Monday, 26 May 2014

एक महत्वपूर्ण सबक


एक अमीर आदमी तफरीह के लिए समुंद्र में नाव लेकर बहुत दूर निकल गया। अचानक जोर का तुफान आया। नाव थपेङों से क्षतिग्रस्त हो कर टूटने लगी, तो वो अमीर आदमी समूंद्र में कूद गया। तुफान थमा तो उसने खुद को एक निर्जन टापू पर पाया। वो सोचने लगा कि मैने जिंदगी में कभी भी किसी का भी बुरा नही किया फिर भी ईश्वर ने मुझे ऐसी विपदा में क्यों डाल दिया। अब पूरी जिंदगी यहीं विराने में गुजारनी होगी। ये सोचकर वह रहने के लिए एक झोपङी बनाने लगा। रात को वो उस झोपङी में सो गया। परंतु अचानक मौसम में ऐसा परिर्वतन हुआ कि बिजली कङकने लगी और तभी बिजली उसकी झोपङी पर गिरी जिससे झोपङी में आग लग गई। अपने रहने की जगह को आग में स्वाहा होते देखकर वह आदमी पूरी तरह टूट गया। इतनी परेशानी में वो ईश्वर को कोसने लगा।

तभी अचानक एक नाव टापू के किनारे आकर लगी। उसमें से दो व्यक्ति उतर कर टापू पर आए और कहने लगे कि हमने यहाँ जलती हुई आग देखी तो हमें लगा कि कोई परेशानी में है, वो आग जलाकर मुसिबत में मदद के लिए संकेत दे रहा है। इस लिए हम लोग यहाँ आए।

लोग कहते हैं कि ईश्वर नजर नही आता, पर सच तो ये है कि जब दुःख के समय कोई दोस्त, सम्बन्धी साथ नही देता तब ईश्वर ही नजर आता है।

 उस आदमी की आँखों से आँसू निकलने लगा और मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देते हुए कहने लगा कि किसी के मानने या न मानने से तुझे कोई फरक नही पङता। हे ईश्वर तू तो निर्विकार, अकिंचन, निस्पृह होकर अपना कर्तव्य करता रहता है।

मित्रों, जिन मुश्किलों में हम ईश्वर को भला-बूरा कहना शुरू कर देते हैं वास्तव में कई बार उसी  कठिन परिस्थिति में ही हमारा हित छुपा होता है। हम सिर्फ परेशानियों को ही देखते हैं जबकि ईश्वर हमारे हित के लिए  नये द्वार का सृजन करता है। अतः हमें हर परिस्थिति में ईश्वर को कोसने के बजाय एक नई आशा के साथ उसके प्रति आस्था और विश्वास की अलख हमेशा जलाए रखनी चाहिये।


Saturday, 10 May 2014

अंधेरी दुनिया में हौसले की रौशनी

कल्पना किजीए यदि दुनिया बिलकुल अँधेरी होती तो क्या हम आज की तरह जिंदगी का आनंद ले सकते थे।  आँख पर पट्टी बाँधकर चार कदम भी सीधे नही चल सकते। बिजली गुल हो जाने पर तुरंत रौशनी का इंतजाम करते हैं,  हम अंधेरे से घबङाते हैं। परन्तु इस दुनिया में कई ऐसे लोग भी हैं जिनकी पूरी जिंदगी अँधेरों के साये में ही बीत जाती है। विज्ञान की अगर माने तो हम सब 85% ज्ञान, आँखों से अर्जित करते हैं। सोचिए !  उन लोगों के बारे में जो देख नही सकते, वो किस तरह से जिदंगी को रौशन करते होंगे ? 

जिवन में पग-पग पर अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए आज कई दृष्टीबाधित लोग अपने हौसले की रौशनी से स्वंय के साथ अनेक लोगों की जिंदगी को प्रकाशित कर रहे हैं। बेमिशाल जिंदादिली से कई लोगों को आत्मनिर्भर बना रहे हैं। कुदरत ने सभी को कुछ न कुछ कमियाँ दी हैं तो कुछ न कुछ प्रतिभाएं भी दी है। जो लोग अपनी कमियों को दरकिनार करते हुए प्रतिभाओं पर फोकस करते हैं वो एक दिन अनेक लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाते हैं। आज हम चर्चा करते हैं, उन लोगों की जिनका सफर आसान नही था। फिरभी मंजिल तक पहुँचने का जज़बा उन्हे खास बना देता है। 

पढने में तीव्र रुची रखने वाले रुस्तम जी मेहरवानजी अल्पाई की आँखें शिक्षा के सोपान चढने में मदद नही कर रहीं थीं। क्षींण होती आँखों की रौशनी से उन्हे लगने लगा कि  समाज उन्हे बेसहार और लाचार समझने लगेगा।  उनकी अंर्तआत्मा को ये स्वीकार नही था। 7 मई 1887 को बंबई के पारसी परिवार में जन्में अलपाई वाला ने अपनी दृण इच्छाशक्ति से दृष्टिबाधिता को परास्त कर 1913 में इंग्लैंड से बैरिस्टर की पढाई पूरी करके भारत आए और वकालत की शुरुवात किये। जबकि उस दौरान आज जैसी आधुनिक सुविधाएं भी नही थीं। आशावादी दृष्टीकोंण लिए, वे सदैव परेशानियों से एक जिंदादिल सिपाही की तरह लङते रहे और जीत-हार की परवाह किये बिना आगे बढते रहे। उनका पूरा जीवन उन लोगों के लिए समर्पित हो गया जो आँखों की रौशनी के अभाव में दयनिय जिवन गुजार रहे थे।

