Tuesday, 25 June 2019

यूरोप की झलक मेरी नजर से.........


मित्रों, हम दोनों अभी यूरोप टूर पर गये थे। वहाँ पुरानी और नई कला संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। सङकें गजब की शानदार, एक भी स्पीड ब्रेकर नहीं। पहाङों को काट कर सुरंगो से गुजरते रास्ते तो कहीं शहरों की सङकों के ऊपर से गुजरते हाई वे। विभिन्न सङकों का गजब का तानाबाना है, जिसे देखकर अच्मभित होना स्वाभाविक है। हमने  जिन देशों का भ्रमण किया उनमें जर्मनी, स्विट्जर लैंड, फ्रांस और बेल्जियम हैं। सभी देश बहुत खूबसुरत हरे-भरे और साफ-सफाई में भी नम्बर एक पर हैं। जर्मनी और स्विट्जर लैंड में जेब्रा क्रॉसिंग पर एक बटन लगा था जिसे पैदल यात्री दबा देते तो जल्दी ही पैदल क्रॉसिंग के लिए हरी लाइट जल जाती। जहाँ सिगनल नहीं थे वहां यदि जेब्रा क्रॉसिंग पर लोग खङें हैं तो गाङियाँ अपने आप रुक जाती और पैदल यात्रियों को पहले जाने देती थीं। 

इन देशों ने नई टेक्नोलॉजी के साथ पुरानी धरोहर को भी सहेज कर रखा है। दुसरे विश्व युद्ध में जो इमारत या कलाकृति नष्ट हो गई थी, उसे फिर से उसी तरह से बनाया गया है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जो लकङी की इमारत थी उसे किसी अन्य धातु से बनाया गया। शहरों की खूबसूरती के साथ-साथ वहां के लोग भी बहुत अच्छे हैं। हम दोनों (मैं और पति अशोक) अकेले कुछ जगह घूमने गये थे, यदि वहां कुछ रास्ता या किसी चीज के बारे में कुछ पूछते तो वहाँ के लोग बहुत खुश होकर अच्छे से बताते और यदि उनको इंग्लिश नही आती तो सॉरी फील करते, जाहिर सी बात है वहां जर्मन, फ्रेंच और स्विस भाषा बोली जाती है। ये जरूरी नही है कि इंगलिश आये फिर भी समझा न पाने पर सॉरी फील करना बहुत बङी बात है। महिला सशक्ति का भी अवलोकन हुआ।
हमारी टूर गाइड 60 साल की थी। पहले दिन कोच (लग्जीरयस बस) की ड्राइवर भी 60 साल की महिला थी। वहां कई जगह होटलों का पूरा संचालन महिलाओं के द्वारा था।






हम लोगों का यूरोप टूर जर्मनी के फ्रेंकफर्ट शहर से शुरु हुआ। ये जर्मनी का पांचवाँ सबसे बड़ा शहर है। फ्रैंकफर्ट सदियों से जर्मनी का आर्थिक केंद्र रहा है और यहां बहुत सारे प्रमुख बैंक और दलाल मंडि़यां हैं। वित्त, परिवहन और व्यापारिक मेले फ्रैंकफर्ट अर्थवय्वस्था के तीन स्तंभ हैं। फ्रैंकफर्ट स्टॉक एक्सचेंज जर्मनी का अब तक का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण स्टॉक एक्सचेंजों में से एक है। फ्रैंकफर्ट जर्मनी का एकमात्र ऐसा शहर, जहां बहुत सारी गगनचुंबी इमारते हैं। हम लोग फ्रेंकफर्ट में सिटी हॉल जिसे रोमर कहते हैं, उसको देखने गये। रोमर का अधिकांश भाग द्वितीय विश्व युद्ध में नष्ट हो गया था, लेकिन बाद में फिर से बनाया गया। यहीं कैथेड्रल गॉथिक चर्च देखे जहां वास्तुशिल्प का अलौकिक चित्रण है। रोमर के मध्य न्याय की देवी जस्टिका की मूर्ति है। वहाँ कानून की देवी की आंखों पर पट्टी नहीं है। 

रोमर के बाद हमारा सफर ब्लैकफॉरेस्ट की तरफ बढ चला, जहाँ वनों से घिरे पर्वत मंत्रमुग्ध कर रहे थे। यहां के वन इतने घने हैं कि सूर्य का प्रकाश भी अपनी दस्तक नही दे पाता इसलिये हम लोग भी इसका सोंदर्य सङकों पर से ही देख सके। ब्लैकफॉरेस्ट में ज्यादातर चीङ और देवदार के वृक्ष हैं। यहीं कु कु क्लॉक फेक्ट्री का भी अवलोकन किये।यहां एक ओपन-एयर संग्रहालय है जो घड़ी  के इतिहास को दर्शाता है। लकड़ी पर नक्काशी इस क्षेत्र का एक पारंपरिक कुटीर उद्योग है। 

हम लोग राइन फॉल्स देखने गये जो यूरोप में सबसे बड़ा सादा झरना है। जर्मनी की सुंदरता का अवलोकन करते हुए हम लोग स्विटजर लैंड में प्रवेश कर चुके थे, जहां रात्रि विश्राम के पश्चात अगले दिन माउंट टिटलिस को प्रस्थान करना था जो बहुत उत्सुकता पूर्ण था। सङक के दोनों तरफ हरे भरे पेङ और कॉटेज टाइप के घर। हर घर में छोटा या बङा बगिचा जरूर था। पिले,सफेद,गुलाबी और लाल गुलाब के फूलों की तो बहुतायत थी। सभी घर बाहर से भी सुसज्जित दिख रहे थे।  धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले इस देश पर प्रकृति ने दिल खोलकर अपनी छटा बिखेरी है। 

