Tuesday, 19 November 2013

आधुनिक समाज में नारी का अस्तित्व



आम बोलचाल की भाषा में  ‘लेडिज फर्स्ट’ एक ऐसा कथन है, जो नारी के लिए सम्मान स्वरूप है। इतिहास साक्षी है, सिन्धुघाटी की सभ्यता हो या पौराणिंक कथाएं हर जगह नारी को श्रेष्ठ कहा गया है।
"यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता" वाले भारत देश में आज नारी ने अपनी योग्यता के आधार पर अपनी श्रेष्ठता का परिचय हर क्षेत्र में अंकित किया है। आधुनिक तकनिकों को अपनाते हुए जमीं से आसमान तक का सफर कुशलता से पूरा करने में सलंग्न है। फिर भी मन में ये सवाल उठता है कि क्या वाकई नारी को 'लेडीज फर्स्ट' का सम्मान यर्थात में चरितार्थ है या महज औपचारिकता है। अक्सर उन्हे भ्रूणहत्या और दहेज जैसी विषाक्त मानसिकता का शिकार होना पङता है। नारी की बढती प्रगति को भी यदा-कदा पुरूष के खोखले अंह का कोप-भाजन बनना पङता है।

आज की नारी शिक्षित और आत्मनिर्भर है। प्रेमचन्द युग में नारी के प्रति नई चेतना का उदय हुआ। अनेक शताब्दियों के पश्चात राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ने नारी का अमुल्य महत्व पहचाना और प्रसाद जी ने उसे मातृशक्ति के आसन पर आसीन किया जो उसका प्राकृतिक अधिकार था। आजादी के बाद से नारी के हित में कई कानून बनाये गये। नारी को लाभान्वित करने के लिए नित नई योजनाओं का आगाज भी हो रहा है। बजट 2013-14 में तो महिलाओं के लिए ऐसे बैंक की नीव रखी गई जहाँ सभी कार्यकर्ता महिलाएं हैं। उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कठोर से कठोर कानून भी बनाये गये हैं। इसके बावजूद समाज के कुछ हिस्से को दंड का भी खौफ नही है और नारी की पहचान को कुंठित मानसिकता का ग्रहंण लग जाता है। "नारी तुम श्रद्धा हो" वाले देश में उसका अस्तित्व तार-तार हो जाता है। 
  
आधुनिकता की दुहाई देने वाली व्यवस्था में फिल्म हो या प्रचार उसे केवल उपभोग की वस्तु बना दिया गया है। लेडीज फर्स्ट जैसा आदर सूचक शब्द वास्तविकता में तभी सत्य सिद्ध होगा जब सब अपनी सोच को सकारात्मक बनाएंगे। आधुनिकता की इस अंधी दौङ में नारी को भी अबला नही सबला बनकर इतना सशक्त बनना है कि बाजारवाद का खुलापन उसका उपयोग न कर सके। नारी को भी अपनी शालीनता की रक्षा स्वयं करनी चाहिए तभी समाज में नारी की गरिमा को सम्पूर्णता मिलेगी और स्वामी विवेकानंद जी के विचार साकार होंगे।

विवेकानंद जी ने कहा था कि- "जब तक स्त्रियों की दशा सुधारी नही जायेगी तब तक संसार में समृद्धी की कोई संभावना नही है। पंक्षी एक पंख से कभी नही उङ पाता।"

इस उम्मीद के साथ कलम को विराम देते हैं कि, आने वाला पल नारी के लिए निर्भय और स्वछन्द वातावरण का निर्माण करेगा, जहाँ आधुनिकाता के परिवेश में वैचारिक समानता होगी। नारी के प्रति सोच में सम्मान होगा और सुमित्रानन्दन पंत की पंक्तियाँ साकार होंगी—

मुक्त करो नारी को मानव, चिर वन्दिनी नारी को।
युग-युग की निर्मम कारा से, जननी सखि प्यारी को।।      

