Saturday, 9 May 2015

मातृ दिवस विशेष


मित्रों, हम सब मदर्स डे बहुत उत्साह से मनाते हैं, सच कहें तो माँ के सम्मान में एक दिन क्या वर्ष के 365 दिन भी कम हैं। 
जो जन्म देती है वो हमारी माँ है, इसके अलावा हम भारतीयों के लिये माँ का स्वरूप लिये गौ माता तथा धरती माता हैं, जिनका हमारे अस्तित्व को कायम रखने में विशेष स्थान है। आदि काल से गाय को माता के समान माना जाता है। यदि किसी कारण वश बच्चे को माँ का दूध नही मिल पाता तो नवजात शिशु को गौ माता का ही दूध दिया जाता है। गौ माता, पृथ्वी, प्रकृति तथा परमात्मा का स्वरूप है। भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति सुजाता द्वारा प्रदत्त गौ दूध की खीर से हुई थी। बाईबिल एवं कुरान में भी गौ माता की महिमा का उल्लेख है। वैज्ञानिकों ने जिस प्रकार विज्ञान का विकास किया उसी प्रकार आध्यात्मिक मनिषियों ने गौ विज्ञान का आविष्कार किया। गाय के दूध से समस्त समाज को शक्ति, बल एवं सात्विक बुद्धी प्राप्त होती है। गाय का गोबर एवं मूत्र खेती के लिये पोषण का कार्य करते हैं। एक सर्वे के अनुसार जापान जैसे आधुनिक टैक्नोलॉजी वाले देश में गाय के गोबर से बनी खाद को सबसे अच्छी खाद मानते हैं। गाय धरती पर एक मात्र प्राणी है जो ऑक्सीजन ग्रहंण करती है और ऑक्सीजन छोङती भी है। वो प्रकृति से 21%  ऑक्सीजन लेती है और 5%  लेकर 16%  प्रकृति को वापस कर देती है। गाँव प्रधान एवं कृषी प्रधान देश भारत में गौ माता का कोई विकल्प नही है , फिर भी  आज हम अपनी संस्कृति, गौ माता को अनदेखा कर रहे हैं। प्लास्टिक की थैलियों के रूप में उसे खाने को जहर दे रहे हैं। आज कई गौ माता की मृत्यु प्लास्टिक की थैलियां खाने से हो रही है, जिसे हम सभी जाने अंजाने में उसे दे रहे हैं। मानव संस्कृति की समृद्धि गाय की समृद्धि से जुङी हुई है। अतः हमें अपनी गौ माता को यत्र-तत्र बिखरी प्लास्टिक की थैलियों से बचाना होगा। यदि हम देश का विकास चाहते हैंं तो हमें हर हाल में गौ माता की रक्षा करनी होगी।  

हम सबकी एक और माँ है वो है धरती माँ, जिसकी वजह से हम सबको रहने के लिये घर और जिवित रहने के लिये भोजन प्राप्त होता है। धरती पर ही अनाज, फल, फूल, साग सब्जियाँ इत्यादी उगते हैं जिससे सभी सजीव जगत का पालन पोषण होता है। पुराणों के अनुसार धरती को सदैव माता माना गया है और यहाँ तक की धरती पर पैर रखना भी पुराणों में पाप मान जाता है लेकिन धरती पर पैर रखे बिना व्यक्ति कोई कार्य नही कर सकता इसलिये सुबह-सुबह धरती पर पैर रखने से पहले क्षमा-याचना हेतु पुराणों में एक श्लोक दिया गया है, 

समुंद्रवसने देवी पर्वतस्तन मंडिते।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व में।। 
अर्थात समुद्र रूपी वस्त्र पहनने वाली पर्वत रूपी स्तनों से मंडित भगवान विष्णु की पत्नी, हे माता पृथ्वी, आप मुझे पाद (पांव) स्पर्श के लिए क्षमा करें। 


ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, ये श्लोक तो बहुत कम ही लोग अपने दैनिक जीवन में पढते होंगे। बरहाल धरती माता को आज सबसे बङा खतरा ग्लोबल वार्मिंग से है और रही सही कसर भू माफिया के आतंक से है। रत्नगर्भा, वसुंधरा को इस धरती के उन लोगों से सबसे ज्यादा खतरा है जो हरी भरी धरा को कंक्रीट के जंगलो में बदल रहे हैं। 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया जाता है, किन्तु मित्रों, सिर्फ एक दिन की जागरुकता से हम अपनी धरती माता की मुस्कान वापस नही कर सकते। इसके लिये हमें हर पल प्रयास करना होगा नये पेङ पौधों से धरती माँ की हरियाली को वापस लाना होगा। 

मित्रों, गौ माता और धरती माता एक दूसरे की पूरक हैं। पुराणों और शास्त्रों में भी गौ माता को धरती माता का जीवन्त रूप माना गया है। इन दोनों का ही हम सबके जीवन में उतना ही महत्व है जितना की हमारी जन्मदात्री माँ का। अतः आज हम सब ये संकल्प करें कि, गौ माता तथा धरती माता की हर संभव रक्षा करेंगे। 

