Monday, 6 July 2015

डिजिटल इंडिया


मित्रों, आज हम सब विज्ञान की आधुनिक टेक्नोलॉजी के गिरफ्त में इस कदर आ चुके हैं कि सुबह की पहली किरण का एहसास whatsapp की good morning के message से होता है। मोबाइल और लेपटॉप तो जीवन सें सांस की तरह घुल चुके हैं। फेसबुक पर मिलने वाले लाइक, लाइफ सर्पोट सिस्टम बन गये हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा डिजिटल इडिया की शुरुवात एक ऐसा ई सपना है जिसे समस्त भारत देख रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंक के काम और बाजार यहाँ तक की मेल मिलाप भी इंटरनेट के माध्यम से हो रहे हैं। जिन लोगों से फेस टू फेस बात किये मुद्दतें बीत गईं, उन सभी की उपस्थिति फेसबुक पर अपने होने का एहसास करा देती है।

आज के इस ई युग में बुद्धिमता का पैमैना भी बदल गया है। बच्चों की परवरिश का तरीका भी बदल रहा है। नित नये इज़ात होते एप ने माँ की लोरी का स्थान भी ले लिया है। डिजिटल क्लासेज ने बस्ते का भार कम कर दिया है। यदि वास्तविकता के चश्में से देखें तो, बच्चों का बचपन दूर हो रहा है। आजकल बच्चे जानकारियों को याद करने के बजाय गुगल या विकीपिडिया पर ढूंढना ज्यादा पसंद कर रहे हैं, जहाँ एक ही जानकारी कई लोगों द्वारा अपलोड होने से उसमें थोङा बहुत अंतर भी होता है। ऐसे में वास्तविक ज्ञान में कनफ्यूजन होना स्वाभाविक है।

दोस्तों, आपको ये जानकर हैरानी होगी कि जिन गुगल पर भारत या अन्य देश के बच्चे इतने व्यस्त हैं, उस गुगल में काम करने वाले 80% पेशेवरों ने अपने बच्चों को टी.वी., इंटरनेट तथा कम्प्यूटर से दूर रखा है। एकबार एपल के स्टीव जॉब्स से एक पत्रकार ने पूछा कि, आपके बच्चे तो आईपेड को बहुत पसंद करते होंगे ? स्टीव ने जवाब दिया, नहीं उन्होने इसे यूज नहीं किया। घर पर बच्चे टेक्नोलॉजी का उपयोग कितना करेंगे, यह हम तय करेंगे।

माइक्रोस़ॉफ्ट कंपनी के पिएरे लॉरेंट भी बच्चों के लिये इस तरह के गैजट पर रोक लगा रखे हैं। अमेरिका की सिलिकॉन वैली में एक ऐसा स्कूल है, जहाँ 12 साल तक के बच्चों को कम्प्युटर, मोबाइल और टेबलेट जैसे आधुनिक उपकरणों से दूर रखा जाता है। कक्षाओं में ट्रेडीशनल तरीके से ब्लैक बोर्ड, फिजिकल एक्टिविटीज, क्रीएटिविटी और एक्सपेरिमेंटल लर्निंग से पढाया जाता है। सबसे खास बात इस स्कूल की ये है कि, इस स्कूल में गूगल तथा माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों के आल्हा दर्जे के कर्मचारियों के बच्चे पढते हैं। यहाँ कल्पनाशीलता को तवज्जोह दी जाती है।

सोचिये! हमारे देश भारत में भी गुरुकुल शिक्षा हुआ करती थी जहाँ बच्चे को विषणु शर्मा जैसे शिक्षक पढाते थे। बात करें राम या कृष्ण की तो उन्होने भी राजशाही ठाठ छोङकर प्रकृति की गोद में व्यवहारिक तौर से शिक्षा ग्रहण की थी। आज भारत का परिवेश इतना आधुनिक हो गया है कि, ई बैग स्कूल स्टेटस सिंबल बन गया है। ऐसे में मोदी जी का ई बैग स्कूल का कंसेप्ट भारत को किस दिशा में ले जायेगा उसका अंदाजा भी लगाना मुश्किल है। एसोचैम के सर्वे के मुताबिक भारत में 8-13 साल के करीब 73% बच्चे इंटरनेट पर सक्रिय हैं। शहरी इलाकों में लगभग 3 करोङ बच्चों के पास अपना मोबाइल है। 3 से 7 साल के बच्चे सोशल मिडिया पर रोज औसतन 3 से 4 घंटे गुजारते हैं और औसतन 4 घंटे टीवी देखते हैं। इसका भयानक परिणाम है छोटी सी उमर में डायबिटीज और मोटापा। आँखों पर चश्मा भी आम बात हो रही है क्योंकि बच्चे टीवी बहुत पास से देखते हैं। एक शोध के मुताबिक गैजेट्स के अधिक इस्तेमाल से बच्चों के दिमाग पर नकारात्मक असर होता है। डिजिटल इंडिया का सपना भारत के भविष्य को समय से पहले ही बङा बना रहा है। विकास के इस क्रम में डिजिटल इंडिया का होना एक आवश्यक कदम है लेकिन जिस तरह हमारे संविधान में हर कार्य के लिये तय उम्र सीमा है, जैसे कि वोट देने का अधिकार, शादी का अधिकार उसी तरह इंटरनेट या मोबाइल को यूज करने की भी तय उम्र सीमा होनी चाहिये। वरना बच्चों की मासूमियत कब बङी होकर अनेक ऐसी अपराधिक गतिविधियों के गिरफ्त में आ जायेगी कि उसे सुधारना भी मुश्किल हो जायेगा।

