं कि मेरे द्वारा लिखे लेख आप लोगों को रोचक लग रहे होंगे। इधर कुछ समय से समय अभाव के कारण लेख लिखने का समय कम मिल रहा है क्योकि जैसा कि आप लोगों को ज्ञात ही है कि, स्वामी विवेकानंद जी के दिये संदेश को आत्मसात करते हुए दृष्टीबाधित बच्चों को शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके अंर्तगत उनकी पाठ्यपुस्तकों को ध्वनांकित करना सबसे महत्वपूर्ण है। वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा 9वीं तथा 11वीं का पाठ्यक्रम बदल जाने से पूर्व की ध्वनांकित पाठ्यपुस्तक अब काम नही आयेगी। अतः वर्तमान में नई पुस्तकों का ध्वनांकन समय पर पूरा करना अहम कार्य है। आप सबसे निवेदन है कि जो पाठक इस कार्य में अपना योगदान देना चाहते हैं वो हमें मेल करें। शिक्षा सबसे सशक्त हथियार है जिससे दुनिया को बदला जा सकता है।

धन्यवाद


Thursday, 29 June 2017

नई राह पर बढते कदम

किरणों का साथ पाकर जीना सीखती आशाएँ, मानो उड़ना चाहती हैं
क्षितिज के भी उस पार अजब सुर्ख एहसास से, जाग उठी सुबह के साथ....
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मित्रों, गुजरात के डायमंड शहर सूरत में 25 जून 2017 को "आई कल्ब" द्वारा आयोजित करियर सेमीनार में अनेक ऐसे हिरे मिले जिनको थोङा सा भी तराशा जाये तो वो बेशकीमती हीरे बन जायेंगे। इस सेमिनार में सूरत के अलावा अहमदाबाद, राजकोट तथा नवसारी से भी लोग शिरकत किये थे। वहाँ उपस्थित बच्चों के मन में आगे बढने का जज़्बा काबिले तारीफ रहा। वहाँ नये विषय को लेकर पढने पर विस्तृत चर्चा हुई उसका परिणाम ये हुआ कि कुछ बच्चे अपने कंफर्ट जोन से निकलकर साहस के साथ अपने मनपसंद विषय को पढने की राह पर निकल भी गये।
इस संगोष्ठी में प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी कैसे करनी है तथा आत्मनिर्भरता के लिये अन्य सभी विकल्पों पर प्रकाश डाला गया। मेरे साथ इंदौर से रजनी शर्मा जो, आन्ध्र बैंक में राज्यभाषा अधिकारी है तथा पायल जैन जो, प्राइवेट आई टी कंपनी में अकांटेंट हैं, वो भी गईं थीं। बैंक की परिक्षा तथा स्कॉलरशिप की जानकारी भी हम लोगों द्वारा शेयर की गई। वहाँ कुछ ऐसे भी नगीने मिले जो स्वंय तो आत्मनिर्भर हैं और अनेक लोगों को भी रोजगार का अवसर दे रहे हैं। दृष्टीबाधिता के बावजूद वहाँ उन बच्चों का हौसला और आगे बढने की चाह देखकर यही लगा कि, "अगर फलक को जिद है, बिजलियाँ गिराने की तो उन्हे भी जिद है,वहीं आशियाँ बनाने की"
हम लोगों के प्रति उनका प्यार और सम्मान अविसमरणिय पल है। उन लोगों के जोश को देखकर हम लोग के अंदर नई ऊर्जा का संचार हुआ तथा इस कार्य को आगे बढाने की प्रेरणा मिली और दिल ने कहा , हर तारे में एक चमक होती है, हर राह की एक मंजिल होती है, रख हौसला कुछ कर दिखाने का हर हौसले में जीत होती है। 

अपने दृष्टबाधित साथियों के लिए कहना चाहेंगे कि, "हर व्यक्ति एक हुनर लेकर पैदा होता है, बस उस हुनर को दुनिया के सामने लाना है।" 


















Wednesday, 24 May 2017

परिस्थितियों का दास नही, स्वामी बने........

दोस्तों, आज की आधुनिक दुनिया में रोजगार के नित नये अवसर बन रहे हैं। नई तकनिकों की क्रांति से आज शारीरिक अक्षमता भी आत्मनिर्भरता में बाधक नही है।आज दरकार है बस उन्हे समझने की और अपनी रुची के अनुसार उसका चयन करने की और एक बार जब हम अपने लक्ष्य को निर्धारित कर लें तो फिर उसी दिशा में आगे बढें। लक्ष्य के मार्ग में परिस्थिती हमेशा अनुकूल ही मिलेगी ये संभव नही है किंतु सकारात्मक दृष्टीकोंण से हम मार्ग में आने वाली बाधाओं को अनुकूल जरूर  बना सकते हैं  ये विश्वास बहुत आवश्यक है। 

मित्रों, कई बार राह में जब आगे बढते हैं तो ठोकर भी लगती है और परिस्थितियां ऐसी भी आ जाती हैं कि मन की भावनाएं आहत हो जाती है। जिससे घबराकर हम आगे बढने से कतराते हैं और विपरीत बातों को याद करते रहते हैं। हम ये भूल जाते हैं कि, नाटक की कहानी में नायक-खलनायक, अच्छे-बुरे-भले सभी पात्र होते हैं.. इनके बिना कहानी आगे नही बढती और न ही कहानी में आनंद आता है। उसी तरह जीवन में भी अच्छी बुरी परिस्थितिया आती रहती हैं और हमारा जीवन भी सुख-दुःख के साथ आगे बढता रहता है। ये हम पर निर्भर करता है कि हम उसे किस तरह समझ रहे हैं। यदि हम हर वक्त बाधाओं के बारे में ही सोचते रहेंगे तो अनजाने में ही सही हम उसे अपने जीवन में आकर्षित ही करते हैं। 

