Sunday, 6 January 2013

एक एकङ में पूरा संसार


 आँखों में दूसरों के लिये आदर्श बनने का सपना लिये आज कई लोग प्रयास कर रहे हैं। बहुत जल्दी तरक्की के शीर्ष पर भी पहुँचना चाहते हैं, किन्तु राह में आने वाली परेशानियों से विचलित हो जाते हैं। कई बार कुछ लोग अपनी असफलता का श्रेय संसाधन को देते हैं।
मित्रों, ऐसे लोगों को गोरखपुर की महिला किसान की जिंदगी से सीख लेनी चाहिये। जिसने यदि अपनी जिंदगी बदलनी चाही तो, कठिन राह की परवाह किये बिना, संसाधनो के अभाव में भी खुद को बेहतर बनाने के लिये जुट गई। अशिक्षा भी उसकी तरक्की में बाधा नही पैदा कर सकी क्योंकि वह दृणसंकल्प एवं धैर्य से आगे बढती गई।
दूसरों के खेत में काम कर आजिवका चलाने वाली रामरती ने आज अपनी एक एकङ जमीन में पूरी दुनिया सजा ली है। विकासखण्ड कैम्पियर गंज जिला गोरखपुर के सरपतहा गाँव की रामरती ने अपने खेत में मिश्रित खेती करके सभी को आश्चर्य चकित कर दिया है। रबि के मोसम में जहाँ एक ओर गेंहु की फसल दिखती है तो दूसरी तरफ तोरियां कटने को तैयार रहती है। सरसों की फसल हो या आलू की मेंढ पर मूली की फसल। 10बिसवा जमीन पर ऐसे केले लगे हैं जो सब्जी और फल दोनो में काम आते हैं। कहीं पपीते और अनार तो कहीं आम और अमरूद।  इन सबके अलावा उनके बगीचे में सागौन और साल के पौधे भी अपनी उपस्थिती दर्ज किये हुए हैं।
मित्रों, रामरती की खेती पूरी तरह जैविक खादों से ही फल फूल रही है। रामरती ने गोरखपुर इन्वाइरन एक्शन ग्रुप से प्रशिक्षण लेने के बाद अपने खेतों के लिये विभिन्न प्रकार की जैविक खादों(नाडेप कम्पोस्ट, केंचुए की खाद, सी.पी.पी.) को स्वयं ही बनाती हैँ। गोमूत्र, लहसुन, सूर्ती, नीम आदी के प्रयोग से कीटनाशक भी घर पर ही बनाती हैँ। जैविक खादों के प्रयोग से मृदा का जैविक स्तर बढता है, जिससे लाभकारी जीवांणुओं की संख्या बढ जाती है और मृदा उपजाऊ रहती है।
दुश्वारियों से भरे जीवन को अपने अथक प्रयास से आम से खास बनाने वाली महिला किसान रामरती आज कई किसानों का आदर्श हैं। आज वे जैविक खादों का उपयोग एवं फसल उत्पादन के बारे में समझाने के लिये कई सरकारी एवं गैरसरकारी कार्यक्रमों में जाती हैं। राज्यस्तरीय सम्मेंलन में उन्हे कई बार प्रगतीशील किसान के रूप में सम्मानित किया गया है। रामरती के हौसले ने उनके जीवन को सर्वसम्पन्न बना दिया। आज उनके पास स्वयं का पक्का घर, बैल, सिंचाई के लिये पंप सेट, ओसाई पंखा तथा चारा मशीन भी है।
जहाँ चाह है वहाँ राह है को चरितार्थ करती रामरती हम सभी के लिये प्रेरणास्रोत हैं। मृदा एवं फसलों के लिये जैविक खाद कितना महत्वपूर्ण है इस बात का संदेश जन जन तक पहुँचाना उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य है।
किसी ने सच ही कहा है कि- जहाँ अडिग विश्वास है और अच्छाई से लगाव है, वहाँ सफलता है और शक्ति है।

धन्यवाद

Thursday, 3 January 2013

एक आवाज


यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवताः। अर्थात जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता बसते हैं। मनुस्मृति में नारी को पूज्यनीय बताया गया है किन्तु आज के परिपेक्ष में क्या इसको आत्मसात करता भारत नजर आ रहा है ? सत्यता तो ये है कि आजादी के 65 वर्षो बाद भी नारी असुरक्षित एवं परतंत्र है। क्या आजादी सिर्फ पुरूषों को ही मिली थी? बुद्ध, गौतम, नानक, पैगम्बर मोहम्द, ईसामसीह जैसे महान संतो ने इंसानियत को जगाए रखने की शिक्षा दी थी, उनकी शिक्षाओं को आज भूलते जा रहे  हैं। स्त्रियों के हक के लिये लङने वाले राजाराम मोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, विवेकानंद जी को याद करना नही चाहते।
आज पूरा देश ही नही अपितु पूरा विश्व इंसानियत को शर्मसार करती मानसिकता से परेशान है। आज समाज वैचारिक प्रदुषंण से इस तरह प्रदुषित हो गया है, जहाँ हम सब को अपने अंतरमन में मंथन की  आवश्यकता है। चार (4) साल की बच्ची हो या चालिस (40) साल की महिला, सभी नारी जाति के लिये असुरक्षा का वातावरण चहुँओर व्याप्त है। घर, पङौसी, या समाज, हर कहीं रक्षक ही भक्षक बन चुके हैं।

