Friday, 25 October 2013

आत्मनिर्भरता



आज की हाई प्रोफाइल और प्रतिस्पर्धा से भरी जीवन शैली में हम अपने बच्चों को सुपर किड देखना चाहते हैं। उसे शैक्षणिकं योग्यता के साथ-साथ अन्य विधाएं जैसे- नृत्य, गीत हो या तैराकी, घुङसवारी में भी योग्य बनाने का प्रयास करते हैं। ये सच है कि व्यक्तित्व को निखारने में शैक्षणिंक योग्यता के साथ इन शिक्षाओं का भी विशेष स्थान है। परंतु वास्तविकता में हम इस जद्दोजहद में एक महत्वपूर्ण शिक्षा को अनदेखा कर देते हैं। बच्चों को बचपन से उसकी जिम्मेदारियों से अवगत नही कराते। आलम ये है कि, सुबह उठाने से लेकर स्कूल के गृहकार्य तक लगभग सारे कार्य हम अभिभावक करते हैं। उम्र के अनुसार यदि बच्चों को उनकी जिम्मेदारियों का भी बोध कराएं तो निःसंदेह बङे होकर यही बच्चे समय प्रबंधन तथा आत्मनिर्भरता को समझ सकते हैं। परिवार तथा समाज के जिम्मेदार नागरिक बन सकते हैं, जो संपन्न राष्ट्र की महत्वपूर्ण ईकाइ है।

जिम्मेदारियों और फायदों के बीच सीधा संबंध होता है। घर के अन्य सदस्यों के समान ही छोटे-बङे कामों में बच्चों को शामिल करने से उनकी आत्मनिर्भता की बुनियाद मजबूत होती है। वही इमारत मजबूत होती है जिसकी नींव मजबूत होती है, उसी प्रकार बच्चे की बुनियाद आत्मनिर्भरता के सबक से बनाई जाए तो उसे कभी भी, किसी भी परिस्थिति में किसी के सहारे की जरूरत नही पङेगी। विषणु शर्मा द्वारा रचित पुस्तक पंचतंत्र में भी ये समझाया गया है कि राजा-महाराजाओं के बच्चों को भी बचपन से गुरुकुल में भेज दिया जाता था। जहाँ वे सुख-सुविधाओं से दूर पूर्णतः आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा ग्रहण करते थे।
पौधों में पानी देना, पालतु जानवर को खाना देना जैसा कार्य 7 साल के बच्चे से कराया जा सकता है। इससे उनमें प्रकृति को भी समझने की इच्छा होगी। पशु-पक्षी सभी अपने बच्चों को बहुत जल्द आत्मनिर्भर बनना सिखाते हैं। केवल इंसान ही अपने बच्चे को कुछ ज्यादा ही बच्चा समझता है और एक दिन युवा हुए बच्चे से ऐसी उम्मीद लगाता है कि वो सारी जिम्मेदारियाँ, आत्मनिर्भरता के साथ बहुत अच्छे से निभाए ये कैसे संभव हो सकता है। कमजोर लता जो दुसरों के सहारे बढती हैं वो कभी वृक्ष नही बन सकती। यदि व्यक्ति हर काम में दूसरे की मदद लेता है तो फिर उसे सदा दूसरों पर ही निर्भर रहने की आदत पड़ जाती है। यह आदत आगे चलकर कष्ट ही देती है। आत्मनिर्भरता से आत्मविश्वास उपजता है जो प्रत्येक कार्य को करने व उसमें सफल होने की प्रेरक शक्ति है। अत: दूसरों पर निर्भर रहने की बजाय अपने काम स्वयं करें।
विनोबा भावे आत्मनिर्भता के महत्व को समझते थे इसीलिए सर्वोदय आंदोलन में अन्य बातों के अलावा आत्मनिर्भर गांवों की कल्पना भी शामिल किए थे।  दिसंबर 1949 में हैदराबाद से वापस आने के बाद विनोबा जी ने पवनार आश्रम में इसका प्रयोग प्रारंभ किया था। उन्होंने बिना बैलों के आश्रम में खेती की और सब्जी बोई। सिंचाई के लिए पानी निकालना बड़ा कठिन कार्य था। रहट में एक डंडे के स्थान पर आठ डंडे लगाए गए जिसके फलस्वरूप एक घंटे में सात सौ चक्कर लगे, जबकि पहले केवल 25 चक्कर लगते थे। इस प्रकार थोड़े परिश्रम से भरपूर पानी मिला और देखते ही देखते समस्त भूमि हरी-भरी हो गई। ईंट पत्थर निकालने के बाद 125 मन सब्जी पैदा हुई। हाथों से की जाने वाली खेती को विनोबा जी ने ऋषि खेती का नाम दिया था। पानी की कमी को पूरा करने के लिए पांच-छ महीनों में खुदाई करके एक कुआं तैयार कर लिया गया। एक साल में ही खेती से 135 किलो ज्वार, 4 क्विंटल मूंगफली और 6 क्विंटल अरहर दाल पैदा हुई। आश्रमवासी अपने वस्त्र भी हाथ से कते सूत के ही पहना करते थे। इस प्रकार आश्रमवासी विनोबा जी के मार्गदर्शन में पूर्णरूप से आत्मनिर्भर हो गए। उसके बाद अनेक गांवों ने उनका अनुकरण किया। 