दोस्तों, इंटरनेट और मोबाइल के कई फायदे हैं तो दुष्प्रभाव भी कम नहीं हैं। आज हम दूर देश में बैठे व्यक्ति से तो बात कर सकते हैं लेकिन पास बैठे अपनों से दूर हो रहे हैं। हर व्यक्ति मोबाइल पर मेसेज पढने में इतना व्यस्त है कि उसे याद भी नहीं कि कब उसने परिवार के साथ बैठकर हँसी-मजाक या गपशप की हो, ऐसे माहौल में पारिवारिक संबंधों पर नकारात्मक असर पङता है। इंटरनेट की लत से नई मानसिक बिमारी का जन्म हो रहा है, जिसे नेटब्रेन नाम दिया गया है। बच्चे हों या बङे आज लगभग हर कोई ई गैजेट्स के नशे का शिकार हो रहा है, जिसका समय रहते उपचार आवश्यक है। डिजीटल इंडिया के माध्यम से भारत का स्वर्णिम सपना साकार हो सकता है, लेकिन इसके लिये हमारी नीव प्राकृतिक और स्वाभाविक होनी चाहिये। 

धन्यवाद 

  




  

Monday, 22 June 2015

आंसू भी बहुत कुछ कह जाते हैं


मुस्कान ही हमेशा सब कुछ नहीं कहती, आवाज में हर बात बँधी नहीं रहती। एहसास आंसुओं के जरिये भी बँया होते हैं। आशा की आहट हो या फिर आशंका की धमक, आँखें अकसर छलक ही जाती हैं। मुकेश जी का गाया गीत याद आता है कि, अगर दिल में गम हो तो रोते हैं आंसू, खुशी में भी आंखे भिगोते हैं आंसू, इन्हे जान सकता नहीं ये जमाना.....

दोस्तों, आंसू हर दम उमड़ नहीं पढते। कई बार बस पलक की कोर में अटके रहते है। आँखें छलकती हैं किन्तु आँसुओं को जमीन नहीं मिलती। हर हाल में रोने की कला तो बच्चों में होती है। आँखों में आँसू नहीं पर रोते ऐसे हैं कि घर सर पर उठा लेते हैं। कई बार कहा जाता है कि रोना तो कमजोरी की निशानी है, सच तो ये है कि दिल की बात आँसुओं की जुबान में बाहर आ ही जाती है। एक बार मैने आंसुओं को समझाया कि युं न आया करो, महफिल में मजाक ना उङाया करो, इसपर आंसू बोले, महफिल में अकेले पाते हैं यही सोच हम चले आते हैं। कई बार कुछ ऐसा भी होता है कि, प्रेम में मिली असफलता आँसुओं की बाण ला देती है। फिराक गोरखपुरी कहते हैं कि, न जाने अश्क ये आंखों में क्यों आये हुए हैं, गुजर गया जमाना तुझको भुलाये हुए।

मित्रों, शिव का उग्र रूप रुद्र कहलता है, उनकी आँखों से गिरे आंसु रुद्राक्ष बन गये। महाभारत काल से लेकर आधुनिक युग तक, कितनी ही कहानियां आंसुओं के द्वारा बुनी गई। हिन्दी फिल्मों के अनेक मेलोड्रामा ग्लीसरीन के सहारे आंसुओं के अनेक रंगो को दिखा देते हैं। रोने धोने का नाटक टीवी सिरियल में और आज के रियलटी शो में इस कदर दिखाया जाता है कि कई सुखी नदियों में उनके अश्कों से बांण आ जाये। क्रोध, खुशी और गम के रंगो से सजे आंसू बेशकीमती होते हैं। जिस तरह सारे आंसू सच्चे नहीं होते उसी तरह आंसुओं का कोई अंतिम सत्य नहीं है। गालिब कहते हैं कि, जो आँख ही से न टपके वो लहु क्या है।

दोस्तों, दुनिया का सबसे महँगा लिक्विड आंसू होता है, जिसमें 1% पानी और 99% फिलिंगस (Emotions) होती है। कहते हैं कि, पूरी दुनिया में सबसे खूबसूरत जोड़ी है, मुसकराहट और आंसू इन दोनों का एक साथ मिलना मुश्किल है पर जब मिलते हैं तो वो पल खूबसूरत होता है क्योंकि खुशी के आंसू हर किसी को अजीज होते हैं। भावनाओं को समेटे ये तरल मोती बङे बेशकीमती होते हैं और ये मनुष्य के प्राकृतिक गुंण हैं। जब बच्चा पैदा होता है तो वह रोता है, रुदन तो जमे हुए गम को निकाल फेंकने की औषधि है कई बार हम सबने सुना होगा कि, हमारे अपने कहते हैं रो लेने दो मन हल्का हो जायेगा। खुशी के आंसुओं से हम और खुश तथा निश्चित हो जाते हैं। फिर भी मित्रों हम तो यही कहेंगे...........
पोंछकर अश्क अपनी आंखों से मुस्कराओ तो कोई बात बने
सर झुकाने से कुछ नहीं होगा, सर उठाओ तो कुछ बात बने


Saturday, 20 June 2015

पिता को समर्पित लेख




मित्रों, बचपन की अनगिनत यादों को समेटे हम सब कब बङे हो जाते हैं पता ही नहीं चलता और एक दिन स्वयं भी अभिभावक बन जाते हैं। लेकिन बचपन के वो पल जो अपने अभिभावक के साथ गुजारते हैं, सदैव मानस पटल पर खुशी की अनुभूति के साथ विद्यमान रहते हैं या यूं कहें कि बचपन की यादें हमें कभी बङा होने नहीं देती हैं। बचपन में अपने पिता के साथ बिताया हुआ पल आज भी मेरे जेहन में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा हुआ है। मेरे पिता सदैव मेरे आदर्श हैं। आज जब नई टेक्नोलॉजी ने हमें अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के कई साधन दिये हैं तो बहुत खुशी हो रही है कि हम भी अपने पिता जी की यादों को सबसे शेयर कर सकते हैं। आज भले ही वो हमारे साथ नहीं हैं किन्तु उनकी बातें, उनकी शिक्षायें हमें आज भी आगे बढने को प्रेरित करती हैं। मेरे बचपन का अधिकतर पल पिता जी के साथ ही बिता था। जीवन में माँ भी मेरी प्रेरणा हैं किन्तु आज हम सिर्फ पिता जी की यादों को ही अभिव्यक्त करेंगे। सच तो ये है कि, किसी भी बच्चे की जिंदगी में माँ और पिता वो आधार हैं जिस पर बच्चे की सुखद बुनियाद टिकी होती है। कहा जाता है कि, पिता एक विश्वास का नाम है, सच तो ये भी है कि, पिता तो जीवन के सम्बल और शक्ति हैं जो सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति हैं। उनका खट्टा-मिठा व्यवहार एक ऐसा सहारा है जो छोटे से परिंदे को आसमान देता है। बच्चों की खुशियों का उपहार लिये किसी भी बच्चे के लिये पिता वो उपहार होते हैं जिसका कोई विकल्प नहीं है। आनंद बख्शी का गीत स्वतः ही जेह़न में आ जाता है कि, सात समुन्दर पार से गुङियों के बाजार से अच्छी सी गुङिया लाना, गुङिया चाहे ना लाना, पापा जल्दी आ जाना। इस गाने में कितनी आसानी से बच्चे ने अपनी भावना को बयाँ कर दिया कि पापा आपका साथ ही जीवन का आधार है बाकी सब निराधार है। पिता की भूमिका उस किसान की तरह है जो बीज के फलने-फुलने के लिये सही माहौल तैयार करता है, उनके लिये खाद-पानी की व्यवस्था करता है।