दृष्टीबाधित लोगों के लिए अभिव्यक्ति का माध्यम है ब्रेललीपि परन्तु   उस दौरान अलग-अलग स्कूलों में ब्रेल लिपियां अलग हुआ करती थीं जिससे इस लिपी में पुस्तकों का आभाव रहता था। रुस्तम जी अलपाई वाला ने 1923 में 'अंध बधिर सम्मेलन' में ब्रेललिपियों की एकरुपता को ठोस तरीके से प्रस्तुत किया किन्तु विदेशी सरकार से भारत के उत्थान की आशा रखना समुन्द्र में पुल बनाने जैसा कार्य था। परन्तु अलपाई वाला हार नही माने और उनके अथक प्रयासों का परिणाम रहा कि  1952 में  युनेस्को ने भारत के लगभग 20लाख दृष्टीबाधित लोगों के लिए एक भारतीय ब्रेल लीपी स्वीकार की। उन्होने दृष्टीबाधित लोगों के लिए व्यवसाय शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जिससे वे आर्थिक क्षेत्र में आत्म निर्भर बन सकें। 1952 में आपके सद्प्रयत्नो से 'नेशनल ब्लाइंड एसोसिएशन' की स्थापना हुई,  जो शिक्षा के साथ प्रशिक्षण केन्द्र तथा औद्योगिक केन्द्र के माध्यम से अनेक दृष्टीबाधित लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास कर रहा है।

सामाजिक सेवाओं की जाग्रत आत्मा बेरिस्टर रुस्तमजी अल्पाई वाला को 1961 में भारत सरकार ने 'पद्म श्री' से अलंकृत किया। मनुष्य केवल एक अंग के अक्षम हो जाने से हताश हो जाता है, किन्तु अलपाई वाला ने शारीरिक अपंगता को स्वीकार नही किया। 1956 में आधे अंग में लकवे का प्रकोप हुआ फिरभी आत्मा के प्रकाश से प्रकाशित होकर लाखों लोगों के जीवन में सुप्रभात लाने में सफल हुए। अनेक आँधियों को झेलते हुए सफलता का दिपक रौशन करने वाले  विनम्र तथा मृदुभाषी अल्पाई वाला मानव जगत में अनेक लोगों के लिेए प्रेरणा स्रोत हैं।

आज जिस समाज में लोग सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, ऐसी दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने आत्मविश्वास के बल पर स्वंय को ही नही बल्की हजारों लोगों को आत्मनिर्भर तथा स्वालंबी बनाने के लिए प्रयासरत हैं। ऐसी ही एक महिला के जीवन परिचय को शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहे हैंः-

डेरीना स्वंय दृष्टीबाधित महिला हैं, किन्तु अपने हौसले की रौशनी से स्वंय को सुशिक्षित तथा स्वालंबी बनाते हुए ,हजारो दृष्टीबाधित लोगों के जीवन में प्रकाश किरण की तरह कार्यरत हैं। डेरीना डी ग्वाइया 'ब्राजीलियन फाउंडेशन' नामक संस्था की अध्यक्षा तथा प्राण हैं। 'विश्व दृष्टीबाधित कल्याण समिति' की उपाध्यक्ष हैं। उनकी संस्था में ब्रेल पुस्तकों का मुद्रण कई दृष्टीबाधित लोग बहुत ही कुशलता से तथा समग्र भाव से कर रहे हैं। डेरीना का अक्सर यही प्रयास रहता है कि दृष्टीबाधित लोग किसी पर निर्भर न रहें। उनकी संस्था रोजगार के अवसर की तलाश करती रहती है, जिससे आत्मनिर्भर जीवन जीने का सौभाग्य सभी दृष्टीबाधित लोगों को हो।

एक बार एक ब्राजील दृष्टीबाधित युवक 'साओ पालो' डेरीना डी ग्वाइया के पास आया और अपनी समस्या सुनाई। वे एक निपुण मालिश करने वाला था फिर भी उसे नौकरी नही  मिल रही थी। डेरीना ने उसे आश्वासन दिया कि मैं पुरा प्रयास करुंगी। डेरीना को पता चला कि एक क्लब में मालिश करने वाले युवक की जरूरत है, वे तुरंत उसके अध्यक्ष से मिलने गईं किन्तु अध्यक्ष महोदय ने कहा कि,  अंधे युवक से मुझे सहानभूति है पर उसे नौकरी पर नही रख सकता।
डेरिना ने कहा, श्री मान ! मालिश आँखों से तो की नही जाती, हाँथो से की जाती है। आप अपनी सहानभूती को थोङा विकसित करने की कृपा करें। उसे रख कर देखें यदि कार्य समझ में न आए तो मना कर दिजीयेगा।
अध्यक्ष को ये बात उचित लगी और युवक साओ पालो को नौकरी पर रख लिया। युवक की कार्य दक्षता और लगन से सभी क्लब मैम्बर संतुष्ट रहने लगे और वो युवक वहीं वर्षों तक नौकरी करता रहा।

ये वाक्या महज उदाहरण नही है बल्की समाज की सोच को दर्शाता है। यदि हमारे समाज में लोगों की सोच और सहयोग की भावना का विकास हो जाए तो कई दृष्टीबाधित लोग अपने पैरों पर खङे होकर आत्मनिर्भर बन सकते हैं।  मेरी नजर में ही आज ऐसे कई दृष्टीबाधित लोग हैं जो बौद्धिक क्षमता में सामान्य लोगों से भी आगे हैं तथा विशेष क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा चुके हैं। जिनका कहना है कि, "हम रास्ता नही देखते मंजील देखते हैं।"

कृष्णकांत माणें आज सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं तथा डिजीटल टेक्नोलॉजी को महत्व देते हुए, अनेक लोगों के लिए जिवंत मिसाल हैं। राजस्थान के पहले दृष्टीबाधित  जज भीलवाङा के  ब्रह्मानंद शर्मा  तथा पी.के.पिंचे कमिशनर पद पर अनेक बाधाओं को आत्मविश्वास के साथ पार करके पदासीन हुए हैं। पर्वतारोही अतुल रंजन सहाय, सॉलीलिटर कंचन सहाय, पत्रकार सुब्रमणी जैसे लोग दृष्टीबाधिता के बावजूद लीक से अलग हठ कर काम कर रहे हैं। टाटा स्टील कंपनी में कार्यरत अतुल रंजन सहाय, बछेन्द्री पाल के साथ कई बर्फीली चोटियों पर ट्रैकिगं कर चुके हैं। 2006 में पद्म श्री से सम्मानित डॉ. गायीत्री संकर का बचपन बहुत ही मुश्किल दौर से गुजरा था। माता-पिता का साथ छूट जाना और दृष्टीबाधिता का अभिशाप, फिर भी अपनी मेहनत और लगन से वे आज ऑल इण्डिया रेडियो में पिछले 22 साल से कार्यरत हैं।

