Friday, 27 June 2014

विवाह जैसे पवित्र बंधन पर तलाक का ग्रहणं क्यों???

हिन्दु धर्म में प्रचलित सोलह संस्कारों में से एक संस्कार है विवाह, जिसके गठबंधन से दो लोगों यानि की वर एवं वधु ही नही बल्की दो परिवारों, दो संस्कारों का भी मिलन होता है। मानव समाज की महत्वपूर्ण प्रथा विवाह के अंर्तगत वर एवं वधु अग्नि को साक्षी मान कर तन, मन और आत्मा के पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हमारे पुराणों, वेदो एवं साहित्यों में भी विवाह की मर्यादा को स्थापित किया गया है।समाज में  हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाने वाला वैवाहिक बंधन का कार्यक्रम दो दशक पहले तक 10 - 12 दिन तक चलता था। समय के साथ 5 दिन का हो गया फिर तीन दिन में ही विवाह कार्यक्रम संपन्न होने लगे। आज आलम ये है कि समाज का अति महत्वपूर्ण संस्कार महज तीन घंटे में संपन्न हो जाता है। समय की कमी का रोना रोने वालों के लिए वो दिन दूर नही जब विवाह जैसा पवित्र बंधन "रेडी टू ईट" की तरह दो मिनट में ही पूर्ण हो जायेगा। 

कहते हैं "सोना तप कर ही कुन्दन बनता है" उसी प्रकार वैवाहिक बंधन भी अपनी-अपनी रीति-रिवाजों के अनुसार हवन की वेदी पर अग्नि के समक्ष किये गये वादों से मजबूत होता है। समय के परिवर्तन ने और आधुनिकता की आँधी से इस पवित्र संस्कार में बदलाव की बयार बह रही है। जहाँ गोत्र, जाति, धर्म एवं गुण आदि का कठोरता से पालन होता था वहाँ अब लङके लङकियों की राय और पसंद को महत्व दिया जा रहा है। पूराने जमाने की मान्यताओं, उपजाति, योग्य वर, सुशील दुल्हन जैसी कसौटियों से हट कर पालक की सहमति से अंर्तजातिय विवाह को सहमति मिल रही है। जाति तो अब केवल राजनैतिक उपकरण रह गई है।  

शादी को लेकर अब लचीला और व्यवहारिक रवैया अपनाया जा रहा है। वैचारिक सामजस्य पर अधिक जोर दिया जा रहा है। वर-वधु की तलाश पंडितों या रिश्तेदारों की बजाय वैवाहिक विज्ञापनो तथा इंटरनेट के माध्यम से की जा रही है। मन में प्रश्न ये उठना स्वाभाविक है कि आज अधिक लचिलापन, वैचारिक महत्व और उच्च शिक्षा के बावजूद वैवाहिक बंधन तलाक जैसी कुप्रथा की अग्नि में पहले से ज्यादा क्यों सुलग रहे हैं?

विज्ञान की नित नई टेक्नोल़ॉजी जहाँ विकास के नये आयाम खोल रही है वहीं, वैचारिक सामजस्य के बावजूद विवाह जैसे पवित्र बंधन को विच्छेद भी कर रही है। एक सर्वे के अनुसार विगत एक साल में तलाक का कारण आधुनिक परिवेश में व्याप्त फेसबुक और वाट्सअप जैसी सुवधाएं भी हैं। कई बार नेटवर्क प्रॉब्लम की वजह से कुछ ऐसी गलतफहमी हो जाती है कि बात तलाक तक पहुँच जाती है। वास्तव में हम सभी आज आधुनिकता के रंग में इस कदर रंग गये हैं कि एक दूसरे की बातों को धैर्य से सुनने की शक्ति को कहीं खोते जा रहे हैं। एक तरफ तो हमारी नई टेक्नोल़ॉजी और दूसरी तरफ सामाजिक दुषित मान्यता रिश्तों को तोङने में "आग में घी" का काम करती हैं। 

आज हम कितने भी आधुनिक होने का परचम फैलाएं किन्तु अभी भी सिर्फ लङकियों को ही अच्छी पत्नी एवं अच्छी बहु बनने की नसीहत दी जाती है। कोई भी अभिभावक अपने बेटे को एक अच्छा पति एवं अच्छा दामाद बनने की नसिहत क्यों नही देते?  21वीं शदी में लङका और लङकी की बराबरी की बात करते हैं। हिन्दु अधिनियम 955 के तहत दोनों को बराबरी का दर्जा देते हैं। वेदों के अनुसार भी पत्नि को आधा अंश कहते हैं। "ताली तो दोनो हाँथ से ही बजती है" फिर सिर्फ एक को नसिहत देने से विवाह जैसे पवित्र बंधन को कब तक टूटने से बचाया जा सकता है। 


कुछ लङके प्यार  को समझते हुए भावनात्मक भावनाओं से युक्त यदि अपनी पत्नी की काबलियत का आदर करते हैं और उनकी कही बात को  अहमियत देते हैं तो, हमारे अपने कहे जाने वाले रिश्ते ही इस भावना को "जोरू का गुलाम" जैसी उपाधी दे देते हैं। कई बार ऐसे आघातों से दामपत्य जैसा मधुर रिश्ता धाराशायी हो जाता है। 

विवाह संबन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए काउनसलर (सलाहाकारों) की बढती बयार यही दर्शाती है कि हमारे समाज में आज हम भले ही अधिक शिक्षित हो गये हों, अधिक आर्थिक संपन्न हो गये हों परन्तु भावनात्मक रिश्तों को आपस में सुलझाने में असर्मथ हैं। ये सलाहकार मनोवैज्ञानिक दृष्टीकोंण से समझा जरूर सकते हैं किन्तु रिश्ते सदैव मधुर रहें इसकी गारंटी नही देते। अतः वैवाहिक युगल को अपनी समस्याओं को आपसी बातचीत और धैर्य के साथ स्वविवेक से हल करना चाहिए, जिससे आधुनिकता के परिवेश में भी  हम अपनी संस्कृति जो की भावनात्मक रिश्तों की नींव है, उससे दूर न हों सकें। 

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, विवाह जैसे पवित्र संस्कार को जिस पर सृष्टी  को आगे बढाने का दायित्व भी है ऐसे पवित्र बंधन को अपने प्यार, समर्पण और आपसी समझदारी से इतना मजबूत करना चाहिये कि आधुनिकता और सामाजिक दुषित सोच  इस बंधन को तोङ न सकें। 

Marrige is a thousand little things.... 
It's giving up your right to be right in the heat of an argument. It's forgiving another when the let you down . It's loving someone enough to step down so they can shine. It's frindship. It's being a cheerleader and trusted confidant. It's place of forgiveness that welcomes one home and arms they can run to in the mist of a storm. 
It's grace. 