दोस्तों, हम चार बहन और तीन भाई थे जिसमें हम सबसे छोटे हैं। मेरे पहले तीन बहन और तीन भाई थे फिर भी मेरे पिता ने मेरे जन्म पर हॉस्पिटल के स्टाफ को खुशी में नोट बाँटे थे। ये वो वक्त था जब बेटियों के जन्म पर रोना-धोना मच जाता था। ऐसे विपरीत माहौल में मेरे पिता की ये खुशी मेरे लिये अनुपम आर्शिवाद है। सच तो ये है कि, बेटियां हमेशा ही अपने पिता की सबसे लाडली होती हैं और बेटियों के लिये उनके पिता सदैव उनका आदर्श होते हैं। बेटियां तो पिता के लिये सदैव राजकुमारी के समान होती हैं। मेरी सोच पर मेरे पिता का गहरा असर है, उन्होने लङकी और लङके में कभी भी अंतर नहीं किया और मुझे भी आगे बढने का हौसला दिया। किताब पढने का शौक बचपन से ही पिता जी की वजह से हो गया था क्योंकि वो सभी बाल पुस्तकें हम लोगों के लिये लाते थे। जरूरतमंद की मदद करने की आदत हम हमेशा उनमें देखते थे, जिसका थोङा-बहुत असर हमपर भी हुआ। पिता जी कहते थे कि, यदि किसी की मदद करो तो उसपर इसे जाहिर न होने दो अर्थात नेकी कर दरिया में डाल। मेरे लिये मेरे पिता जी वो रोल मॉडल हैं जिसका कोई भी विकल्प नहीं है। मुझ पर किया गया उनका विश्वास मेरे जीवन का सबसे बङा उपहार है, जो आज भी हमें आगे बढने में मदद दे रहा है। 

ये बहुत खुशी की बात है कि, ईश्वर के अनुपम उपहार पिता को सम्मान देने के लिये, विश्व 21 जून को फॉदर्स डे के रूप में मना रहा है। दरअसल सोनोरा डॉड अपने पिता की याद में एक दिन की शुरुवात करना चाहती थीं, जो किसान थे। सोनोरा के प्रयास का ही परिणाम है कि, अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने 1966 में इसे जून के तीसरे रविवार को मनाने का फैसला लिया था और 1972 में राष्ट्रपति निक्सन ने पहली बार इस अवसर पर छुट्टी की घोषणा की थी।

मित्रों, बच्चों के सपनों को साकार करने में पिता का जीवन कैसे बीत जाता है उन्हे याद ही नहीं रहता। अपनी भावनाओं को समेटे हुए बच्चों को सदैव साहस का पाठ पढाते हुए, पिता एक ऐसी छाँव है जो वट वृक्ष की तरह हमेशा अपने बच्चों को सुख के पालने में रखते हैं तथा सभी परेशानियों को मुस्कराते हुए भूल जाते हैं। अनुशासन प्रियता तथा उनकी सख्त हिदायतें किसी भी बच्चे के विकास में एक ऐसी संजीवनी है जिसका समय पर लाभ ले लेने से बच्चे का भविष्य सुनहरा हो जाता है। पिता तो समुद्र के समान है जिसका पानी भले ही खारा हो लेकिन उनके अंदर अनेक रत्नों का भण्डार है। हम ईश्वर को पिता कहते हैं क्योंकि हम उस पर भरोसा करते हैं कि वो हमारी रक्षा करेंगे, हमें जीवन देंगे, परम पिता परमेश्वर के गुणों को अपने में समाये इस धरती पर विद्यमान पिता भी उसी का एक रूप हैं जिनके पास हमारी सभी परेशानियों का हल चुटकी बजाते मिल जाता है।

मित्रों, ये कहना अतिशयोक्ति न होगा कि, पिता के दुलार को शब्दों में समेटना उतना ही मुश्किल है जितना कि पानी की सतह पर चलना। आज हम चाहे जितने भी बङे हों जायें किन्तु पिता के भावनात्मक स्पर्श की छाँव को महसूस करते हैं। पिता का जब साथ होता है तो आँखों में सपने और मुठ्ठी में आसमान होता है।


Really he is the only one, No one can beat him, and He is the best!!!!!
                                   Happy Father’s Day



Wednesday, 10 June 2015

रक्तदान है महादान, नही कोई आम दान




विज्ञान के इस आधुनिक युग में हम मंगल पर पहुँच चुके हैं। विश्व में अनेक ऐसे कीर्तिमान बना चुके हैं जो हमारी जिंदगी को पहले से बेहतर बनाते हैं। परंतु विकास के इस दौर में आज भी  हम रक्तदान करने में संकोच करते हैं, जिसके कारण कई लोग सही समय पर रक्त की व्यवस्था के अभाव में असमय ही काल के मुहँ में चले जाते हैं।  ऐसा नही है कि हमारा समाज पूरी तरह से उदासीन है। रक्तदान के क्षेत्र में बहुत कुछ अच्छा भी हो रहा है फिरभी वास्तविकता ये है कि, जिस तरह जरूरत है उसके अनुसार जागरुकता नही है। आज भी अनेक लोग रक्तदान करने में डरते हैं। विश्व स्वास्थ संघठन  के अनुसार  भारत में हर साल लगभग एक करोङ युनिट रक्त की जरूरत होती है लेकिन उप्लब्धता केवल 75 लाख युनिट की हो पाती है। सभ्यता के इस दौर में आज भी कई लोगों को रक्त खरीदना पढता है और उससे भी बङी विडंबना ये है कि पैसे देने के बावजूद भी सही समय पर रक्त नही मिल पाता और व्यक्ति की असमय मृत्यु हो जाती है