एक निवेदनः-  दिये गये लिंक पर क्लिक करके उसे अवश्य पढें

Special Mother: पन्ना धाय

धन्यवाद
अनिता शर्मा 




Saturday, 2 May 2015

निःस्वार्थ सहयोग से जिंदगी को रौशन करें


मित्रों, अरबों की आबादी वाले देश में आज विकास की गति भी अपनी आधुनिक तकनीक से दिन प्रतिदिन बढ रही है और जनसंख्या की बात करें तो अपना देश भारत, विश्व में चीन के बाद दूसरे नम्बर पर है। विकास की इस चाल में कहीं कुछ पिछङता हुआ भी नजर आ रहा है। जगजीत सिंह की गजल पर गौर करें तो, "हर जगह हर तरफ बेशुमार आदमी फिर भी तनहांईयों का शिकार आदमी"  ये पंक्ति आज की सच्चाई बयां करती है। आज हम तरक्की की इबारत लिख रहे हैं और जिंदगी के सफर में हर दिन  इंसानो की भीङ से दो चार हो रहें हैं और इस भीङ भरी आँधी में इंसानियत के अपनेपन को तङपते हुए भी देख रहे हैं।  हमारी भारतीय संस्कृति की धरोहर सहयोग की भावना, विकास की इस आँधी में दूर होती नजर आ रही है। हम ये नही कह सकते कि सहयोग की भावना खत्म ही हो गई क्योंकि आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने दर्द को भूलकर दूसरों के जीवन को खुशहाल करने का भाव रखते हैं और हर संभव प्रयास भी करते हैं। जैसा कि, आप सभी पाठकों को पता होगा कि मई-जून में भारत के लगभग सभी राज्यों में परिक्षा का मौसम होता है और हर कोई अच्छे नम्बर लाने की कोशिश करता है ताकि अच्छे नम्बरों वाली डिग्री से अच्छी नौकरी मिले तथा जीवन सुखमय हो जाये। करोणों की संख्या वाले विद्यार्थियों के बीच कुछ हजारों की संख्या में ऐसे भी विद्यार्थी हैं जो वर्षभर मेहनत से पढते हैं लेकिन समाज और सरकार की उदासीनता की वजह से परिक्षा नही दे पाते क्योंकि वो देख नही सकते उनको परिक्षा में सहलेखक की आवश्यकता होती है, परंतु ऐसे जरूरत के समय पर हममें में से कई लोगों के पास  दूसरों के लिये वक्त नही होता। ऐसे में  हाल ही में गुजरात की एक घटना  आप सबसे शेयर करना चाहेंगे। वहाँ महाविद्यालय की परिक्षा चल रही है। अहमदाबाद में सामान्य विद्यार्थियों के बीच कुछ दृष्टीबाधित बच्चे भी अपने सपनो को साकार करने का प्रयास कर रहे हैं। इसी क्रम में अंध कल्यांण केन्द्र की दृष्टिबाधित बालिका हेतल को भी B.A. II year की परिक्षा देनी थी लेकिन उसे कोई राइटर नही मिला तो उसके ही संस्था की अल्पदृष्टीबाधित बालिका प्रियंका उसका पेपर लिखने को तैयार हो गई हालांकी प्रियंका के लिये ये आसान नही है क्योंकि अल्पदृष्टी के साथ कॉलेज के पेपर को लिखना किसी साहस से कम नही है। फिर भी प्रियंका अपनी दोस्त हेतल का पेपर देने में पुरा सहयोग दे रही है क्योंकि वह अपनी दोस्त हेतल के सपनों को साकार करना चाहती है। ऐसे में उसे अपनी परेशानी बहुत छोटी नजर आ रही है। प्रियंका जैसे और भी कई लोगों से मेरा सामना हुआ जो अपनी तकलीफ को दरकिनार करते हुए दूसरों की मदद के लिये सदैव तत्पर  रहते हैं। इंदौर में एक बालिका वर्षा, पोलियो  से ग्रस्त है फिर भी उसने अपनी पढाई अच्छे से पूरी की और ट्राईसिकल पर रोज दृष्टीबाधित बालिकाओं की मदद करने जाती थी। ऐसा ही एक वाक्या और है जब हम इंदौर में राइटर के लिये समाचार पत्र में अनुरोध किये तो देवास से एक विकलांग बालक विनय ने हमें फोन किया कि हम परिक्षा देने को तैयार हैं। मित्रों, ऐसे लोगों के जज़बों को हम और हमारा वाइस फॉर ब्लाइंड क्लब सलाम करता है। हालांकी समाचार पत्र में दिये इश्तेहार से कई दृष्टीसक्षम लोग भी सहायता के लिये आगे आये और उन लोगों ने सहयोग भी दिया और दे भी रहे हैं किन्तु जितनी आवश्यकता है राइटर की उतनी पूर्ती नही हो रही है तभी तो हमारे देश में हेतल जैसी छात्राओं या छात्रों को राइटर का अभाव आज भी सहना पङ रहा है। एक कहावत है जाके पङे न पैर बवाई वो क्या जाने पीर पराई। दोस्तों, इस कहावत को झुटला दिजीये और जिंदगी की तेज रफ्तार में अपने मन में उन लोगों के दर्द का एहसास महसूस किजीये जिन्हे आपकी जरूरत है। आइये हम सब मिलकर निःस्वार्थ भाव से भारतीय संस्कृति को गौरवान्वित करें और अपने सहयोग से हजारों दृष्टीबाधित लोगों की जिंदगियों को रौशन करें। आपका सकारात्मक सहयोग किसी के सपने को साकार कर सकता है।  
धन्यवाद