Wednesday, 25 June 2014

उत्तराखण्ड के पाँच प्रयाग



भारत वर्ष में पवित्र नदियों के संगम को प्रयाग कहा जाता है। इलाहाबाद में गंगा, जमुना एवं सरस्वती के संगम को प्रयाग राज कहा जाता है। ऐसे ही उत्तराखण्ड के पाँच प्रयागों का हमारे धर्मों में विषेश महत्व है। जो इस प्रकार हैः-


देवप्रयागः- अलकनंदा तथा भगीरथ नदियों के संगम पर देवप्रयाग नामक स्थान स्थित है। इसी संगम स्थल के बाद इस नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है । यह समुद्र सतह से १५०० फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। देवप्रयाग में शिव मंदिर तथा रघुनाथ मंदिर हैजो की यहां के मुख्य आकर्षण हैं। रघुनाथ मंदिर द्रविड शैली से निर्मित है। देवप्रयाग को सुदर्शन क्षेत्र भी कहा जाता है। देवप्रयाग में कौवे दिखायी नहीं देतेजो की एक आश्चर्य की बात है।



रुद्र प्रयागः- रुद्र प्रयाग मंदाकिनी और अलकनंदा के संगम पर स्थित है। अलकनंदा का उद्गम स्थल बद्रीनाथ धाम है एवं मंदाकिनी शिव के क्षेत्र केदारनाथ से प्रवाहित होती है। रुद्र प्रयाग में ही नारद जी ने रुद्र रूप शिव से संगीत का ज्ञान प्राप्त किया था। यहाँ शिव के रुद्र अवतार का दर्शन होता है। यहीं पर भगवान रुद्र ने श्री नारदजी को `महतीनाम की वीणा भी प्रदान की थी। यहीं से केदारनाथ के दर्शन हेतु यात्रा मार्ग आरंभ होता है। यहाँ की संध्या आरती का सौभाग्य हम दोनों को भी प्राप्त हुआ जो अति आनंदमय क्षण था।

कर्ण प्रयागः-  कर्ण प्रयाग में अलकनंदा तथा पिंडर नदी का संगम स्थल है। पिण्डर का एक नाम कर्ण गंगा भी हैजिसके कारण ही इस तीर्थ संगम का नाम कर्ण प्रयाग पडा। यहीं पर महादानी कर्ण द्वारा भगवान सूर्य की आराधना और अभेद्य कवच कुंडलों का प्राप्त किया जाना प्रसिद्ध है। कर्ण की तपस्थली होने के कारण भी इस स्थान को कर्णप्रयाग कहा जाता है।

नंद प्रयागः- नंदाकिनी एवं अलकनंदा के संगम को नंद प्रयाग कहते हैं। कर्णप्रयाग से उत्तर में बदरीनाथ मार्ग पर 21 किमी आगे नंदाकिनी एवं अलकनंदा का पावन संगम है। पौराणिक कथा के अनुसार यहां पर नंद महाराज ने भगवान नारायण की प्रसन्नता और उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए तप किया था। यहां पर नंदादेवी का भी बड़ा सुंदर मन्दिर है। नन्दा का मंदिरनंद की तपस्थली एवं नंदाकिनी का संगम आदि योगों से इस स्थान का नाम नंदप्रयाग पड़ा। संगम पर भगवान शंकर का दिव्य मंदिर है। यहां पर लक्ष्मीनारायण और गोपालजी के मंदिर दर्शनीय हैं। यह सागर तल से २८०५ फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है।है।

विष्णु पुराणः- विष्णु पुराण धौली गंगा तथा अलकनंदा का संगम स्थल है। यहाँ विष्णु जी की प्रतिमा से सुशोभित मंदिर और विष्णुकुण्ड दर्शनिय है। यहीं से सूक्ष्म बदरिकाश्रम प्रारंभ होता है। इसी स्थल पर दायें-बायें दो पर्वत हैंजिन्हें भगवान के द्वारपालों के रूप में जाना जाता है। दायें जय और बायें विजय हैं। स्कंद पुराण में इसका वर्णन वर्णित है।

भारत की संस्कृति में नदियों को देवी रूप प्रदान किया गया है, अतः उपरोक्त प्रयागों का दर्शन धार्मिक यात्रा में विशेष महत्व रखता है। इन पाँच प्रयागों के पश्चात ही देव प्रयाग के बाद से ही इस धरती पर माँ गंगा का अवतरण होता है। ऋषिकेश से अलकनंदा मंदाकिनी नंदाकिनी धौली गंगा पिंडर नदी तथा भागीरथी माँ गंगा के नाम से इस धरती पर पूज्यनिय हैं। पवित्र पावनी जीवनदायनी मोक्षदायनि माँ गंगा को निमर्ल एवं स्वच्छ रखने का प्रण करते हुए शत् शत् नमन करते हैं।

                

Tuesday, 24 June 2014

केदारनाथ धाम


हिमालय की गोद में तपस्वियों, ऋषियों की तपो भूमि केदारनाथ शिव धाम समुन्द्र तल से 11735 फिट की ऊँचाई पर स्थित अत्यन्त शोभायमान स्थान है। यहाँ परम् पिता महादेव का ग्यारहवाँ ज्योर्तिलिंग श्री केदारेश्वर के रूप में विद्यमान है। पौराणिक कथानुसार केदारनाथ से संबंधी प्रचलित कथा इस प्रकार हैः-

कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद गोत्र हत्या के पाप का प्रायश्चित्त करने के लिए पांडव काशी गये परन्तु वहाँ वे भोले भंडारी विश्वनाथ का दर्शन कर प्रायश्चित्त नहीं कर सके। ऐसा मानना है कि शिव शंकर उन्हे दर्शन देना नहीं चाहते थे, अतः वे हिमालय पर चले गये। पांडव महादेव को ढूढंते हुए हिमालय पहुँचे किन्तु शिव वहाँ से भी अदृश्य हो गये। इस स्थान को गुप्त काशी कहा जाता है। पांडव गौरी कुण्ड आदि स्थानों पर शिव को ढूंढते हुए आगे बढ रहे थे कि तभी नकुल और सहदेव को एक नर भैंसा दिखा जिसका रूप विचित्र था। विचित्र भैंसे को देखकर भीम उसके पीछे दौङे अत्य़धिक भागम-भाग के कारण भीम थक गये परंतु भैंसा भीम के हाँथ नहीं लगा। तभी भैंसे को दूर खङे देख भीम ने उसपर गदा से प्रहार किया तब भी वो भैंसा जमीन में मुख छिपाए बैठा रहा। भीम ने उसकी पूंछ पकङ कर जोर से खींचा तो भैंसे का मुख नेपाल में प्रकट हुआ जिसे पशुपतीनाथ के नाम से जाना जाता है। भैंसे का पार्श्वभाग वहीं रह गया, उसमें से दिव्य ज्योति प्रकट हुई। इस ज्योति में भगवान शिव शंकर प्रकट हुए और उन्होने पांडवों को दर्शन दिये। महादेव के आशिर्वाद से पांडव गोत्र हत्या के पाप से मुक्त हुए। पांडवों की प्रार्थना पर भगवान भोले नाथ त्रीकोंणिय आकार में भक्तों के कल्यांण हेतु वहीं विराजमान हो गये। नर भैंसे का पश्च भाग त्रीकोंणी था अतः शिव का ये रूप त्रीकोंणिय आकार में पूज्यनिय है।
नर भैंसे के रूप में प्रत्यत्क्ष शिवजी पर गदा से प्रहार करने की वजह से भीम बहुत दुःखी हुए तथा भोलेभंडारी शिव से क्षमा याचना माँगी तथा उनकी पीठ की घी से मालिश किये। आज भी केदार नाथ में पानी से अभिषेक करने के बजाय घी से अभिषेक किया जाता है। केदार नामक हिमालय चोटी पर स्थित होने के कारण इस ज्योर्तिलिंग को केदारेश्वर ज्योर्तिलिंग के रूप में पूजा जाता है।

