Thursday, 23 May 2013

भविष्यफल का ताना बाना


कल क्या होगा इस बात को जानने के लिये लगभग हम सभी उत्सुक रहते हैं और भविष्य जानने के लिये ज्योतिष विद्या के लगभग सभी तरीके अपनाते हैं। व्यपार में सफलता मिलेगी या नहीं, किसकी सरकार बनेगी, परीक्षा का परिणाम कैसा होगा, नौकरी मिलेगी या नहीं, और तो और बच्चों के विवाह से संबन्धित जानकारियों को जानने की उत्सुकता स्वाभाविक है। आज भविष्य को जानने के कई तरीके हमारे आस पास विद्यमान हैं जैसे- टैरो कार्ड, अंक ज्योतिष, ग्रँफोलॉजी, और पुराने समय से चले आ रहे कुछ संसाधन जिसका ज्ञान अधिकतम लोगों को है, जैसे- कुण्डली, नाङी शास्त्र, हस्त ज्योतिषी इत्यादि। भविष्य के साथ आज लोगों के व्यक्तित्व की भी परख करने के कई तरीके आजमाए जाते हैं।

आज का युग कंप्युटर का युग है तो जाहिर सी बात है लोगों के व्यक्तित्व को जानने में कंप्युटर का भी अपना योगदान है। कंप्युटर-फोंट्स के आधार पर लोगों के व्यक्तित्व को समझने का प्रयास किया जा रहा है। डॉ. एरिक की किताब ‘द साइकोलॉजी ऑफ फोंट्स’ के अनुसार समझदार और अच्छी तरह सोच-विचार कर काम करने वाले लोग ‘कूरियर’ जबकि उत्तेजक और बिंदास किस्म के लोग ‘जॉर्जिया’ या ‘शैली’ जैसे घुमावदार फोंट काम में लेना पसंद करते हैं। टाइम्स न्यू रोमन जैसे फोंट समझौतावादी प्रकृति को दर्शाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसी परंपरागत कंपनी में नौकरी के लिये आवेदन करें तो सी.वी. बनाते समय ‘टाइम्स फोंट’ का इस्तेमाल करें यदि कंपनी आधुनिक है तो ‘वर्दाना’ फोंट्स का इस्तेमाल करें। नौकरी छोङते समय ‘कूरियर न्यू' का इस्तेमाल करें। अध्ययन के अनुसार पुरूषों को आयताकार जबकि महिलाओं को गोल और घुमावदार फोंट पसंद आते हैं।

पिछले कुछ वर्षों से ग्राफोलॉजी भी व्यक्तित्व- परीक्षण की एक लोक प्रिय प्रणाली बन गई है। केवल इंग्लैण्ड में ही लगभग 3,000 बङी कंपनियां इस विधा को भर्ती-प्रक्रिया में इस्तेमाल कर रहीं हैं। लिखावट के माध्यम से किसी के व्यक्तित्व के बारे व्याख्या करने की यह पद्धति ग्राफोलॉजी (लीपि विज्ञान) कहलाती है। आजकल, न केवल चयन प्रक्रिया में बल्कि मनोवैज्ञानिक विश्लेषण सहित बहुत से दूसरे क्षेत्रों में भी ग्राफोलॉजी का प्रयोग किया जा रहा है। इसके द्वारा किसी व्यक्ति के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की जाती है। वैवाहिक संबधों में भी दो लोग एक दूसरे के लिए उपयुक्त हैं या नहीं, ये तय करने के लिये ग्राफोलॉजिस्ट की मदद ली जा रही है।

एक और रोचक प्रणाली भविष्य को एवं व्यक्तित्व को बताने में कामयाब हो रही है, वो है कॉफी कप रीडिंग। दानेदार कॉफी पीने के बाद कप में जो आकृतियां बनती हैं उसी से आने वाले कल के बारे में बताया जाता है। कॉफी कप रीडिंग से भविष्य बताने का चलन लगभग 1400 साल पुराना है। यह सिलसिला चीन से शुरू हुआ था, उसके बाद  अरब देशों में कॉफी कप रीडिंग की शुरूवात टर्की से हुई थी। इंग्लैण्ड में भी इसका चलन ज्यादा रहा किन्तु भारत में यह बिलकुल नई तकनीक है। कॉफी कप रीडिंग के लिये घरों में मिलने वाली सामान्य कॉफी का इस्तेमाल नहीं होता इसके लिये दाने दार कॉफी की जरूरत होती है और जो कप इस्तेमाल किये जाते हैं वो यू शेप में चौङे फैले हुए होते हैं। इसमें दूध का भी प्रयोग नहीं होता। कैरियर, शिक्षा, सेहत, रिश्तों की समस्या, पैसा आदि यानि जिसकी जो समस्या हो वह बताई जा सकती है।
    
भविष्य बताने वाली विधाओं में टैरो कार्ड इन दिनों बहुत तेजी से लोगों को आकर्षित कर रहा है। पिछले दस वर्षों में टैरो कार्ड पढने वालों की संख्या पचास गुणा बढी है। ‘मिस्टिक इंडिया’ नामक संगठन के अनुसार अकेले दिल्ली में लगभग 1200 कार्ड रीडर हैं। टैरो कार्ड मामूली पत्ते नहीं होते। उन्हे एक खास आध्यात्मिक भाव के साथ भविष्यवाणी के लिये इस्तेमाल किया जाता है।