Wednesday, 13 November 2013

प्रशंसा के फूल


याद कीजिए जीवन के वो स्वर्णिम पल जब शिक्षक और अभिभावक अच्छी पढाई, उत्कृष्ट खेल प्रदर्शन या अच्छे व्यवहार के लिए शाबासी देते थे और ‘Keep it up’ कहकर हौसला बढाते थे। ये शब्द बाल सुलभ मन में उत्साह का संचार कर देते थे। कार्य को और बेहतर करने की प्रेरणा देते थे। आज भले ही हम बङे हो गयें हों फिर भी अच्छे कार्यों के हेतु, अपनो से मिली प्रशंसा जीवन में नई चेतना और सकारात्मक ऊर्जा देती है। प्रशंसा से भरे शब्द संघर्षमय जीवन में रामबांण औषधी की तरह हैं। सच्ची तारीफ सदा लाभदायक होती है। व्यक्ति में प्रशंसा के माध्यम से उसके कार्य करने की क्षमता कई गुना बढ जाती है।   

प्रशंसा का भाव एक ऐसी औषधी है, जिससे व्यक्ति के मन में उमंग तथा उत्साह का संचार होता है। प्रशंसा राह भ्रमित व्यक्ति को राह पर ले आती है, उसमें सकारात्मक भावनाओं का विकास होता है। सच्ची प्रशंसा करने से कभी पीछे नही हटना चाहिए।  कभी भी झूठी तारीफ नहीं करनी चाहिए क्योंकि झूठी प्रशंसा चाटूकारिता या कहें चापलूसी का प्रतीक है। संभवतः इससे दूर ही रहना चाहिए।  

प्रशंसा करना एक कला है, जो दिल की गहराइंयों से निकलनी चाहिए, तभी उसकी पहुँच दूसरे तक जायेगी । कभी भी किसी की प्रशंसा करते समय आडंबर का सहारा नही लेना चाहिए। जीवन में हमसभी की कई बार ऐसे लोगों से मुलाकात होती है जिन्हे हम व्यक्तिगत रूप से नही जानते फिर भी उनके कार्यो से प्रभावित होते हैं। यदि जीवन में ऐसा ही कोई व्यक्ति नेक काम करते दिखे या अपने कार्य को ईमानदारी से निभाते दिखे तो उसकी प्रशंसा करने से स्वंय को कभी भी रोकना नही चाहिए। प्रशंसा के शब्द अमृत के समान हैं जिसको व्यवहार में अपनाने से दोनो को ही शांति और प्रसन्नता की अनुभूति होती है, जो बहुमूल्य है।

जीवन की यात्रा के दौरान यदि व्यक्ति को प्रशंसा मिलती है तो उसका अपने कार्य के प्रति उत्साह बढ जाता है और वे अधिक ऊर्जा से अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है। अधिनस्त कर्मचारियों द्वारा किये गये उत्कृष्ट कार्यों पर बङे अधिकारियों द्वारा की गई प्रशंसा विकास की राह को आसान बनाती है। सामाजिक विकास हो या व्यक्तिगत विकास सभी एक दूसरे के सहयोग से सम्पूर्ण होते हैं, परन्तु आलम ये है कि हम उन सहयोग को भूल जाते हैं। विकास की दौङ में अप्रत्यक्ष लोगों की सराहना को नजर अंदाज कर देते हैं। जबकी प्रशंसा भरे शब्द तो सुगन्धित फूल के समान हैं जिसकी खुशबू व्यक्ति में अच्छे भावों को महका देती है।

सच्ची तारीफ अंधकार भरे जीवन में आगे बढने की चाह रूपी उजाले की ज्योति होती है। परंतु अपनी तारीफ स्वंय नही करनी चाहिए और दूसरों से मिली तारीफों से स्वंय में अंहकार को जगह नही देना चाहिए। प्रशंसा तो उस सीढी के समान है, जो हमें ऊपर भी ले जा सकती है और नीचे भी गिरा सकती है। किन्तु जीवन में कुछ पल ऐसे भी होते हैं जब स्वंय की पीठ भी थपथपा लेनी चाहिए और अपनी उपलब्धियों के बारे में सोचना चाहिए ताकि जीवन में आए निराशा के बादल स्व प्रेरणा से छँट जायें। स्व-सराहना जीवन में नई ऊर्जा के साथ कार्य करने की प्रेरणा देती है।