केदारनाथ मंदिर एक ऊँचे चबूतरे पर बङे पत्थरों से बना मंदिर है। ऐतिहासिक साक्ष्य के अनुसार 1019 में राजा भोज ने इसे बनवाया था। 1800 में अहिल्लयाबाई होल्कर ने इसका जिर्णोद्वार करवाकर मंदिर पर स्वर्ण कलश स्थापित करवाया। मंदिर के सभामंडप में नंदी, पांडव, द्रोपदी, कुंती तथा कृष्ण भगवान की मूर्तियां भी स्थापित हैं। ज्योर्तलिंग का आकार त्रीकोंणिय होने के कारण इस पर जालाभीषेक नहीं किया जाता। केदार नाथ की प्रातः कालीन पूजा को निर्वाण दर्शन कहा जाता है तथा सांयकालीन पूजा को शृगांरदर्शन कहा जाता है। केदारनाथ धाम की महिमा का वर्णन गरुण पुराण,  शिव पुराण, सौर पुराण तथा पद्म पुराण आदि में वर्णित किया गया है। कार्तिक मास में जब जोर की हिम वर्षा होती है तो श्री केदारेश्वर का भोगसिंहासन निकालकर मंदिर का द्वार बंद कर दिया जाता है। चैत्र मास तक केदारनाथ जी का निवास उखीमठ में होता है।

वर्ष 2013 में आई प्राकृतिक सुनामी में जहां संपूर्ण बस्ती का विनाश हो गया वहीं केदार नाथ मंदिर का सुरक्षित रहना ईश्वरीय चमत्कार ही है। शिव की अद्भुत महिमा का ऐसा असर हुआ कि एक चट्टान पता नहीं कहाँ से आकर मंदिर के लिए सुरक्षा कवच बन गई। इस रहस्य की गुत्थी विज्ञान भी सुलझाने में असर्मथ है। गौरी कुण्ड में भी केवल माता भगवती का मंदिर, सुरक्षित बचा रहना आस्था के विश्वास को और भी मजबूत करता है। सर्व शक्तिमान बाबा केदारनाथ का आशिर्वाद हम सभी पर रहे तथा विश्वास और आस्था की अलख हम सभी के मन में जलती रहे। ऐसी पवित्र मनोकामना के साथ सब मिलकर प्रेम से बोले ऊँ नमःशिवाय



  

Tuesday, 17 June 2014

हमारी केदारनाथ यात्रा


उत्तराखण्ड के पवित्र चार धामों में से एक तथा भोलेभंडारी शिव के बारह ज्योर्तिलिंग का ग्यारहंवां ज्योर्तलिंग केदार नाथ का पट इस वर्ष 4 मई को भक्तों के दर्शनार्थ हेतु खोल दिया गया। भगवान केदार नाथ से आशिर्वाद लेने अनेक भक्तजन केदारधाम की यात्रा पर निकल पङे हैं। पिछले साल की त्रासदी के बावजूद  ईश्वरीय आस्था के सैलाब ने प्राकृतिक आपदा के सैलाब को इस कदर शिक्सत देने की थान ली है कि 60-70 साल के बुजुर्ग भी भोलेनाथ के दर्शन को पैदल कठिन मार्ग पर भी चलने के लिए उत्सुक हैं। हर तरफ भोलेनाथ, कोदारनाथ बाबा की जय जयकार के साथ लोग लम्बी कतारों में सोनप्रयाग में दर्शन यात्रा हेतु प्रतिक्षा में खङे नजर आ रहे थे। डॉक्टरी जाँच परिक्षण की कतार हो या पोनी के लिए टिकिट पंक्ति चँहुओर दर्शनार्थी प्रसन्न मन से अपनी बारी का इंतजार करते हुए थकते नही।

शिव शंकर बाबा केदार नाथ के दर्शन की अभिलाषा लिए हम लोगों की यात्रा ऋषीकेश से 16 मई 2014 को  गढवाल मंडल के सहयोग से शुरू हुई, जो रास्ते में स्थित पावन पाँच प्रयागों के दर्शन से और भी मनोहारी हो रही थी। रास्ते के मनोरम प्रकृतिक दृश्य यात्रा को उत्साह प्रदान कर रहे थे। यात्रा शुरू होने के कुछ समय पश्चात हम लोगों ने देवप्रयाग का दर्शन लाभ लिया, जहाँ भागरथी तथा अलखनंदा का संगम है। केदारनाथ धाम की यात्रा के सफर में उत्तराखण्ड के पाँच प्रयागों का दर्शन अतिमनोहारी है जिसकी विस्तार में चर्चा अगले लेख में करेंगे।

देवप्रयाग पर अल्पविराम के पश्चात हमारी यात्रा आगे बढी और दोपहर के भोजन हेतु रुद्र प्रयाग में गढवालमंडल के गेस्टहाउस में रुकी। रुद्रप्रयाग में अलखनंदा और मंदाकनी का संगम है। भोजन अवकाश के पश्चात यात्रा आगे बढती है एंव शाम को रामपुर पहुँच गई। रामपुर के गेस्टहाउस में हम सभी के लिए रात्रिविश्राम की व्यवस्था थी। वहीं हम सबको ये पता चला कि सुरक्षा की दृष्टी से सभी का मेडिकल चेकअप अनिवार्य है, जिसके लिए लंबी कतार लगी हुई है। ऐसी स्थिती में हमारे गाइड ने उचित निर्णय लिया सुबह मेडिकल चेकअप कराने के बजाय शाम को ही वो हम सभी को लेकर रामपुर से 6 किमी दूर सोनप्रयाग ले गया। सोनप्रयाग में मेडीकल चेकअप की व्यवस्था थी। लंबी प्रतिक्षा के बाद हम सभी का मेडिकल सर्टीफिकेट बन गया और हम सभी ने इसे केदारनाथ दर्शन हेतु एक सकारात्मक संदेश माना। हम लोगों को हेलीकॉप्टर से केदार नाथ जाना था किन्तु सरकार द्वारा तबतक  हेलीकॉप्टर यातायात की अनुमति नही प्राप्त हो सकी थी। अतः हम लोगों ने अपनी यात्रा पोनी के माध्यम से पूर्ण करने का निर्णय लिया। अगले दिन 17 मई को प्रातः 4 बजे हमलोग सोनप्रयाग पहुँचे और वहाँ रजिस्ट्रेशन के पश्चात पोनी के माध्यम से 17 किमी की दूरी तय करके लिंचौली पहुँचे।


सोनप्रयाग से ही एक वर्ष पूर्व हुई त्रासदी का असर दिखने लगा था। सुरक्षा की दृष्टी से 500 या 600 यात्रियों को ही आगे की यात्रा की अनुमति मिल रही थी। सोनप्रयाग से केदार नाथ धाम का रास्ता आपदा के कारण और भी कठिन हो गया है, फिर भी आस्था का सैलाब हर कठिनाईयों को पार करके बाबा केदार नाथ के दर्शन को उत्साहित था। रास्ते के मनोरम दृश्य तथा पवित्र धाम के दर्शन की अभिलाषा, आगे बढने का उत्साह दे रहे थे। पहाङियों पर घुमावदार तथा  ऊँचे-निचे रास्ते, तो कहीं बेहद मुश्किल मोङ मन में अनेक भावों को जन्म दे रहे थे। कभी खाई का डर तो कभी झरनो की शीतलता मन को शान्त कर रही थी। मार्ग में सभी यात्रियों के मुख से ऊँ नमः शिवाय का स्वर गुँजायमान हो रहा था। गढवाल सरकार की तरफ से जगह-जगह पर चाय-पानी एवं भोजन की निःशुल्क व्यवस्था है, जहाँ यात्री अल्प विश्राम के पश्चात  जय भोले नाथ का जयकारा लगाते हुए आगे बढ रहे थे।  