बहरहाल, भले ही ये तरीके भविष्य एवं व्यक्तित्व की जानकारी देने का दावा करते हों किन्तु ये कहना गलत न होगा कि कोई भी तर्क पूर्णतः सत्यता को प्रमाणित नहीं करते। कुछ अपवाद भी हैं। हिरोशिमा की घटना हो या भोपाल गैस त्रासदी जिसमें हजारों लोग मृत्यु के आगोश में आ गये। ये सोचने वाली बात है कि, इन हजारों लोगों को, जिनको मौत निगल गई, ज्योतिषियों ने कुंडली अथवा हाँथ देखकर कभी नहीं बताया होगा कि आप सब फलां दिन एक साथ मर जाओगे; उनको सावधान भी न किया होगा कि इस क्षेत्र को छोङ कर आप सभी कहीं और चले जाएं। मौत की सूचना मिल भी जाए तो मौत के साथ कुछ किया नहीं जा सकता। जीवन कहीं भी वाष्पीभूत हो सकता है। अतः जीवन तथा प्रकृति के नियम को भी समझना चाहिए, जिन्हे मनुष्य बदल नहीं सकता

आज तक ज्यादातर भविष्यवाणियां सही नहीं निकलती फिर भी हम सभी मानव के मन में भविष्य जानने की उत्सुकता हमेशा नित नये तरीकों को आजमाती रहती है। सब कुछ जानते समझते हुए भी आज सब कुछ जल्दि जानने की प्रवृत्ति के कारण ही भविष्य बताने वालों का व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है।

मित्रों, भविष्य जानने की कोशिश गलत नही है किन्तु भविष्य को जान कर केवल भाग्य भरोसे जीवन गुजारना एक गलत मानसिकता है। अतः कर्म पर अधिक विश्वास करना चाहिये क्योंकि भाग्य भरोसे हाँथ पर हाँथ रखकर बैठे रहना और असफलता पर भाग्य या किस्मत को कोसना गलत है।

Tuesday, 14 May 2013

मुगल गार्डेन और डॉ.ए.पी.जे अब्दुल कलाम



जीवन में बङे सपने देखने और उसे पूरा करने में विश्वास रखने वाले महान वैज्ञानिक, देश-विदेश के लाखों युवाओं के आदर्श डॉ.ए.पी.जे अब्दुल कलाम साहब अपने मजबूत हौसलों के साथ 2002में राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए। अपने कार्यकाल के दौरान आपने राष्ट्रपति भवन में स्थित मुगल गार्डेन को नये आयामों से सुशोभित किये।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब का मुगल गार्डन से लगाव राष्ट्रपति बनने के पहले से था। वर्ष 1997 में जब आपको भारतरत्न से सम्मानित किया गया था, तब तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर.नारायणन की पुत्री चित्रा नारायणन के साथ मुगल गार्डन घूमने का अवसर प्राप्त हुआ। उद्यान की अप्रतिम सुन्दरता को देखकर कलाम साहब को बहुत खुशी हुई और उद्यान को चाँदनी रात में देखने की इच्छा जाहिर किये। ये इच्छा राष्ट्रपति के.आर.नारायणन को एवं उनकी पत्नी को पता चली, उसके बाद जब भी कलाम साहब विभागीय काम से दिल्ली आते, तो राष्ट्रपति के आग्रह पर राष्ट्रपति भवन में ही ठहरते थे।

कलाम साहब के अनुसार- तब मुझे पता न था कि राष्ट्रपति भवन में मुझे पूर्णमासी की साठ रातें देखने का अवसर मिलेगा। जिन दिनों मैं वहाँ था, मुगल गार्डन मेरे लिये एक बङा प्रयोग स्थल बन गया था। वह एक बङा संवाद मंच था जिस से मैने प्रकृति के और अपने देश वासीयों के साथ मन की बातें की, जहाँ मैने विविध क्षेत्रों से आये लोगों से विचार-विमर्श किया। बाग के अनेक पशु-पक्षी मेरे अंतरंग हो गये थे। बगीचे का सुव्यवस्थित परिवेश और पेङ-पौधे मुझे शान्ति प्रदान करते थे। कलाम साहब के कार्य-काल में 2007 में सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ घूमते हुए पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शौकत अजीज ने कहा था कि अगर मुगल गार्डन में द्विपक्षिय मिटिंग हो जाये तो, दोनो देशों के भेद-भाव छू मंतर हो जायेंगे।

डॉ. कलाम साहब ने बगीचे में दो झोपङियां बनवाईं थीं। दोनो प्राकृतिक पदार्थों से बनी है। एक का नाम थिंकिग हट तथा दूसरी का नाम इम्मोरटल हट है। थिंकिग हट का डिजाइन त्रिपुरा के कारिगर द्वारा किया गया है। आपकी पुस्तक इनडोमिटेबल स्पिरिट का बहुत बङा हिस्सा इसी हट में लिखा गया है। दूसरी हट, इम्मोरटल हट यानि, अमर स्थलि। डॉ.कलाम साहब की पुस्तक गाइडिंग सोल, जो जीवन के लक्ष्य की खोज पर आधारित है, उसका उद्भव इसी हट में हुआ था। राष्ट्रहित से जुङे कई विचार-विमर्श डॉ.कलाम साहब अपने मित्रों के साथ इन्ही हटों में किया करते थे। अनेक कविताओं का उद्भव भी यहाँ हुआ था।
डॉ.कलाम साहब की सामाजिक चेतना एवं प्राकृतिक प्रेम की वजह से मुगल गार्डन में कई नये सुधार भी किये गये थे। स्पर्शनीय पौधों के बगीचे की नींव सामाजिक जागरुकता का स्पष्ट उदाहरण है। भारत में एवं विश्व में इस तरह के बगीचे बहुत कम है। लखनऊ में सी.एस.आई.आर नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीटयूट में स्पर्शनीय उद्यान है। राष्ट्रपति कलाम साहब के प्रयासों का ही परिणाम है कि 2004 राष्ट्रपति भवन में स्पर्शनीय बगीचा लगाया गया। फल, फूल, औषधी तथा मसालों के पौधों की क्यारियों पर सूचना पट्टिका के जरिये संबधित पौधे के बारे में हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषाओं और ब्रेल लिपि में लिखा है। प्रतिवर्ष जब भी ये बगीचा दृष्टीबाधितों के लिये खोला जाता कलाम साहब उनके साथ जाते थे। दृष्टीबाधितों की खुशी देखकर कलाम साहब बहुत खुश होते थे। 2006 में मुगल गार्डन में संगीतमय फव्वारा लगाया गया था।
जब अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लयु बुश अपनी पत्नि और शिष्य मंडल के साथ भारत आये थे, तब उनके सम्मान में मुगल गार्डन में प्रतिभोज आयोजित किया गया था। इस प्रतिभोज में बहुत से कलाकार एवं बुद्धी जीवी और अतिविशिष्ठ व्यक्ति भी आमंत्रित थे। जॉर्ज दम्पत्ति इस अद्भुत आयोजन से अत्यधिक प्रभावित हुए थे। डॉ. कलाम साहब के अनुसार पूर्णिमा की एक रात को जब पंडित शिवकुमार शर्मा ने 500 लोगों के सम्मुख संतूर-वादन किये तो यह संगीतमय बगीचे का स्वर्णिम क्षंण था।