कहने का आशय है कि, बचपन से लेकर किशोरावस्था और युवावस्था तक विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए जब बच्चा सही अर्थो में जिम्मेदार बनता है, तो वो वास्तविक सुपरकिड बनता है। उसके यही प्रयास, अनुभव और आपसी जिम्मेदारियां उसे एक सफल इंसान बनाते हैं। वो अपने बल पर अपने लक्ष्य को पाने में कामयाब होता है।  

Tuesday, 15 October 2013

एक अपील

आपके अमुल्य तीन घंटे किसी की आँखों की रोशनी बन सकते हैं। अहिल्याबाई की पावन नगरी इंदौर के पाठकों से एक निवेदन है कि, इंदौर में Old GDC. Collage में B.A. 2nd Year की परिक्षाएं 23 अक्टुबर से शुरु हो रही है। वहाँ सामान्य छात्राओं के साथ कुछ दृष्टीबाधित छात्राएं भी परीक्षा देंगी, परिक्षा के समय सहलेखक (Scribe) की आवश्यकता की पूर्ती हेतु हम आपके सहयोग की अपेक्षा करते हैं। परिक्षा में सहलेखक का सहयोग केवल बालिकाएं ही दे सकती हैं। जो छात्रा 12वीं या B.A. 1st Year में अध्ययन कर रही है वे यदि दृष्टीबाधित बच्चियों की परिक्षा देने को इच्छुक हों तो, वे हमें मेल कर सकती हैं।

अधिक जानकारी के लिये आप हमें मेल कर सकते हैं। E-mail : voiceforblind@gmail.com

 मेरी पूर्व की अपील पढने के लिए लिंक पर क्लिक करें
http://roshansavera.blogspot.in/2013/04/a-request.html

 

Saturday, 12 October 2013

रावण का अंहकार


हम सब दशहरे का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक रूप में मनाते हैं। रावण बहुत बुद्धिमान और अनेक विद्याओं में निपुण था। फिर भी रावण के अन्त को हम सब बुराई का प्रतीक मानते हुए उसे जलाते हैं। प्रेमचन्द जी कहते हैं कि, आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन गरूर है।
रावण में भी सबसे बङी बुराई यही थी कि, उसे अंहकार का भ्रम हो गया था। अंहकार, व्यक्ति के जीवन को ऐसे नशे में डुबो देता है, जिसके कारण व्यक्ति स्वयं को सबसे श्रेष्ठ समझने लगता है और सोचता है कि पूरी दुनिया उसी से चल रही है। रावण में भी ऐसी भावना ने अपना रूप विकसित कर लिया था जिसका परिणाम ये हुआ कि सब कुछ अंहकार की ज्वाला में जल गया। वास्तव में अंहकार का कोई सच्चा अस्तित्व है ही नही। वीर का असली दुश्मन तो उसका अहंकार ही होता है।   