इंदौर की पूर्णिमा जैन एमपीपीएससी को क्वालीफाइ करने वाली पहली दृष्टीबाधिता हैं किन्तु दृष्टीबाधिता के कारण रिजेक्ट कर दिया गया। उन्हे जीवन में पग-पग पर ये एहसास कराया गया कि वे आम लोगों से कमतर हैं। हार न मानने वाली पूर्णिमा ने यूपीएससी की परिक्षा दी और सभी राउन्ड्स में अच्छे प्रर्दशन के बावजूद उनकी नियुक्ति नही की गई। उन्हे 1123 अंक मिले थे, जो उस वर्ष के टॉपर के बराबर थे। पूर्णिमा जैन ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया आखिर उसे इंसाफ 'प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह' के हस्तक्षेप से ही मिल सका। पूर्णिमा को इंडियन रेलवे पर्सनल सर्विसेज के ग्रुप बी, क्लास वन के तहत पोस्टिंग दी गई। जबकि उनके नम्बरों की योग्यता के आदार पर आईएएस या आईएफएस के तहत पोस्टिंग मिलनी चाहिए थी। 

अनेक सफलताओं के बावजूद आज भी दृष्टीबाधित लोगों को अपनी योग्यता को प्रमाणित करने के लिए अनेक अग्नि परिक्षाओं से गुजरना पङता है क्योंकि समाज की संकीर्ण सोच उनके मार्ग की सबसे बङी बाधा है। अनेक नकारात्मक रास्तों के बावजूद दृष्टीबाधित लोग अपनी दृणइच्छा शक्ति से "जहाँ चाह है वहाँ राह है", कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। 

उन तमाम जिंदादिल जिंदगी को मेरा सलाम है, जिनके लिए शारीरिक दोष प्रगती के मार्ग में बाधा नही बनते। इस ब्लॉग के माध्यम से आप सभी से नेत्रदान की अपील करते हैं। आपकी ये पहल आपके न रहने पर भी किसी के जीवन का उजाला बन सकती है। 

कृपया निवेदन है कि होनहार छात्रा रजनी शर्मा की अपील जरूर सुने। इसके लिए दिये गये लिंक पर क्लिक करेंः- 

धन्यवाद

Friday, 2 May 2014

एक माँ की कलम से (Happy Mother's Day)



प्राणी जगत में  पशु, पक्षी एवं मनुष्य सभी वर्ग को माँ के आँचल में ही सारी परेशानी और बैचेनी को सकून मिलता है। हम सब अक्सर देखते हैं एक चिङिया किस तरह एक-एक दाना के लिए उङान भरती है और बच्चे को अपनी चोंच से एक-एक दाना खिलाती है। इस वातसल्य के भाव को शब्दों में समेटा नही जा सकता।  माँ की प्यार भरी डाँट और दुलार को पाने के लिए स्वयं ईश्वर भी बच्चे के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होते हैंं।

एक बच्चे के जनम पर  ईश्वर उसे माँ रूपी तोहफा देते हैं, तो दूसरी तरफ एक स्त्री के असतित्व को माँ रूपी सम्मान से सम्मानित करते हैं। ईश्वर नारी को कुदरत के कार्य  में सहभागी बनाते हैं, नौ महिने तक सहनशीलता के साथ उसे जीवन चक्र को गतिमय रखने की शक्ति प्रदान करते हैं।  ये ऐसा रूप है जिसमें सारी ईश्वरिय शक्ति समाहित है। न जाने किस मिट्टी से उसे ईश्वर ने बनाया है, जो न कभी थकती है और न कभी रुकती है। हर पल अपने बच्चों की सुरक्षा में वटवृक्ष की तरह अपने आँचल की छाँव देती है।  अपने बच्चे के प्रति सुरक्षा का भाव एवं उसे श्रेष्ठ बनाने की जद्दोज़हद में कभी-कभी वो कठोर भी बन जाती है। स्वंय चाहे कितनी भी नाराज हो अपने बच्चे से परन्तु किसी दूसरे की नाराजगी के आगे सदैव ढाल बनकर खङी हो जाती है। माँ के सम्पूर्ण वातसल्य भाव में सब्र (Patience)   का भाव अतिआवश्यक होता है परन्तु आजकल कुछ ही माताओं में ये दिखाई देता है। हकिकत तो ये है कि मुझमें भी इस गुणं का अभाव रहा जिसकी वजह से मेरे बच्चों की मेरे द्वारा यदा-कदा  पिटाई भी हुई जो शायद किसी भी तर्क से सही नही थी। ये मेरा सौभाग्य है कि मेरे दोनो ही बच्चे मेरे इस व्यवहार को सकारात्मक रूप से अपनाए। आज मेरी बेटी और मेरा बेटा दोनो ही अपनी योग्यता के आधार पर कई बच्चों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि  मेरे दोनो ही बच्चे हमारी फिक्र करते हैं हम तुलना भी नही कर सकते कि कौन कितना फिक्रमंद है।  जबकि  हमारे समाज में अक्सर कहा जाता है कि बेटी ही भावुक होती है और माता-पिता का अधिक ख्याल रखती है। सच तो ये है कि, माँ और बच्चे के रिश्ते में बेटी-बेटे का भेद सिर्फ सामजिक कुप्रथा है  क्योंकि ममता से पूर्ण वातसल्य कोई रिश्ता नही है बल्कि ईश्वरीय शक्ति का एहसास है जो हरपल हम सबके पास होता है।

किसी ने सच कहा हैः- When you are a Mother, You are never really alone in your thoughts..
                                  A Mother always has to think twice, Once for her self & Once for her Child. 