जैसे-जैसे हम आगे बढ रहे थे रास्ता और अधिक कठिन हो रहा था, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि बाबा केदार नाथ हम सभी की परिक्षा ले रहे हों। ईश्वर की कृपा से मौसम सकारात्मक था। लिंचौली के बाद लगभग 4 किमी का सफर हमें पैदल पूरा करना था। कहीं-कहीं बर्फ के बीच में से चलना तो कहीं सीधी पहाङी पर चढना। यात्रा अत्यधिक मुश्किल थी,  एक किमी का सफर पूरा करने में एक घंटे का समय लगा। मार्ग में सेवाभाव में लगे लोग सभी दर्शनार्थियों को आगे बढने के लिए प्रेरित कर रहे थे। शिव की कृपा और लोगों के सकारात्मक सहयोग से बर्फिली पहाङियों के रास्ते तथा ऊँचे-निचे दुर्गम मार्ग भी पार हो गये। जैसे ही मंदिर का गुम्बद दिखा, हम सभी में उमंग का ऐसा संचार हुआ कि थकान काफूर हो गई। जगत पिता केदारनाथ के आर्शिवाद हेतु हमारे पैर मंदिर की ओर चल पङे, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि, कोई पिता अपने बच्चों को गले लगाने के लिए बाँहें फैलाए खङा हो। चारो तरफ बर्फ की सफेद चादरों के बीच बाबा केदारनाथ का मंदिर मनोहारी प्रतीत हो रहा था। अक्सर हम सबके मन में जो छवी है कि, कैलाश पर शिव बर्फ के पहाङों पर बैठे हैं, उसी दृश्य का आभास होने लगा था।  

मंदिर के अंदर परम् पिता केदारनाथ बाबा का प्रतीक ग्रेफाइट की एक शिला से बना हुआ है जो त्रीकोंणिय आकार का है। जिसमें बुद्धि के देवता गणेंश एंव माता पार्वती,  शिवशंकर केदारनाथ के संग विराजमान हैं। मंदिर के अंदर स्थित पुजारी जी के द्वारा हमें मंत्रोचार से 20 मिनट तक  पूजा अर्चना करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जिससे अद्भुत मानसिक शान्ति का आभास हो रहा था। दुर्गम एवं कठिन रास्तों की थकान दर्शन मात्र से पलभर में दूर हो गई। मंदिर परिसर में हमने लगभग एक घंटे का समय व्यतीत किया। शिव के दर्शन से प्राप्त आर्शिवाद का ऐसा असर हुआ कि वापसी का सफर रंच मात्र भी दुष्कर नही लगा। पहाङी रास्तों पर रात्री का सफर लगभग असंभव होता है अतः हम लोग लिंचौली में उत्तराखण्ड सरकार द्वारा बनाये गये टेन्टहाउस में रात्री विश्राम के लिए रुके, जहाँ अत्यधिक ठंड  से बचने के लिए प्रत्येक यात्रियों को स्लीिपिंग बैग दिया गया था। अगले दिन प्रातः 5 बजे हम लोग वापस सोनप्रयाग के लिए प्रस्थान किये। प्रभु की ऐसी कृपा हुई कि  अधिकांश दूरी हम पैदल ही चलकर पार कर सके।  

ईश्वर की कृपा से ही हम बाबा केदार नाथ का दर्शन लाभ प्राप्त कर सके। ये सारस्वत सत्य है कि  ईश्वर की कृपा के बिना एक पत्ता भी नही हिलता उनकी कृपा हो तो मार्ग के सभी संकट पलभर में दूर हो जातें हैं। परन्तु प्रयास करना मनुष्य का परम् धर्म है, अतः आपदा के खौफ से बाहर निकलकर केदारनाथ की यात्रा के इच्छुक लोगों को यात्रा की शुरूवात जरूर करनी चाहिये क्योंकि ईश्वर भी उसी की सहायता करता है जो आगे बढने का प्रयास करता है।पवित्र धाम केदारनाथ की अद्भुत छवि का वर्णन शब्दों में असंभव है क्योंकि उसे सिर्फ वहाँ जाकर महसूस ही किया जा सकता है। अपने अनुभव को इस लेख द्वारा व्यक्त करना एक प्रयास है। केदार नाथ के दर्शन के पश्चात हम लोगों की यात्रा बद्रीनाथ धाम के दर्शन हेतु अग्रसर हुई। एक सप्ताह की हमारी यात्रा में 12 लोगों का समूह था, जो अलग-अलग प्रान्त के थे, फिर भी यात्रा के दौरान ऐसा सकारात्मक वातावरण बना रहा कि हम सब एक परिवार जैसे ही रहे तथा भारतीय संस्कृति को आत्मसात करते हुए हर्षोल्लास के साथ हम सभी का सफर दोनो धाम अर्थात केदारनाथ तथा बद्रीनाथ के दर्शन से पूर्ण हुआ। 




बाबा केदारनाथ की कथा एवं पाँच प्रयागों का उल्लेख हम अपने अगले लेख में करेंगे। ऊँ नमः शिवाय 



Monday, 26 May 2014

एक महत्वपूर्ण सबक


एक अमीर आदमी तफरीह के लिए समुंद्र में नाव लेकर बहुत दूर निकल गया। अचानक जोर का तुफान आया। नाव थपेङों से क्षतिग्रस्त हो कर टूटने लगी, तो वो अमीर आदमी समूंद्र में कूद गया। तुफान थमा तो उसने खुद को एक निर्जन टापू पर पाया। वो सोचने लगा कि मैने जिंदगी में कभी भी किसी का भी बुरा नही किया फिर भी ईश्वर ने मुझे ऐसी विपदा में क्यों डाल दिया। अब पूरी जिंदगी यहीं विराने में गुजारनी होगी। ये सोचकर वह रहने के लिए एक झोपङी बनाने लगा। रात को वो उस झोपङी में सो गया। परंतु अचानक मौसम में ऐसा परिर्वतन हुआ कि बिजली कङकने लगी और तभी बिजली उसकी झोपङी पर गिरी जिससे झोपङी में आग लग गई। अपने रहने की जगह को आग में स्वाहा होते देखकर वह आदमी पूरी तरह टूट गया। इतनी परेशानी में वो ईश्वर को कोसने लगा।

तभी अचानक एक नाव टापू के किनारे आकर लगी। उसमें से दो व्यक्ति उतर कर टापू पर आए और कहने लगे कि हमने यहाँ जलती हुई आग देखी तो हमें लगा कि कोई परेशानी में है, वो आग जलाकर मुसिबत में मदद के लिए संकेत दे रहा है। इस लिए हम लोग यहाँ आए।