रक्तदान हेतु बढावा देने के लिये विश्व स्वास्थ संघटन ने 14 जून 1997 को विश्व रक्तदान दिवस मनाने की घोषणा की, जिसका उद्देश्य था कि, लोग रक्तदान के महत्व को समझें और अधिक से अधिक लोगों के जीवन को रक्तदान से आलोकित करें। जागरुकता की ये शुरुवात 14 जून से इसलिये शुरु हुई क्योंकि इसी दिन  रक्त में अग्गुल्युटिनिन की मौजूदगी के आधार पर रक्त का अलग-अलग रक्त समूहों - ए, बी, ओ में वर्गीकरण कर चिकित्साविज्ञान में अहम योगदान देने वाले कार्ल लैण्डस्टाइलर का जन्म हुआ था। कार्ल लैण्डस्टाइलर एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे, भौतिक तथा जीवविज्ञान के क्षेत्र में कार्ल लैण्डस्टाइलर के  प्रयासों की वजह से कई खोज हुई है।  अनेक सम्मानो से सम्मानित कार्ल लैण्डस्टाइलर को 1930 में नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में उनके अहम योगदान की वजह से ही उनके जन्मदिन को यानि की 14 जून को रक्तदान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस मुहिम के पीछे मकसद विश्वभर में रक्तदान की अहमियत को समझाना भी है।



मित्रों, आज भी कई लोग रक्तदान करने में हिचकिचाते हैं, सोचिये यदि जब हम किसी को रक्तदान करने में संकोच करेंगे तो, हम ये कैसे उम्मीद लगा सकते हैं कि जरूरत के वक्त लोग हमको रक्त देगें। यदि हम विज्ञान पर विश्वास करें तो उसके अनुसार, रक्तदान हर वह व्यक्ति जिसकी उम्र 16 से 60 साल के बीच और वजन 45 किलोग्राम से अधिक होजिसे एचआईवी(HIV), 
हैपिटाइटिस बी” या सी” (Hepatitis B,C) जैसी बीमारी न हुई होवह रक्तदान कर सकता है। एक बार में 350 मिलीग्राम रक्त दिया जाता हैउसकी पूर्ति शरीर में चौबीस घण्टे के अन्दर हो जाती है और गुणवत्ता की पूर्ति 21 दिनों के भीतर हो जाती है। प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति तीन माह में एक बार रक्तदान कर सकता है। एक व्यक्ति के रक्तदान से तीन लोगों की जिंदगियां बचाई जा सकती है। स्वस्थ शरीर में रक्त बनने की प्रक्रिया स्वाभाविक है इसके लिये कोई अलग से खर्च नही करना पडता तो फिर प्राकृतिक तौर पर प्राप्त रक्त को दान करने में कैसा संकोच! 


यदि मध्यप्रदेश में रक्तदान के प्रतिशत की बात करें तो संतोषप्रद परिणाम नही है क्योंकि अभी हम शत-प्रतिशत रक्तदान आँकङों से दूर हैं। ऐसी ही समस्याओं को दूर करने के लिये मध्य प्रदेश समेत कई शहरों में अनेक संघठन कार्य कर रहे हैं। हमारे शहर इंदौर में भी कई संस्थायें इस रक्तदान के यज्ञ में अपने सहयोग की आहुती दे रही हैं। इन संस्थाओं में एक संस्था है "अक्युब रक्त सेवा" 
जिसकी नीव एक कम उम्र के युवा ने रखी। जिस उम्र में कई युवा अपनी खुशियों को ही सर्वोपरी मानते हैं, उस समय अक्षय ने रक्तदान का संक्लप लिया 18 वर्ष से भी कम उम्र में अक्षय ने पहली बार 8 मार्च 2014 को रक्तदान किया। किसी दूसरे की जिंदगी को रक्त देकर उसे ऐसी खुशी का एहसास हुआ कि वो अब निरंतर इसी प्रयास में रहता है कि रक्त का अभाव किसी को भी न हो। इस मुहीम के लिये अक्षय ने लोगों को जागरूक करना शुरु किया। अक्षय को इस कार्य हेतु कलेक्टर समेत कई संस्थाओं ने सम्मानित भी किया है। 

If you're a blood donor, you're a hero to someone, somewhere, who received your gracious gift of life. 

दोस्तों, कहने का आशय ये है कि यदि हम सब अपने-अपने क्षेत्र में ऐसे ही प्रयास करते रहें तो कई लोगों के जीवन को असमय काल में जाने से बचाया जा सकता है। अपने जन्मदिन पर रक्तदान शिविर लगाकर लोगों को इस कार्य हेतु प्रेरित कर सकते हैं। देशभर में रक्तदान हेतु नाको, रेडक्रास जैसी संस्थायें कार्य कर रही हैं किन्तु ये संस्थाएं तभी सफल होंगी जब हम स्वयं रक्तदान हेतु सामने आयेंगे।आज हम सब शिक्षित हैं और सभ्य समाज के नागरिक हैं, जो सामाजिक ताने-बाने की अहमियत को समझते भी हैं। इसलिये मित्रों हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है कि, अपने जीवन को सार्थकता प्रदान करें। रक्तदान के यज्ञ में अपनी सजगता की आहुति देकर लाखों लोगों को जीवन दान दें, क्योंकि रक्तदान तो जीवन दान है। 
 
If you donate money, you give food But If you donate blood you give life
धन्यवाद 

कृपया इस लेख को भी अवश्य पढें 
अंगदान जीवन दान 




 