एक अनुरोधः- आप में से जो भी पाठक दृष्टीबाधित लोगों की मदद करना चाहते हैं,  वो ब्लॉग में अटैच फार्म को भरकर अपने सहयोग का क्षेत्र बतायें। 





Monday, 27 April 2015

अनोखी पहल

भारत की आजादी के 68 साल बाद आखिर देश के प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान में भारतीयता ने दस्तक दे दी। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय में 2015 के दिक्षांत समारोह का रंग भारतीय संस्कृति से रंग गया, जब सभी छात्रों ने नई परंपरा की शुरुवात की। बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय के 97 वें दिक्षांत समारोह में सभी छात्रों ने अंग्रेजो की परंपरा यानी की काले गाउन को नकार दिया। छात्रों ने मदन मोहन मालवीय जी की तरह धोती-कुर्ता और सर पर उनके जैसी ही टोपी पहन कर दिक्षा ली और छात्राओं ने लाल रंग के बार्डर वाली सफदे साङी पहनी तो कुछ छात्राएं सफदे सलवार कुर्ते में सर पर साफा लगाए नजर आईं। माँ सरस्वती के आँगन में एक नई किरण का आगाज हुआ। ये नई पहल बनारस हिन्दु विश्वविद्याल के कुलपती  प्रो. जे.सी.त्रीपाठी जी के प्रोत्साहन का ही परिणाम है। 

मैकाले की शिक्षा प्रणाली के बंधनो से आजादी की पहली और सकारात्मक शुरुवात है। वास्तव में ये शुरुवात अंधकार से उजाले की ओर बढता कदम है, जो श्वेत वस्त्र घारण किये हुए कमल पर विराजमान माँ सरस्वती की शुद्ध अर्चना एवं वंदना है। 
धन्यवाद

निवेदनः-  दिये गये लिंक को अवश्य पढें

आजादी के 60 साल बाद भी क्या हम आजाद हैं ??



Thursday, 23 April 2015

आज के बालक भारत का भविष्य हैं

मित्रो, जिस तरह से आज समाज में बाल अपराध बढ रहे हैं और नाबालिग बच्चे, ऐसे जघन्य अपराध को अंजाम दे रहे हैं, वो  किसी भी सभ्य समाज के लिये कलंक से कम नही है। आज के वातावरण को देखते हुए किशोर न्याय अधिनियम 2014 संशोधन बिल पर कैबिनेट की मोहर एक सार्थक कदम है। पिछले कुछ वर्षों से नाबालिग बच्चों द्वारा हत्या, दुश्कर्म तथा तेजाबी हमले तेज हुए हैं लेकिन उन्हे पुराने अधिनियम के अनुसार सख्त सजा का प्रावधान नही था जिससे अपराधिक मानसिकता की प्रवृत्ति ने निर्भया जैसी घटना को अंजाम दिया। आज भी देश निर्भया कांड को याद करके सिहर जाता है। आठवीं में पढने वाला बालक अपनी शिक्षिका की रिवाल्वर से हत्या कर देता है तो कहीं 10 से 12 वर्ष के बालक अपने साथी का अपहरण करके उसकी हत्या कर देते हैं। पिछले कुछ वर्षों से तो,  लङकियों और महिलाओं पर नाबालिग किशोरों द्वारा तेजाबी मानसिकता का कहर कुछ ज्यादा ही हो रहा है। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि, किसी भी अपराध की सजा उसकी जघन्यता के आधार पर होनी चाहिये न की उम्र या लिंग के आधार पर । जिस दिन जे जे एक्ट संशोधन विधेयक पर संसद की मुहर लग जायेगी उस दिन से शायद इस तरह के अपराध में कमी आयेगी।

