Sunday, 4 October 2026

जान है तो जहान है(कैंसर को अपने जिवन से करें सेंसर)

मित्रों, आज की आधुनिक जीवन शैली में समाज पारंपरिक और सांस्कृतिक जीवन पद्धति से विमुख हो रहा है। अपने को प्रगतिशील समझने की होङ में फैशन, वैभव के साजो समान और साधन-संसाधन के अंबारो में भटक गया है। अब तो खान-पान की आदतों और आहार को भी आधुनिकता ने अपने वश में कर लिया है। बिना सोचे-समझे खान-पान के सेवन से व्यक्ति का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ ग्रसित होता है।

मित्रों, इधर कुछ वर्षों से बढते कैंसर हॉस्पिटल को देखकर मेरे मन में अक्सर ये सवाल उठ रहा था कि ऐसा क्या हो गया जो केवल इसी बिमारी के लिए बङे-बङे अस्पताल खुल रहे हैं। और तो और अस्पताल भी बच्चों एवं महिलाओं के लिए अलग, पुरषों के लिए अलग। इस तरह के बङे-बङे अस्पताल देखकर प्रश्न और प्रबल हो जाता है। यहां एक बात स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि इस लेख को लिखने का मकसद आपको डराना नही बल्की जागरुक करना है क्योंकि जान है तो जहान है।

लोकमान्य तिलक जी का कहना है कि, “शरीर को रोगी और निर्बल रखने के समान दूसरा कोई पाप नही है।“

उपरोक्त विचारों के बीच एक दिन हमने डॉ. तरंग कृष्णा का इंटरव्यु सुना जिसको सुनकर पता चला कि इस बिमारी के अनगिनत कारणों को हमलोग अंजाने में हरपल बढावा दे रहे हैं। अक्सर हस सब सिनेमा हॉल में बीङी, तम्बाकु, गुटका और सिगरेट को इस बिमारी का कारण देख रहे थे। लेकिन आज उससे इतर इतने गुप्त कारण हैं जो अज्ञानता या लापरवाही के कारण बढ रहे हैं। हमारी अनियमित जिवन शैली में ऐसे अनेक कारण धिरे-धिरे इस रोग को निमंत्रण दे रहे हैं, जिसको जानकर उसपर नियंत्रण करना आज पहली प्राथमिकता है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर कहते हैं, "शरीर के लिए स्वास्थ का महत्व वैसा ही है जैसे दीपक के लिए तेल।"

यहां ये जान लेते हैं कि कैंसर या कर्क रोग है क्या-  कर्क रोग (कैंसर) एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर की कोशिकाएं असामान्य रूप से अनियंत्रित होकर बढ़ने और विभाजित होने लगती हैं। ये असाधारण कोशिकाएं स्वस्थ ऊतकों को नष्ट कर सकती हैं और ट्यूमर (गांठ) बना सकती हैं।

आइये जानते हैं वर्तमान में कैंसर के कारण :-
सबसे पहले अनियंत्रित खान-पान पर विचार करते हैं, मित्रों आज की भागदौङ वाली जिंदगी में समय कहीं सिमट सा गया है। सब फटाफट तुरंत चाहिए, ऐसे में बाहर के खान-पान की आदत दिनचर्या का हिस्सा बन गई है। बाहर के प्लास्टिक डिब्बे में आनेवाला गर्म खाना, डिब्बा बंद फूड, फास्ट फूड जैसे पिज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक इत्यादि.....शोध बताते हैं कि, रेस्टोरेंट या ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरी में इस्तेमाल होने वाले काले प्लास्टिक के डिब्बे अक्सर पुराने इलेक्ट्रॉनिक कचरे (जैसे पुराने टीवी, कंप्यूटर, रिमोट और केबल) को पिघलाकर बनाए जाते हैं। ये प्लास्टिक 'फूड ग्रेड' खाने योग्य सामग्री के लिए सुरक्षित नहीं होते हैं। गर्म और तैलिय खाने के संपर्क में आते ही प्लास्टिक के अत्यंत सूक्ष्म कण टूटकर भोजन में मिल जाते हैं (माइक्रोप्लास्टिक), जो पाचन तंत्र और किडनी-लिवर को नुकसान पहुंचाते हैं। काले प्लास्टिक के रसायन और ब्रोमिनेटेड फ्लेम रिटार्डेंट्स जब बार-बार शरीर में पहुंचते हैं, तो इससे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। यदि बाहर से खाना मंगाते हैं, तो उसे तुरंत प्लास्टिक के डिब्बे से निकालकर स्टील या कांच के बर्तन में पलट लें। काले या किसी भी डिस्पोजेबल प्लास्टिक के डिब्बे में खाने को माइक्रोवेव में बिल्कुल भी गर्म न करें। पहले अचार कांच की बर्नी में आता था, अब तो अचार भी प्लास्टिक में मिल रहा। प्लास्टिक के पैकेट में रखे चिप्स और नमकीन भी धिरे-धिरे अपना असर दिखा रहे हैं।

आईआईटी खड़गपुर (IIT Kharagpur) के एक शोध के अनुसार, अक्सर ऑफिस में दिनभर सर्व की गई चाय जिस कप में पी जाति है उस कप में 100 मिलीलीटर गर्म चाय या कॉफी (85-90 डिग्री सेल्सियस) यदि 15 मिनट तक रखी जाए, तो उसकी प्लास्टिक की परत पिघलकर करीब 25,000 माइक्रोप्लास्टिक कण चाय में घोल देती है। यदि कोई व्यक्ति दिन में 3 कप चाय ऐसे पेपर कप में पीता है, तो उसके शरीर में रोजाना लगभग 75,000 अदृश्य माइक्रोप्लास्टिक कण चले जाते हैं। प्लास्टिक की इस कोटिंग में लेड, कैडमियम, क्रोमियम, और थैलेट्स (Phthalates) जैसे विषैले तत्व पाए जाते हैं। ये हानिकारक केमिकल्स शरीर में जाकर पाचन तंत्र को कमजोर करते हैं, हार्मोन असंतुलन (Hormone imbalance) पैदा करते हैं, और लंबे समय में लिवर, किडनी तथा केंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं।