बायो डायवर्सिटी पार्क का आगाज भी डॉ. कलाम साहब के कार्यकाल में ही हुआ था। जिसमें बहुत से पक्षियों और पशुओं की प्रजातियाँ लाई गई थी। मछलियों के लिये तालाब, खरगोश के खोह, बत्तखों के घर और पक्षियों के ठिकाने से ये पार्क प्रकृति प्रेम का अद्भुत स्थल बन गया है। एक बार डॉ. कलाम साहब अपने मित्र डॉ. सुधीर के साथ टहलने निकले तभी एक नन्ही हिरनी रास्ते में दिखी जिसे उसकी माँ ने त्याग दिया था। वो ठीक से चल भी नही पा रही थी क्योंकि उसकी दो टाँगे जन्म से ही चोटिल थी। डॉ. सुधीर के इलाज से वो कुछ दिनों बाद ठीक हो गई और कुछ हफ्तों बाद हिरनों के झुण्ड ने उसे अपना लिया। डॉ. कलाम साहब के अनुसार, मैं इस घटना से बहुत अभिभूत हुआ था। राष्ट्रपति भवन में मुगल गार्डन और परिसर के अन्य बगीचों ने जो आनंद की अनुभूति मुझे दी, उसके प्रति बहुत भावुक हूँ। मैं इस बात के लिये सर्वशक्तिमान का शुक्रिया अदा करता हुँ, जिसने मुझे कुदरत का यह सुख लेने का मौका दिया।

देश-विदेश के लाखों युवाओं के आदर्श और प्रेरणास्रोत डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम सबसे अधिक लोकप्रिय राष्ट्रपति एवं वैज्ञानिक हैं। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के अनमोल संदेश के साथ कलम को विराम देते हैं।
  
"अपने मिशन में कामयाब होने के लिए , आपको अपने लक्ष्य के प्रति एकचित्त निष्ठावान होना पड़ेगा."


नोट  (प्रस्तुत जानकारी टर्निंग प्वांइट पुस्तक पर आधारित है, यदि कोई भूल हुई हो तो क्षमाप्रार्थी है.)


Wednesday, 8 May 2013

Special Mother: पन्ना धाय



भारत का इतिहास त्याग और बलिदान के गौरव को समाहित किये हुए है। इसका हर पन्ना बलिदान की गौरवगाथा को सुनाता है। इतिहास का ऐसा ही एक पन्ना, पन्ना धाय के बलिदान एवं स्वामीभक्ति की अनूठी मिशाल को परिलाक्षित करते हुए स्वर्णअक्षरों से लिखा गया। माँ का ये रूप राजस्थान के लिये ही नही वरन पूरे भारत वर्ष के लिये गौरव का प्रतीक है।

स्वामिभक्त वीरांगना पन्ना धन्य हैं! जिसने अपने कर्तव्य-पूर्ति में अपनी आँखों के तारे पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ राजवंश को बचाया। मेवाड़ के इतिहास में जिस गौरव के साथ महाराणा प्रताप को याद किया जाता है, उसी गौरव के साथ पन्ना धाय का नाम भी लिया जाता है, जिसने स्वामीभक्ति को सर्वोपरि मानते हुए अपने पुत्र चन्दन का बलिदान दे दिया था। पन्ना धाय राणा साँगा के पुत्र राणा उदयसिंह की धाय माँ थीं। पन्ना धाय किसी राजपरिवार की सदस्य नहीं थीं। अपना सर्वस्व स्वामी को अर्पण करने वाली वीरांगना पन्ना धाय का जन्म कमेरी गावँ में हुआ था। राणा साँगा के पुत्र उदयसिंह को माँ के स्थान पर दूध पिलाने के कारण पन्ना 'धाय माँ'  कहलाई थी। पन्ना का पुत्र चन्दन और राजकुमार उदयसिंह साथ-साथ बड़े हुए थे। उदयसिंह को पन्ना ने अपने पुत्र के समान पाला था। उदयसिहं की माँ स्वर्ग सिधारते समय पन्नाधाय को बालक की परवरिश करने का दायित्व दे गईं थीं। पन्ना ने पूरी लगन से बालक की परवरिश और सुरक्षा की।