लोग कहते हैं कि ईश्वर नजर नही आता, पर सच तो ये है कि जब दुःख के समय कोई दोस्त, सम्बन्धी साथ नही देता तब ईश्वर ही नजर आता है।

 उस आदमी की आँखों से आँसू निकलने लगा और मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देते हुए कहने लगा कि किसी के मानने या न मानने से तुझे कोई फरक नही पङता। हे ईश्वर तू तो निर्विकार, अकिंचन, निस्पृह होकर अपना कर्तव्य करता रहता है।

मित्रों, जिन मुश्किलों में हम ईश्वर को भला-बूरा कहना शुरू कर देते हैं वास्तव में कई बार उसी  कठिन परिस्थिति में ही हमारा हित छुपा होता है। हम सिर्फ परेशानियों को ही देखते हैं जबकि ईश्वर हमारे हित के लिए  नये द्वार का सृजन करता है। अतः हमें हर परिस्थिति में ईश्वर को कोसने के बजाय एक नई आशा के साथ उसके प्रति आस्था और विश्वास की अलख हमेशा जलाए रखनी चाहिये।


Saturday, 10 May 2014

अंधेरी दुनिया में हौसले की रौशनी

कल्पना किजीए यदि दुनिया बिलकुल अँधेरी होती तो क्या हम आज की तरह जिंदगी का आनंद ले सकते थे।  आँख पर पट्टी बाँधकर चार कदम भी सीधे नही चल सकते। बिजली गुल हो जाने पर तुरंत रौशनी का इंतजाम करते हैं,  हम अंधेरे से घबङाते हैं। परन्तु इस दुनिया में कई ऐसे लोग भी हैं जिनकी पूरी जिंदगी अँधेरों के साये में ही बीत जाती है। विज्ञान की अगर माने तो हम सब 85% ज्ञान, आँखों से अर्जित करते हैं। सोचिए !  उन लोगों के बारे में जो देख नही सकते, वो किस तरह से जिदंगी को रौशन करते होंगे ? 

जिवन में पग-पग पर अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए आज कई दृष्टीबाधित लोग अपने हौसले की रौशनी से स्वंय के साथ अनेक लोगों की जिंदगी को प्रकाशित कर रहे हैं। बेमिशाल जिंदादिली से कई लोगों को आत्मनिर्भर बना रहे हैं। कुदरत ने सभी को कुछ न कुछ कमियाँ दी हैं तो कुछ न कुछ प्रतिभाएं भी दी है। जो लोग अपनी कमियों को दरकिनार करते हुए प्रतिभाओं पर फोकस करते हैं वो एक दिन अनेक लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाते हैं। आज हम चर्चा करते हैं, उन लोगों की जिनका सफर आसान नही था। फिरभी मंजिल तक पहुँचने का जज़बा उन्हे खास बना देता है। 

पढने में तीव्र रुची रखने वाले रुस्तम जी मेहरवानजी अल्पाई की आँखें शिक्षा के सोपान चढने में मदद नही कर रहीं थीं। क्षींण होती आँखों की रौशनी से उन्हे लगने लगा कि  समाज उन्हे बेसहार और लाचार समझने लगेगा।  उनकी अंर्तआत्मा को ये स्वीकार नही था। 7 मई 1887 को बंबई के पारसी परिवार में जन्में अलपाई वाला ने अपनी दृण इच्छाशक्ति से दृष्टिबाधिता को परास्त कर 1913 में इंग्लैंड से बैरिस्टर की पढाई पूरी करके भारत आए और वकालत की शुरुवात किये। जबकि उस दौरान आज जैसी आधुनिक सुविधाएं भी नही थीं। आशावादी दृष्टीकोंण लिए, वे सदैव परेशानियों से एक जिंदादिल सिपाही की तरह लङते रहे और जीत-हार की परवाह किये बिना आगे बढते रहे। उनका पूरा जीवन उन लोगों के लिए समर्पित हो गया जो आँखों की रौशनी के अभाव में दयनिय जिवन गुजार रहे थे।

दृष्टीबाधित लोगों के लिए अभिव्यक्ति का माध्यम है ब्रेललीपि परन्तु   उस दौरान अलग-अलग स्कूलों में ब्रेल लिपियां अलग हुआ करती थीं जिससे इस लिपी में पुस्तकों का आभाव रहता था। रुस्तम जी अलपाई वाला ने 1923 में 'अंध बधिर सम्मेलन' में ब्रेललिपियों की एकरुपता को ठोस तरीके से प्रस्तुत किया किन्तु विदेशी सरकार से भारत के उत्थान की आशा रखना समुन्द्र में पुल बनाने जैसा कार्य था। परन्तु अलपाई वाला हार नही माने और उनके अथक प्रयासों का परिणाम रहा कि  1952 में  युनेस्को ने भारत के लगभग 20लाख दृष्टीबाधित लोगों के लिए एक भारतीय ब्रेल लीपी स्वीकार की। उन्होने दृष्टीबाधित लोगों के लिए व्यवसाय शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जिससे वे आर्थिक क्षेत्र में आत्म निर्भर बन सकें। 1952 में आपके सद्प्रयत्नो से 'नेशनल ब्लाइंड एसोसिएशन' की स्थापना हुई,  जो शिक्षा के साथ प्रशिक्षण केन्द्र तथा औद्योगिक केन्द्र के माध्यम से अनेक दृष्टीबाधित लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास कर रहा है।

सामाजिक सेवाओं की जाग्रत आत्मा बेरिस्टर रुस्तमजी अल्पाई वाला को 1961 में भारत सरकार ने 'पद्म श्री' से अलंकृत किया। मनुष्य केवल एक अंग के अक्षम हो जाने से हताश हो जाता है, किन्तु अलपाई वाला ने शारीरिक अपंगता को स्वीकार नही किया। 1956 में आधे अंग में लकवे का प्रकोप हुआ फिरभी आत्मा के प्रकाश से प्रकाशित होकर लाखों लोगों के जीवन में सुप्रभात लाने में सफल हुए। अनेक आँधियों को झेलते हुए सफलता का दिपक रौशन करने वाले  विनम्र तथा मृदुभाषी अल्पाई वाला मानव जगत में अनेक लोगों के लिेए प्रेरणा स्रोत हैं।

आज जिस समाज में लोग सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, ऐसी दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने आत्मविश्वास के बल पर स्वंय को ही नही बल्की हजारों लोगों को आत्मनिर्भर तथा स्वालंबी बनाने के लिए प्रयासरत हैं। ऐसी ही एक महिला के जीवन परिचय को शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहे हैंः-

डेरीना स्वंय दृष्टीबाधित महिला हैं, किन्तु अपने हौसले की रौशनी से स्वंय को सुशिक्षित तथा स्वालंबी बनाते हुए ,हजारो दृष्टीबाधित लोगों के जीवन में प्रकाश किरण की तरह कार्यरत हैं। डेरीना डी ग्वाइया 'ब्राजीलियन फाउंडेशन' नामक संस्था की अध्यक्षा तथा प्राण हैं। 'विश्व दृष्टीबाधित कल्याण समिति' की उपाध्यक्ष हैं। उनकी संस्था में ब्रेल पुस्तकों का मुद्रण कई दृष्टीबाधित लोग बहुत ही कुशलता से तथा समग्र भाव से कर रहे हैं। डेरीना का अक्सर यही प्रयास रहता है कि दृष्टीबाधित लोग किसी पर निर्भर न रहें। उनकी संस्था रोजगार के अवसर की तलाश करती रहती है, जिससे आत्मनिर्भर जीवन जीने का सौभाग्य सभी दृष्टीबाधित लोगों को हो।