सच्ची प्रशंसा सदैव सकारात्मक भावों का ही विकास करती है। प्रशंसा के सदुपयोग से व्यक्ति का सकारात्मक और समुचित विकास होता है, परन्तु दुरपयोग से अंहकार एवं द्वंद का जन्म होता है। इसलिए प्रशंसा रूपी मिठास का सही समय पर, सही तरीके से उपयोग करना चाहिए और प्रशंसा करने का अवसर चूकना नही चाहीए। 

               
 

Wednesday, 6 November 2013

मानवता का प्रतीक है, सहयोग की भावना



मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जिसकी उन्नति सहयोग की बुनियाद पर निर्भर है। जिस प्रकार ईंट से ईंट जोङकर विशाल भवन बनता है, पानी की एक-एक बूंद से सागर बनता है। उसी प्रकार अनेक व्यक्तियों के परस्पर सहयोग से ही मनुष्य का विकास संभव है। समाज और राष्ट्र की समृद्धि परस्पर सहयोग पर ही निर्भर है।

पूर्ण विकास सहयोग से ही होता है। कोई भी व्यक्ति सर्वज्ञ नही होता। कलाकार के सामने डॉक्टर अयोग्य है, तो डॉक्टर के सामने इंजीनियर, तो कहीं साहित्यकार के सामने व्यपारी। कहने का आशय ये है कि, सभी अपनी-अपनी विधाओं में पूर्ण हैं किन्तु संतुलित विकास के लिए एक दुसरे का सहयोग अति आवश्यक है। सहयोग की आदतें मनुष्य में मैत्री भावना का विकास करती हैं। गौतम, महावीर, ईसा हों या कृष्ण, कबीर, राम, रहीम सभी महापुरुषों में मैत्री की भावना समान है।

धरती पर जैविक संरचना कुछ इस प्रकार है कि समाज से परे अकेले व्यक्ति का विकास संभव नही है। प्राणी में शरीर के सभी अंग मिलकर कर कार्य करते हैं तभी व्यक्ति अनेक कार्य करने में सक्षम होता है। इतिहास गवाह है कि रावण, कंस, दुर्योधन हो या हिटलर, मुसोलिन, चँगेज खाँ तथा नादिरशाह जैसे शक्तिसंपन्न कुशल नितिज्ञ थे किन्तु सभी ने सामाजिक भावना का निरादर किया जिसका परिणाम है उनका अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
  
सृजन का आइना है परस्पर सहयोग। जिस तरह आम के वृक्ष का विशाल अस्तित्व, मधुर फल, शीतल छाया दूसरें लोगों के सहयोग का ही परिणाम है। उसी प्रकार व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व समाज के प्रयत्नों का ही फल है।
मदर टेरेसा का कहना था कि, “आप सौ लोगों की सहायता नही कर सकते तो सिर्फ एक की ही सहायता कर दें।“ 

सच ही तो है मित्रों, एक और एक ग्यारह होता है, बूंद-बूंद से ही घङा भरता है। व्यक्ति और समाज का कल्याण इसी पर निर्भर है कि लोग व्यक्तिवाद की मानसिकता को छोङकर सहयोग के महत्व को समझते हुए उसे जीवन का अहम हिस्सा बना ले। सहयोग की भावना की एक शुरुवात से ही "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना सजीव होती है।