आज भी बच्चों का हमारे प्रति फिक्र और ध्यान (attention )  रखने का भाव मुझे सुखद एहसास देता है। जब भी अतीत के पन्नो को देखते हैं तो उनकी बालसुलभ हरकतें और बचपन की किलकारियाँ मेरे लिए किसी साज की संगीतमय धुन के समान होती है जिसकी तरंग से मन भाव-विभोर हो जाता है।  हम अपनी कलम से  ईश्वर का कोटी-कोटी धन्यवाद करते हैं, जिसने नारी को माँ रूपी कुदरती उपहार से अलंकृत किया और मुझे गौरवान्वित करने वाले बच्चों का साथ दिया।  

माँ को सर्मपित कुछ शब्द सुमन लेख का अवलोकन करने के लिए लिंक पर क्लिक करेंः- 
माँ
धन्यवाद


My dearest Daughter Akanksha & Son Pranjal 
God Bless you my Dears 


Wednesday, 23 April 2014

मानव एकता को इंसानियत के साथ जिवंत करें



मिलकर काम करने से बङी सी बङी चुनौतियाँ भी छोटी हो जाती हैं, इसी संदेश को जन-जन में पहुँचाने के लिए मानव एकता दिवस 24 अप्रैल को मनाया जाता है। यदि विचार करें तो आज की आधुनिक दुनिया में इस संदेश को प्रत्येक मानव को अपनाने की जरूरत है। मानवीय एकता को जिन्दा रखने के लिए मनुष्य में इंसानियत का गुण होना अति आवश्यक है। आज तो देश-दुनिया की बिगङती आवो-हवा, विकृत मानसिकता जनवरों से भी बदतर स्थिति को दर्शा रही है। जानवर भी संघटन की शक्ति को पहचानता है इसलिए समूह में रहता है परन्तु अति बुद्धीमान प्राणी इंसान स्वार्थी नेताओं के बहकावे में मानवीय एकता को कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर दिमक की तरह खोखला कर रहा है।


दिल्ली में हुई अमानवीय घटना शायद ही कोई भूल पाया हो, असम में एक लङकी के साथ सरे आम कुछ लोग बदतमीजी कर रहे थे और लोग तमाशबीन खङे थे। बात लङकी या लङके की नही है बात है, अमानवियता की क्योंकि दरंदिगी का शिकार कोई भी कहीं भी हो सकता है। कुछ समय पूर्व एक अश्वेत छात्र को कुछ लोगों ने इतना पीटा की वो कोमा में चला गया। हाल ही में दिल्ली में एक असम के छात्र को इतना ज्यादा पीटा कि वो मर गया कोई बचाने नही आया जबकि तमाशबीन कई थे। इस तरह की वारदातें इस सच्चाई को साफ कर देती हैं कि केवल दो पाँव पर चलने वाला जीव जरूरी नही है कि मनुष्य हो क्योंकि मनुष्य तो संवेदनाओं और भावनाओं की प्रतिमूर्ती है। मानविय एकता को मजबूत करने के लिए सबसे पहले इंसानियत का पाठ आत्मसात करते हुए एक अच्छा इंसान बनना बहुत जरूरी है।


आज हम अत्याधुनिक तकनिक के जमाने में जी रहे हैं। मंगल पर घर बसाने की बात कर रहे हैं किन्तु ये बात भूल रहे हैं कि घर तो भाई-चारे से, प्यार मोहब्बत से तथा अमन चैन से बनता है। हम मशीनी युग में जी रहे हैं, मनुष्य होने का दम भर रहे हैं परन्तु मनुष्यता से कोंसो दूर हो रहे हैं। पङौसी मुल्क के सैनिकों द्वारा धोखे से सीमा पर स्थित सैनिकों का सिर काटा जाना जबकि सैनिक तो विरता के प्रतीक होते हैं। ये बर्बरता क्या मनुष्यता को परिभाषित कर सकती है ?


आज दुनिया में महान बनने की चाहत तो हर एक में है पर पहले इंसान बनना भूल जाते हैं। एक वर्ष पूर्व केदारनाथ में आई प्राकृतिक त्रासदी से ज्यादा दुखित करने वाली इंसानी त्रासदी थी, जिसने इंसानियत को तार-तार कर दिया था। इंसानियत की सच्ची परिक्षा विषम परिस्थिती में ही होती है। सुख के समय तो हर कोई मानवता की दुहाई देता है।

किसी ने सच कहा है कि, "इस जहाँ में कब किसी का दर्द अपनाते हैं लोग, हवा का रुख देखकर बदल जाते हैं लोग।"

ईश्वर ने मनुष्य को उसके स्वंय की शारीरिक बनावट एवं क्रियाओं से एकता का पाठ समझाया है। सभी अंगो के पारस्परिक सहयोग से ही मनुष्य क्रियाशील रहता है। प्राणी जीवन चक्र भी एक दूसरे के बिना संभव नही है, फिर भी हम मानवीय एकता को नजर अंदाज कर देते हैं।

आज की भागम-भाग जिंदगी में कुछ इंसान ऐसे भी हैं जो इंसानियत को जिवंत करते हैं। मानवीय एकता के महत्व को प्राथमिकता देते हैं। कहते हैं "बूंद-बूंद से सागर भरता है।" इस उम्मीद के साथ भले ही मानवता दिवस महज एक दिन की ही बात क्यों न हो यदि उसे इंसानियत के साथ मनायेंगे तो हर-दिन, हर-पल मानवता का जय घोष होगा। हम सब का प्रयास यही रहे कि मानव एकता दिवस महज औपचारिकता न रहे क्योकि संघठन में ही शक्ति है।


"Where there is Unity, There is always Victory. "

Friday, 18 April 2014

रिश्तों का महत्व



शिशु  जन्म के साथ ही अनेक रिश्तों के बंधन में बंध जाता है और माँ-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी जैसे अनेक रिश्तों को जिवंत करता है। रिश्तों के ताने-बाने से ही परिवार का निर्माण होता है। कई परिवार मिलकर समाज बनाते हैं और अनेक समाज सुमधुर रिश्तों की परंपरा को आगे बढाते हुए देश का आगाज करते हैं। सभी रिश्तों का आधार संवेदना होता है, अर्थात सम और वेदना का यानि की सुख-दुख का मिलाजुला रूप जो प्रत्येक मानव को धूप - छाँव की भावनाओं से सराबोर कर देते हैं। रक्त सम्बंधी रिश्ते तो जन्म लेते ही मनुष्य के साथ स्वतः ही जुङ जाते हैं। परन्तु कुछ रिश्ते समय के साथ अपने अस्तित्व का एहसास कराते हैं। दोस्त हो या पङौसी, सहपाठी हो या सहर्कमी तो कहीं गुरू-शिष्य का रिश्ता। रिश्तों की सरिता में सभी भावनाओं और आपसी प्रेम की धारा में बहते हैं। अपनेपन की यही धारा इंसान के जीवन को सबल और यथार्त बनाती है, वरना अकेले इंसान का जीवित रहना भी संभव नही है। सुमधुर रिश्ते ही इंसानियत के रिश्ते का शंखनाद करते हैं।