एक बार एक ब्राजील दृष्टीबाधित युवक 'साओ पालो' डेरीना डी ग्वाइया के पास आया और अपनी समस्या सुनाई। वे एक निपुण मालिश करने वाला था फिर भी उसे नौकरी नही  मिल रही थी। डेरीना ने उसे आश्वासन दिया कि मैं पुरा प्रयास करुंगी। डेरीना को पता चला कि एक क्लब में मालिश करने वाले युवक की जरूरत है, वे तुरंत उसके अध्यक्ष से मिलने गईं किन्तु अध्यक्ष महोदय ने कहा कि,  अंधे युवक से मुझे सहानभूति है पर उसे नौकरी पर नही रख सकता।
डेरिना ने कहा, श्री मान ! मालिश आँखों से तो की नही जाती, हाँथो से की जाती है। आप अपनी सहानभूती को थोङा विकसित करने की कृपा करें। उसे रख कर देखें यदि कार्य समझ में न आए तो मना कर दिजीयेगा।
अध्यक्ष को ये बात उचित लगी और युवक साओ पालो को नौकरी पर रख लिया। युवक की कार्य दक्षता और लगन से सभी क्लब मैम्बर संतुष्ट रहने लगे और वो युवक वहीं वर्षों तक नौकरी करता रहा।

ये वाक्या महज उदाहरण नही है बल्की समाज की सोच को दर्शाता है। यदि हमारे समाज में लोगों की सोच और सहयोग की भावना का विकास हो जाए तो कई दृष्टीबाधित लोग अपने पैरों पर खङे होकर आत्मनिर्भर बन सकते हैं।  मेरी नजर में ही आज ऐसे कई दृष्टीबाधित लोग हैं जो बौद्धिक क्षमता में सामान्य लोगों से भी आगे हैं तथा विशेष क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा चुके हैं। जिनका कहना है कि, "हम रास्ता नही देखते मंजील देखते हैं।"

कृष्णकांत माणें आज सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं तथा डिजीटल टेक्नोलॉजी को महत्व देते हुए, अनेक लोगों के लिए जिवंत मिसाल हैं। राजस्थान के पहले दृष्टीबाधित  जज भीलवाङा के  ब्रह्मानंद शर्मा  तथा पी.के.पिंचे कमिशनर पद पर अनेक बाधाओं को आत्मविश्वास के साथ पार करके पदासीन हुए हैं। पर्वतारोही अतुल रंजन सहाय, सॉलीलिटर कंचन सहाय, पत्रकार सुब्रमणी जैसे लोग दृष्टीबाधिता के बावजूद लीक से अलग हठ कर काम कर रहे हैं। टाटा स्टील कंपनी में कार्यरत अतुल रंजन सहाय, बछेन्द्री पाल के साथ कई बर्फीली चोटियों पर ट्रैकिगं कर चुके हैं। 2006 में पद्म श्री से सम्मानित डॉ. गायीत्री संकर का बचपन बहुत ही मुश्किल दौर से गुजरा था। माता-पिता का साथ छूट जाना और दृष्टीबाधिता का अभिशाप, फिर भी अपनी मेहनत और लगन से वे आज ऑल इण्डिया रेडियो में पिछले 22 साल से कार्यरत हैं।

इंदौर की पूर्णिमा जैन एमपीपीएससी को क्वालीफाइ करने वाली पहली दृष्टीबाधिता हैं किन्तु दृष्टीबाधिता के कारण रिजेक्ट कर दिया गया। उन्हे जीवन में पग-पग पर ये एहसास कराया गया कि वे आम लोगों से कमतर हैं। हार न मानने वाली पूर्णिमा ने यूपीएससी की परिक्षा दी और सभी राउन्ड्स में अच्छे प्रर्दशन के बावजूद उनकी नियुक्ति नही की गई। उन्हे 1123 अंक मिले थे, जो उस वर्ष के टॉपर के बराबर थे। पूर्णिमा जैन ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया आखिर उसे इंसाफ 'प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह' के हस्तक्षेप से ही मिल सका। पूर्णिमा को इंडियन रेलवे पर्सनल सर्विसेज के ग्रुप बी, क्लास वन के तहत पोस्टिंग दी गई। जबकि उनके नम्बरों की योग्यता के आदार पर आईएएस या आईएफएस के तहत पोस्टिंग मिलनी चाहिए थी। 

अनेक सफलताओं के बावजूद आज भी दृष्टीबाधित लोगों को अपनी योग्यता को प्रमाणित करने के लिए अनेक अग्नि परिक्षाओं से गुजरना पङता है क्योंकि समाज की संकीर्ण सोच उनके मार्ग की सबसे बङी बाधा है। अनेक नकारात्मक रास्तों के बावजूद दृष्टीबाधित लोग अपनी दृणइच्छा शक्ति से "जहाँ चाह है वहाँ राह है", कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। 

उन तमाम जिंदादिल जिंदगी को मेरा सलाम है, जिनके लिए शारीरिक दोष प्रगती के मार्ग में बाधा नही बनते। इस ब्लॉग के माध्यम से आप सभी से नेत्रदान की अपील करते हैं। आपकी ये पहल आपके न रहने पर भी किसी के जीवन का उजाला बन सकती है। 

कृपया निवेदन है कि होनहार छात्रा रजनी शर्मा की अपील जरूर सुने। इसके लिए दिये गये लिंक पर क्लिक करेंः- 

धन्यवाद

Friday, 2 May 2014

एक माँ की कलम से (Happy Mother's Day)



प्राणी जगत में  पशु, पक्षी एवं मनुष्य सभी वर्ग को माँ के आँचल में ही सारी परेशानी और बैचेनी को सकून मिलता है। हम सब अक्सर देखते हैं एक चिङिया किस तरह एक-एक दाना के लिए उङान भरती है और बच्चे को अपनी चोंच से एक-एक दाना खिलाती है। इस वातसल्य के भाव को शब्दों में समेटा नही जा सकता।  माँ की प्यार भरी डाँट और दुलार को पाने के लिए स्वयं ईश्वर भी बच्चे के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होते हैंं।