किसी ने सच ही कहा है, आप ने क्या कमाया उस पर कभी घमंड न करें क्योंकि शतरंज की बाजी समाप्त होने पर राजा और मोहरे एक ही डिब्बे में रख दिये जाते हैं।

अहंकार एक ऐसा बीज है जिससे कभी भी सकारात्मक फसल नही उगती बल्की बुराईयों की जङें गहरी हो जाती है। कहते हैं, अहंकार को कितना भी पोषण दीजिए उसकी तृप्ति संभव नही है। अहंकार तो गुब्बारे के समान है जो हवा भरने पर फूल जाता है यही हवा रूपी अहंकार जब ज्यादा हो जाता है तो गुब्बारा फूट जाता है। जरा सा कुछ हासिल हो जाने पर हम सब भी गुब्बारे की तरह फूल जाते हैं और अंहकार के वायरस को अपने भावों में समा लेते है। ये भूल जाते हैं कि कोई भी उपलब्धी किसी एक का परिणाम नही होती उसमें कई लोगों का योगदान होता है। कहावत को भूल जाते हैं कि, अकेला चना भाङ नही फोङता। हम हैं कि खुद को सर्वे-सर्वा समझ कर अहंकार की अग्नि में स्वयं को तबाह कर देते हैं 

वाल्टेयर ने कहा है कि, मनुष्य जितना छोटा होता है, उसका अंहकार उतना ही बड़ा होता है।“
अतः मित्रों सच्ची विजय या सही मायने में दशहरे का महत्व तभी है जब हम अपने अंदर के अहंकार रूपी रावण को ऊँचाई से उतार कर धरातल पर ले आयें। जन मानस की याद में अच्छे विचारों के साथ रहें। इसके लिए हमें विनम्रता और शालीनता को जीवन का अंग बना लेना चाहिए।

विद्वानों ने सच ही कहा है कि, कभी भी कामयाबी को दिमाग में और नाकामयाबी को दिल में जगह नही देनी चाहिए क्योंकि, कामयाबी दिमाग में घमंड और नाकामयाबी दिल में मायुसी पैदा करती है।

दशहरे से संबधित पूर्व की पोस्ट को पढने के लिए दिये गये लिंक पर क्लिक करें

 

 
 

 

Friday, 4 October 2013

माँ दुर्गा का अनुपम पर्व



जब हम भय की जगह निर्भय होकर प्रत्येक कठिनाई को परास्त करने में सक्षम हो जाते हैं और अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं तब शक्ति की कृपा का अनुभव होने लगता है। माँ दुर्गा शक्ति का रूप हैं। रणक्षेत्र में श्री कृष्ण ने युद्ध शुरु होने से पहले अर्जुन को माँ शक्ति की उपासना और आह्वान करने के लिए कहा था, जिससे न्यायसंगत शक्ति के साथ सफलता प्राप्त हो। जीवन भी एक प्रकार का संग्राम है। इसमें पल-पल परिस्थितियाँ बदलती रहती है। विपरीत परिस्थिती में भी स्वयं को कायम रखने के लिए एक विषेश प्रकार की शक्ति की आवश्यकता होती है। जो जीवन  मझधार में अटकी नैया को सकुशल अपने लक्ष्य तक पहुँचाने में मदद करती है। ऐसी ही अपरिमित शक्ति का भंडार गायत्री मंत्र (ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुवर्रेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्) के तीसरे अक्षर में समया हुआ है। जो शक्ति की प्राप्ति और सदुपयोग की शिक्षा देता है।