सन् 1535 मे चितौड़ का असली उत्तराधिकारी , विक्रमादित्य का अनुज उदय सिंह, जब मात्र छ: वर्ष का था| दासी पुत्र बनबीर ने चितौड़ की राजगद्दी हथिया लेने की मंशा से विक्रमादित्य की हत्या कर , लक्ष्य के एक मात्र अवरोध चितौड़ के वंशानुगत उत्तराधिकारी बालक उदय को भी रास्ते से हटाने के लिये उसके कक्ष की ओर बढा किन्तु पन्ना धाय को उसके अमानवीय इरादों का आभास हो गया था। उसने तुरंत शिशु उदय सिंह को टोकरी में सुला पत्तियों से ढक कर एक सेवक को उसे सुरक्षित निकालने का दायित्व सोंपा | फिर खाट पर उदय सिंह की जगह अपने पुत्र चंदन को लिटा दिया | सत्ता के मद में चूर क्रुद्ध बनबीर ने वहां पहुँचते ही तलवार घोंप कर पन्ना के बालक को उदय समझ मार डाला | बलबीर को कुछ पता चलता उसके पहले ही शिशु का अंतिम संस्कार कर दिया गया। स्वामिभक्त वीरांगना पन्ना धन्य हैं! जिसने अपने कर्तव्य-पूर्ति में अपनी आँखों के तारे पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ राजवंश को बचाया।

त्याग की अद्भुत मिशाल पन्ना धाय माँ को कभी भुलाया नही जा सकता। उनका नाम सदैव अमर है। ऐसी विरांगना को मातृदिवस पर शत्-शत् नमन।

Thursday, 2 May 2013

एकतरफा विनिमय प्रणाली


कल  की बात है पोस्ट ऑफिस में रजिस्ट्री करने गये थे। एक रजिस्ट्री का चार्ज 39 रूपये था। पोस्ट ऑफिस वाले ने मुझे एक रूपये वापस करने की बजाय एक रूपये का टिकट दे दिया। जरा सोचिये! आज के E-Mail & SMS  के जमाने में कौन पत्र लिखता है, जिसे इस टिकिट की जरूरत पङेगी? फिर भी पूँजीवाद के और वैश्वीकरण के इस युग में प्रत्येक उत्पादक का पहला उद्देश्य होता है, अपने लाभ को बढाना। अपने उद्देश्य की पूर्ती के लिये आज उत्पादक या दूकानदार नित नये तरीकों से शोषण कर रहा है।  चाहे वो सरकारी महकमा हो या दवा की दुकान हो या किराने की दुकान हर जगह चिल्लर की कमी की दुहाई देकर फुटकर पैसे की जगह टॉफी पकङा देते हैं। बाजारवाद की ये प्रणाली एकदम अलग है क्योंकि ये सिर्फ एकतरफा है। आलम ये है कि जब हम दुकानदार से 96 रूपये की कोई चीज लेते हैं तो जाहिर सी बात है उसे 100 का नोट देते हैं किन्तु वो चार रूपये वापस करने की वजाय हमें चार रूपये कि चार टॉफियाँ दे देता है। वहीं यदि हम 104 का कोई सामान लेते हैं तो हम उसे चार रूपये की बजाय चार टॉफियाँ दें तो वह नही लेता। ऐसा क्यों ?

इतिहास पर यदि एक नजर देखें तो, जब किसी एक वस्तु या सेवा के बदले दूसरी बस्तु या सेवा का लेन-देन होता है तो इसे वस्तु विनिमय (Bartering) कहते हैं। जैसे एक गाय लेकर 10 बकरियाँ देना या अनाज के बदले अनाज इत्यादि। इस पद्धति में विनिमय की सार्वजनिक इकाई (अर्थात मुद्रा, रूपये-पैसे) का इस्तेमाल नही किया जाता था। मुद्रा के प्रादुर्भाव के पहले सारा लेन-देन (विनिमय) वस्तु-विनिमय के रूप में ही होता था। जाहिर सी बात है इस तरह की प्रणाली में वस्तु का सही निर्धारण नही होता था। तब मुद्रा प्रणाली का विकास हुआ। किन्तु आज जो बाजार की व्यवस्था है, वो तो सिर्फ शोषण की प्रणाली है।


One Way  विनिमय प्रणाली को प्रचार के नये तरीकों से मीडीया भी बढावा दे रहा है। हाल ही में एक प्रचार में एक लङका टैक्सी ड्राइवर से किराये से वापस बचे पुरे छुट्टे पैसे माँगता है, लेकिन ड्राइवर एक रूपये वापस करने के बजाय उसे एक विडियो दिखाता है और बोलता है कि देख लो पूरा तुम्हारा एक रूपये वसूल हो जायेगा। जिस कंपनी का प्रचार है उसका मकसद है ये बताना कि एक रूपये में पूरा विडियो देखा जा सकता है किन्तु अनजाने में ही सही, ये प्रचार आज की वस्तु विनिमय प्रणाली को बढावा ही दे रहा है। अलग-अलग जगह पर ये एकतरफा विनिमय प्रणाली अपना माया जाल फैलाए हुई है। बुक फेयर में छुट्टे की जगह स्टीकर दे देते हैं। ये गौर करने वाली बात है क्या वास्तव में सरकार फुटकर पैसों की सप्लाई नही कर पा रही है? या इस अंधी लूट को बढावा देना उसकी साजिश का हिस्सा है। जरा सोचीये !


Friday, 26 April 2013

Life & Puzzles


आज हम सभी के जीवन की रफ्तार बहुत तेजी से भाग रही है। लाइफ में कई उलझनों का ताना-बाना भी साथ-साथ चलता है जिससे हम सभी थोङा परेशान भी हो जाते हैं। दिन की शुरुआत के साथ ही हमें चुनौतियाँ मिलनी शुरु हो जाती हैं और एक साथ कई विचार दिमाग को जाम कर देते हैं। परिणामस्वरूप हमारा दिमाग ऊबने लगता है। परन्तु आगे बढने की प्रक्रिया में उलझनों से निजात पाने के लिये नित नये तरीकों को भी आजमाते हैं। ऐसे में हम खोजते हैं नए-नए खेल, जिज्ञासाओं को शान्त करने वाली पहेलियाँ।