Friday, 1 November 2013

शुभ दिपावली




अमावस की अँधियारी रात में, रौशनी का आगाज हो।

माटी के इस दिपक में, ज्ञान की बाती और बुद्धि का प्रकाश हो।

सुख-समृद्धि की रंगोली से, हर आँगन मंगलमय हो।

स्वास्तिक की शुभता में, सबके सपने साकार हो।

भाई-चारे की मिठास में, चहुँ ओर दियों की मंगल कामना हो।

हार्दिक बधाई के साथ दिपों के प्रकाश में, दिपावली शुभ हो।

(पूर्व की पोस्ट के लिए लिंक पर क्लिक करें) -



 


Friday, 25 October 2013

आत्मनिर्भरता



आज की हाई प्रोफाइल और प्रतिस्पर्धा से भरी जीवन शैली में हम अपने बच्चों को सुपर किड देखना चाहते हैं। उसे शैक्षणिकं योग्यता के साथ-साथ अन्य विधाएं जैसे- नृत्य, गीत हो या तैराकी, घुङसवारी में भी योग्य बनाने का प्रयास करते हैं। ये सच है कि व्यक्तित्व को निखारने में शैक्षणिंक योग्यता के साथ इन शिक्षाओं का भी विशेष स्थान है। परंतु वास्तविकता में हम इस जद्दोजहद में एक महत्वपूर्ण शिक्षा को अनदेखा कर देते हैं। बच्चों को बचपन से उसकी जिम्मेदारियों से अवगत नही कराते। आलम ये है कि, सुबह उठाने से लेकर स्कूल के गृहकार्य तक लगभग सारे कार्य हम अभिभावक करते हैं। उम्र के अनुसार यदि बच्चों को उनकी जिम्मेदारियों का भी बोध कराएं तो निःसंदेह बङे होकर यही बच्चे समय प्रबंधन तथा आत्मनिर्भरता को समझ सकते हैं। परिवार तथा समाज के जिम्मेदार नागरिक बन सकते हैं, जो संपन्न राष्ट्र की महत्वपूर्ण ईकाइ है।

जिम्मेदारियों और फायदों के बीच सीधा संबंध होता है। घर के अन्य सदस्यों के समान ही छोटे-बङे कामों में बच्चों को शामिल करने से उनकी आत्मनिर्भता की बुनियाद मजबूत होती है। वही इमारत मजबूत होती है जिसकी नींव मजबूत होती है, उसी प्रकार बच्चे की बुनियाद आत्मनिर्भरता के सबक से बनाई जाए तो उसे कभी भी, किसी भी परिस्थिति में किसी के सहारे की जरूरत नही पङेगी। विषणु शर्मा द्वारा रचित पुस्तक पंचतंत्र में भी ये समझाया गया है कि राजा-महाराजाओं के बच्चों को भी बचपन से गुरुकुल में भेज दिया जाता था। जहाँ वे सुख-सुविधाओं से दूर पूर्णतः आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा ग्रहण करते थे।
पौधों में पानी देना, पालतु जानवर को खाना देना जैसा कार्य 7 साल के बच्चे से कराया जा सकता है। इससे उनमें प्रकृति को भी समझने की इच्छा होगी। पशु-पक्षी सभी अपने बच्चों को बहुत जल्द आत्मनिर्भर बनना सिखाते हैं। केवल इंसान ही अपने बच्चे को कुछ ज्यादा ही बच्चा समझता है और एक दिन युवा हुए बच्चे से ऐसी उम्मीद लगाता है कि वो सारी जिम्मेदारियाँ, आत्मनिर्भरता के साथ बहुत अच्छे से निभाए ये कैसे संभव हो सकता है। कमजोर लता जो दुसरों के सहारे बढती हैं वो कभी वृक्ष नही बन सकती। यदि व्यक्ति हर काम में दूसरे की मदद लेता है तो फिर उसे सदा दूसरों पर ही निर्भर रहने की आदत पड़ जाती है। यह आदत आगे चलकर कष्ट ही देती है। आत्मनिर्भरता से आत्मविश्वास उपजता है जो प्रत्येक कार्य को करने व उसमें सफल होने की प्रेरक शक्ति है। अत: दूसरों पर निर्भर रहने की बजाय अपने काम स्वयं करें।
विनोबा भावे आत्मनिर्भता के महत्व को समझते थे इसीलिए सर्वोदय आंदोलन में अन्य बातों के अलावा आत्मनिर्भर गांवों की कल्पना भी शामिल किए थे।  दिसंबर 1949 में हैदराबाद से वापस आने के बाद विनोबा जी ने पवनार आश्रम में इसका प्रयोग प्रारंभ किया था। उन्होंने बिना बैलों के आश्रम में खेती की और सब्जी बोई। सिंचाई के लिए पानी निकालना बड़ा कठिन कार्य था। रहट में एक डंडे के स्थान पर आठ डंडे लगाए गए जिसके फलस्वरूप एक घंटे में सात सौ चक्कर लगे, जबकि पहले केवल 25 चक्कर लगते थे। इस प्रकार थोड़े परिश्रम से भरपूर पानी मिला और देखते ही देखते समस्त भूमि हरी-भरी हो गई। ईंट पत्थर निकालने के बाद 125 मन सब्जी पैदा हुई। हाथों से की जाने वाली खेती को विनोबा जी ने ऋषि खेती का नाम दिया था। पानी की कमी को पूरा करने के लिए पांच-छ महीनों में खुदाई करके एक कुआं तैयार कर लिया गया। एक साल में ही खेती से 135 किलो ज्वार, 4 क्विंटल मूंगफली और 6 क्विंटल अरहर दाल पैदा हुई। आश्रमवासी अपने वस्त्र भी हाथ से कते सूत के ही पहना करते थे। इस प्रकार आश्रमवासी विनोबा जी के मार्गदर्शन में पूर्णरूप से आत्मनिर्भर हो गए। उसके बाद अनेक गांवों ने उनका अनुकरण किया। 