शक्ति और सत्ता, ईश्वर कृपा से प्राप्त होने वाली पवित्र धरोहर है, जो मनुष्य को इसलिए दी जाती है कि वह निर्बलों की रक्षा कर सके। परंतु यत्र-तत्र अक्सर देखने को मिल जाता है कि दुर्बल सबलों का आहार हैं। शक्ति तो वह तत्व है जिसके आह्वान से अविद्या, अंधकार तथा सभी परेशानियों का अंत हो जाता है। मन में शक्ति का उदय होने पर साधारण मनुष्य भी गाँधी, आर्कमडीज, कोलंबस, लेनिन, आइंस्टाइन जैसी हस्ती बन जाते हैं। बौद्धिक बल की जरा सी चिंगारी तुलसी, सूर, वाल्मिकी, कालीदास जैसे रचनाकारों को जन्म दे देती है।

माँ के इस अनुपम पर्व पर हम सभी अष्टभुजी दुर्गा की पूजा करते हैं। आठ भुजाओं से तात्पर्य हैः- स्वास्थ, संगठन, यश, शौर्य, सत्य, व्यवस्था, विद्या तथा धन। इन आठ विधओं का सम्मलित रूप ही शक्ति है। यदि हम सच्ची लगन के साथ माँ की उपासना निरंतर करें तो जीवन की यात्रा शक्ति की कृपा से निःसंदेह सुखद और सफल हो जाती है।

सर्वव्यापी, सर्वसम्पन्न माँ शक्ति की कृपा आप सभी पर सदैव बनी रही इसी मंगल कामना के साथ कलम को विराम देते हैं।

नोट- (नवरात्री से संबन्धित मेरी पूर्व की पोस्ट को पढने के लिए दिये गये लिंक पर क्लिक करें।)
जय माता दी

   

Tuesday, 1 October 2013

सत्य और अहिंसा के पुजारी

सत्य, अहिंसा  तथा देश हित को सर्वोपरी मानने वाले भारत के गौरव को शत्-शत् नमन।



मेरी पूर्व की पोस्ट को पढने के लिए लिकं पर क्लिक करें।





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Wednesday, 25 September 2013

श्राद्धपक्ष



श्रद्धा के साथ अपने पूर्वजों को नमन करने का पक्ष है श्राद्ध पक्ष। हमारे अपने हमेशा हम सभी के साथ रहते हैं, भले ही वो सशरीर हमारे बीच न हों किन्तु उनकी आवाज, रंगरूप और उनके द्वारा दिए संस्कार हमेशा हमारे साथ होते हैं। सम्मान और आदर के साथ याद करना ही श्राद्ध पक्ष पर सही तरपण है। जिस तरह किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेंश जी का ध्यान करते हैं उसी तरह गणेंश वंदना के पश्चात हम सभी, प्रत्येक शुभ कार्य से पहले अपने पूर्वजों का भी आर्शिवाद लेते हैं। इसी क्रमानुसार दस दिनों तक गणेंश जी के विराजने के तुरंत बाद हम सभी अपने-अपने पूर्वजों को नमन एवं वंदन करते हैं। शब्दों के माध्यम से हम अपने पूर्वजों को सादर भावांजली अर्पित करते हुए समाज में कुछ अस्वाभाविक संस्कारों पर अपने विचार रखने का प्रयास किए हैं, जिसे निचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढा जा सकता है।



http://roshansavera.blogspot.in/2012/10/blog-post_7.html

Monday, 16 September 2013

क्षमा की शक्ति


हम सब सामाजिक प्राणी हैं, जहाँ संबंधो की दुनिया में कुछ बुरा-भला आचरण स्वाभाविक है क्योंकि गलती करना मानव स्वभाव है। जिस प्रकार प्रकृति की बगिया में भाँति-भाँति के पुष्प और पौधे हैं उसी प्रकार जीवन की बगिया भी अनेक प्रकार की सोच और प्रकृति वाले लोगों से सुसज्जित है। कई बार हममें से कई लोगों का सामना नागफनी जैसे लोगों से भी होता है। वो अपनी सोच के अनुसार हमारा मुल्याकंन करते हैं जिससे हम विचलित हो जाते हैं। कहने वाला तो कह कर चला जाता है किन्तु हम हैं कि उसकी बात को दिल से लगा कर स्वयं को तकलीफ देते रहते हैं। ये जरूरी तो नही कि सबका नजरिया एक जैसा हो। हमें अपने पर विश्वास होना चाहिए तथा स्वयं को तकलीफ देने के बजाय उसे क्षमा करके उस बात को भूल जाना चाहिए।