2012 अत्याचार के खिलाफ जन चेतना को एक आवाज दे गया। जाते जाते जुल्म की दासतां के विरुदध देश को जागृत कर गया। इंसानियत को शर्मसार करने वाली मानसिकता के खिलाफ जंग का आगाज कर गया। 16 दिसम्बर से पहले भी विपरीत नामों के साथ विभिन्न स्थानो पर इंसानियत को शर्मसार करती ऐसी घटनाएं घटित हो चुकी हैं। ऐसी अमानवीय घटनाओं की जितनी भी निंदा की जाये कम है।

प्रश्न ये उठता है कि क्या! अमानवीय कृत्यों वाले इंसान अलग दुनिया से आते हैं? नही मित्रों, ये भी उसी समाज के अंग हैं, जिस समाज में हम और आप रहते हैं।  जब हम महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को सुनते हैं तो मन में ख्याल आता है कि हम किस समाज में रह रहे हैं, स्त्रियों के प्रति ऐसी सोच क्यों?

दोष हमारी एक तरफा सोच में है। समाज में ये मानसिकता है कि औरत का दर्जा आदमी से नीचा है। बच्चे इसी बात को सच मानते हैं जिससे लङके रौब दिखाना शुरु कर देते हैं और लङकियाँ दबने लगती हैं। यही लङकियाँ जब बङी होती हैं तो अपनी बेटीयों और बहु को भी दबकर रहने की शिक्षा देती हैं। पुरुष प्रधान अधिपत्य वाले समाज में औरतों के साथ छेङ-छाङ करने वाले पुरूष की गलती नही मानी जाती है, बल्की ये कहा जाता है कि औरतों का पहनावा छेङ-छाङ को न्योता देता है। ऐसी संकीर्ण सोच भरे समाज में जब किसी स्त्री वर्ग के साथ दुराचार होता है तो समाज उस महिला या बेटी को हेय (घृणा) की दृष्टी से देखता है। भले ही अपराधी को सजा मिल जाये, कानून महिला को बेकसूर माने, पर समाज उस महिला को वो सम्मान नहीं देता जिसकी वो हकदार है। स्त्री का दोष न होते हुए भी उसे सामाजिक तिरस्कार जैसी मानसिक वेदना से ताउम्र गुजरना पङता है।
अपराधी को तो सजा के तौर पर जेल मिल गई जहाँ उसे सामाजिक तिरस्कार जैसी वेदना नहीं मिलती। आज फाँसी की सजा की माँग जोर पर है। एक बार में ही सभी सजाओं से मुक्ती। किन्तु उस महिला का क्या, जो बेकसूर होते हुए भी समाज का तिरस्कार झेलती है। मित्रों, कुछ बरस पहले गीता चोपङा कांड में रंगा व बिल्ला को फाँसी दी गई थी। क्या ऐसे कृत्य कम हुए ? ऐसी दुषित मानसिकता वाले इंसान का जीवन तो पल-पल त्रासदी भरा होना चाहिये जो दूसरों को ऐसे कृत्य न करने का सबक दे सके।
मौलिक अधिकार के तहत एक स्त्री होने के नाते मेरा ये मानना है कि ऐसे अपराधी का Castration (नपुंसक) कराके उसके माथे पर बलात्कारी का टैटु बनाकर समाज में छोङ देना चाहिये ताकी उसे अपने किये की सजा हर पल समाज की तिरस्कार पूर्ण दृष्टी से मिलती रहे। ऐसी सजा देखकर कोई दूसरा ऐसे कृत्य को करने की हिम्मत नही करेगा। यदि कोई अपने माथे की प्लास्टिक सर्जरी करवाने की कोशिश करे तो उस डॉ. के खिलाफ भी कङी कारवाई हो, ऐसा सख्त कानून बनना चाहिये।
इसके साथ ही हम सब को अपनी अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझकर समाज को भी एकतरफा सोच से दूर करना होगा। बेटे और बेटियों में अंतर करना बंद करना होगा। अभिभावकों को अपने बेटे को बचपन से ही बेटियों का सम्मान करना सिखाना होगा। बच्चे केवल कहने से नही सीखते, जो देखते है उसी को जीवन में उतारते हैं इसलिये प्रत्येक आदमी को अपनी पत्नी की इज्जत करना चाहिये, माँ एवं बहन-बेटियों को भी सम्मान देना चाहिये जिससे बच्चे के मन में भी बाल्यावस्था से ही नारी के प्रति सम्मान की भावना का विकास हो। आज फिल्मो और प्रचारों में भी नारी को वस्तु न मानकर उसके सम्मान की रक्षा का वक्त आ गया है। समाज को सुसंस्कृत बनाने में सिनेमा की भी नैतिक जिम्मेदारी है। सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन एक धीमी प्रक्रिया जरूर है किन्तु सामाजिक सुधार के लिये ये आवश्यक कदम है।
यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि सबसे ज्यादा बदलाव लाने की जरूरत दो जगह पर है, औरतो के बारे में आदमियों की सोच और औरतों के बारे में स्वयं औरतों की सोच।
बदलाव की सबसे ज्यादा उम्मीद आने वाली पीढी से है, उन्होने अपनी एकजुटता और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाकर एक सकारात्मक कदम बढा दिया है। ये एकजुटता और आवाज बुलन्द रहे यही कामना करते हैं। 
आशा करते हैं कि, 16 दिसम्बर की बहादुर नारी का बलिदान बेकार न जाए, समाज की एकजुटता में उसका आगाज, ऐसे अपराधियों को फांसी के फंदे की मुक्ती नही बल्की उनकी जिंदगी सामाजिक तिरस्कार वेदना से परिपूर्ण जैसी सजा दिला सके। आने वाले भारत का आगाज कुछ ऐसा हो----
जहाँ नारी का सम्मान हो,
इंसानियत का व्यवहार हो,
सदभावना का माहौल हो,
जहाँ मन निर्भय हो,
सुख शान्ती का सहज एवं सरल विचार हो।
हे प्रभो ! देश का मस्तक गर्व से ऊँचा हो।
भारत का नव उदय हो।