इंसानी दुनिया में एक दूसरे के साथ जुङाव का एहसास ही रिश्ता है, बस उसका नाम अलग-अलग होता है। समय के साथ एक वृक्ष की तरह रिश्तों को भी संयम, सहिष्णुता तथा आत्मियता रूपी खाद पानी की आवश्यकता होती है। परन्तु आज की आधुनिक शैली में तेज रफ्तार से दौङती जिंदगी में बहुमुल्य रिश्ते कहीं पीछे छुटते जा रहे हैं। Be  PRACTICAL की वकालत करने वाले लोगों के लिए रिश्तों की परिभाषा ही बदल गई है। उनके लिए तो न बाप बङा न भैया सबसे बङा रूपया हो गया है।

किसी भी रिश्ते में धूप-छाँव का होना सहज प्रक्रिया है किन्तु कुछ रिश्ते तो बरसाती मेंढक की तरह होते हैं, वो तभी तक आपसे रिश्ता रखते हैं जबतक उनको आपसे काम है या आपके पास पैसा है।  उनकी डिक्शनरी में भावनाओं और संवेदनाओं जैसा कोई शब्द नही होता। ऐसे रिश्ते मतलब निकल जाने पर इसतरह गायब हो जाते हैं, जैसे गधे के सर से सिंग। परन्तु कुछ लोग अनजाने में ही इस तरह के रिश्तों से इस तरह जुङ जाते हैं कि उसके टूटने पर अवसाद में भी चले जाते हैं। कुछ लोग रिश्तों की अनबन को अपने मन में ऐसे बसा लेते हैं जैसे बहुमुल्य पदार्थ हो। मनोवैज्ञानिक मैथ्यु सेक्सटॉन कहते हैं किः-   इंसानी प्रवृत्ति होती है कि मनुष्य, रिश्तों की खटास और पीढा को  अपने जेहन में रखता है और उसका पोषण करता है। जिसका मनुष्य के स्वास्थ पर बुरा असर पङता है। इस तरह की नकारात्मक यादें तनाव बढाती हैं। तनाव से शरीर में 'कार्टीसोल' नामक हार्मोन स्रावित होता है, जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली की क्षमता को कम करता है। परिणाम स्वरूप मनुष्य कई बिमारियों से ग्रसित हो जाता है।  युवावर्ग को खासतौर से ऐसे रिश्तों से परहेज करना चाहिए जो अकेलेपन और स्वार्थ भावनाओं की बुनियाद पर बनते हैं क्योंकि ऐसे रिश्ते दुःख और तनाव के साथ कुंठा को भी जन्म देते हैं।

 स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है किः- "जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नही है,  पर जो रिश्ते हैं उनमें जीवन होना जरूरी है।"

रिश्तों का जिक्र हो और पति-पत्नी के रिश्तों की बात न हो ये संभव नही है क्योंकि ये रिश्ता तो पूरे परिवार की मधुरता का आधार होता है। इस रिश्ते की मिठास और खटास दोनो का ही असर बच्चों पर पङता है।  कई बार ऐसा होता है कि, छोटी-छोटी नासमझी  रिश्ते को कसैला बना देती है। जबकि पति-पत्नी का रिश्ता एक नाजुक पक्षी की तरह  अति संवेदनशील होता है। जिसे अगर जोर से पकङो तो मर जाता है, धीरे से पकङो अर्थात उपेक्षित करो तो दूर हो जाता है। लेकिन यदि प्यार और विश्वास से पकङो तो उम्रभर साथ रहता है।

कई बार आपसी रिश्ते जरा सी अनबन और झुठे अंहकार की वजह से क्रोध की अग्नी में स्वाह हो जाते हैं। रिश्तों से ज्यादा उम्मीदें और नासमझी से हम में से कुछ लोग अपने रिश्तेदारों से बात करना बंद कर देते हैं। जिससे दूरियां इतनी बढ जाती है कि हमारे अपने हम सबसे इतनी दूर आसमानी सितारों में विलीन हो जाते हैं कि हम चाहकर भी उन्हे धरातल पर नही ला सकते और पछतावे के सिवाय कुछ भी हाँथ नही आता। 

किसी ने बहुत सही कहा हैः-  "यदि आपको किसी के साथ उम्रभर रिश्ता निभाना है तो, अपने दिल में एक कब्रिस्तान बना लेना चाहिए। जहाँ सामने वाले की गलतियों को दफनाया जा सके।" 

कोई भी रिश्ता आपसी समझदारी और निःस्वार्थ भावना के साथ परस्पर प्रेम से ही कामयाब होता है। यदि रिश्तों में आपसी सौहार्द न मिटने वाले एहसास की तरह होता है तो, छोटी सी जिंदगी भी लंबी हो जाती है। इंसानियत का रिश्ता यदि खुशहाल होगा तो देश में अमन-चैन तथा भाई-चारे की फिजा महकने लगेगी। विश्वास और अपनेपन की मिठास से रिश्तों के महत्व को आज भी जीवित रखा जा सकता है। वरना गलत फहमी और नासमझी से हम लोग, सब रिश्ते एक दिन ये सोचकर खो देंगे कि वो मुझे याद नही करते तो मैं क्यों करूं.......................


                                        "कोई टूटे तो उसे सजाना सिखो,
                                          कोई रूठे तो उसे मनाना सिखो,
                                          रिश्ते तो मिलते हैं मुकद्दर से,
                                           बस उसे खूबसूरती से निभाना सिखो।" 






Monday, 14 April 2014

जय वीर हनुमान








हनुमान जी की कृपा सब पर रहे इसी कामना के साथ हनुमान जयन्ती के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनायें। 
 हनुमान जी से जुङे प्रसंग को पढने के लिए लिंक पर क्लिक करें।
पवन पुत्र वीर हनुमान


Friday, 11 April 2014

राजनैतिक दल ! पार्टी प्रतीक चिन्ह के प्रति क्या वफादार हैं???