ये भी सच है कि माफी या क्षमा भूलने के समान नही है तथा व्यक्ति कुछ चीजें कभी नही भूलता खासतौर पर जब मन पर या स्वाभिमान पर चोट लगी हो। परन्तु ये भी सच है कि गलती किससे नही होती अक्सर कहा जाता है कि गलती करना मानव स्वभाव है और क्षमा करना ईश्वरीय। किसी को क्षमा कर देने से उससे मिले कष्ट को भूलने में मदद मिलती है। जीवन तो बढने का नाम है ऐसे में यदि हम एक बात को लेकर बैठ जायेंगे तो आगे कैसे बढेगें। माफी तो एक ऐसी औषधी है जो गहराई तक जाकर घावों का इलाज करती है। ये उस जहर को खत्म कर देती है जो प्रेम तथा सोहार्द के लिए घातक है। माफी ऐसी प्रक्रिया है जिससे अपराधी से अधिक पीङित को राहत मिलती है। क्षमा कर देने वाला व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सेहत का हकदार होता है। जीवन में सुखमय शान्ति के दो ही तरीके हैं-
1- माफ कर दो उन्हे जिन्हे तुम भूल नही सकते।
2- भूल जाओ उनको जिन्हे तुम माफ नही कर सकते।

चिकित्सकों के अनुसारः- जो लोग बदले की बजाय माफी में विश्वास रखते हैं वो आवेश तथा बदले की कल्पनाओं से मुक्त अच्छी नींद लेते हैं।
क्रोध तो गर्म कोयले के समान है जिसे पकङ कर हम स्वयं को ही जलाते हैं। क्षमा करके हम स्व-परिचय, विशिष्टता और वासत्विक स्व को सुरक्षित रखते हैं। समाज के लिए ही नही बल्कि आपसी रिश्ते में भी क्षमा महत्वपूर्ण आधार है जो रिश्तों की नींव को मजबूत करती है। दूसरों के लिए क्षमा भाव के साथ खुद को भी माफ करना आवश्यक पहलु है। जब हम अपनी असफलताओं और गलतियों को मान लेते हैं तो ग्लानी भाव के बोझ से निकलकर सकारात्मक वातावरण का निर्माण करते हैं तथा अपने आप से प्रेम करने लगते हैं जिससे जीवन का सफर सुखद हो जाता है।

क्षमा ऐसा मंत्र है जिसका बीज बचपन से ही बोने का काम करना चाहिए क्योंकि परिवार ही वह पहला स्कूल है जहाँ इसकी शिक्षा दी जा सकती है। जब माता पिता एक दूसरे को माफ करते हैं तो वो बच्चों को भी वास्तविक जीवन में क्षमा के महत्व समझाते हैं, यकिनन यही बच्चा आगे चलकर परिवार, समुदाय, समाज और राष्ट्र में इन मूल्यों को और एकता को बनाये रखने में सफल होता है।

हमारे सभी धर्मों में क्षमा को विषेश स्थान दिया गया है। ईद हो या होली, सभी लोग गले मिलकर एक दूसरे की गलतियों को माफ कर देते हैं और स्वस्थ भाई-चारे को बढावा देते हैं। जैन धर्म मानने वाले हर वर्ष सितंबर के महिने में एक विशेष पर्व मनाते हैं, जिसे क्षमा पर्व कहते हैं। सभी जन एक दूसरे से जाने अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रर्थना करते हैं। निःसंदेह ये सकारात्मक प्रक्रिया है जो मानवीय संबंधो में मधुरता का संचार करती है। 

शास्त्रों के अनुसारः-
क्षमावशीकृतिलोर्के क्षमया किं न साध्यते।
शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः।।
अर्थात- संसार को क्षमा वश में कर लेती है। ऐसा कौन सा कार्य है जो क्षमा से नही हो सकता जिसके हाँथ में शान्ति रूपी तलवार हो दुर्जन उसका क्या बिगाङ सकता है।