Saturday, 29 December 2012

I m Possible


Hello, Friends 

नयी उमंग की नई किरणों में नई आशाओं के साथ, आँखों में नई उम्मीदों का उजाला लिये नव वर्ष का स्वागत करने के लिये मैं भी आपके साथ चलने को तत्पर हुँ। जीवन मे उमंग और नई खुशियां हर पल आपके साथ हों।

नया वर्ष तो कोरी कॉपी की तरह है, आप चाहें तो अपनी काबलियत से उस पर तरक्की की इबारत लिख सकते हैं। अपने हौसले से एक नया इतिहास लिख सकते हैं। किसी ने सच ही कहा है कि, यदि आप चाहते हो कि आपको भुला न दिया जाए तो दो काम करो। या तो पढने लायक कुछ लिख डालो या लिखने लायक कुछ कर डालो क्योंकि दुनिया में कोई भी इंसान अपने कृत्यों के लिये याद किया जाता है या कृतियों के लिये याद किया जाता है।

मित्रों, यदि आप मुझे अपने साथ लेकर चलते हैं तो मैं आपकी इच्छाओं और लक्ष्य को पूरा करने में मदद कर सकता हुँ, मैं ही क्यों! मेरे परिवार का हर सदस्य- P,O,S,S,I,B,L,E आपकी सफलता में काम आ सकता है। मेरे परिवार का हर सदस्य सकारात्मक बातों को ही दर्शाता है।

यदि धैर्य (Patience) और आशावादी (Optimist) विचारधारा से कोई कार्य शुरू (Start) करते हैं तो सफलता (Success) जरूर मिलती है। महत्वपूर्ण (Important) बात ये है कि मजबूत इरादों (Strong Idea) से आप कई लोगों के आदर्श (Ideal) बन सकते हैं। ये सब तभी संभव है जब आपका अपने ऊपर विश्वास (Believe) हो। विवेकानंद जी ने कहा है कि—

“जब तक आप खुद पर विश्वास नही करते, तब तक ईश्वर भी आप पर विश्वास नही करता।“

जीवन एक पाठशाला है उसमें अच्छा बुरा जो भी घटता है, उससे कुछ न कुछ सीखने (Learn) को मिलता है क्योंकि असफलता भी अपने में समाहित सफलता का एहसास कराती है। असफलताओं से घबराकर कई लोग वहीं रुक जाते हैं। Friends, छोटी-छोटी रूकावटें लक्ष्य का अन्त (End) नही है, बल्की सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) के साथ लक्ष्य को हासिल करने की प्रेरणा देती हैं।

 मिसाइल मैन अब्दुल कलाम साहब ने का है कि-

“Waves are my inspiration, not because they rise and fall, But whenever they fall, they rise again”