Saturday, 9 May 2015

मातृ दिवस विशेष


मित्रों, हम सब मदर्स डे बहुत उत्साह से मनाते हैं, सच कहें तो माँ के सम्मान में एक दिन क्या वर्ष के 365 दिन भी कम हैं। 
जो जन्म देती है वो हमारी माँ है, इसके अलावा हम भारतीयों के लिये माँ का स्वरूप लिये गौ माता तथा धरती माता हैं, जिनका हमारे अस्तित्व को कायम रखने में विशेष स्थान है। आदि काल से गाय को माता के समान माना जाता है। यदि किसी कारण वश बच्चे को माँ का दूध नही मिल पाता तो नवजात शिशु को गौ माता का ही दूध दिया जाता है। गौ माता, पृथ्वी, प्रकृति तथा परमात्मा का स्वरूप है। भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति सुजाता द्वारा प्रदत्त गौ दूध की खीर से हुई थी। बाईबिल एवं कुरान में भी गौ माता की महिमा का उल्लेख है। वैज्ञानिकों ने जिस प्रकार विज्ञान का विकास किया उसी प्रकार आध्यात्मिक मनिषियों ने गौ विज्ञान का आविष्कार किया। गाय के दूध से समस्त समाज को शक्ति, बल एवं सात्विक बुद्धी प्राप्त होती है। गाय का गोबर एवं मूत्र खेती के लिये पोषण का कार्य करते हैं। एक सर्वे के अनुसार जापान जैसे आधुनिक टैक्नोलॉजी वाले देश में गाय के गोबर से बनी खाद को सबसे अच्छी खाद मानते हैं। गाय धरती पर एक मात्र प्राणी है जो ऑक्सीजन ग्रहंण करती है और ऑक्सीजन छोङती भी है। वो प्रकृति से 21%  ऑक्सीजन लेती है और 5%  लेकर 16%  प्रकृति को वापस कर देती है। गाँव प्रधान एवं कृषी प्रधान देश भारत में गौ माता का कोई विकल्प नही है , फिर भी  आज हम अपनी संस्कृति, गौ माता को अनदेखा कर रहे हैं। प्लास्टिक की थैलियों के रूप में उसे खाने को जहर दे रहे हैं। आज कई गौ माता की मृत्यु प्लास्टिक की थैलियां खाने से हो रही है, जिसे हम सभी जाने अंजाने में उसे दे रहे हैं। मानव संस्कृति की समृद्धि गाय की समृद्धि से जुङी हुई है। अतः हमें अपनी गौ माता को यत्र-तत्र बिखरी प्लास्टिक की थैलियों से बचाना होगा। यदि हम देश का विकास चाहते हैंं तो हमें हर हाल में गौ माता की रक्षा करनी होगी।  

हम सबकी एक और माँ है वो है धरती माँ, जिसकी वजह से हम सबको रहने के लिये घर और जिवित रहने के लिये भोजन प्राप्त होता है। धरती पर ही अनाज, फल, फूल, साग सब्जियाँ इत्यादी उगते हैं जिससे सभी सजीव जगत का पालन पोषण होता है। पुराणों के अनुसार धरती को सदैव माता माना गया है और यहाँ तक की धरती पर पैर रखना भी पुराणों में पाप मान जाता है लेकिन धरती पर पैर रखे बिना व्यक्ति कोई कार्य नही कर सकता इसलिये सुबह-सुबह धरती पर पैर रखने से पहले क्षमा-याचना हेतु पुराणों में एक श्लोक दिया गया है, 

समुंद्रवसने देवी पर्वतस्तन मंडिते।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व में।। 
अर्थात समुद्र रूपी वस्त्र पहनने वाली पर्वत रूपी स्तनों से मंडित भगवान विष्णु की पत्नी, हे माता पृथ्वी, आप मुझे पाद (पांव) स्पर्श के लिए क्षमा करें। 


ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, ये श्लोक तो बहुत कम ही लोग अपने दैनिक जीवन में पढते होंगे। बरहाल धरती माता को आज सबसे बङा खतरा ग्लोबल वार्मिंग से है और रही सही कसर भू माफिया के आतंक से है। रत्नगर्भा, वसुंधरा को इस धरती के उन लोगों से सबसे ज्यादा खतरा है जो हरी भरी धरा को कंक्रीट के जंगलो में बदल रहे हैं। 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया जाता है, किन्तु मित्रों, सिर्फ एक दिन की जागरुकता से हम अपनी धरती माता की मुस्कान वापस नही कर सकते। इसके लिये हमें हर पल प्रयास करना होगा नये पेङ पौधों से धरती माँ की हरियाली को वापस लाना होगा। 

मित्रों, गौ माता और धरती माता एक दूसरे की पूरक हैं। पुराणों और शास्त्रों में भी गौ माता को धरती माता का जीवन्त रूप माना गया है। इन दोनों का ही हम सबके जीवन में उतना ही महत्व है जितना की हमारी जन्मदात्री माँ का। अतः आज हम सब ये संकल्प करें कि, गौ माता तथा धरती माता की हर संभव रक्षा करेंगे। 