दोस्तों, मेरे मन में बाल अपराध को लेकर कुछ मंथन चल रहा है इसलिये मैने अपनी पूर्व की लाइन में शायद शब्द का इस्तमाल किया है क्योंकि ये जो बाल अपराध का ग्राफ दिन-प्रतिदिन बढ रहा है, उसके लिये जिम्मेदार क्या सिर्फ नाबालिग बच्चे हैं ! या समाज और परिवार भी। आज हम सब एक सभ्य सुंदर और सुसंस्कृत भारत की कल्पना करते हैं।  सुरक्षित वातावरण की भी कामना रखते हैं किन्तु अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को दरकिनार कर देते हैं। मेरा मानना है कि, कोई भी शिशु जन्म से अपराधी नही होता उसके लिये अनेक कारण समाज में विद्यमान हैं। हमारा कानून भी इस बात को मानता है कि,  बालकों में बढ रही अपराधिक मनोवृत्ति के पीछे सामाजिक ढांचा भी जिम्मेदार है। आज तो आलम ये हो गया है कि, संभ्रान्त परिवार के बालक भी अनेक अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। किसी भी समाज की पहली ईकाइ होती है परिवार जहाँ बालक का प्रारंभिक विकास होता है। आज-कल अक्सर  देखने को मिल रहा है कि, बच्चे की परवरिश बहुत आधुनिक ढंग से हो रही है। वास्तव में (Actully) आधुनिकता गलत नही है बल्कि आधुनिकता का अधुरा ज्ञान दिमक की तरह समाज को खोखला कर रहा है। आज बच्चों के हाँथ में इंटरनेट से सुसज्जित मोबाइल, आई पेड और स्कूल जाने  के लिये बाइक या कार कानूनी उम्र सीमा से पहले ही परिवार द्वारा मिल जाती है। यदि स्कूल या ट्राफिक नियम इसे रोकते हैं तो परिवार द्वारा हर्जाना भर दिया जाता है। ऐसे ही छोटे-छोटे अपराधों को कई परिवारों का सपोर्ट मिलता है और बच्चों का कानून से डर खत्म हो जाता है। इसके अलावा समाज में व्याप्त फिल्मों तथा विज्ञापनों का खुलापन एक नासूर की तरह अपरिपक्व बच्चों को डस रहा है। जिसका परिणाम आज का बढता बाल-अपराध है। यदि शुरुवात में ही छोटे-छोटे अपराधों को अभिभावकों द्वारा रोका जाए तो एक हद तक बच्चों में सुधार लाया जा सकता है। 

आज के बालक  हमारे भारत देश का भविष्य हैं। अतः हम सबको मिलकर भविष्य के कर्णधार की नींव को सुसंस्कारों से पल्लवित करना है। बाल्यकाल की गलतियों को बढावा देने की बजाय समय रहते ही उसे सुधारना हम सबकी नैतिक और आवश्यक जिम्मेदारी है।

Children are like different type of flowers, So irrigate them good manners and make this world a beautiful garden 

नोटः- दिये गये लिंक को अवश्य पढें, धन्यवाद 

बदलता बचपन जिम्मेदार कौन ????








Saturday, 18 April 2015

साहस और आत्मविश्वास

मित्रों, जीवन में कई बार परिस्थिती हमारे अनुकूल नही होती। अक्सर कुछ कठिन परिस्थितियाँ हमारे साहस और विश्वास की परिक्षा लेती रहती हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि, समस्याएं समुंद्र की तरह विशाल और उसकी प्रचंड लहरें सब कुछ तहस-नहस कर देंगी। ऐसी परिस्थिती पर विजय पाने के लिए हमें साहस के साथ अपने आत्मविश्वास के बल पर इससे मुकाबला करना चाहिए क्योंकि साहस और आत्मविश्वास वो शक्ति है जिससे सभी परेशानियों को दूर किया जा सकता है। ये वो आधार हैं, जिससे दृणइच्छाशक्ति को बल मिलता है। 

चर्चित मनोवैज्ञानिक लुईस एल के अनुसार, यदि व्यक्ति को कामयाबी हासिल करनी है तो, साहस के साथ आत्मविश्वास के कवच को धारण करना ही होगा। काम कोई भी हो उसमें दिक्कतें न आएं ये तो संभव नही है किन्तु परेशानियों को आत्मविश्वास के साथ पार करना संभव है। यदि हम ह्रदय में अविश्वास और विफलता का डर लाते हैं तो कभी भी सफल नही हो सकते। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो ये दर्शाते हैं कि, निडरता और विश्वास से सफलता की राह आसान हो जाती है। शिवाजी और रानी लक्ष्मीबाई के विश्वास भरे साहस से मुगलों और अंग्रेजों के हौसले भी परास्त हो गये थे। विलियम पिट को जब इंग्लैंड के प्रधानमंत्री पद से हटाया गया था, तब उन्होने डेवेनशायर के ड्यूक से निडरता के साथ कहा था कि, इस देश को मैं ही बचा सकता हुँ, इस कार्य को मेरे सिवाय दुसरा कोई नही कर सकता। 11 हफ्ते तक इंग्लैंड में उनके बिना काम चला लेकिन अंत में पिट को ही योग्य मानते हुए उन्हे प्रधानमंत्री बनाया गया। कोलंबस ने अपने साहस और विश्वास के बल पर अमेरीका की खोज की। घनश्याम दास बिङला की शिक्षा सिर्फ पाँचवी तक हुई थी। लेकिन उनके मन में एक सफल उद्योग करने का जज़बा था। उन दिनो जूट का व्यपार केवल अंग्रेज करते थे। अंग्रेजों ने बिङला को कर्ज देने से भी इंकार कर दिया। उन्हे मशीने भी दुगने दाम में खरीदनी पङी, फिर भी साहस और आत्मविश्वास के धनी बिङला ने सभी मुश्किलों का डटकर सामना किया, नतिजा आज सब जानते हैं। बिङला ग्रुप आज प्रतिष्ठित और संपत्तिशाली उद्योग घराना है। 