सच ही तो है, लहरें उठती गिरती किनारे (लक्ष्य) तक पहुँच ही जाती हैं। कहते हैं, जितना कठिन संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी। शान्त समुन्द्र में नाविक कुशल नहीं बनते।

Friends, कुछ लोग मुझे स्पेस (धैर्य) के बिना लिख देते हैं और मेरी भावनाओं का गलत अर्थ यानि असम्भव (Impossible) समझ कर मुझसे डरते हैं और आगे बढने की हिम्मत नही करते। जिन्होने मुझे समझा, उन्होने इतिहास रचा है। शुरुआती दौर में व्यक्तिगत जीवन में संघर्ष से जूझने वाले भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की डिक्शनरी में असंभव (Impossible) जैसा शब्द नहीं है, आज वे पूरी दुनिया में सम्माननीय हैँ।

 एडिसन को पूरी दुनिया जानती है, उन्होने मुझे समझा और हमेशा अपने साथ रखा। प्रकाश बल्ब का आविष्कार करके घर-घर रौशनी पहुँचाने वाले एडिसन कई बार अपने कार्य में असफल हुए। एक आविष्कार में करीब 10,000 बार फेल हुए पर उनका कहना था कि मैं फेल नही हुए बल्कि मैंने 10,000 ऐसे तरीके खोज लिये जो काम नही करते। ऐसी सकरात्मक सोच की वजह से ही अनेक आविष्कारों का सृजन कर सके।

 आज का युवा वर्ग हॉलीवुड हीरो टॉम क्रूज को बहुत पसंद करता है। टॉम क्रूज का लक्ष्य एक्टिंग था। जिसको पूरा करने में कई रुकावटें आईं जीवन में खलासी का काम करना पड़ा, होटल में पोंछा लगाया। कुली का काम भी करना पङा वो भी किया किन्तु लक्ष्य को नही छोङे। संभावनाओ (Possibility) के साथ फिल्मों में ऑडिशन (Audition) देते रहे। लंबे संघर्ष के बाद उन्हें फिल्मे मिलने लगीं। फिर 1986 में ‘टॉप गन’ आयी। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही। जीवन की थोड़ी सी कठिनाई से विचलित हुए बिना उन्होने सफलता की इबारत लिख दी। आज, क्रूज व सफलता एक दूसरे के पर्याय बन गये।

मित्रों, कामयाबी के शिखर तक पहुंचने के लिये संभावनाओं पर विश्वास करके प्रयास करते रहिये क्योंकि, दुनिया में सब कुछ संभव है।

“Believe that, anything is possible & it will happen.”

 

               "नव वर्ष का प्रभु इस तरह आगाज हो।

                  पंख शक्तीपूर्ण हों, हर दिन नई उङान हो।

                  ईश कृपा से चर्तुदिक, खुशियों की बौछार हो।

                 स्वपन जो भी देख लें, सहज ही स्वीकार हो।

        सुख- समृद्धि से भरपूर, नव वर्ष का उपहार हो।"

                      Have a lucky and wonderful 2013
 

Monday, 24 December 2012

जनजन के प्रिय नेता संवेदनशील कवि अटल जी


सम्पूर्ण विश्व को आध्यात्म का संदेश देनेवाले विश्वगुरू भारत के लोकतंत्र के सजग प्रहरी, 'अनमोल रत्न' ग्वालीयर का गौरव, संवेदनशील कवि, श्रेष्ठ पत्रकार, प्रखर वक्ता, दलगत राजनीति के परे सर्वजन प्रिय अटल बिहारी वाजपेयी जी राजनीति की पटल पर एक ऐसे मसीहा हैं, जिन्हे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी सम्मान से याद किया जाता है
प्रख्यात चिंतक अटलजी  का जन्म 25 दिसम्बर 1924 को ग्वालियर में हुआ था। माता का नाम कृष्णा एवं पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी थे। वाजपेयी जी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद के गुण विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे। वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे।