 विश्व के सबसे बङे लोकतांत्रिक देश भारत में होने वाला चुनाव भी सब देशों से निराला होता है। आज देश में कई राजनैतिक पार्टियां अपने-अपने विचारों और मुद्दों के साथ चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेकर लोकतांत्रिक परंपरा का निर्वाह कर रही हैं। विभिन्न पार्टियों की अपनी-अपनी पहचान एक प्रतीक चिन्ह के रूप में होती है। जो कहीं न कहीं उनके विचारों और देश के प्रति जागरुकता को भी परिलाक्षित करती हैं। परन्तु क्या आज के परिवेश में राजनैतिक दल पार्टी प्रतीक चिन्ह के प्रति वफादार हैं?? 

भारत में चुनावों का आयोजन भारतीय संविधान के तहत बनाये गये भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाता है। आज देश के चुनावी दंगल में अनेक राजनैतिक पार्टियां अपने-अपने भाग्य को आजमा रहीं हैं। जबकि प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देते हुए कुछ ही दल स्थापित थे। जहां एक ओर श्यामा प्रसाद मुर्खजी ने अक्टुबर 1951 में जनसंघ की स्थापना की, वहीं दूसरी ओर दलित नेता बी.आर. आम्बेडकर ने अनुसूचित जीति महासंघ को पुर्नीवित किया। जो अन्य दल उस समय आगे आए उनमें आचार्य कृपलानी की किसान मजदूर प्रजा परिषद, राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी शामिल थी। अपने विचार को गति देने के लिए वर्तमान में उपस्थित राजनैतिक दलों के प्रतीक चिन्हों को जानना आवश्यक है। 

सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का 1885 यानि की स्थापना के समय चिन्ह था, हल के साथ दो बैल तद्पश्चात बदलकर गाय-बछङा हुआ। परंतु वर्तमान में इंदिरा गाँधी की सोच अर्थात शक्ति, ऊर्जा और एकता का प्रतीक हाँथ का पंजा कांग्रेस का चुनाव चिन्ह है।

दूसरे नम्बर की राजनैतिक पार्टी है भारतिय जनता पार्टी जिसका वर्तमान में चुनाव चिन्ह है कमल। कमल  किचङ जैसी विपरीत परिस्थिती में भी अपने वजूद को कायम रखता है और माता लक्ष्मी के हाँथ में शोभायमान है। परन्तु ये पार्टी पूर्व में यानि की 1951 में डॉ. श्यामाप्रसाद मुर्खजी द्वारा स्थापित भारतिय जनसंघ के नाम से अस्तित्व में आई थी उस दौरान इस पार्टी का चुनाव चिन्ह दिपक हुआ करता था। 1977 में इसे जनता पार्टी नाम दिया गया जिसका चिन्ह था हलधर किसान। किन्तु 1980 में इसका स्वरूप बदला तभी से भारतिय जनता पार्टी के नाम से कमल के साथ वर्तमान के चुनाव में भी अपना भाग्य आजमा रही है।

कार्लमाक्स के विचारों से प्रभावित एवं देश की रीढ कहे जाने वाले वर्ग अर्थात कृषक वर्ग एवं कामगारों के हित के लिए आवाज बुलंद करने वाली पार्टी भारतिय कम्युनिष्ट पार्टी का अस्तित्व 1952 से आज तक बना हुआ है। इसका चुनाव चिन्ह है, बाली और हसिया।

मजदूर वर्ग के मसीहा कहे जाने वाले मार्क्सवादी कम्यूनिष्ट पार्टी ने 1967 से हसिये और हथौङे के साथ खेतिहर मजदूर और कारखानों के मजदूरों की प्रतीक रूप में कार्यरत है। ये पार्टी भरतिय कम्युनिष्ट  का ही हिस्सा थी परन्तु वर्तमान में एक स्वतंत्र पार्टी है।

बाईं ओर देखता हाथी बहुजन समाज पार्टी का चुनाव प्रतीक है। काशीराम द्वारा स्थापित तथा बहन मायावति के प्रयासों से ये पार्टी देश के अल्पसंख्यक और निचली जाती के सुधार हेतु प्रयासरत है। बहुजन समाज पार्टी का चुनाव चिन्ह हांथी, शारीरिक शक्ति और इच्छा शक्ति का प्रतीक है। इस पार्टी का विशेष प्रभाव उत्तर
प्रदेश में है। अन्य प्रदेशों में भी मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में सुदृण मानसिकता के साथ आंशिक रूप से कार्यरत है।

लाल और हरे रंग के झंडे पर साइकिल चुनाव चिन्ह के साथ समाजवादी पार्टी देश में हरियाली और खुशियाली लाने के लिए  क्रन्ति का नारा बुलंद कर रही है।

कांग्रेस पार्टी से अलग हुई राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अपने सिद्धान्तों को घङी रूपी चुनाव चिन्ह में प्रर्दशित कर रही है। नीले रंग की रेखिय घङी जिसमें निचे दो पाए तथा ऊपर अलार्म बटन लगा है, घङी के कांटे 10 बजकर 10 मिनट को दर्शा रहे हैं।


प्रचीन भारतीय परंपरा का प्रतीक शंख बीजू जनतादल का चुनावी शंखनाद है। श्री हरि विष्ण् का प्रतीक शंख विजयनाद को दृष्टीगोचर करता है। इसी मनोभाव को आत्मसात करते हुए बिजू जनतादल ने इसे अपने चुनाव चिन्ह के रूप में धारण किया है।

जनता दल (यूनाइटेड) के लिए चुनाव आयोग द्वारा 'तीरका निशान स्वीकृत किया गया है। यह चिह्न अविभाजित जनता दल का था। यह तीर हरे और सफेद रंग के बीच बनी सफेद पट्टी पर बना हुआ है। वास्तव में यह ध्वज जॉर्ज फर्नांडीज़ की समता पार्टी का था। 'तीरइंगित करता है कि पार्टी अपने लक्ष्यभारत को एक धर्मनिरपेक्षसंप्रभुसमाजवादी व लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की ओर प्रयासरत है।