मनोवैज्ञानिक सत्य है कि, पहेलियां अपने अंदर रहस्य समेटे रहती हैं, जो परेशानियों से दूर दूसरी दुनिया में ले जाती हैं। तर्क, बुद्धि, किस्मत, हांथो या पेंसिल की बदौलत एक ऐसी दुनिया में पँहुच जाते हैं, जहाँ हमारा सामना उन उलझनों से होता है, जो वास्तविकता में उलझनें न होकर हमारी समस्याओं का समाधान होती हैं। माइक्रोसाफ्ट के मालिक बिल गेट्स और उनकी पत्नी मेलिंडा  जब बिजनस के काम से थक जाते हैं या ऊब जाते हैं तो जिग्सा पजल को सुलझाने बैठ जाते हैं और एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं कि कौन पहले उलझन को सुलझा लेगा। कई सेलिब्रिटी अपने मुश्किल से मिले समय को जिग्साँ पजल, क्रॉसवर्ड या सुडोकू पर खर्च करते हैं।

अपनी तीव्रबुद्धि के लिये पहचाने जाने वाले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिटंन का कहना है कि, व्हाइट हाउस में काम के बोझ के बाद जैसे ही उन्हे अखबार पढने का समय मिलता था, वे सबसे पहले क्रॉसवर्ड देखते थे और उसे हल करने की कोशिश करने लगते थे। उनका कहना है कि क्रॉसवर्ड की उलझने मुझे तनाव से मुक्त करने के साथ ही तनाव को झेलने की शक्ति भी देती हैं। वैज्ञानिक मत है कि क्रॉसवर्ड को सुलझाने पर व्यक्ति तरोताजा होकर आगे के काम करने के लिये नई ऊर्जा महसूस करता है।

पहेलियाँ दिमाग की आवश्यकता है। समय और मस्तिष्क की क्षमताओं के साथ पहेलियां जीवन को बदलने की क्षमता भी रखती हैं। दुखों में एक अच्छे साथी की तरह पहेलियों की उलझने हमें परेशानियों से उबरने में मदद करती हैं। वे हमारा ध्यान परेशानियों से हटाकर कहीं और मोङ देती हैं। कई बार हमारी मुश्किलों का समाधान इन पहेलियों को हल करने में मिल जाता है। ऐसी मानवीय तरकीब के कारण व्यक्ति स्फूर्तीदायक विचारों के साथ पुनः अपनी दुनिया की उलझनों को सुलझाने में लग जाता है। 

Wednesday, 24 April 2013

पवन पुत्र वीर हनुमान




भगवान शिवजी का 11वां रुद्र अवतार, सबसे बलवान और बुद्धिमान, जिसके गुरु स्वयं सूर्य, ऐसे परम पूज्य अवतार हनुमान जी को  गोस्वामी तुलसीदास जी ने  ‘अघटित घटन-सुघटन विघटन’ कह कर उनकी शक्ति का उल्लेख किया है। हनुमान जी का सम्पूर्ण जीवन भक्त का जीवन है। व्यक्तिगत सुख-दुख से परे एक निष्काम साधक के रूप मे सदैव भगवान राम के चरणों में अनन्य भक्ति में लीन कर्तव्यनिष्ठ बजरंगबली अनेक नामों से पूजे जाते हैं, जैसे- मारुति , अंजनि सुत , पवनपुत्र , संकटमोचन , केसरीनन्दन , महावीर , कपीश , बालाजी महाराज आदि।

पिता पवन और माता अंजनी के पुत्र हनुमान जी को सभी देवताओं की शक्ति प्राप्त है। इन्द्र के वज्र से हनुमान जी की ठुड्डी (संस्कृत मे हनु) टूट गई थी| इसलिये उनको हनुमान कहा जाता है। परंतु ‘पद्मपुराण’ में हनुमान नाम के विषय में विचित्र कल्पना मिलती है- ‘हनुसह’ नामक नगर में बालक ने जन्म-संस्कार प्राप्त किया, इसीलिए वह ‘हनुमान’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। श्री हनुमान जी स्वयं तो बलवान हैं ही, दूसरों को बल प्रदान करने में भी समर्थ हैं। बजरंगबली प्रत्येक क्रिया में मन की गति से अग्रसर होते हैं, उनकी तीव्रगामिता केवल परहित-साधन अथवा स्वामी-हित-साधन तक ही सीमित है। वे मन के अधीन होकर ऐसा कोई कार्य नहीं करते जो उनकी महत्ता को धुमिल करे, इसीलिए उनको जितेन्द्रियम् भी कहा गया है।

रघुतिप्रियभक्तम् अर्थात् भगवान श्री राम के प्रिय भक्त। वातजातम् अर्थात वायुपुत्र हनुमान बाल-ब्रह्मचारी थे। लेकिन मकरध्वज को उनका पुत्र कहा जाता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, लंका जलाते समय आग की तपिश के कारण हनुमानजी को बहुत पसीना आ रहा था। इसलिए लंका दहन के बाद जब उन्होंने अपनी पूँछ में लगी आग को बुझाने के लिए समुद्र में छलाँग लगाई तो उनके शरीर से पसीने की एक बड़ी-सी बूँद समुद्र में गिर पड़ी। उस समय एक बड़ी मछली ने भोजन समझ वह बूँद निगल ली। उसके उदर में जाकर वह बूँद एक शरीर में बदल गई। एक दिन पाताल के असुरराज अहिरावण के सेवकों ने उस मछली को पकड़ लिया। जब वे उसका पेट चीर रहे थे,  तो उसमें से वानर की आकृति का एक मनुष्य निकला। वे उसे अहिरावण के पास ले गए। अहिरावण ने उसे पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया। यही वानर हनुमान पुत्र ‘मकरध्वज’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