कहने का आशय है कि, बचपन से लेकर किशोरावस्था और युवावस्था तक विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए जब बच्चा सही अर्थो में जिम्मेदार बनता है, तो वो वास्तविक सुपरकिड बनता है। उसके यही प्रयास, अनुभव और आपसी जिम्मेदारियां उसे एक सफल इंसान बनाते हैं। वो अपने बल पर अपने लक्ष्य को पाने में कामयाब होता है।  

Tuesday, 15 October 2013

एक अपील

आपके अमुल्य तीन घंटे किसी की आँखों की रोशनी बन सकते हैं। अहिल्याबाई की पावन नगरी इंदौर के पाठकों से एक निवेदन है कि, इंदौर में Old GDC. Collage में B.A. 2nd Year की परिक्षाएं 23 अक्टुबर से शुरु हो रही है। वहाँ सामान्य छात्राओं के साथ कुछ दृष्टीबाधित छात्राएं भी परीक्षा देंगी, परिक्षा के समय सहलेखक (Scribe) की आवश्यकता की पूर्ती हेतु हम आपके सहयोग की अपेक्षा करते हैं। परिक्षा में सहलेखक का सहयोग केवल बालिकाएं ही दे सकती हैं। जो छात्रा 12वीं या B.A. 1st Year में अध्ययन कर रही है वे यदि दृष्टीबाधित बच्चियों की परिक्षा देने को इच्छुक हों तो, वे हमें मेल कर सकती हैं।

अधिक जानकारी के लिये आप हमें मेल कर सकते हैं। E-mail : voiceforblind@gmail.com

 मेरी पूर्व की अपील पढने के लिए लिंक पर क्लिक करें
http://roshansavera.blogspot.in/2013/04/a-request.html

 