मित्रों, खुद पर अटूट विश्वास और आगे बढने का साहस ही हमें सफलता का एहसास कराता है। व्यक्ति जब स्वंय पर विश्वास करता है तो उसका आत्मबल प्रकट होता है। शक्तियाँ और क्षमताएं तो हर किसी में मौजूद होती हैं, सिर्फ उसे पहचानने की जरूरत है। अपनी क्षमताओं को जानकर ही हम बेहतर विश्व का निर्माण कर सकते हैं और ये तभी संभव है जब हम अपने विश्वास को साहस के साथ व्यवहार में लायेंगे। आत्मविश्वास भी तभी मजबूत होता है जब हम निडरता के साथ सभी बाधाओं को फेस करते हैं। दुनिया भी उसे ही याद रखती है जो साहस और आत्मविश्वास के साथ अपना रास्ता खुद बनाता है। जीवन की अनेक बाधाओं के बावजूद साहस,  दृणता और  विश्वास  के साथ लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। 

किसी ने सच ही कहा है,  मुश्किलों से डर के भाग जाना आसान होता है। हर पहलु जिंदगी का इम्तहान होता है। डरने वालों को मिलता नही जिंदगी में कुछ, साहस और आत्मविश्वास के साथ आगे बढने वालों के कदमों में जहान होता है। 





Tuesday, 7 April 2015

आपका थोङा सा समय किसी को आत्म सम्मान से जीने का अवसर दे सकता है


Friends, शिक्षा वो हथियार है जिसके माध्यम से आत्म सम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन यापन किया जा सकता है। वाइस फॉर ब्लाइंड क्लब का उद्देश्य भी है कि, Visual Impaired Students को शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाना। जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें और विचारों का सामजस्य कर सकें वही शिक्षा वास्तविक शिक्षा है। अध्ययन के दौरान सभी को बहुत मेहनत करनी पङती है और उच्च तथा सफल शिक्षा के लिये कई बार मन पसंद चीजों का त्याग भी करना पङता है। यदि हम बात करें दृष्टीबाधित बच्चों की तो उनको अध्ययन के दौरान सामान्य बच्चों की अपेक्षा अधिक परेशानियों का सामना करना पङता है। मैने देखा है कि अनेक दिक्कतों के बावजूद वो पढना चाहते हैं, शिक्षा के माध्यम से समाज में गौरवपूर्ण स्थान के लिये बहुत मेहनत भी करते हैं। परंतु उनके अध्ययन के दौरान कुछ ऐसी भी समस्याएं आती हैं जहाँ उनको दृष्टीसक्षम लोगों पर निर्भर होना पङता है। जैसे कि, पुस्तक को रेर्काड करवाने के लिये तथा परिक्षा में सह लेखन के लिये। आज विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है जिसके कारण लाइफ थोङी आसान हो गई है। कम्प्युटर के आविष्कार से किसी भी प्रकार की शारीरिक विकलांगता अब समस्या नही है। लेकिन कम्प्युटर का उपयोग काफी हद तक बिजली पर निर्भर है और बिजली की स्थिति हमारे कुछ शहरों में छोङ दी जाये तो बाकी जगह भगवान भरोसे है। ऐसे में कम्प्युटर तथा कम्प्युटर का ज्ञान काम नही आता। आज कई दृष्टीबाधित बच्चे कम्प्युटर ज्ञान से परिपूर्ण हैं फिर भी परिक्षा के समय उन्हे राइटर के लिये  मानवीय सहारे की आवश्यकता होती है, वे चाहकर भी कम्प्युटर के माध्यम से परिक्षा नही दे सकते। 

अतः हम आप सबसे निवेदन करते हैं कि, आप लोग इस नेक कार्य में अपना सहयोग दें क्योंकि आपका थोङा सा समय किसी को आत्म सम्मान से जीने का अवसर दे सकता है। यदि आप राइटर या रेर्काडिंग के लिये अपना योगदान देना चाहते हैं तो, आप हमारे क्लब वाइस फॉर ब्लाइंड के सदस्य बन सकते हैं। अधिक जानकारी के लिये लिंक पर क्लिक करें।
धन्यवाद 
Cooperate the blind