एक निवेदनः-  दिये गये लिंक पर क्लिक करके उसे अवश्य पढें

Special Mother: पन्ना धाय

धन्यवाद
अनिता शर्मा 




Saturday, 2 May 2015

निःस्वार्थ सहयोग से जिंदगी को रौशन करें


मित्रों, अरबों की आबादी वाले देश में आज विकास की गति भी अपनी आधुनिक तकनीक से दिन प्रतिदिन बढ रही है और जनसंख्या की बात करें तो अपना देश भारत, विश्व में चीन के बाद दूसरे नम्बर पर है। विकास की इस चाल में कहीं कुछ पिछङता हुआ भी नजर आ रहा है। जगजीत सिंह की गजल पर गौर करें तो, "हर जगह हर तरफ बेशुमार आदमी फिर भी तनहांईयों का शिकार आदमी"  ये पंक्ति आज की सच्चाई बयां करती है। आज हम तरक्की की इबारत लिख रहे हैं और जिंदगी के सफर में हर दिन  इंसानो की भीङ से दो चार हो रहें हैं और इस भीङ भरी आँधी में इंसानियत के अपनेपन को तङपते हुए भी देख रहे हैं।  हमारी भारतीय संस्कृति की धरोहर सहयोग की भावना, विकास की इस आँधी में दूर होती नजर आ रही है। हम ये नही कह सकते कि सहयोग की भावना खत्म ही हो गई क्योंकि आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने दर्द को भूलकर दूसरों के जीवन को खुशहाल करने का भाव रखते हैं और हर संभव प्रयास भी करते हैं। जैसा कि, आप सभी पाठकों को पता होगा कि मई-जून में भारत के लगभग सभी राज्यों में परिक्षा का मौसम होता है और हर कोई अच्छे नम्बर लाने की कोशिश करता है ताकि अच्छे नम्बरों वाली डिग्री से अच्छी नौकरी मिले तथा जीवन सुखमय हो जाये। करोणों की संख्या वाले विद्यार्थियों के बीच कुछ हजारों की संख्या में ऐसे भी विद्यार्थी हैं जो वर्षभर मेहनत से पढते हैं लेकिन समाज और सरकार की उदासीनता की वजह से परिक्षा नही दे पाते क्योंकि वो देख नही सकते उनको परिक्षा में सहलेखक की आवश्यकता होती है, परंतु ऐसे जरूरत के समय पर हममें में से कई लोगों के पास  दूसरों के लिये वक्त नही होता। ऐसे में  हाल ही में गुजरात की एक घटना  आप सबसे शेयर करना चाहेंगे। वहाँ महाविद्यालय की परिक्षा चल रही है। अहमदाबाद में सामान्य विद्यार्थियों के बीच कुछ दृष्टीबाधित बच्चे भी अपने सपनो को साकार करने का प्रयास कर रहे हैं। इसी क्रम में अंध कल्यांण केन्द्र की दृष्टिबाधित बालिका हेतल को भी B.A. II year की परिक्षा देनी थी लेकिन उसे कोई राइटर नही मिला तो उसके ही संस्था की अल्पदृष्टीबाधित बालिका प्रियंका उसका पेपर लिखने को तैयार हो गई हालांकी प्रियंका के लिये ये आसान नही है क्योंकि अल्पदृष्टी के साथ कॉलेज के पेपर को लिखना किसी साहस से कम नही है। फिर भी प्रियंका अपनी दोस्त हेतल का पेपर देने में पुरा सहयोग दे रही है क्योंकि वह अपनी दोस्त हेतल के सपनों को साकार करना चाहती है। ऐसे में उसे अपनी परेशानी बहुत छोटी नजर आ रही है। प्रियंका जैसे और भी कई लोगों से मेरा सामना हुआ जो अपनी तकलीफ को दरकिनार करते हुए दूसरों की मदद के लिये सदैव तत्पर  रहते हैं। इंदौर में एक बालिका वर्षा, पोलियो  से ग्रस्त है फिर भी उसने अपनी पढाई अच्छे से पूरी की और ट्राईसिकल पर रोज दृष्टीबाधित बालिकाओं की मदद करने जाती थी। ऐसा ही एक वाक्या और है जब हम इंदौर में राइटर के लिये समाचार पत्र में अनुरोध किये तो देवास से एक विकलांग बालक विनय ने हमें फोन किया कि हम परिक्षा देने को तैयार हैं। मित्रों, ऐसे लोगों के जज़बों को हम और हमारा वाइस फॉर ब्लाइंड क्लब सलाम करता है। हालांकी समाचार पत्र में दिये इश्तेहार से कई दृष्टीसक्षम लोग भी सहायता के लिये आगे आये और उन लोगों ने सहयोग भी दिया और दे भी रहे हैं किन्तु जितनी आवश्यकता है राइटर की उतनी पूर्ती नही हो रही है तभी तो हमारे देश में हेतल जैसी छात्राओं या छात्रों को राइटर का अभाव आज भी सहना पङ रहा है। एक कहावत है जाके पङे न पैर बवाई वो क्या जाने पीर पराई। दोस्तों, इस कहावत को झुटला दिजीये और जिंदगी की तेज रफ्तार में अपने मन में उन लोगों के दर्द का एहसास महसूस किजीये जिन्हे आपकी जरूरत है। आइये हम सब मिलकर निःस्वार्थ भाव से भारतीय संस्कृति को गौरवान्वित करें और अपने सहयोग से हजारों दृष्टीबाधित लोगों की जिंदगियों को रौशन करें। आपका सकारात्मक सहयोग किसी के सपने को साकार कर सकता है।  
धन्यवाद

एक अनुरोधः- आप में से जो भी पाठक दृष्टीबाधित लोगों की मदद करना चाहते हैं,  वो ब्लॉग में अटैच फार्म को भरकर अपने सहयोग का क्षेत्र बतायें। 





Monday, 27 April 2015

अनोखी पहल

भारत की आजादी के 68 साल बाद आखिर देश के प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान में भारतीयता ने दस्तक दे दी। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय में 2015 के दिक्षांत समारोह का रंग भारतीय संस्कृति से रंग गया, जब सभी छात्रों ने नई परंपरा की शुरुवात की। बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय के 97 वें दिक्षांत समारोह में सभी छात्रों ने अंग्रेजो की परंपरा यानी की काले गाउन को नकार दिया। छात्रों ने मदन मोहन मालवीय जी की तरह धोती-कुर्ता और सर पर उनके जैसी ही टोपी पहन कर दिक्षा ली और छात्राओं ने लाल रंग के बार्डर वाली सफदे साङी पहनी तो कुछ छात्राएं सफदे सलवार कुर्ते में सर पर साफा लगाए नजर आईं। माँ सरस्वती के आँगन में एक नई किरण का आगाज हुआ। ये नई पहल बनारस हिन्दु विश्वविद्याल के कुलपती  प्रो. जे.सी.त्रीपाठी जी के प्रोत्साहन का ही परिणाम है। 

मैकाले की शिक्षा प्रणाली के बंधनो से आजादी की पहली और सकारात्मक शुरुवात है। वास्तव में ये शुरुवात अंधकार से उजाले की ओर बढता कदम है, जो श्वेत वस्त्र घारण किये हुए कमल पर विराजमान माँ सरस्वती की शुद्ध अर्चना एवं वंदना है। 
धन्यवाद

निवेदनः-  दिये गये लिंक को अवश्य पढें

आजादी के 60 साल बाद भी क्या हम आजाद हैं ??