पीले रंग की पृष्ठभूमि पर तेलुगू देशम पार्टी का चुनाव चिह्न 'साइकिलहै। जो समृद्धिखुशी और धन की चमक को परिलाक्षित करता है। 


दो पत्तियों के चुनाव चिन्ह के साथ ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम पार्टी चुनावी रण में अपना भागय आजमा रही है। उक्त चुनाव चिह्न का एक खास इतिहास रहा है। 1987 में एम.जी. रामचंद्रन की मृत्यु के बाद एआईएडीएमके को लेकर जानकी रामचंद्रन और जयललिता के बीच अनबन हो गई। अत: चुनाव आयोग ने दोनों को एमजीआर के उत्तराधिकारी के रूप में पार्टी की कमान सम्हालने में अयोग्य करार दिया। परिणामस्वरूप दोनों को पृथक चुनाव चिह्न आवंटित किए गए। जानकी रामचंद्रन को 'दो कबूतरतथा जयललिता गुट को 'बांग देता हुआ मुर्गाचुनाव चिह्न दिया गया। हालांकिद्रमुक के शक्तिशाली बनकर उभरने से उक्त मामला हल हो गया और 1989 में जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके को 'दो पत्तियांचुनाव चिह्न आवंटित कर दिया गया।



डीएमके (द्रविण मुनेत्र कङगम) का चुनाव चिह्न दो पर्वतों के बीच से रश्मियां बिखेरते हुए उगता सूरज है।  यह चिह्न सीधे तौर पर द्रविण लोगों के इतिहास और उनकी राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा थाजिसका राजनीतिक नेतृत्व पेरियार ने किया था। 

 अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का चुनाव चिन्ह राष्ट्रीय तिरंगे के सभी रंगो के साथ दो फूल है एवं पार्टी का नारा है, 'माँमाटी और मनुष्य

जनता दल (सेक्युलर) : जेडी (एस) का चुनाव चिन्ह 'अपने सिर पर धान रखकर ले जाती एक कृषक महिलाहै। पार्टी का प्रचार वाक्य है, 'मूल्य से एकजुटविश्वास से प्रेरित'। चिह्न में महिला को दर्शाना महिलाओं के अधिकारों और अवसरों के प्रति गंभीर होना दर्शाता है।


राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का चुनाव चिह्न 'लालटेनहै। इस चुनाव चिह्न को पार्टी के अनुसार अंधकार के उन्मूलन और प्रकाश व प्रेम का प्रचार करने के लिए उपयुक्त माना जाता है।


पार्टी की मजबूत हिन्दू राष्ट्रवादी भावना की ओर संकेत करता हुआ केसरिया रंग के ध्वज पर 'तीर-कमानशिवसेना का चुनाव चिह्न है। केसरिया रंग हिन्दुत्व का प्रतीक है। पार्टी कार्यकर्ताओं को शिव सैनिक कहा जाता है।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना मनसे का चुनाव चिह्न दाईं ओर जाता हुआ 'रेलवे का भाप इंजनहै। झंडे में शीर्ष पर गहरा चमकदार नीला रंगफिर सफेद पट्टीफिर केसरिया रंग के बाद सफेद पट्टी और फिर हरा रंग है। राष्ट्रीय तिरंगे के रंग को आत्मसात करते हुए त्याग-बलिदान, समृद्धि और खुशियाली का प्रतीक है। 


2013 में नवगठित आम आदमी पार्टी (आप) का चुनाव चिह्न 'झाड़ूहै। भ्रष्टाचार मिटाने के उद्देश्य से अस्तित्व में आई इस पार्टी का मानना है कि चुनाव चिह्न झाड़ू के मुताबिक देश में फैले हर प्रकार के भ्रष्टाचार की सफाई करना है।


 प्रथम चुनाव से लेकर आज तक की चुनावी यात्रा में अपनी सरकार स्वंय चुनने का रोमांच नितनई पार्टियों की भीङ में कहीं खोता जा रहा है। आज जिस तरह से नवीन पार्टियां चुनाव तो अपने चुनावी चिन्हों के संदेश को लेकर लङती हैं किन्तु परिणाम आने पर कुर्सी को सर्वोपरी मानते हुए जोङ-तोङ की राजनीति में विश्वास करने लगती हैं। नेताओं के बदलते विचारों से चुनाव चिन्हों की नितीयों पर ग्रहण लग जाता है और पार्टी के प्रतीक चिन्ह मात्र प्रतीक बनकर ही रह जाते हैं क्योकिं आज महिलाओं की सुरक्षा एवं सम्मान तथा देश की खुशहाली एवं मजदूर वर्ग
का हित केवल विचारों में सिमट गया है।  


Tuesday, 8 April 2014

मर्यादा पुरषोत्तम राम




विष्णु के सातवें अवतार राम का जन्म अयोध्या के राजा दशरथ के घर मानवीय रूप में हुआ। उनका सम्पूर्ण जीवन आदर्शों एवं संघर्षों से युक्त ऐसी धारा है। जिसमें सत्य, प्रेम, मर्यादा एवं सेवा का संदेश प्रवाहित होता है। राम नाम के उच्चारण मात्र से ही शरीर एवं मन में आत्मिक शान्ति का प्रवाह होता है। राम की कुशल राजनीति को स्वतंत्र भारत में फलीभूत करने की कल्पना गाँधी जी ने भी की थी।