Saturday, 12 October 2013

रावण का अंहकार


हम सब दशहरे का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक रूप में मनाते हैं। रावण बहुत बुद्धिमान और अनेक विद्याओं में निपुण था। फिर भी रावण के अन्त को हम सब बुराई का प्रतीक मानते हुए उसे जलाते हैं। प्रेमचन्द जी कहते हैं कि, आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन गरूर है।
रावण में भी सबसे बङी बुराई यही थी कि, उसे अंहकार का भ्रम हो गया था। अंहकार, व्यक्ति के जीवन को ऐसे नशे में डुबो देता है, जिसके कारण व्यक्ति स्वयं को सबसे श्रेष्ठ समझने लगता है और सोचता है कि पूरी दुनिया उसी से चल रही है। रावण में भी ऐसी भावना ने अपना रूप विकसित कर लिया था जिसका परिणाम ये हुआ कि सब कुछ अंहकार की ज्वाला में जल गया। वास्तव में अंहकार का कोई सच्चा अस्तित्व है ही नही। वीर का असली दुश्मन तो उसका अहंकार ही होता है।   

किसी ने सच ही कहा है, आप ने क्या कमाया उस पर कभी घमंड न करें क्योंकि शतरंज की बाजी समाप्त होने पर राजा और मोहरे एक ही डिब्बे में रख दिये जाते हैं।

अहंकार एक ऐसा बीज है जिससे कभी भी सकारात्मक फसल नही उगती बल्की बुराईयों की जङें गहरी हो जाती है। कहते हैं, अहंकार को कितना भी पोषण दीजिए उसकी तृप्ति संभव नही है। अहंकार तो गुब्बारे के समान है जो हवा भरने पर फूल जाता है यही हवा रूपी अहंकार जब ज्यादा हो जाता है तो गुब्बारा फूट जाता है। जरा सा कुछ हासिल हो जाने पर हम सब भी गुब्बारे की तरह फूल जाते हैं और अंहकार के वायरस को अपने भावों में समा लेते है। ये भूल जाते हैं कि कोई भी उपलब्धी किसी एक का परिणाम नही होती उसमें कई लोगों का योगदान होता है। कहावत को भूल जाते हैं कि, अकेला चना भाङ नही फोङता। हम हैं कि खुद को सर्वे-सर्वा समझ कर अहंकार की अग्नि में स्वयं को तबाह कर देते हैं।  

वाल्टेयर ने कहा है कि, “मनुष्य जितना छोटा होता है, उसका अंहकार उतना ही बड़ा होता है।“
अतः मित्रों सच्ची विजय या सही मायने में दशहरे का महत्व तभी है जब हम अपने अंदर के अहंकार रूपी रावण को ऊँचाई से उतार कर धरातल पर ले आयें। जन मानस की याद में अच्छे विचारों के साथ रहें। इसके लिए हमें विनम्रता और शालीनता को जीवन का अंग बना लेना चाहिए।

विद्वानों ने सच ही कहा है कि, “कभी भी कामयाबी को दिमाग में और नाकामयाबी को दिल में जगह नही देनी चाहिए क्योंकि, कामयाबी दिमाग में घमंड और नाकामयाबी दिल में मायुसी पैदा करती है।“

दशहरे से संबधित पूर्व की पोस्ट को पढने के लिए दिये गये लिंक पर क्लिक करें

 

 
 

 

Friday, 4 October 2013

माँ दुर्गा का अनुपम पर्व



जब हम भय की जगह निर्भय होकर प्रत्येक कठिनाई को परास्त करने में सक्षम हो जाते हैं और अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं तब शक्ति की कृपा का अनुभव होने लगता है। माँ दुर्गा शक्ति का रूप हैं। रणक्षेत्र में श्री कृष्ण ने युद्ध शुरु होने से पहले अर्जुन को माँ शक्ति की उपासना और आह्वान करने के लिए कहा था, जिससे न्यायसंगत शक्ति के साथ सफलता प्राप्त हो। जीवन भी एक प्रकार का संग्राम है। इसमें पल-पल परिस्थितियाँ बदलती रहती है। विपरीत परिस्थिती में भी स्वयं को कायम रखने के लिए एक विषेश प्रकार की शक्ति की आवश्यकता होती है। जो जीवन  मझधार में अटकी नैया को सकुशल अपने लक्ष्य तक पहुँचाने में मदद करती है। ऐसी ही अपरिमित शक्ति का भंडार गायत्री मंत्र (ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुवर्रेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्) के तीसरे अक्षर ‘स’ में समया हुआ है। जो शक्ति की प्राप्ति और सदुपयोग की शिक्षा देता है।