दृष्टीबाधितों की सहायता कैसे कर सकते हैं

Wednesday, 25 March 2015

परिक्षा में नकल सफलता का आधार नही है

आधुनिक सदी में शिक्षा ही एकमात्र ऐसा सशक्त  हथियार है जो पूरी दुनिया को बदलने की ताकत रखता है। बाल्यकाल की शिक्षा तो उस नींव के समान है जिस पर उज्जवल भविष्य की ईमारत खडी होती है। बाल्यकाल से ही शिक्षा के प्रति जागृति का असर जिवन पर्यन्त लाभ देता है। शिक्षा समाज में नैतिकता की परिचायक है, परंतु विगत कुछ समय से शिक्षा के क्षेत्र में जिस तरह की अनैतिकता का जन्म हुआ है, वो किसी भी समाज, देश तथा दुनिया के पतन का मुख्य कारण है। आज आधुनिकता के साथ शिक्षा के क्षेत्र में नकल के लिए नए-नए आइडियाज का आविष्कार हो रहा है। एक फिल्म आई थी मुन्नाभाई एम बी बी एस जिसमें मोबाइल जैसे नए उपकरण का उपयोग परिक्षा में नकल करने के लिये किया गया था।  पिछले सप्ताह टीवी चैनलों पर नकल की जो तस्वीर नजर आई वो तो सीधे तौर पर दादागीरी है जो स्कूल प्रशासन तथा सरकार की कमजोर सुरक्षा प्रणाली को उजागर करती है। उत्तरपुस्तिकाओं को बदल देना तथा पैसे के बल पर डिग्रियाँ खरीदना आमबात होता जा रहा है।  जिन राज्यों की तस्वीर टीवी पर दिखाई गई, ये वो राज्य हैं जहाँ नालन्दा विश्वविद्यालय तथा काशी हिन्दु विश्वविद्यालय जैसे विश्व प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान स्थित हैं। आज चंद लोगों की अनैतिक शिक्षा नीति के कारण इन प्रसिद्ध शिक्षण संस्थानो को भी शर्मिन्दा होना पडा क्योंकि सम्पूर्ण राज्य की डिग्री पर ही आज प्रश्न चिन्ह लग गया है। परिक्षा में नकल के वायरस से भारत के कई राज्य ग्रसित हैं।  शॉर्टकट से सफलता पाने की ये मनोवृत्ति किसी भी समाज तथा देश के लिए हानिकारक है। आज तो अफसोस इस बात का भी है कि नकल जैसे अपराध को हमारे राजनेता अनुचित नही मानते और बयान देते हैं कि, मेरे शासन में तो मैं, परिक्षा में  उत्तर लिखने के लिए किताब दे देता। यदि यही सोच है तो,  परिक्षा जैसे प्रावधान की जरूररत ही क्यों है?  बच्चों को बिना परिक्षा के ही पास की डिग्री दे देना चाहिए। स्कूली परिक्षाओं के बाद विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित प्रवेश परिक्षाओं तथा प्रशासनिक सेवाओं में कार्य करने हेतु जो प्रवेश परिक्षाएं होती हैं, उसमें आशातीत परिणाम न मिलने पर युवा वर्ग जिस अवसाद में जाकर आत्महत्या जैसी कोशिशों को अंजाम देता है, उसके लिए बाल्यकाल की शिक्षा प्रणाली बहुत हद तक जिम्मेदार है। आज आबादी का एक बहुत बङा तबका गलत शिक्षा निती के कारण पिछङता जा रहा है। लाखों युवा डिग्री होने के बावजूद बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। इस त्रासदी के जिम्मेदार सिर्फ बच्चे ही नही हैं बल्की अभिभावक, सरकार तथा स्कूल प्रशासन भी बराबर के जवाबदार हैं। आज समाज में बढती आत्महत्या की मानसिकता, अपराधीकरण तथा दिन प्रतिदिन बढता अनैतिक माहौल, हमारी बिमार शिक्षा प्रणाली का ही परिणाम है। नकल का वायरस दिमक की तरह सभ्य समाज को खोखला कर रहा है। भारत का भविष्य आज के बच्चे हैं, भविष्य को सच्ची और सार्थक शिक्षा का मार्ग दिखाना वर्तमान की जिम्मेदारी है। Education is not a Problem. Education is an Opportunity दोस्तों, यदि समय रहते हमलोग नही जागे तो अनुचित तरीके से प्राप्त डिग्रियां इंटरव्यु तथा प्रवेश परिक्षाओं की असफलता को बर्दाश्त नही कर पायेंगी। जिसके परिणाम में लाखों युवा अवसाद के आगोश में चले जायेंगे। 

अतः सभी विद्यार्थियों से मेरा निवेदन है कि, शॉर्टकट को न अपनाएं अपनी मेहनत और बुद्धी के दमपर अपनी योग्यता को सिद्ध किजिए। विद्यार्थी जीवन में कितनी भी शारीरिक, प्राकृतिक और वैचारिक बाधाँए आए फिर भी हमें अपना आत्मविश्वास बनाये रखना चाहिये क्योंकि परिक्षा में नकल करना किसी भी ज्ञान या परिक्षा को पास करने का समाधान नही है। ईमानदारी से प्राप्त शिक्षा तो उस प्रकाश के समान है जो विद्यार्थी के जिवन को पतन के अंधकार से दूर करती है। शिक्षा व्यपार की वस्तु नही है बल्की वास्तविक और सच्ची शिक्षा व्यक्ति के आत्मिय विकास में अह्म योगदान देती है और उसे सफलता के शिखर पर पहुँचाती है।  शिक्षा तो सभ्य समाज की नीव है इसे नकल के वायरस से बचाना हमसब की नैतिक जिम्मेदारी है क्योंकि परिक्षा में नकल सफलता का आधार नही है।   Respected A.P.J. Kalam says, 
                       Learning gives creativity,
                       Creativity leads thinking,
                       Thinking provides knowledge,
                       Knowledge makes you great. 