आदर्श व्यक्तित्व के प्रतीक श्री राम सच्चे जनसेवक, आदर्श भाई, आज्ञाकारी पुत्र तथा कुशल शिष्य एवं पति के रूप में सभी रिश्तों को सच्चाई से निभाते हुए जनमानस के समक्ष सार्थक उदाहरण प्रस्तुत किया है। रघुनंदन श्री राम नीतिकुशल एवं न्यायप्रिय राजा तथा सुग्रिव के सच्चे सखा हैं। जातिवाद से परे मर्यादा पुरषोत्तम राम ने स्वंय के कष्ट की चिन्ता न करते हुए सदैव जनहित को सर्वोपरि माना। सभी को साथ लेकर चलने वाले श्री राम जी का मनोहारी वर्णन वाल्मिकी जी ने रामायण में संस्कृत भाषा के माध्यम से उल्लेखित किया है। भाषाई और सीमाई बंधनो से मुक्त श्री राम का अलौकिक प्रसंग तुलसीदास जी की रामचरित मानस से भी आगे समुन्द्रों को पार करते हुए कंपूचिया की रामकेर्ति रामायण में, मलेशिया की हिकायत सेरीराम में और थाईलैंड की रामकियेन आदि में बहुत ही सुन्दर रूप से वर्णित किया गया है। इसके अलावा भी अन्य कई देशों में वहाँ की स्थानिय भाषा में जगजनतारण श्री राम जी की अनुपम छवी का महत्व जन-जन में गूँज रहा है।


तमिल भाषा में कम्बन रामायण, उङिया में विलंका रामायण, कन्नण में पंप रामायण एवं बंगाली में रामायण पांचाली आदि भारतीय भाषाओं में भी दीनदयाल श्री राम की महिमा का शाब्दिक स्वर प्राचीनकाल से ही अमृतधारा के रूप में प्रवाहित होकर जनमानस के लिेए कल्याणकारी सिद्ध हो रहा है। नेपाल, लाओस, कंपूचिया, मलेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, बंगलादेश, भूटान, श्रीलंका, बाली, जावा, सुमत्रा और थाईलैंड आदि देशों की लोकसंस्कृतियों एवं ग्रंथों में आज भी राम वंदनिय हैं।


मानवीय रूप में अवतरित सत्यसनातन मंगलकारन श्री राम को उनके सद्चरित्र तथा आदर्श युकत जीवन यापन के गुणों के कारण सदैव एवं सर्वत्र पूजा जाता है। मुनिमनरंज्जन, भवभयरंज्जन, असुरनिकंदन सीताराम की महिमा का गुनगान स्वंय भोलेनाथ ने भी किया है। जिस नाम के महान प्रभाव मात्र से ही जीवन का उद्धार हो जाता है। ऐसे कृपालु भक्त वत्सल्य श्री राम को बारंबार प्रणाम है।


रामनवमी के पावन पर्व पर सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं













Tuesday, 25 March 2014

फिल्मी पोस्टर






भारतिय सिनेमा अपने सौ वर्षों के सफर का जलसा मना रहा है। सौ वर्षों के सफर में कई नई चीजें जुङी तो कई पुराने तरीके आधुनिक तकनिकों के शिकार भी हुए। डिजीटल युग ने तो हाथ से बने  फिल्मी पोस्टर्स को गुजरे जमाने का अक्स बना दिया। पोस्टर बनाना श्रम-साध्य काम होता था। जिसके एवज में बनाने वाले को मेहनताना मिलता था, जो रचनात्मक कला से पूर्ण रोजगार होता था। किसी भी चेहरे को उसके मूल रूप में कागज पर उकेरना आसान नही होता था। बॉलीवुड में कई नामचीन लोगों ने इस विधा में काम किया, जो समय के परिर्वतन के साथ गुमनामी में खो गये। परन्तु चित्रकार एफ.एम. हुसैन तथा डी.आर.भोसले का नाम आज भी आदर से लिया जाता है। उनकी कार्यशैली एक अलग अंदाज में थी।

1924 में भारत में  पहली बार 'कल्याण खजिना' फिल्म का पोस्टर बना था। ये फिल्म शिवाजी के जीवन पर बनाई गई थी।  इसके पोर्स्टस बाबुराव पेंटर ने बनाए थे। संसार का पहला फिल्मी पोस्टर 1890 में एक लघु फिल्म प्रोजेक्शन 'आर्टटिकुएस' के लिए फ्रेंच चित्रकार जुल्स चेरेट ने बनाया था। 1913 में भारत की निर्मित पहली फिल्म का पोस्टर तस्वीर विहीन था। उस समय पोस्टर कैनवस पर हांथ से पेंट किये जाते थे। फिल्मो के प्रचार प्रसार में फिल्मी पोस्टर्स का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

1930 से लेकर 1960 के फिल्मी पोस्टर्स काफी चर्चा में रहे। संसार में लुप्त होती इस कला के कुछ पारखियों ने 2007 में  फिल्मी पोस्टर्स पर लगी प्रदर्शनी को सफल बनाया। इस प्रर्दशनी में  डी.आर.भोसले द्वारा बनाया गया गाइड का पोस्टर दो हजार डॉलर में बिका।  हॉलीवुड में कुछ समय पूर्व 'द साइलेन्स एंड द लैम्ब' फिल्म के पोस्टर को 35 साल का सबसे शानदार फिल्मी पोस्टर माना गया है।

आज नई पीढी अपनी इस लुप्त हेती सांस्कृतिक धरोहर को लेकर सजग है। हितेश जेठवानी जैसे कुछ लोग हस्तनिर्मित पोस्टर्स को हिप्पी डॉट संस्था के जरिये बढावा दे रहे हैं। ओसियन संग्रहालय में सदियों पुराने लगभग 19,500 पोस्टर्स सुरक्षित रखे गये हैं.। पश्चिमी देशों में बसे कला प्रेमियों के लिए भारतीय फिल्मी पोस्टर्स का विशेष महत्व है। एक दुकानदार द्वारा पाँच रूपये में खरीदे 'मदर इण्डिया' के एक पोस्टर को विदेश में लगभग 6 हजार में बेचा गया था।  फिरभी लगातार लुप्त होती प्रजातियोॆ की तरह ही फिल्मी पोस्टर्स का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है क्योंकि पोस्टर्स का सिधा रिश्ता प्रचार और एडवरटाइजिंग से होता है।
यदि सरकार और फिल्मी क्षेत्र के जागरूक लोग इन पोस्टर्स को सहजने का बीङा उठाएं तो निःसंदेह लुप्त होते पोस्टर्स फिर से जिवित हो जायेंगे और हजारो कलाकारों के हाथ को रोजी-रोटी का आधार मिल जायेगा।