एक बच्चे के जनम पर  ईश्वर उसे माँ रूपी तोहफा देते हैं, तो दूसरी तरफ एक स्त्री के असतित्व को माँ रूपी सम्मान से सम्मानित करते हैं। ईश्वर नारी को कुदरत के कार्य  में सहभागी बनाते हैं, नौ महिने तक सहनशीलता के साथ उसे जीवन चक्र को गतिमय रखने की शक्ति प्रदान करते हैं।  ये ऐसा रूप है जिसमें सारी ईश्वरिय शक्ति समाहित है। न जाने किस मिट्टी से उसे ईश्वर ने बनाया है, जो न कभी थकती है और न कभी रुकती है। हर पल अपने बच्चों की सुरक्षा में वटवृक्ष की तरह अपने आँचल की छाँव देती है।  अपने बच्चे के प्रति सुरक्षा का भाव एवं उसे श्रेष्ठ बनाने की जद्दोज़हद में कभी-कभी वो कठोर भी बन जाती है। स्वंय चाहे कितनी भी नाराज हो अपने बच्चे से परन्तु किसी दूसरे की नाराजगी के आगे सदैव ढाल बनकर खङी हो जाती है। माँ के सम्पूर्ण वातसल्य भाव में सब्र (Patience)   का भाव अतिआवश्यक होता है परन्तु आजकल कुछ ही माताओं में ये दिखाई देता है। हकिकत तो ये है कि मुझमें भी इस गुणं का अभाव रहा जिसकी वजह से मेरे बच्चों की मेरे द्वारा यदा-कदा  पिटाई भी हुई जो शायद किसी भी तर्क से सही नही थी। ये मेरा सौभाग्य है कि मेरे दोनो ही बच्चे मेरे इस व्यवहार को सकारात्मक रूप से अपनाए। आज मेरी बेटी और मेरा बेटा दोनो ही अपनी योग्यता के आधार पर कई बच्चों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि  मेरे दोनो ही बच्चे हमारी फिक्र करते हैं हम तुलना भी नही कर सकते कि कौन कितना फिक्रमंद है।  जबकि  हमारे समाज में अक्सर कहा जाता है कि बेटी ही भावुक होती है और माता-पिता का अधिक ख्याल रखती है। सच तो ये है कि, माँ और बच्चे के रिश्ते में बेटी-बेटे का भेद सिर्फ सामजिक कुप्रथा है  क्योंकि ममता से पूर्ण वातसल्य कोई रिश्ता नही है बल्कि ईश्वरीय शक्ति का एहसास है जो हरपल हम सबके पास होता है।

किसी ने सच कहा हैः- When you are a Mother, You are never really alone in your thoughts..
                                  A Mother always has to think twice, Once for her self & Once for her Child. 

आज भी बच्चों का हमारे प्रति फिक्र और ध्यान (attention )  रखने का भाव मुझे सुखद एहसास देता है। जब भी अतीत के पन्नो को देखते हैं तो उनकी बालसुलभ हरकतें और बचपन की किलकारियाँ मेरे लिए किसी साज की संगीतमय धुन के समान होती है जिसकी तरंग से मन भाव-विभोर हो जाता है।  हम अपनी कलम से  ईश्वर का कोटी-कोटी धन्यवाद करते हैं, जिसने नारी को माँ रूपी कुदरती उपहार से अलंकृत किया और मुझे गौरवान्वित करने वाले बच्चों का साथ दिया।  

माँ को सर्मपित कुछ शब्द सुमन लेख का अवलोकन करने के लिए लिंक पर क्लिक करेंः- 
माँ
धन्यवाद


My dearest Daughter Akanksha & Son Pranjal 
God Bless you my Dears 


Wednesday, 23 April 2014

मानव एकता को इंसानियत के साथ जिवंत करें



मिलकर काम करने से बङी सी बङी चुनौतियाँ भी छोटी हो जाती हैं, इसी संदेश को जन-जन में पहुँचाने के लिए मानव एकता दिवस 24 अप्रैल को मनाया जाता है। यदि विचार करें तो आज की आधुनिक दुनिया में इस संदेश को प्रत्येक मानव को अपनाने की जरूरत है। मानवीय एकता को जिन्दा रखने के लिए मनुष्य में इंसानियत का गुण होना अति आवश्यक है। आज तो देश-दुनिया की बिगङती आवो-हवा, विकृत मानसिकता जनवरों से भी बदतर स्थिति को दर्शा रही है। जानवर भी संघटन की शक्ति को पहचानता है इसलिए समूह में रहता है परन्तु अति बुद्धीमान प्राणी इंसान स्वार्थी नेताओं के बहकावे में मानवीय एकता को कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर दिमक की तरह खोखला कर रहा है।


दिल्ली में हुई अमानवीय घटना शायद ही कोई भूल पाया हो, असम में एक लङकी के साथ सरे आम कुछ लोग बदतमीजी कर रहे थे और लोग तमाशबीन खङे थे। बात लङकी या लङके की नही है बात है, अमानवियता की क्योंकि दरंदिगी का शिकार कोई भी कहीं भी हो सकता है। कुछ समय पूर्व एक अश्वेत छात्र को कुछ लोगों ने इतना पीटा की वो कोमा में चला गया। हाल ही में दिल्ली में एक असम के छात्र को इतना ज्यादा पीटा कि वो मर गया कोई बचाने नही आया जबकि तमाशबीन कई थे। इस तरह की वारदातें इस सच्चाई को साफ कर देती हैं कि केवल दो पाँव पर चलने वाला जीव जरूरी नही है कि मनुष्य हो क्योंकि मनुष्य तो संवेदनाओं और भावनाओं की प्रतिमूर्ती है। मानविय एकता को मजबूत करने के लिए सबसे पहले इंसानियत का पाठ आत्मसात करते हुए एक अच्छा इंसान बनना बहुत जरूरी है।


आज हम अत्याधुनिक तकनिक के जमाने में जी रहे हैं। मंगल पर घर बसाने की बात कर रहे हैं किन्तु ये बात भूल रहे हैं कि घर तो भाई-चारे से, प्यार मोहब्बत से तथा अमन चैन से बनता है। हम मशीनी युग में जी रहे हैं, मनुष्य होने का दम भर रहे हैं परन्तु मनुष्यता से कोंसो दूर हो रहे हैं। पङौसी मुल्क के सैनिकों द्वारा धोखे से सीमा पर स्थित सैनिकों का सिर काटा जाना जबकि सैनिक तो विरता के प्रतीक होते हैं। ये बर्बरता क्या मनुष्यता को परिभाषित कर सकती है ?


आज दुनिया में महान बनने की चाहत तो हर एक में है पर पहले इंसान बनना भूल जाते हैं। एक वर्ष पूर्व केदारनाथ में आई प्राकृतिक त्रासदी से ज्यादा दुखित करने वाली इंसानी त्रासदी थी, जिसने इंसानियत को तार-तार कर दिया था। इंसानियत की सच्ची परिक्षा विषम परिस्थिती में ही होती है। सुख के समय तो हर कोई मानवता की दुहाई देता है।

किसी ने सच कहा है कि, "इस जहाँ में कब किसी का दर्द अपनाते हैं लोग, हवा का रुख देखकर बदल जाते हैं लोग।"

ईश्वर ने मनुष्य को उसके स्वंय की शारीरिक बनावट एवं क्रियाओं से एकता का पाठ समझाया है। सभी अंगो के पारस्परिक सहयोग से ही मनुष्य क्रियाशील रहता है। प्राणी जीवन चक्र भी एक दूसरे के बिना संभव नही है, फिर भी हम मानवीय एकता को नजर अंदाज कर देते हैं।

आज की भागम-भाग जिंदगी में कुछ इंसान ऐसे भी हैं जो इंसानियत को जिवंत करते हैं। मानवीय एकता के महत्व को प्राथमिकता देते हैं। कहते हैं "बूंद-बूंद से सागर भरता है।" इस उम्मीद के साथ भले ही मानवता दिवस महज एक दिन की ही बात क्यों न हो यदि उसे इंसानियत के साथ मनायेंगे तो हर-दिन, हर-पल मानवता का जय घोष होगा। हम सब का प्रयास यही रहे कि मानव एकता दिवस महज औपचारिकता न रहे क्योकि संघठन में ही शक्ति है।