राम भक्त हनुमान जी को सदैव सिन्दूर का चोला चढता है। ऐसा क्यों होता है? इसकी बहुत ही रोचक कथा है। एक बार की बात है, जब माता सीता श्रृंगार करके अपनी माँग में सिन्दूर को सुशोभित कर रह थीं तभी हनुमान जी ने माता से निवेदन किया कि हे माता आप अपनी माँग में सिन्दूर क्यों भरती हैं? तब माँ सीता ने हनुमान जी को बताया कि तुम्हारे आराध्यदेव भगवान श्री राम की लंबी आयु और स्वास्थ कामना के लिये माँग में सिन्दूर भरती हूँ। राम भक्त हनुमान जी को लगा की जब माँ अपनी मांग में थोङा सा सिंदूर भरती हैं तो उससे आराध्यदेव दीर्घायु होते हैं, तब हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर मलकर मां से कहा कि मेरे सिंदूर लगाने से भी मेरे आराध्यदेव की आयु लंबी होगी। तब माता सीता ने हनुमान जी की प्रभु भक्ति देख प्रसन्न होते हुए आर्शीवाद दिया कि जो भी मनुष्य हनुमान जी को सिदूंर चढाएगा उसकी हर मनो कामना पूर्ण होगी। माना जाता है कि आदि-अनादिकाल से भक्तगणं आज भी इस प्रथा का पूरी निष्ठा से पालन करते हैं। रामायण के अनुसार हनुमान जी जानकी माता के अत्यधिक प्रिय हैं। इस धरा पर सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है उनमें बजरंगबली भी हैं।

संकट मोचन पवनपुत्र हनुमान जी में भक्तो की असीम आस्था है। मंदसौर शहर के बीच स्थित तलाई वाले बालाजी जी को चोला चढाने के लिये सालों इंतजार करना पङता है। वाराणसी का संकट मोचन मंदिर देश के प्रसिद्ध प्राचीन मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में आस्था रखने वाले भक्तों की संख्या लाखों में है। भक्त इस मंदिर को दुःखहर्ता मंदिर भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि तुलसीदास जी ने इस मंदिर की स्थापना करवाई थी और वे रोज यहाँ पूजा करने आते थे। सभी के संकट को हरने वाले अंजनीपुत्र हनुमान जी की पूजा देश के सभी आंचलों में भक्तगंण पूरी आस्था से करते हैं।
हनुमान ज्यन्ति के इस पावन पर्व पर सभी भक्तों की मनोकामना पूर्ण हो एवं सभी पर संकटमोचन बजरंगबली की असीम कृपा बनी रहे यही कामना करते हैं।





Thursday, 18 April 2013

डर



मार्च का महिना जैसे ही शुरु होता है कई विद्यार्थियों के मन में एक अन्जाना डर दिखने लगता है। ये आलम मई, जून तक रहता है। ये एक प्रकार का फोबिया है जिसे एक्जामिनेशन फोबिया कहते हैं। फोबिया या भय एक तरह का आंतरिक डर होता है। डर दिमाग की उपज है, लेकिन उसका असर मन और शरीर दोनो पर पङता है। हम सभी डर का अदुभव करते हैं, बल्कि साक्ष्य ये बताते हैं कि हम सभी कभी न कभी डर से जरूर डरे हैं।
डर जीवन का एक हिस्सा है जो कई बार हमें आगे बढने में भी मदद करता है। खुद को आग से बचाना या ड्राइवर के हार्न देने पर रास्ते से हट जाना ये भी एक प्रकार का डर ही तो है जो सकारात्मक पहलु को दिखाता है। यदि बच्चे में डर न हो तो उसके अस्तित्व को खतरा बना रहता है। यही डर हमारे लिये एक जीवन सुरक्षात्मक उपाय है।

डर एक मानवीय प्राकृतिक संवेदना है, जिससे हर कोई गुजरता है, चाहे वो मशहूर हस्ती ही क्यों न हो। अंतर यही है कि कुछ लोग इसे मान लेते हैं या कुछ इसे अंदर रख कर मुकाबला करते हैं। एक्शन हीरो जैकी चान खतरनाक स्टंट के लिये पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। अनेक मंजिलों से कूद जाना जैकी के बाँए हाँथ का खेल है लेकिन इंजेक्शन के ख्याल से ही उनको पसीना आ जाता है। उन्हे इंजेक्शन फोबिया बचपन से है। हैरी पॉटर की लेखिका जे.के. रोलिंग ने अपनी पुस्तक में तिलिस्म की दुनिया का बहुत संजीदगी से वर्णन किया लेकिन स्वयं मकङियों से डरती हैं। प्रोफेसर जीन के अनुसार फोबिया किसी को भी हो सकता है। इस बात से फर्क नही पङता कि आप कितने साहसिक हैं, बुद्धीमान हैं और तर्कशक्तियुक्त हैं। एडोल्फ हिटलर से लेकर मार्क ट्वेन तक हर किसी को फोबिया के कहर ने अपना शिकार बनाया है।

आयरिश कवि, कहानीकार,नाटककार, ब्रेडन फ्रांसिस ने कहा है, हमारे ज्यादातर डर टिश्यु पेपर जितने पतले होते हैं और साहस से उठाया कदम हमें उससे बाहर निकाल लाता है। एक फिल्मी डॉयलॉग बहुत चलन में है कि जो डर गया वो मर गया। डर पूरी तरह असंभावित है। कुछ भी कभी भी डरा सकता है। किसी को फूलों का (एंथोफोबिया) तो किसी को पानी का (एक्वाफोबिया) डर होता है। कुछ लोगों को ऊँचाई से (एक्रोफोबिया) डर लगता है तो किसी को 13 अंक (ट्रिसकैडेकाफोबिया) डराता है। एक शोध के अनुसार 18-30 वर्ष के लोगों में ऊँचाई या उङान के डर की तुलना में मकङी, सुई या क्लाउन का डर पाया गया।