बचपन से ही अटल जी की सार्वजनिक कार्यों में विशेष रुचि थी। उन दिनों ग्वालियर रियासत दोहरी गुलामी में थी। राजतंत्र के प्रति जनमानस में आक्रोश था। सत्ता के विरुद्ध आंदोलन चलते रहते थे। सन् 1942 में जब गाँधी जी ने 'अँग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा दिया तो ग्वालियर भी अगस्त क्रांति की लपटों में आ गया। छात्र वर्ग आंदोलन की अगुवाई कर रहा था। अटलजी तो सबके आगे ही रहते थे। पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी चुंकि सरकारी नौकरी में थे तो वे अटल जी को ऐसे कार्यक्रमों से दूर रहने की हिदायत देते थे, किन्तु देशप्रेम का ज़ज्बा उन्हे सदैव आगे बढने को प्रेरित करता था। इस कार्य में उनकी बङी बहन का सहयोग हमेशा रहा। राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन करने के अलावा आपने अपना जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक का दायित्व सफलता पूर्वक निभाया।
अटल जी भारत के ऐसे प्रथम राजनेता थे जिन्होंने संसद व संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा की वार्षिक बैठकों सहित कई महत्वपूर्ण विषयों पर हिंदी में भाषण देकर देश ही नहीं अपितु राष्ट्रभाषा हिंदी को भी गौरवान्वित किया। अटल जी ने संसद में अपना प्रथम भाषण हिंदी में दिया। जिससे उनका राष्ट्रभाषा प्रेम स्वतः ही उजागर हो जाता है।
तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष अनन्त शयनम आयंगर ने कहा था कि, “अटल जी हिंदी के सर्वश्रेष्ठ वक्ता हैं। वे बहुत कम बोलते हैं परन्तु जो बोलते हैं वह ह्रदयस्पर्शी होता है। अन्तर को छूने वाला होता है।“
बहुत कम लोग हुए हैं भारतीय राजनीति में जिन्हें जनसभा हो या लोकसभा हर कहीं पिनड्राप साइलेंस यानी नि:शब्द हो कर सुना जाए, अटल बिहारी वाजपेयी उन गिनती के लोगों में शुमार होते हैं। प्रधान मन्त्री के पद पर रहे हों या नेता प्रतिपक्ष; बेशक देश की बात हो या क्रान्तिकारियों की, या फिर उनकी अपनी ही कविताओं की; नपी-तुली और बेवाक टिप्पणी करने में अटल जी कभी नहीं चूके। देशहित में  विपक्ष द्वारा किये गये कार्यों की भी निश्छल भाव से तारीफ करते थे। उनकी दूरदृष्टि के सभी कायल हैं। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री जी द्वारा दिया नारा 'जय जवान, जय किसान' के आगे एक शब्द 'जय विज्ञान' और जोड़ कर राजनीतिक श्रेष्ठता का अद्वितीय उदाहरण दिया।'जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान' की भावना से ओतप्रोत अटल जी की दूरदर्शिता का ही परिणाम है, वैज्ञानिक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को भारत के राष्ट्रपति पद के सम्मान से सम्मानित करना।

अपने प्रधानमंत्री काल में दलगत राजनीति से परे, जिन विशिष्ठ नेताओं एवं सामाजिक कार्यकताओं से अटलजी की व्यक्तिगत घनिष्ठता रही उनमें नरसिंह राव, ज्योति बसु, सोमनाथ चटर्जी, इन्द्रकुमार गुजराल, करूणानिधि, शरद पवार के नाम प्रमुख हैं। नरसिंह राव उनके गुणों से सदैव प्रभावित थे, उन्होने 1993 के जनेवा में हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के बेहद महत्वपूर्ण सम्मेलन में उस समय के नेता विपक्ष अटलजी को भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेता नियुक्त कर भारतीय लोकतन्त्र में एक स्वस्थ परम्परा का आरम्भ किया था।

अटल जी के संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेकों आयामों को उनकी कविता में देखा जा सकता है।
इमरजेन्सी के दौरान तबियत खराब होनेपर बैंगलूर जेल से अटल जी को ऑलइण्डिया इंस्टीट्यूट में तीसरी या दूसरी मंजिल पर रखा गया था। जहाँ रोज सुबह रोने की आवाज उनको विचलित कर देती। अपनी उसी वेदना को कवि अटल जी ने इस तरह व्यक्त किया।

दूर कहिं कोई रोता है,
तन पर कपङा भटक रहा मन,
साथी है केवल सूनापन,
बिछुङ गया क्या स्वजन किसी का,
क्रंदन सदा करुण होता है।

इमरजेन्सी का जिक्र करते हुए कहते हैं कि उस वक्त स्वतंत्रता का अपहरण हुआ था। इमरजेन्सी के एक वर्ष बाद अपनी भावनाओं को निम्न शब्दों में अभिव्यक्त किये।

एक बरस बीत गया,
झुलसाता जेठ मास,
शरद चाँदनी उदास,
सिसकी भरते सावन का,
अंतर्घट रीत गया,
एक बरस बीत गया।


इमरजेन्सी के बाद जनता ने “जनता पार्टी” पर विश्वास किया था। जय प्रकाश जी के नेतृत्व में राजघाट पर शपथ ली गई थी कि सब मिलकर साथ चलेंगे और देशहित के लिये मिलकर कार्य करेंगे किन्तु वो शपथ पूरी न हो सकी “जनता पार्टी” टूट गई, अपनी इसी विरह वेदना को कवि अटल जी ने इस तरह अभिव्यक्त किया।

क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।
चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे।

जिंदगी के शोर और राजनीति की आपाधापी में शब्दों के रंगो से रंगी कवि अटल जी की कविताएं सभी संवेदनशील इंसानो की कविताएं हैं।


हार नहीं मानूंगा
रार नई ठानूंगा
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं.......