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि क्षमा पर्व जैसे सत्कर्म अगर केवल एक दिन या एक सप्ताह के लिए भी हों तो व्यक्ति का ह्रदय अपने अपराध भाव के बोझ से थोङा बहुत मुक्त हो जायेगा लेकिन यदि हम क्षमा भाव को अपनी जीवन शैली बना लें तो हम गुलाब की तरह वातावरण को खुशनुमा बना सकते हैं, जिसका काँटो के साथ रहते हुए भी महत्वपूर्ण स्थान है। माफी तो वह खुशबू है, जो एक फूल उन्ही हाँथो में छोङ जाता है, जिन हाँथो ने उसे तोङा होता है।     

Sunday, 8 September 2013

गणेंश चतुर्थी के पावन पर्व पर हार्दिक बधाई



बुद्धिदाता, विघ्नहर्ता भगवान गणेश के हर एक नाम में अपने भक्तों का उद्धार छुपा हुआ है। शारीरिक संरचना में भी विशिष्ट व गहरा अर्थ निहित है। शिवमानस में श्री गणेश को ओमकार: (ॐ) कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूँड है। गौरीसुत, महागणपति सारे ब्रह्मांड के भगवान हैं।सभी शुभ कार्य के देव प्रथमेश्वर सफलता के स्वामी हैं। देवों के देव वक्रतुण्ड ज्ञान के दाता हैं। बाधाओं को हरने वाले,  सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले सिद्दिविनायक को कोटी-कोटी प्रणाम  है।
मंगलमूर्ती गजानन के बारे में अधिक जानकारी के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

http://roshansavera.blogspot.in/2012/09/blog-post_5322.html





Wednesday, 4 September 2013

जीवन में शिक्षा का महत्व



जीवन एक पाठशाला है। जिसमें अनुभवों के आधार पर हम शिक्षा पाते हैं। शिक्षा का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। शिक्षा हमारी समृद्धि में आभूषण, विपत्ति में शरण स्थान और समस्त कालों में आनंद स्थान होती है। जीवन लक्ष्य की पूर्ती के लिए शिक्षा आवश्यक है। महान दार्शनिक एवं शिक्षाविद् डॉ. राधाकृष्णन भी मनुष्य को सही अर्थों में मनुष्य बनाने के लिए शिक्षा को सर्वाधिक आवश्यक मानते थे। उनके अनुसार- शिक्षा वह है, जो मनुष्य को ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ उसके ह्रदय एवं आत्मा का विकास करती है। शिक्षा व्यक्ति को स्वंय के विकास के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के विकास के लिए भी प्रेरित करती है। महामहीम सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचार से शिक्षा का माध्यम मातृभाषा में होना चाहिए क्योंकि विदेशी भाषा में भारतीय मौलिक चिंतन नही कर सकते।
शिक्षा के महत्व को परिलाक्षित करते हुए स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं कि, जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें और विचारों का सामजस्य कर सकें यर्थाथ में यही वास्तविक शिक्षा होगी। स्वामी जी भारत में ऐसी शिक्षा चाहते थे, जिसमें उसके अपने आदर्शवाद के साथ पाश्चात्य कुशलता का सामंजस्य हो। उनका कहना था कि लोगों को आत्मनिर्भर बनना अति आवश्यक है वरना सारे संसार की दौलत से भी भारत के एक गाँव की सहायता नही  की जा सकती। अतः नैतिक तथा बौद्धिक, दोनों ही प्रकार की शिक्षा प्रदान करना देश व समाज का पहला कार्य होना चाहिए।
ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, आज जिस तरह का वातावरण चारो तरफ व्याप्त है ऐसे में ऐसी शिक्षा ही आवश्यक है जिससे बच्चों का चरित्र-निर्माण हो सके, उनकी मानसिक शक्ति बढे, बुद्धि विकसित हो और देश के युवक अपने पैरों पर खङा होना सीखें। भौतिकवादी स्वार्थपरक सोच के फैलते प्रभाव को कम करने के लिए आवश्यक है कि स्कुली शिक्षा के साथ-साथ नैतिक शिक्षा की भी नींव मजबूत की जाए।
शिक्षक दिवस के पावन दिन पर सार्थक शिक्षा को आत्मसात करते हुए खुद से वादा करें कि जो शिक्षा मनुष्य को सही अर्थों में मनुष्य बना सके ऐसी मूल्यवान शिक्षा की अलख हम विपरीत वातावरण में भी जलाए रखेंगे। इसी प्रण के साथ आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई।