Thursday, 23 April 2015

आज के बालक भारत का भविष्य हैं

मित्रो, जिस तरह से आज समाज में बाल अपराध बढ रहे हैं और नाबालिग बच्चे, ऐसे जघन्य अपराध को अंजाम दे रहे हैं, वो  किसी भी सभ्य समाज के लिये कलंक से कम नही है। आज के वातावरण को देखते हुए किशोर न्याय अधिनियम 2014 संशोधन बिल पर कैबिनेट की मोहर एक सार्थक कदम है। पिछले कुछ वर्षों से नाबालिग बच्चों द्वारा हत्या, दुश्कर्म तथा तेजाबी हमले तेज हुए हैं लेकिन उन्हे पुराने अधिनियम के अनुसार सख्त सजा का प्रावधान नही था जिससे अपराधिक मानसिकता की प्रवृत्ति ने निर्भया जैसी घटना को अंजाम दिया। आज भी देश निर्भया कांड को याद करके सिहर जाता है। आठवीं में पढने वाला बालक अपनी शिक्षिका की रिवाल्वर से हत्या कर देता है तो कहीं 10 से 12 वर्ष के बालक अपने साथी का अपहरण करके उसकी हत्या कर देते हैं। पिछले कुछ वर्षों से तो,  लङकियों और महिलाओं पर नाबालिग किशोरों द्वारा तेजाबी मानसिकता का कहर कुछ ज्यादा ही हो रहा है। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि, किसी भी अपराध की सजा उसकी जघन्यता के आधार पर होनी चाहिये न की उम्र या लिंग के आधार पर । जिस दिन जे जे एक्ट संशोधन विधेयक पर संसद की मुहर लग जायेगी उस दिन से शायद इस तरह के अपराध में कमी आयेगी।

दोस्तों, मेरे मन में बाल अपराध को लेकर कुछ मंथन चल रहा है इसलिये मैने अपनी पूर्व की लाइन में शायद शब्द का इस्तमाल किया है क्योंकि ये जो बाल अपराध का ग्राफ दिन-प्रतिदिन बढ रहा है, उसके लिये जिम्मेदार क्या सिर्फ नाबालिग बच्चे हैं ! या समाज और परिवार भी। आज हम सब एक सभ्य सुंदर और सुसंस्कृत भारत की कल्पना करते हैं।  सुरक्षित वातावरण की भी कामना रखते हैं किन्तु अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को दरकिनार कर देते हैं। मेरा मानना है कि, कोई भी शिशु जन्म से अपराधी नही होता उसके लिये अनेक कारण समाज में विद्यमान हैं। हमारा कानून भी इस बात को मानता है कि,  बालकों में बढ रही अपराधिक मनोवृत्ति के पीछे सामाजिक ढांचा भी जिम्मेदार है। आज तो आलम ये हो गया है कि, संभ्रान्त परिवार के बालक भी अनेक अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। किसी भी समाज की पहली ईकाइ होती है परिवार जहाँ बालक का प्रारंभिक विकास होता है। आज-कल अक्सर  देखने को मिल रहा है कि, बच्चे की परवरिश बहुत आधुनिक ढंग से हो रही है। वास्तव में (Actully) आधुनिकता गलत नही है बल्कि आधुनिकता का अधुरा ज्ञान दिमक की तरह समाज को खोखला कर रहा है। आज बच्चों के हाँथ में इंटरनेट से सुसज्जित मोबाइल, आई पेड और स्कूल जाने  के लिये बाइक या कार कानूनी उम्र सीमा से पहले ही परिवार द्वारा मिल जाती है। यदि स्कूल या ट्राफिक नियम इसे रोकते हैं तो परिवार द्वारा हर्जाना भर दिया जाता है। ऐसे ही छोटे-छोटे अपराधों को कई परिवारों का सपोर्ट मिलता है और बच्चों का कानून से डर खत्म हो जाता है। इसके अलावा समाज में व्याप्त फिल्मों तथा विज्ञापनों का खुलापन एक नासूर की तरह अपरिपक्व बच्चों को डस रहा है। जिसका परिणाम आज का बढता बाल-अपराध है। यदि शुरुवात में ही छोटे-छोटे अपराधों को अभिभावकों द्वारा रोका जाए तो एक हद तक बच्चों में सुधार लाया जा सकता है। 

आज के बालक  हमारे भारत देश का भविष्य हैं। अतः हम सबको मिलकर भविष्य के कर्णधार की नींव को सुसंस्कारों से पल्लवित करना है। बाल्यकाल की गलतियों को बढावा देने की बजाय समय रहते ही उसे सुधारना हम सबकी नैतिक और आवश्यक जिम्मेदारी है।

Children are like different type of flowers, So irrigate them good manners and make this world a beautiful garden 

नोटः- दिये गये लिंक को अवश्य पढें, धन्यवाद 

बदलता बचपन जिम्मेदार कौन ????








Saturday, 18 April 2015

साहस और आत्मविश्वास

मित्रों, जीवन में कई बार परिस्थिती हमारे अनुकूल नही होती। अक्सर कुछ कठिन परिस्थितियाँ हमारे साहस और विश्वास की परिक्षा लेती रहती हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि, समस्याएं समुंद्र की तरह विशाल और उसकी प्रचंड लहरें सब कुछ तहस-नहस कर देंगी। ऐसी परिस्थिती पर विजय पाने के लिए हमें साहस के साथ अपने आत्मविश्वास के बल पर इससे मुकाबला करना चाहिए क्योंकि साहस और आत्मविश्वास वो शक्ति है जिससे सभी परेशानियों को दूर किया जा सकता है। ये वो आधार हैं, जिससे दृणइच्छाशक्ति को बल मिलता है। 