ये महज़ कविता की पंक्तियां नहीं बल्कि एक ऐसे जीवट आदमी की जीवन गाथा को व्यक्त करती है जिसने भारतीय राजनीति के फलक पर ऐसी इबारतें लिख दी जिसे भूलाया नही जा सकता। भारतीय राजनीति क्या, विश्व राजनीति में भी अगर कोई एक नाम बिना किसी विवाद के कभी लिया जाएगा तो वह नाम होगा अटल बिहारी वाजपेयी जी का। यह एक ऐसा नाम है जिस के पीछे काम तो कई जुड़े हुए हैं पर विवाद शून्य हैं।

 प्रखर राष्ट्रवादी भारतमाता के सपूत पं. अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म दिवस '25 दिसंबर' को भारतीय जनता पार्टी ने 'सुशासन दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।
अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे ही इकलौते विनम्र राजनीतिज्ञ हैं, क्योंकि उन के जीवन का मूल-मंत्र है:-

मेरे प्रभु !
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना
गैरों को गले न लगा सकूं
इतनी रुखाई
कभी मत देना।
"भारत को लेकर अटल जी का दृष्टिकोंण - ऐसा भारत जो भूख, भय, निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो।"

मित्रों, ऐसे ही खुशहाल भारत बनाने की शपथ लेकर,  अभिमान, स्वाभिमान और स्नेहशील “सत्यम्‌, शिवम्‌ और सुन्दरम्‌” के प्रतिरूप अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्मदिन पर उनका वंदन एवं अभिनंदन करते हैं तथा  ईश्वर से उनके शीघ्र स्वास्थ की प्रर्थना करते हैं।

जयहिंद




Thursday, 20 December 2012

जीवन अनमोल है


आज के वैश्वीकरण के युग में सबसे आगे बढने की होङ और अति व्यस्तता भरी जीवनशैली में अवसाद, अकेलापन, निराशा और कुंठा जैसी प्रवृतियाँ कुछ ज्यादा ही अपना वर्चस्व बढा रही है। ऐसी प्रवृतियाँ कहीं न कहीं आत्महत्या को बढावा देती हैं।
आजकल अखबारों या मीडीया के अन्य माध्यमों से कई ऐसी घटनाएं सुनाई देती हैं, जहाँ घर का मुखिया व्यपार या नौकरी में नुकसान से परेशान होकर स्वयं के साथ पूरे परिवार को भी इस अग्नी में जला देता है। जरा सी नाकामयाबी से युवा इस प्रवृत्ति के शिकार हो रहे हैं। इस वायरस से बच्चे भी ग्रसित हो रहे हैं।

मित्रों, आत्महत्या अर्थात जीवन से पलायन, जीवन जो सभी धर्मों के अनुसार ईश्वर की अनुपम देन है। उसे नष्ट करने की कोशिश रचयिता का अपमान है। इस दुनिया में हम अपनी मर्जी से नही आते तो इसे नष्ट करने का भी हक हमें नही है क्योंकि जीवन कोई वस्तु नही है।

एक सर्वे के अनुसार 1960 ई. से अबतक आत्महत्या का मामला 300% बढ चुका है। शोध दर्शाते हैं कि तनाव एवं अवसाद इसके प्रमुख कारण हैं। डिप्रेशन मनोवैज्ञानिक ‘ब्लैक होल ‘ कि तरह है, जिसमें इसका शिकार व्यक्ति अपनी खुशियां उड़ेलता जाता है, लेकिन बदले मे उदासी के सिवा कुछ नहीं मिलता और वह आत्महत्या जैसे कृत्य करता है।