"Where there is Unity, There is always Victory. "

Friday, 18 April 2014

रिश्तों का महत्व



शिशु  जन्म के साथ ही अनेक रिश्तों के बंधन में बंध जाता है और माँ-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी जैसे अनेक रिश्तों को जिवंत करता है। रिश्तों के ताने-बाने से ही परिवार का निर्माण होता है। कई परिवार मिलकर समाज बनाते हैं और अनेक समाज सुमधुर रिश्तों की परंपरा को आगे बढाते हुए देश का आगाज करते हैं। सभी रिश्तों का आधार संवेदना होता है, अर्थात सम और वेदना का यानि की सुख-दुख का मिलाजुला रूप जो प्रत्येक मानव को धूप - छाँव की भावनाओं से सराबोर कर देते हैं। रक्त सम्बंधी रिश्ते तो जन्म लेते ही मनुष्य के साथ स्वतः ही जुङ जाते हैं। परन्तु कुछ रिश्ते समय के साथ अपने अस्तित्व का एहसास कराते हैं। दोस्त हो या पङौसी, सहपाठी हो या सहर्कमी तो कहीं गुरू-शिष्य का रिश्ता। रिश्तों की सरिता में सभी भावनाओं और आपसी प्रेम की धारा में बहते हैं। अपनेपन की यही धारा इंसान के जीवन को सबल और यथार्त बनाती है, वरना अकेले इंसान का जीवित रहना भी संभव नही है। सुमधुर रिश्ते ही इंसानियत के रिश्ते का शंखनाद करते हैं।

इंसानी दुनिया में एक दूसरे के साथ जुङाव का एहसास ही रिश्ता है, बस उसका नाम अलग-अलग होता है। समय के साथ एक वृक्ष की तरह रिश्तों को भी संयम, सहिष्णुता तथा आत्मियता रूपी खाद पानी की आवश्यकता होती है। परन्तु आज की आधुनिक शैली में तेज रफ्तार से दौङती जिंदगी में बहुमुल्य रिश्ते कहीं पीछे छुटते जा रहे हैं। Be  PRACTICAL की वकालत करने वाले लोगों के लिए रिश्तों की परिभाषा ही बदल गई है। उनके लिए तो न बाप बङा न भैया सबसे बङा रूपया हो गया है।

किसी भी रिश्ते में धूप-छाँव का होना सहज प्रक्रिया है किन्तु कुछ रिश्ते तो बरसाती मेंढक की तरह होते हैं, वो तभी तक आपसे रिश्ता रखते हैं जबतक उनको आपसे काम है या आपके पास पैसा है।  उनकी डिक्शनरी में भावनाओं और संवेदनाओं जैसा कोई शब्द नही होता। ऐसे रिश्ते मतलब निकल जाने पर इसतरह गायब हो जाते हैं, जैसे गधे के सर से सिंग। परन्तु कुछ लोग अनजाने में ही इस तरह के रिश्तों से इस तरह जुङ जाते हैं कि उसके टूटने पर अवसाद में भी चले जाते हैं। कुछ लोग रिश्तों की अनबन को अपने मन में ऐसे बसा लेते हैं जैसे बहुमुल्य पदार्थ हो। मनोवैज्ञानिक मैथ्यु सेक्सटॉन कहते हैं किः-   इंसानी प्रवृत्ति होती है कि मनुष्य, रिश्तों की खटास और पीढा को  अपने जेहन में रखता है और उसका पोषण करता है। जिसका मनुष्य के स्वास्थ पर बुरा असर पङता है। इस तरह की नकारात्मक यादें तनाव बढाती हैं। तनाव से शरीर में 'कार्टीसोल' नामक हार्मोन स्रावित होता है, जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली की क्षमता को कम करता है। परिणाम स्वरूप मनुष्य कई बिमारियों से ग्रसित हो जाता है।  युवावर्ग को खासतौर से ऐसे रिश्तों से परहेज करना चाहिए जो अकेलेपन और स्वार्थ भावनाओं की बुनियाद पर बनते हैं क्योंकि ऐसे रिश्ते दुःख और तनाव के साथ कुंठा को भी जन्म देते हैं।

 स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है किः- "जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नही है,  पर जो रिश्ते हैं उनमें जीवन होना जरूरी है।"

रिश्तों का जिक्र हो और पति-पत्नी के रिश्तों की बात न हो ये संभव नही है क्योंकि ये रिश्ता तो पूरे परिवार की मधुरता का आधार होता है। इस रिश्ते की मिठास और खटास दोनो का ही असर बच्चों पर पङता है।  कई बार ऐसा होता है कि, छोटी-छोटी नासमझी  रिश्ते को कसैला बना देती है। जबकि पति-पत्नी का रिश्ता एक नाजुक पक्षी की तरह  अति संवेदनशील होता है। जिसे अगर जोर से पकङो तो मर जाता है, धीरे से पकङो अर्थात उपेक्षित करो तो दूर हो जाता है। लेकिन यदि प्यार और विश्वास से पकङो तो उम्रभर साथ रहता है।

कई बार आपसी रिश्ते जरा सी अनबन और झुठे अंहकार की वजह से क्रोध की अग्नी में स्वाह हो जाते हैं। रिश्तों से ज्यादा उम्मीदें और नासमझी से हम में से कुछ लोग अपने रिश्तेदारों से बात करना बंद कर देते हैं। जिससे दूरियां इतनी बढ जाती है कि हमारे अपने हम सबसे इतनी दूर आसमानी सितारों में विलीन हो जाते हैं कि हम चाहकर भी उन्हे धरातल पर नही ला सकते और पछतावे के सिवाय कुछ भी हाँथ नही आता। 

किसी ने बहुत सही कहा हैः-  "यदि आपको किसी के साथ उम्रभर रिश्ता निभाना है तो, अपने दिल में एक कब्रिस्तान बना लेना चाहिए। जहाँ सामने वाले की गलतियों को दफनाया जा सके।" 

कोई भी रिश्ता आपसी समझदारी और निःस्वार्थ भावना के साथ परस्पर प्रेम से ही कामयाब होता है। यदि रिश्तों में आपसी सौहार्द न मिटने वाले एहसास की तरह होता है तो, छोटी सी जिंदगी भी लंबी हो जाती है। इंसानियत का रिश्ता यदि खुशहाल होगा तो देश में अमन-चैन तथा भाई-चारे की फिजा महकने लगेगी। विश्वास और अपनेपन की मिठास से रिश्तों के महत्व को आज भी जीवित रखा जा सकता है। वरना गलत फहमी और नासमझी से हम लोग, सब रिश्ते एक दिन ये सोचकर खो देंगे कि वो मुझे याद नही करते तो मैं क्यों करूं.......................


                                        "कोई टूटे तो उसे सजाना सिखो,
                                          कोई रूठे तो उसे मनाना सिखो,
                                          रिश्ते तो मिलते हैं मुकद्दर से,
                                           बस उसे खूबसूरती से निभाना सिखो।" 






Monday, 14 April 2014

जय वीर हनुमान








हनुमान जी की कृपा सब पर रहे इसी कामना के साथ हनुमान जयन्ती के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनायें। 
 हनुमान जी से जुङे प्रसंग को पढने के लिए लिंक पर क्लिक करें।
पवन पुत्र वीर हनुमान