सच तो ये है कि, यदि हम नकारात्मक विचारों की उपेक्षा करते हैं, उन पर ध्यान नही देते तो वो हमारे जीवन में घटित नही होते। इसलिये शुभ एवं सकारात्मक विचारों को ही सोचना चाहिये क्योंकि हमारी सोच चुंबक का काम करती है। यदि हमें वास्तव में आगे बढना है और अपने लक्ष्य को सफलता से हासिल करना है तो विषतुल्य सोच से स्वयं को बचाना चाहिये। जीवन में आगे बढने के लिए हमारा सकारात्मक दृष्टीकोंण एक रामबांण औषधी की तरह है।

दोस्तों, आपको एक सच्ची घटना मणीपुर की बताते हैं, जहाँ 28 वर्ष के IAS आर्मस्ट्रांग पामें ने अकल्पनिय कार्य को साकार कर दिया। वहाँ दुर्गम पहाङियों से लोगों को गुजरने में बहुत तकलीफ होती थी। इस ओर सरकार की उदासीनता से परेशान हुए बिना अपने वेतन से बची जमापूँजी तथा गॉव वालों के सहयोग से सङक बनाने की योजना पर काम शुरु कर दिये। उनके विश्वास को देखकर पङोस के गॉव वालों ने भी आर्थिक सहयोग किया तथा युवाओं ने श्रम दान दिया, जिसकी वज़ह से 100 किलोमीटर लंबी सङक बन गई। जिसका नाम जनता की सङक रखा गया। उनके आत्मविश्वास ने गॉव वालों का रास्ता आसान कर दिया। गॉव वालों ने पामें को मिरेक लायन से विभूषित किया। 

अक्सर कई लोग आगे बढना तो चाहते हैं लेकिन मार्ग में आने वाली तकलिफों का सामना नही कर पाते, जबकी इनमें से कुछ तकलीफें हमारे लिये एक सबक होती हैं और भविष्य में हमें दृण बनाने के लिये हितकारी भी होती हैं। ऐसे में हमारी सोच पत्थर की तरह अङियल न होकर पानी की तरह होनी चाहिये जो किसी भी परिस्थिती में आगे बढने का राह बना ही लेता है, पानी एक छोटे से छिद्र से भी बह जाता है वो अवरोध हटने का इंतजार नही करता। इसी तरह हमें भी विकल्प तलाशते हुए आगे बढते रहना चाहिये न की बाधाओं की दुहाई देकर रुकना चाहिये। जिस प्रकार से राह में आने वाले कंकङ-पत्थर को हम बीन कर नही हटा सकते हैं, लेकिन पाँवों में जूत पहनकर उससे अपने पैर को सुरक्षित रख सकते हैं। ठीक इसी तरह राह में आने वाली विपरीत परिस्थितियों को हम अपने ज्ञान तथा आत्मविश्वास से दूर कर सकते हैं। 

"Always remember that your present situation is not your final destination. The best is yet to come " 

दोस्तों, भारतीय खेलों के इतिहास में दृष्टीबाधित सागर बहेती ने अपने विश्वास के बल पर एक गौरवशाली अध्याय जोड़ते हुए बोस्टन मैराथन पूरी कर इतिहास रच दिया। वह इस मैराथन में हिस्सा लेने वाले पहले दृष्टीबाधित भारतीय भी हैं। बेंगलुरु के रहने वाले बहेती की यह उपलब्धि इस मायने में खास है कि इस मैराथन के लिए क्वालीफाई करना बेहद मुश्किल और प्रतिस्पर्धी है। सागर ने शारीरिक अक्षमता की सभी मुश्किलों को पार कर यह मुकाम हासिल किया है। उन्होने 42.16 किमी की इस मैराथन को महज 4 घंटे में ही पूरा कर लिया। वर्ष 2016 में पैराओल्मपिक में हमारे कई साथियों ने शारीरिक अक्षमता के बावजूद अपने साहस से परिस्थिती को अनुकूल बनाकर भारत को स्वर्ण और रजत पदकों से गौरवांवित किया है। 

"You can always improve your situation. But you do so by facing it, not by running away."
 
अंततः यही कहना चाहेंगे दोस्तों, मनुष्य परिस्थितियों का दास नही है, वरन उनका निर्माता है। ये बात जितनी ज्ल्दी समझ आ जाये सफलता उतनी जल्दी हमारे पास होगी।
बेहतर से बेहतर कि तलाश करो
मिल जाये नदी तो समंदर कि तलाश करो

टूट जाता है शीशा पत्थर कि चोट से
टूट जाये पत्थर ऐसा शीशा तलाश करो

Saturday, 13 May 2017

Happy Mother's Day



धरती मां को नमन करते हुए सृष्टी की सभी माँ को नमन करते हैं। प्रकृति में वात्सल्य रूप पशु, पक्षी एवं मनुष्य में एक समान नज़र आता है। गर्भ से लेकर जीवन पर्यन्त अपने आँचल की छाँव में सुरक्षा की ढाल लिये माँ अपने बच्चे की जरूरत को बिना कहे ही समझ जाती है। उसकी दुआएं उसका आर्शिवाद हर पल बच्चे की खुशहाली, तरक्की तथा स्वस्थ जीवन की कामना लिये पल्लवित होती है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश का सम्लित रूप माँ स्नेह का निर्झर झरना है। ममता के प्रवाह में उसकी ऊर्जा शिशु को सुखद और सफल भविष्य देती है। इस सृष्टी की सबसे अनुपम कृति माँ को पुनः वंदन एवं नमन