फोबिया को जीतने का सबसे सरल तरीका है उसे समझकर उसका सामना किया जाये। नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के बारे में बैठकर सोचने और चिन्ता करने की अपेक्षा डर को दूर करने का प्रयास करें क्योंकि जिंदगी बहुत छोटी है, इसलिये जोखिम उठायें, बढें और सीखें क्योंकि डर के आगे जीत है।
So Friends,  डर को खत्म करने का सिर्फ और सिर्फ एक ही तरीका है, कि हम निडर हो कर उसका सामना करें।  

Friday, 12 April 2013

उपवास



भारतवासियों में उपवास करने की प्रथा बहुत ही पुरानी और महत्वपूर्ण हैं। धार्मिक दृष्टी से अगर हम देखें तो, उपवास दो शब्दों उप + वास से मिलकर बना है जिसका अर्थ है, निकट निवास करना अर्थात उपवास के माध्यम से ईश्वर से निकटता बढ जाती है। हम सब धर्म की चर्चा करते हैं एवं कुछ सकारात्मक सोचते हैं जो हम सभी के बेहतर जीवन के लिये उपयोगी है।

आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ चरक संहिता से लेकर आज के विभिन्न चिकित्सीय शोधों ने उपवास को लाभकारी बताया है। उपवास का तातपर्य है कि शरीर के पाचनतंत्र को आराम देना। कुदरत की माँग भी है कि कुछ समय पेट को आराम दिया जाये ताकि स्वस्थ जीवन बिताया जा सके। उपवास का मतलब भूखा मरने से नही है न ही इसके नाम पर फरियाली पकवान खाना...! जैसे- खिचड़ी, चिप्स, फरियाली मिक्चर, साबूदाना बड़े, मूँगफली के नमकीन दाने आदि दिन भर खाते रहने से लाभ के बजाय हानि ही होती है। वहीं यदि उपवास सही तरीके से किया जाए तो शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुँचता। हमारे शरीर में कई तरह के विषाक्त एकत्र हो जाते हैं उनको शरीर से निकालना भी उपवास है।
उपवास के समय अधिक मात्रा में जल का सेवन करना चाहिए। अधिक कमजोरी होने पर नींबू-पानी ले सकते हैं। इससे आँतों की सफाई अच्छी तरह से हो जाती है। उपवास वाले दिन सुबह एवं शाम पैदल घूमना चाहिए।
आज कई धर्मों में ऐसी मानसिकता जन्म ले रही है जहाँ व्रत कंपटिशन की शक्ल में दृष्टीगोचर हो रहा है, दूसरों में अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिये अधिक से अधिक व्रत करते हैं। उपवास के सार्थक लाभ को समझ कर उसे आत्मसात करना चाहिये। कहते हैं “काया राखे धर्म” कोई भी व्रत या उपास अपनी शारीरिक शक्ती के आधार पर करना चाहिये, न तो किसी के कहने पर या न किसी की देखा देखी, स्व विवेक से किया उपास ही सही अर्थ में उपवास है।

उपवास का उद्देश्य होता है पाचन प्रणाली को पूर्ण रूपेण अवकाश प्रदान करना। जो भी भोजन हम ग्रहण करते हैं उसे पचाने के लिए शरीर को बहुत सारी उर्जा खर्च करनी पड़ती है |शरीर की पाचन प्रणाली सुचारू ढंग से कार्य करती रहे इसलिए उसे सप्ताह में कम से कम एक दिन के लिए पूर्णतया अवकाश प्रदान करना चाहिए | हमारे धर्म शास्त्रों में विभिन्न व्रत,उपवास को स्वस्थ्य की द्रष्टि से ही जोड़ा गया है।
आस्था ,पवित्रता के साथ किया गया उपवास हमारे मस्तिष्क व् शरीर दोनों को शुद्ध करता है| उपवास के दौरान भोजन को पचाने वाली जो उर्जा बचती है वह शरीर के दोष दूर करने एवं रोगमुक्त करने में लग जाती है| तीव्र रोगों में उपवास के समान कोई औषधि नही है| इस मामले में मनुष्य से अधिक जानवर अधिक संवेदनशील होते हैं क्योंकि वे बीमार पड़ने पर सबसे पहले भोजन का त्याग कर देते हैं और बिना किसी औषधि के स्वस्थ्य भी हो जाते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि रोगमुक्त करने की शक्ति शरीर मे ही मौजूद है, आवश्यकता इस बात की है कि उस उर्जा का सही वक्त पर सही उपयोग किया जाये|

आयुर्वेद में उल्लेख है- अग्नि आहार को पचाती है और उपवास दोषों को पचाता अर्थात नष्ट करता है। निश्चय ही उपास ऐसी औषधि है जिसमे बिना किसी खतरे के रोग दूर कर देने की क्षमता है। अमेरिका के सुप्रसिद्ध डॉक्टर चाल्सर् सी. हक्सले की चिकित्सा पद्धति के अनुसार, उपवास पद्धति से कठिन रोग भी अच्छे हो जाते हैं।

उपवास केवल भोजन त्यागने से ही पूर्ण नही होता, हमें अपने विचारों को भी सात्विक बनाना चाहीये तभी सही मायने में उपवास पूरा होता है क्योंकि ये वो क्रिया है जिससे हमारी इक्छा शक्ती (will power) मजबूत होती है। Strong, will power से हम जीवन की विषम परिस्थितियों से सामना कर सकते हैं एवं शान्त भाव से उसका निवारण भी। अतः मित्रों, स्वस्थ मन और स्वस्थ तन के लिये उपवास अचूक औषधि है।