Sunday, 22 March 2015

देशभक्त सरदार भगत सिंह


आज हम लोग जिस आजाद फिज़ा में सांस ले रहे हैं, उसके लिए अनेक देशभक्तों ने अपना सर्वस्य बलिदान कर दिया था।  अपने जीवन की आहुति देकर भारत माता के अनेक सपूतों ने भारत माता को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराया। सरदार भगत सिंह उन्ही सच्चे सपूतों में से एक हैं। भगत सिंह ने अपने जीवन की आहुति देकर ये सिद्ध कर दिया कि वे भारत माता के सच्चे सपूत थे। भगत सिंह सिर्फ क्रांतिकारी ही नही थे बल्की उनके व्यक्तित्व के और भी पहलु ऐसे हैं, जो उन्हे महान बनाते हैं। विलक्षण प्रतिभा के धनी भगत सिंह भारतीय क्रांति के दार्शनिक तथा सुलझे हुए लेखक भी थे। 1930 में उन्होने संपादक मॉर्डन रिव्यु के नाम से एक पत्र लिखा था। जो भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज के नाम से संकलित है। इस पत्र में भगत सिंह ने क्रांति के प्रति अपने दृष्टीकोंण को व्यक्त किया था। उनके अनुसार " क्रांति (इंकलाब) का मतलब अनिवार्य रूप से सशत्र आंदोलन नही होता। विद्रोह को क्रांति नही कहा जा सकता, यद्यपि ये हो सकता है कि विद्रोह का अंतिम परिणाम क्रांति हो।"

जन आंदोलन के प्रति भगत सिंह का दृष्टीकोंण बहुत स्पष्ट था। 1929 में लाहौर के ट्रिब्युन में प्रकाशित विद्यार्थियों के नाम पत्र लिखते हुए कहा था कि, " हम इस समय विद्यार्थियों से  बम और पिस्तौल उठाने को नही कह सकते उनके सामने और भी महत्वपूर्ण कार्य हैं। भगत सिंह का एक महत्वपूर्ण गुंण था उनका लचिलापन जिसके कारण वो रुढीवादी, अढियल स्वभाव के नही थे। महात्मा गाँधी के विचारों से मतभेद रखने के बावजूद वे कांग्रेस द्वारा संचालित जन-आंदोलन में बढ-चढ कर हिस्सा लेते थे। अपनी गिरफ्तारी के दौरान उन्होने भूख हङताल जैसे शस्त्र को भी अपनाया। यद्यपि ये अस्त्र गाँधी जी का था, लेकिन जेल में कैदियों की स्थिति में सुधार लाने के लिए इस अस्त्र को भी अपनाने में भगत सिंह ने  संकोच नही किया। भगत सिंह जेल में भूख हङताल के दौरान इतने प्रसिद्ध हो गये थे कि 30 जून 1929 को पूरे देश में भगत सिंह दिवस मनाया गया था। लाला लाजपत राय से भगत सिंह का संबध क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास का दिलचस्प अध्याय है। वैचारिक भेद होने के बावजूद भगत सिंह ने लाला लाजपत राय की मृत्यु को राष्ट्रीय अपमान समझा और उन्होने योजनाबध तरीके से इस राष्ट्रीय अपमान का बदला भी लिया। देशप्रेम का ज्वार उनके रग-रग में समाया हुआ था। उनका कहना था कि, मेरे जज़बातों से इस कदर वाकिफ है कलम मेरी कि, इश्क भी लिखना चाहुँ तो इंकलाब लिख जाता है। 

भगत सिंह को जेल में अमानविय यातनाओं से गुजरना पडा था फिर भी उनके चेहरे पर शिकन नही रहती थी।इंकलाब जिंदाबाद का नारा सदैव बुलंद आवाज में गुंजायमान करते थे।  न्यायालय में जब भगत सिंह पर अभियोग की चर्चा हो रही थी तब उनके समर्थक उन्हे लाहौर जेल से छुडाने की योजना बना रहे थे लेकिन  भगत सिंह ने अपने समर्थकों को समझाया कि दो-चार व्यक्तियों के लिए मैं इतने अधिक लोगों का रक्तपात  नही देख सकता।  उनका कहना था कि व्यक्ति विशेष को महत्व न देकर राष्ट्र के स्वतंत्रता आंदोलन को महत्व देना चाहिए। सरदार भगत सिंह की जिंदगी, क्रांतिकारी रणनितियों को लेकर दुःसाहसिक प्रयोगों से भरी हुई थी। 

ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि,  आजादी के दौरान जन-मानस में क्रांति की चिंगारी जलाने वाले शहीद भगत सिंह का नाम भारत के भाल पर सुनहरे अक्षरों से लिखा हुआ है। भगत सिंह के बलिदान ने आजादी की जो आग जलाई थी उसकी तपन आज भी महसूस की जा सकती है। भगत सिंह शौहरत से प्रभावित होकर डॉ. पट्टासितारमैया ने कहा था कि, भगत सिंह का नाम उतना ही लोकप्रिय है जितना गाँधी जी का। भगत सिंह के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि, उनकी शहादत पर गाँधी जी एवं नेहरु जी ने भी अंग्रेजों की नीति की घोर निंदा की थी। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने तो यहाँ तक कहा था कि, अंग्रेजों ने बिना जाँच-पङताल के ही उन्हे फाँसी दे दी, जो अन्याय की पराकाष्ठा है। 

23 मार्च को सुखदेव एवं राजगुरु के साथ भगत सिंह को फांसी दे दी गई थी। भारत माता के ये सच्चे सपूत इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए खुशी-खुशी भारत माता की गोद में समा गये। अनेक युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत भगत सिंह , राजगुरु एवं सुखदेव की शहादत को इतिहास कभी भुला नही सकता। उनके बलिदान दिवस पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

इंकलाब जिंदाबाद 
सुखदेव, राजगुरु तथा भगतसिंह के बारे में अधिक पढने के लिए लिंक पर क्लिक करें।

शहीद दिवसः जरा याद करो कुर्बानी






Wednesday, 11 March 2015

सहयोग की भावना मानवता की प्रतीक है


दोस्तों, वर्तमान युग नई तकनिकों का युग है और हम सब आधुनिक सोच के साथ आगे बढ रहे हैं। हमारी सामाजिकता ने भी आधुनिकता अपना ली है। फेसबुक तथा वाट्सअप को अपनाते हुए हम सब व्यस्त जिंदगी में भी समाज के करीब हैं और एक दूसरे की सहयाता भी इन नये तरिकों से करने लगे हैं। कहने का तात्पर्य ये है कि हम कितने भी आधुनिक हो जायें फिर भी हम समाज और उसके सहयोग की अहमियत को समझते हैं क्योंकि समाज से परे एकांकी रहकर तो व्यक्तिगत जीवन का भी विकास संभव नही है। धरती पर जीवन की बनावट ही कुछ ऐसी है कि मनुष्य अपने आप में सिमट कर नही रह सकता। विकास की यात्रा हो या जिवन यापन की जरूरतें सब के सहयोग से ही पूर्ण होती है। गौतम बुद्ध, महावीर, ईसा तथा विवेकानंद जी की शिक्षाओं का ही परिणाम है कि, समस्त देश मानव समाज के विकास हेतु एक मंच पर सहयोग की भावना का आगाज कर रहे हैं। हमारा सामाजिक ढांचा सात सुरों का संगम है, जहाँ कुछ सुर मध्यम तथा कुछ सुर ऊँचे लगते हैं परंतु जब सब सुर मिल जाते हैं तो एक मधुर संगीत गूँजता है। उसी तरह समाज में सबल-निबर्ल, सक्षम-अक्षम, ज्ञानी-अज्ञानी इत्यादी सभी तरह के लोग विद्यमान हैं। कहने का आशय है कि कोई भी सर्वगुणं सम्पन्न नही होता परंतु सहयोग की भावना से व्यक्ति खास हो जाता है। जिस तरह आम के पेङ की शीतल छाया तथा मधुर फल, किसान के सहयोग का ही परिणाम है क्योंकि किसान द्वारा उचित समय पर खाद एवं पानी देने से आम का वृक्ष अन्य लोगों के लिए परोपकारी बन जाता है। सहयोग का ये क्रम एक चेन की तरह है तथा निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। ईश्वर ने सबको समान नही बनाया है। प्रकृति का भी स्वरूप भिन्नताओं से भरा हुआ है फिर भी संसार का विकास सभी के सहयोग से गतिमान है। उसी तरह  समाज भी भिन्नताओं से भरा हुआ है, जहाँ   ऐसे भी लोग हैं जिनको समाज के सकारात्मक सहयोग की आवशयकता थोङी अधिक होती है। मित्रों, हमारा देश हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर रहते हुए आगे का मार्ग भी प्रशस्त कर रहा है। हम सब भी अपने सहयोग की भावना को इस तरह प्रकाशित करें कि जिससे दृष्टीबाधित लोगों का जीवन आत्मसम्मान से रौशन हो जाये और भारत स्वदेशी सहयोग के धन से परिपूर्ण हो जाए। हमारी भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन भी यही है कि, सबका हित, सबका सुख, सबका लाभ। दूसरों की सहयाता करने का गुणं अर्थात सहयोग की भावना मानवता की प्रतीक होती है। 
धन्यवाद

दृष्टीबाधितों की सहायता कैसे कर सकते हैं