दोस्तों, ये अवसाद, तनाव या कुंठा क्यों ? मनोवैज्ञानिकों के अध्यन द्वारा जो परिणाम आये हैं वो चौकाने वाले हैं। माता-पिता की बढती उम्मीदें और अपेक्षाएं, युवा में जल्दी-जल्दी सब कुछ पा लेने की चाह, माता-पिता का अति व्यस्त रहना जिससे सावेंगिक तारतम्य(Emotional Balancing) का अभाव जो बच्चों में अकेलेपन का बोध कराता है। आज आत्मविश्वास और सहनशीलता का भी अभाव ऐसे कृत्यों को बढावा दे रहा है। आजकल टेंशन ज्यादा है और-तो-और अब आठ साल का बच्चा भी कहता हैं की वह बहुत टेंशन में हैं। कहीं न कहीं छोटे परिवार भी इसके जिम्मेदार हैं।पहले संयुक्त परिवार होते थे, दादा-दादी, चाचा-चाची जैसे रिश्ते बच्चों की गलतियों को प्यार से समझाते थे, कहते थे कि गलती इंसान से ही होती है आगे से ध्यान रखना। ऐसी बातें सभी के लिये भी (moral support) भावनात्मक दवा का काम करती है। इस भावनात्मक सपोर्ट के अभाव में न जाने कितने किशोरों को आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर किया।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि, ऐसे ख्याल तब आते हैं जब दर्द हद से ज्यादा बढ जाता है। मित्रों, दुनिया के बड़े नेताओं में अब्राहम लिंकन जितना दुख शायद ही किसी ने झेला हो। बचपन में ही पहले भाई, फिर माँ का देहांत। चाची ने पाला। फिर वे भी महामारी की शिकार हो गयीं। बाद में बहन की मौत। खुद उनके चार बच्चों में केवल एक युवा हो पाया। इतनी मौत देखने के बाद किसी पर कैसा असर होगा, समझा जा सकता है।अनेक चुनावों में हार, व्यपार में नाकामयाबी जिससे वे उदास रहते थे। कई बार नदी के किनारे अकेले बैठे रहते। उन्होने कई कविताएं ऐसी लिखीं, जिसमें घोर उदासी दिखती है। ऐसी ही एक कविता को कई इतिहासकार सूसाइडल नोट करार देते हैं। कई बार उनके दोस्त रात में साथ सोते की कहीं वे आत्महत्या न कर लें। इतने दुखी लिंकन आखिर अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित राष्ट्रपति बने। पूरे अमेरिका को एक सूत्र में बांधा। गुलामों की मुक्ति के नायक बने और सबसे बढ़ कर दुनिया में जीने के अधिकार, स्वतंत्रता व भाईचारे के लिये कार्य किये। लिंकन ने अपने दुखों का मुकाबला सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए खुद को समर्पित करके किया। हमेशा काम की पूजा की। राष्ट्र की चुनौतियों के मुकाबले के लिए खुद को तैयार किया। कहते हैं, जब एक तरफ करोड़ों राष्ट्रवासियों के जीवन में खुशियां भरने का सवाल हो, तो अपना बड़ा–से–बड़ा दुख भी पंख के समान लगता है।
यदि आप युवा हैं और अपने दुखों से परेशान हैं, तो एक बार अपने समाज या राष्ट्र की चिंता करके देखें। आपका पहाड़–सा दुख क्षण भर में राई–सा हल्का लगने लगेगा।

कहते हैं कि, अगर जरूरतें आविष्कार की जननी हैं, तो तनाव को आप महान बनाने की भट्टी कह सकते हैं। मनुष्य व तनावों का संबंध पुराना हैं। कई बार लोगों के तानो से आत्महंता को ये लगता है कि, वो कुछ नही कर सकता, जीवन में कुछ नही बदलने वाला, मेरी किसी को जरूरत नही है, दुनिया बङी खराब है आदि। ऐसी बातें नकारत्मकता को बढावा देती हैं। ये बातें पूरे समाज को नुकसान पहुँचाती हैं। "पॉजिटिव एडिक्शन" के लेखक विलियम ग्लॉसर कहते हैं-“हमें हमेशा याद रखना चाहिये कि कभी भी दूसरे की पीडा खुद महसूस नही की जा सकती।” यदि किसी व्यक्ति में आत्महत्या का विचार आता है या वो ऐसा कृत्य करता है तो ये परिवार और समाज की असफलता को भी दर्शाता है।
दोस्तों पाँचो ऊँगली बराबर नहीं होती, कोई भी सर्वगुणं सम्पन्न नही होता। पिछली सदी के दो बड़े नाम पूछे जायें, तो सहज ही महात्मा गांधी व आइंस्टीन के नाम आयेंगे। दोनों ही शुरुआती पढ़ाई में औसत थे। आइंस्टीन को तो मंदबुद्धि बालक माना जाता था। स्कूल शिक्षक ने यहां तक कह दिया था कि यह लड़का जिंदगी में कुछ नहीं कर पायेगा। अगर वह निराश हो गये होते, तो क्या दुनियाँ आज यहां होती। उन्हें "फादर ऑफ मॉडर्न फ़िज़िक्स" कहा जाता है।