चर्चित मनोवैज्ञानिक लुईस एल के अनुसार, यदि व्यक्ति को कामयाबी हासिल करनी है तो, साहस के साथ आत्मविश्वास के कवच को धारण करना ही होगा। काम कोई भी हो उसमें दिक्कतें न आएं ये तो संभव नही है किन्तु परेशानियों को आत्मविश्वास के साथ पार करना संभव है। यदि हम ह्रदय में अविश्वास और विफलता का डर लाते हैं तो कभी भी सफल नही हो सकते। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो ये दर्शाते हैं कि, निडरता और विश्वास से सफलता की राह आसान हो जाती है। शिवाजी और रानी लक्ष्मीबाई के विश्वास भरे साहस से मुगलों और अंग्रेजों के हौसले भी परास्त हो गये थे। विलियम पिट को जब इंग्लैंड के प्रधानमंत्री पद से हटाया गया था, तब उन्होने डेवेनशायर के ड्यूक से निडरता के साथ कहा था कि, इस देश को मैं ही बचा सकता हुँ, इस कार्य को मेरे सिवाय दुसरा कोई नही कर सकता। 11 हफ्ते तक इंग्लैंड में उनके बिना काम चला लेकिन अंत में पिट को ही योग्य मानते हुए उन्हे प्रधानमंत्री बनाया गया। कोलंबस ने अपने साहस और विश्वास के बल पर अमेरीका की खोज की। घनश्याम दास बिङला की शिक्षा सिर्फ पाँचवी तक हुई थी। लेकिन उनके मन में एक सफल उद्योग करने का जज़बा था। उन दिनो जूट का व्यपार केवल अंग्रेज करते थे। अंग्रेजों ने बिङला को कर्ज देने से भी इंकार कर दिया। उन्हे मशीने भी दुगने दाम में खरीदनी पङी, फिर भी साहस और आत्मविश्वास के धनी बिङला ने सभी मुश्किलों का डटकर सामना किया, नतिजा आज सब जानते हैं। बिङला ग्रुप आज प्रतिष्ठित और संपत्तिशाली उद्योग घराना है। 

मित्रों, खुद पर अटूट विश्वास और आगे बढने का साहस ही हमें सफलता का एहसास कराता है। व्यक्ति जब स्वंय पर विश्वास करता है तो उसका आत्मबल प्रकट होता है। शक्तियाँ और क्षमताएं तो हर किसी में मौजूद होती हैं, सिर्फ उसे पहचानने की जरूरत है। अपनी क्षमताओं को जानकर ही हम बेहतर विश्व का निर्माण कर सकते हैं और ये तभी संभव है जब हम अपने विश्वास को साहस के साथ व्यवहार में लायेंगे। आत्मविश्वास भी तभी मजबूत होता है जब हम निडरता के साथ सभी बाधाओं को फेस करते हैं। दुनिया भी उसे ही याद रखती है जो साहस और आत्मविश्वास के साथ अपना रास्ता खुद बनाता है। जीवन की अनेक बाधाओं के बावजूद साहस,  दृणता और  विश्वास  के साथ लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। 

किसी ने सच ही कहा है,  मुश्किलों से डर के भाग जाना आसान होता है। हर पहलु जिंदगी का इम्तहान होता है। डरने वालों को मिलता नही जिंदगी में कुछ, साहस और आत्मविश्वास के साथ आगे बढने वालों के कदमों में जहान होता है। 





Tuesday, 7 April 2015

आपका थोङा सा समय किसी को आत्म सम्मान से जीने का अवसर दे सकता है


Friends, शिक्षा वो हथियार है जिसके माध्यम से आत्म सम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन यापन किया जा सकता है। वाइस फॉर ब्लाइंड क्लब का उद्देश्य भी है कि, Visual Impaired Students को शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाना। जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें और विचारों का सामजस्य कर सकें वही शिक्षा वास्तविक शिक्षा है। अध्ययन के दौरान सभी को बहुत मेहनत करनी पङती है और उच्च तथा सफल शिक्षा के लिये कई बार मन पसंद चीजों का त्याग भी करना पङता है। यदि हम बात करें दृष्टीबाधित बच्चों की तो उनको अध्ययन के दौरान सामान्य बच्चों की अपेक्षा अधिक परेशानियों का सामना करना पङता है। मैने देखा है कि अनेक दिक्कतों के बावजूद वो पढना चाहते हैं, शिक्षा के माध्यम से समाज में गौरवपूर्ण स्थान के लिये बहुत मेहनत भी करते हैं। परंतु उनके अध्ययन के दौरान कुछ ऐसी भी समस्याएं आती हैं जहाँ उनको दृष्टीसक्षम लोगों पर निर्भर होना पङता है। जैसे कि, पुस्तक को रेर्काड करवाने के लिये तथा परिक्षा में सह लेखन के लिये। आज विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है जिसके कारण लाइफ थोङी आसान हो गई है। कम्प्युटर के आविष्कार से किसी भी प्रकार की शारीरिक विकलांगता अब समस्या नही है। लेकिन कम्प्युटर का उपयोग काफी हद तक बिजली पर निर्भर है और बिजली की स्थिति हमारे कुछ शहरों में छोङ दी जाये तो बाकी जगह भगवान भरोसे है। ऐसे में कम्प्युटर तथा कम्प्युटर का ज्ञान काम नही आता। आज कई दृष्टीबाधित बच्चे कम्प्युटर ज्ञान से परिपूर्ण हैं फिर भी परिक्षा के समय उन्हे राइटर के लिये  मानवीय सहारे की आवश्यकता होती है, वे चाहकर भी कम्प्युटर के माध्यम से परिक्षा नही दे सकते। 

अतः हम आप सबसे निवेदन करते हैं कि, आप लोग इस नेक कार्य में अपना सहयोग दें क्योंकि आपका थोङा सा समय किसी को आत्म सम्मान से जीने का अवसर दे सकता है। यदि आप राइटर या रेर्काडिंग के लिये अपना योगदान देना चाहते हैं तो, आप हमारे क्लब वाइस फॉर ब्लाइंड के सदस्य बन सकते हैं। अधिक जानकारी के लिये लिंक पर क्लिक करें।
धन्यवाद 
Cooperate the blind

दृष्टीबाधितों की सहायता कैसे कर सकते हैं