शक्ति और सत्ता, ईश्वर कृपा से प्राप्त होने वाली पवित्र धरोहर है, जो मनुष्य को इसलिए दी जाती है कि वह निर्बलों की रक्षा कर सके। परंतु यत्र-तत्र अक्सर देखने को मिल जाता है कि दुर्बल सबलों का आहार हैं। शक्ति तो वह तत्व है जिसके आह्वान से अविद्या, अंधकार तथा सभी परेशानियों का अंत हो जाता है। मन में शक्ति का उदय होने पर साधारण मनुष्य भी गाँधी, आर्कमडीज, कोलंबस, लेनिन, आइंस्टाइन जैसी हस्ती बन जाते हैं। बौद्धिक बल की जरा सी चिंगारी तुलसी, सूर, वाल्मिकी, कालीदास जैसे रचनाकारों को जन्म दे देती है।

माँ के इस अनुपम पर्व पर हम सभी अष्टभुजी दुर्गा की पूजा करते हैं। आठ भुजाओं से तात्पर्य हैः- स्वास्थ, संगठन, यश, शौर्य, सत्य, व्यवस्था, विद्या तथा धन। इन आठ विधओं का सम्मलित रूप ही शक्ति है। यदि हम सच्ची लगन के साथ माँ की उपासना निरंतर करें तो जीवन की यात्रा शक्ति की कृपा से निःसंदेह सुखद और सफल हो जाती है।

सर्वव्यापी, सर्वसम्पन्न माँ शक्ति की कृपा आप सभी पर सदैव बनी रही इसी मंगल कामना के साथ कलम को विराम देते हैं।

नोट- (नवरात्री से संबन्धित मेरी पूर्व की पोस्ट को पढने के लिए दिये गये लिंक पर क्लिक करें।)
जय माता दी

   

Tuesday, 1 October 2013

सत्य और अहिंसा के पुजारी

सत्य, अहिंसा  तथा देश हित को सर्वोपरी मानने वाले भारत के गौरव को शत्-शत् नमन।



मेरी पूर्व की पोस्ट को पढने के लिए लिकं पर क्लिक करें।





http://roshansavera.blogspot.in/search?updated-max=2012-10-04T10:57:00-07:00&max-results=10&start=6&by-date=false

Wednesday, 25 September 2013

श्राद्धपक्ष



श्रद्धा के साथ अपने पूर्वजों को नमन करने का पक्ष है श्राद्ध पक्ष। हमारे अपने हमेशा हम सभी के साथ रहते हैं, भले ही वो सशरीर हमारे बीच न हों किन्तु उनकी आवाज, रंगरूप और उनके द्वारा दिए संस्कार हमेशा हमारे साथ होते हैं। सम्मान और आदर के साथ याद करना ही श्राद्ध पक्ष पर सही तरपण है। जिस तरह किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेंश जी का ध्यान करते हैं उसी तरह गणेंश वंदना के पश्चात हम सभी, प्रत्येक शुभ कार्य से पहले अपने पूर्वजों का भी आर्शिवाद लेते हैं। इसी क्रमानुसार दस दिनों तक गणेंश जी के विराजने के तुरंत बाद हम सभी अपने-अपने पूर्वजों को नमन एवं वंदन करते हैं। शब्दों के माध्यम से हम अपने पूर्वजों को सादर भावांजली अर्पित करते हुए समाज में कुछ अस्वाभाविक संस्कारों पर अपने विचार रखने का प्रयास किए हैं, जिसे निचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढा जा सकता है।



http://roshansavera.blogspot.in/2012/10/blog-post_7.html