Friday, 30 August 2013

जिंदगी की पाठशाला



जीवन में हम सभी को अपने आस-पास के वातावरण से कई ऐसी बातें सीखने को मिलती हैं जो जीवन को नया आयाम देती है। कभी-कभी तो बच्चे भी हमें ऐसी सामाजिक भावना की सीख दे जातें हैं जिससे ये प्रमाणित हो जाता है कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं, वो तो वाकई भगवान का रूप होते हैं। ऐसी ही एक बच्ची की बातें आप सभी से Share कर रहें हैं। उसकी बातों से हम बहुत प्रभावित हुए।

एक बार की बात है। एक बच्ची खाना नही खा रही थी, उसकी माँ कई प्रकार से समझा रही थी फिर भी वो खाना नही खा रह थी। आखिर में उसके पिता ने उसे समझाया कि तुम खाना खा लो उसके बाद तुम जो चाहोगी तुम्हे दिला देंगे। बच्ची ने पक्का करने के लिए पुनः अपने पिता से पुछा कि जो मैं माँगुगी आप दिलाएंगे। पिता ने पुनः आश्वासन दिया और साथ ही ये हिदायत भी दे दी कि कुछ मंहगा न माँगना। बच्ची ने भी मुस्कराते हुए अपने पापा को कहा कि वो मंहगी चीज नही लेगी। खाना खाने के बाद उसके पापा ने उससे पुछा कि तुम्हे क्या चाहिए? थोङा सहमते हुए बच्ची बोली पापा मुझे अपना सर मुंडवाना है, पूरे बाल कटवाने हैं! पिता ने आश्चर्य से पूछा, माँ तो नाराज ही हो गई कि इतने अच्छे लम्बे बाल हैं क्यों कटवाना चाहती हो। बच्ची अपनी बात पर अढी रही, आखिरकार उसके पापा ने उसका बाल कटवा दिया किन्तु उसकी माँ उससे बहुत नाराज रही यहाँ तक की दूसरे दिन स्कूल जाने के लिए तैयार भी नही की। उसके पापा उसे तैयार करके स्कूल छोङने गए। वहाँ वे उसके एक ऐसे दोस्त से मिले जिसके सर पर बिलकुल भी बाल नही था। वे कुछ सोचते उसके पहले ही उस बच्चे की माँ उनके पास आई और बोली, "सर आपकी बेटी का दिल बहुत बङा है। जिस बच्चे को इतने ध्यान से देख रहे हैं वो मेरा बेटा है,उसे ल्यूकेमिया है, किमोथैरिपी की वजह से उसके पूरे बाल झङ गए हैं। क्लास के बच्चे उसका मजाक न उङाएं इसलिए वो एक महिने से स्कूल नही आ रहा था। पिछले सप्ताह आपकी बेटी मेरे घर आई थी। उसने मेरे बेटे से वादा किया था कि सोमवार से स्कूल आए उसे कोई परेशान नही करेगा। मैने कभी सोचा भी न था कि वो अपने खूबसूरत बालों का बलिदान कर देगी। आप बहुत भाग्यशाली हैं कि आपको इतनी सुंदर आत्मा वाली बेटी मिली है।"

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि उस नन्ही परी ने अपने पापा को ही नही बल्की हम सबको ये सीख दी कि इस दुनिया में खुशी उन्हे नही मिलती जो अपनी शर्तो पर जिंदगी जीते हैं बल्की उन्हे मिलती है, जो दूसरों की खुशी के लिए जिंदगी की शर्तों को बदल देते हैं।