जिंदगी के किसी मोड़ पर असफलता मिलते ही आत्मघाती कदम उठाने वाले युवा, आइंस्टीन से सीख ले सकते हैं। युवाओ को सही दिशा देने में अभिभावकों और शिक्षकों की भी अहम भूमिका हैं। गार्डनर ने बताया कि, बुद्धिमता आठ तरह कि होती हैं। इसीलिए गणित या अँग्रेजी में फेल हों या आईआईटी की प्रवेश परीक्षा मे असफलता मिले, तो हार न मानें। असफलता तो सफलता की सीढ़ी है। आइंस्टीन ने भी यही माना और अपने परिवार, पड़ोसी व गुरुजी को गलत साबित कर दिया।
जो मानते हैं कि आप जिंदगी में कुछ नहीं कर सकते, उन्हे आप भी गलत साबित कर सकते है।

मनोवैज्ञानिक पॉल जी क्विनेट की किताब “सुसाइड: द फॉरएवर डिसीजन“ के अनुसार दुनिया में अधिकांश लोगों ने अपने जीवन में कम से कम एक बार आत्महत्या करने पर गंभीर विचार किया है। यानि मन में ऐसे विचार का आना साधारण सी बात है किन्तु ऐसे विचार को लोग किसी से कहते नही क्योंकि कई लोग उन्हे पागल, कायर या बुजदिल, एवं बुरा इंसान समझते हैं। जबकि ऐसे विचार पीङा और उससे लङने के साधन के बीच के असंतुलन का परिणाम है, जिसे आपसी बातचीत और भावात्मक सहयोग से रोका जा सकता है। अन्ना हजारे भी एकबार आत्महत्या के लिये रेलवे की पटरियों तक पहुंचे थे, लेकिन बुक स्टॉल पर पङी विवेकानंद की किताब ने उन्हे बचा लिया। आज वे देश को बदल रहे हैं।

गलत कदम उठानेवालों का नाम केवल थाने में दर्ज होता है। वहीं, हिम्मत से काम लेनेवालों का नाम किताबों में मॉडल बनता है। आप भी यदि तनाव में हैं, तो आत्मघाती कदम उठाने की बजाय दुनिया को बेहतर बनाने में हाँथ बंटाएँ। जिदंगी ब्लाइंड लेन नही है, बल्की खुला आसमान है, जहाँ आगे बढने के हजार रास्ते हैं।

दोस्तो, 15 सेकेंड की ताली आत्महत्या के विचार जैसे वायरस को दूर करने की सबसे अचूक एवं रामबांण दवा है। हमारे शरीर के सभी अंतरिक उत्सर्जन संस्थानो के प्वॉइंट हमारी हथेलियों में होते हैं और जब हम ताली बजाते हैं तो उन सभी उत्सर्जन अंगो को उत्तेजना मिलती है, जिससे इम्यून सिस्टम का सुचारू रूप से संचालन होता है और निराशा, कुंठा, अवसाद तथा तनाव के कारणो का कारगर इलाज होता है। ताली से हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढती है। "आयुष्यमान भवः न्यास एवं शोध संस्थान" के संस्थापक अरुण ऋषि देशभर में जन स्वास्थ के लिये ये अभियान चला रहे हैं। कुछ समय पूर्व ही जब मुंबई पुलिस के जवानों को डिप्रेशन से लङने का पाठ पढा रहे थे, तो समूचा परेड ग्राउंड तालियों से गूंज रहा था।
ताली वज्रासन में बैठकर या आसन पर खङे रहकर हांथो में तेल लगाकर ही बजाएं। आँखे बंद रखें, मुह से ऊँ का जाप करें। ताली की शुरुवात सबसे पहले प्रथमा उंगली से दूसरे हाँथ की हथेली के मध्य भाग पर चार बार चोट करें, फिर मध्यमा उँगली को भी साथ लेकर वही क्रिया दोहरायें, इसी क्रम में तीसरी एवं चौथी उँगली को भी साथ लेकर चार बार चोट करते हुए अंत में पाँचो उँगलियो से ताली जोर से एवं शिघ्रता पूर्वक बजाएं।
वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि ताली बजाने से हमारे शरीर का तापक्रम बढ जाता है और कोलस्ट्राल पिघलने लगता है। ताली के कंपन से रक्त धमनियों के सभी अवरोध समाप्त हो जाते हैं, जिसके कारण ह्रदय को आराम मिलता है और श्वेत रक्त कण (White Blood cell) के पर्याप्त मात्रा में होने से रक्त का प्रवाह पॉजिटिव डाइरेक्शन में प्रवाहित होता है। इससे डिप्रेशन को नियंत्रित करने में सफलता मिलती है।

मित्रों, जिंदगी है तभी तो सब कुछ है अन्यथा कुछ भी नहीं। जीवन ईश्वर का दिया हुआ अमूल्य तोहफा है, इसे हर दिन जी भर के जियें।
                                                  Life is a song – sing it.
                                          Life is a game – play it.
                                          Life is a challenge – meet it.
                                          Life is a dream– realize it
                                          Life is a sacrifice – offer it.
                                              Life is love – enjoy it.