आज की जिवन शैली हमें मानसिक एवं भावनात्मक, चिङचिङेपन के सरोवर में डूबो रही है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अनुसार , स्वस्थ शरीर में हमारा इम्यून सिस्टम विशेषकर नेचुरल किलर सेल्स हर वक्त शरीर की निगरानी करता है और किसी भी असामान्य या कैंसरग्रस्त कोशिका को शुरुआती चरण में ही नष्ट कर देता है। जब कोई व्यक्ति लगातार मानसिक चिंता और भागमभाग में रहता है तो शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे स्ट्रेस हार्मोन लगातार रिलीज होते हैं। ये हार्मोन इम्यून सेल्स की कार्यक्षमता को दबा देते हैं, जिससे शरीर की कैंसर से लड़ने वाली प्राकृतिक रक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती हैं और कैंसर कोशिकाएं बिना किसी रोक-टोक के अपना असर दिखाने लगती हैं।

शोध तो यहां तक बता रहे हैं कि, घर में उपयोग किये जाने वाले फिनायल, हारपिक तथा बर्तन मांजने वाला पफ भी कैंसर को बढावा दे रहे हैं। हलांकि फिनाइल, हार्पिक और बर्तन मांजने वाले स्पंज से सीधा संबंध कैंसर से नहीं है। लेकिन इनमें मौजूद रसायनों का गलत इस्तेमाल और गंदगी स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है। इनमें ब्लीच, अमोनिया और कई प्रकार के वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) होते हैं, जिनकी महक और निकलने वाले तेज धुएं को लगातार सांस के जरिए अंदर लेने से फेफड़ों को भारी नुकसान पहुंचता है, जिससे सांस की गंभीर बीमारियां और लंबे समय में फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। वहीं बर्तन मांजने वाला स्पंज हमेशा गीला रहता है और उसमें खाने के बारीक कण फंस जाते हैं जो बैक्टीरिया और फंगस के पनपने के लिए अनुकूल हैं। जो धुले बर्तन में भी रह जाते हैं जिससे फूड पॉइजनिंग, डायरिया और आंतों का संक्रमण हो सकता है और पुराना संक्रमण पेट की जटिलताओं को बढ़ा सकता है।

मित्रों, चिकित्सकों के अनुसार कैसर होने के तो बहुत कारण हैं और अलग-अलग प्रकार के हैं। एक लेख में सबका विवरण संभव नही है। कुछ कैंसर तो आनुवंशिक भी होते हैं, ऐसे कारणों पर सामान्यतः चर्चा नहीं की जा सकती। परंतु जो कारण हम लोगों के नियंत्रण में हैं, उसपर तो ध्यान दिया जाना चाहिए। जागरुकता के मद्देनजर इसिलिए कुछ कारणों को आप सबसे सांझा करने का प्रयास किये हैं।

ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, स्वस्थ तन और मस्त मन, जीवन की संजीवनी है ।। यदि हम जागरुकता के साथ अपने रोजमर्रा की जिंदगी को व्यवस्थित कर लें तो कैंसर को जिवन में सेंसर कर सकते हैं। सभी को समझाना है कि स्वस्थ्य और स्वच्छ जीवन शैली से बीमारियाँ दूर रहेगी, जिंदगी ख़ुशहाल रहेगी। जान है तो जहान है, ये बीमारी सब्र का इम्तिहान लेती है, इसलिए इससे घबराना नहीं है बल्की कैंसर को हराना है, हारना नहीं।

आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्।।

अर्थ: निरोगी शरीर होना मनुष्य का सबसे बड़ा भाग्य है और अच्छा स्वास्थ्य ही सभी कार्यों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) को सिद्ध करने का एकमात्र साधन है।

मित्रों, अंतोगत्वा प्लास्टिक को अपने जिवन से टाटा बाय-बाय कर देना चाहिए। कैंसर का पता चलने पर घबरायें नहीं बल्की उचित डॉ. की परामर्श पर निदान की प्रक्रिया करें। उपचार के साथ अपनी दृणइच्छा शक्ति के आधार पर इस बिमारी को परास्त कर सकते हैं। जागरुकता का ये छोटा सा प्रयास समाज में फैल रहे कैंसर को रोकने में साकार हो ऐसी मेरी अभिलाषा है।स्वास्थ्य को ही सबसे बड़ा धन माना गया है, स्वास्थ्य ठीक रहेगा तब ही हम सुख-सुविधा का आनंद ले सकते हैं।

महात्मा बुद्ध ने स्वास्थ्य को ही सबसे बड़ी संपत्ति बताया है

मुंशी प्रेमचंद जी कहते हैं, "अगर आप स्वस्थ हैं, तो आप कुछ भी हासिल कर सकते हैं।"

मित्रों, जागरुकता के इस प्रयास को अधिक से अधिक लोगों तक सांझां करें, ताकि स्वस्थ भारत का सपना साकार हो। एक श्लोक के साथ अपनी कलम को विराम देते हैं......

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥



धन्यवाद 
जय हिंद वंदे मातरम्

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