Wednesday, 10 April 2013

नव वर्ष मंगलमय हो



न्याय प्रिय राजा विक्रमादित्य, जिनका दरबार वराहमिहिर, अमरसिहं, कालीदास, धन्वन्तरि और वरुरुची जैसे रत्नो से प्रकाशमान था, ऐसे महान सम्राट की सोच का परिणाम है विक्रम संवत। हिन्दु धर्म में सभी शुभकार्य एवं त्यौहार विक्रम-संवत के कलेण्डर में स्थित तिथियों के अनुसार ही पूर्ण होते हैं। चैत्र, बैशाख, जेष्ठ, आषाण, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन से सुशोभित हिन्दु नववर्ष का प्रथम दिन भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता का प्रतीक है। गुङी-पङवा हो या चेटीचंद हर फिजा में नववर्ष की धूम है। सूर्य, चन्द्र और ग्रहों का आधार लिये विक्रम संवत और शक संवत विजय घोष की पहचान है। माँ का शुभ आशिर्वाद लिये नववर्ष का शुभ संदेश है।शक्ती की उपसना के साथ, विक्रमीसंवत के चैत्र मास के प्रथम दिवस पर सभी के लिये मंगल कामना करते हैं।

“नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ सूरज का उदय हो,
नई सोच और नये विकास की धूप हो,
स्वस्थ भाईचारे की भावना का आगाज हो,
मिले सभी को नव खुशी, नित्य नया विश्वास हो,
सपरिवार सहित प्रियजन और मित्रजन की मंगलमय शुरुवात हो।“



Sunday, 7 April 2013

First African American female judge



आत्मियता, दया, और ममता की प्रतिमूर्ती  श्रीमती सेम्पसन, न्याय प्रणाली की जटिलता और न्याय के लिये समय तथा धन के व्यय से व्यथित लोगों की समस्या को गहराई समझती थीं। उनका मानना था कि, समय अनमोल है, समय गँवाने का अर्थ होता है- जीवन गँवाना। सेम्पसन संयुक्त राष्ट्र अमेरिका कि प्रथम अश्वेत महिला थीं जिन्हें हाईकोर्ट बेंच स्तर का न्यायाधीश पद मिला था।

शिकागो की म्युनिसिपल कोर्ट दुनियाँ के सबसे बङे और सबसे व्यस्त न्यायालयों में से एक है। प्रतिवर्ष इस न्यायालय में लगभग 30लाख से भी ज्यादा मुकदमें आते हैं। दिन-पर-दिन जटिल होती जीवन की समस्याओं को सेम्पसन ने समझा और उसका समुचित समाधान करने का भी प्रयास किया। उनका कहना था कि, एक व्यक्ति न्याय पाने के लिये एक दिन काम का हर्ज करे यह भी उनके लिये बहुत होता है। यदि उन्हे कई दिनों तक इंतजार करना पङे तो इसका स्पष्ट अर्थ आर्थिक संकट होगा जिसका असर न केवल उस व्यक्ति पर पङता है वरन पूरे देश को भी प्रभावित करता है। उनका न्यायालय विश्व का अपने ढंग का अनूठा न्यायालय था। वे दिनभर में सैकङों मुकदमें निपटा देती थीं।

एडिथ सेम्पसन का न्यायाधीश तक का सफर आसान नही था। उन्हे बहुत संघर्ष करना पङा था। अमेरिका में जब गोरे काले का भेद चरम शिखर पर था, हर क्षेत्र में अश्वेतों को हिकारत की नजर से देखा जाता था। पक्षपात पूर्ण वातावरण के बावजूद इतने बङे पद पर पहुँचना किसी आश्चर्य से कम नही है। एडिथ का जन्म 1901 में एक गरीब परिवार में हुआ था। पिता एक सिलाई की दुकान पर काम करते थे एवं माता हेट बनाती थीं। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उनके पास श्रम और संतोष की संपदा पर्याप्त थी। दृणइच्छा शक्ती और धैर्य के साथ वे दिन में काम करती तथा रात्री पाठशालाओं और कॉलेजों में अध्ययन करती रहीं। उनकी मेहनत का फल ही था कि शिकागो में जानी-मानी वकील में उनकी गिनती होने लगी थी। उनकी प्रतिभा को सम्मान मिला, राष्ट्रपति ट्रूमेन के द्वारा 1950 में तथा 1952 में संयुक्त राष्ट्र संघ में भेजे गये प्रतिनिधि मंडल में सदस्य मनोनित हुईं। 1962 में जज के रूप में नियुक्त हुईं।

 सादा जीवन एवं उच्च विचार वाली सेम्पसन के व्यक्तित्व से हर कोई प्रभावित होता था। लेकप्रियता का आलम ये था कि वे जिधर से भी निकल जातीं सभी श्रद्धा युक्त अभिवादन करते। उनके कोर्ट के एक वकील का कहना है कि--  “श्रीमती सेम्पसन के न्यायालय में मानवीय अधिकारों को संपदा के अधिकारों से उच्च स्थान दिया जाता है। उनके न्याय की सबसे बङी विशेषता सहज अनौपचारिक प्रक्रिया है। जज का सम्मान भी कम न होने पाए और काम भी शीध्र हो जाए इस दृष्टी से वे सर्वोत्तम न्यायाधीश हैं।“ 

उनका व्यक्तित्व और उनका अध्यव्यसाय अनेक लोगों के लिये प्रेरणा-प्रकाश के रूप में कार्य कर रहा है। उनका कहना था की- “अपनी योग्यता, अपना पात्रत्व विकसित करो, श्रेय और सम्मान तो तुम्हारा इंतजार करता मिलेगा।“

1979 में लोगों के दुख को समझने वाली समाजसेविका एवं न्यायधीश इहलोक को त्यागकर परलोक सिधार गई, परन्तु आज भी सेम्पसन के प्रति न केवल अश्वेतों के मन में श्रद्धा है वरन कितने श्वेत लोग भी उनको अपनी माता की तरह मानते हैं।

काश, हमारे देश में भी श्रीमती सेम्पसन जैसी न्यायप्रणाली को मानने वाले न्यायाधीश होते तो न्यायालय से गरीब देशवासियों को जल्दी और कम खर्च में न्याय मिल पाता।