होटल से माउंट टिटलिस तक का सफर भी बहुत लुभावना था।  माउंट टिटलिस का बेस पङाव इंगलवर्ड था। जहां से केबल कार के माध्यम से ऊपर का सफर शुरु हुआ। रास्ते में सफेद चादर से ढकी टिटलिस की श्रेणियां मन को असीम खुशी दे रही थीं। केबल कार से निचे इंग्लबर्ड का नजारा भी अद्भुत दिख रहा था। गायों के गले में बंधी घंटी की आवाज प्रकृति की सुंदरता को संगीतमय कर रही थी। काफी ऊचाई पर आ जाने के बाद दूसरी केबल कार से हम लोग आगे बढे जो दुनिया की सबसे पहली Rotated केबल कार थी। इसमें एकबार में 80 लोग खङे होकर माउंट टिटलिस के शिखर तक पहुंचते हैं। ये 360 डिग्री घूम जाती है। माउंट टिटलिस पर जैसे ही पैर जमीं पर पङा लगा परिलोक में आ गये। बर्फ की चादर ओढी इसकी श्रृखंलाएं अंतरमन तक प्रसन्नचित्त कर गईं। एक चोटी से दूसरी चोटी तक एक बृज बना है जिसपर चहल कदमी करना किसी स्वपन को साकार करता नजर आ रहा था। यहां बर्फ से अटखेलियां करने के बाद इंगलबर्ड वापस आ गये, जहां भारतीय भोजन के सभी व्यंजन की उपलब्धता लिये रेस्टुरेंट था।

इंगलबर्ड भी किसी स्वपनलोक से कम नही था। यहां से बर्फ की चादर ओढे आल्पस की पहाङियों का नजारा अद्भुत था।

भोजन के पश्चात हमलोग ल्युसर्न की ओर बढ चले। ल्युसर्न स्विट्जर लैंड का सातवां बङा शहर है। प्रकृति ने इसे भी अपनी भरपूर छटा प्रदान की है। शहर तीन तरफ आल्पस की ऊंची बर्फ की पहाङियों  से ढका नजर आता है। लेक ल्युसर्न से निकलती नदी और झील पर बना पुल अत्यधिक रमणिय हैं। यहां का टाउनहाल 16वीं शताब्दी में इतावली रेनंसा शैली में बना है।
रोइस नदी पर लकङी का बना चैपल बृज अचरज करने वाला है। ये 600 साल पुराना बृज है, इसके अंदर एशियन चित्रकारी को देखा जा सकता है। इसकी खास बात ये है कि इसका कुछ हिस्सा जल गया था जिसे वापस लकङी से ही हुबहु बनाया गया है। ये पुल वाकई आश्चर्य का रंग बिखेरता है। नदी के उस पार जेसुइट चर्च और पिकासो म्युजियम का नजारा देखते हुए हम लोग लॉयन मान्युमेंट की ओर बढ चले। 

लॉयन मान्युमेंट 18वीं शताब्दी में फ्रांस की क्रांति में शहीद हुए सैनिकों की याद में बनाया गया है। एक खङी चट्टान पर सुरंग में लेटे हुए शेर का अद्भुत शिल्प है। जिसके सिरहाने भाला और तलवार रखा है तथा पेट में खंजर लगा हुआ है। शेर की भंगिमाएं स्पष्ट नजर आती हैं कि वो विषाद में है। मार्क ट्वेन ने इस शिल्प को विश्व की सबसे विषाद और ह्रदयस्पर्शी प्रतिमा कहा है। ल्युसर्न घुमने के पश्चात हम लोग वापस होटल आ गये। 


अगला दिन ऑपशनल था तो हम दोनों मेट्रो से जुग शहर घूमने निकल पङे, जहां कुछ खरिदारी के पश्चात जुग लेक पर पहुँच गये। स्विट्जर लैंड को झीलों का देश भी कहते हैं। जुग लेक भी प्रकृति के उपहार से परिपुर्ण है। उसके किनारे बने घर भी बहुत सुंदर बने हुए हैं। सौभाग्य से वहां उस दिन बच्चों की विभिन्न प्रतियोगिताओं जैसे- तैराकी, साइकिलिंग और दौङ को देखने का अवसर मिला। 

अगले दिन हम लोगों का टूर पेरिस के लिये निकल चला। पेरिस में कई बङी रिहायशी ईमारतें देखने को मिली। एफिल टॉवर से तो पेरिस का नजारा अदभुत था। हालांकि एफिल का नजारा हर किसी को मोहित कर देता है। फ्रांस की राजधानी पैरिस के शैम्प-दे-मार्स में स्थित एफिल टावर दुनिया के सात अजूबों में शुमार है। यह लौह टावर दुनिया के सबसे आकर्षित निर्माणों में से एक और फ्रांस की संस्कृति का प्रतीक है। इस टावर की ऊँचाई 324 मीटर है और जब यह बनकर तैयार हुआ था, उस वक्त यह दुनिया की सबसे ऊँची इमारत थी। गौरतलब है कि, इस टावर का डिजाइन अलेक्जेंडर-गुस्ताव एफिल ने किया था और इन्हीं के नाम पर इसका नाम भी रखा गया है। हम लोग दिन में एफिल टॉवर पर गये थे लेकिन जगमगाते एफिल टॉवर को शाम को क्रूज से देखे। सेंट नदी में क्रूज की यात्रा भी आनंदमय थी। नदी के दोनों ओर स्थित पेरिस शहर बहुत ही शानदार है। फ्रांस की राजधानी पेरिस को ‘रोशनी का शहर’ और ‘फैशन की राजधानी’ भी कहा जाता है। हरेक प्रेमी जोडा चाहता है कि जिंदगी में एक बार वह एफिल टावर के नीचे कुछ खुशगवार पल बिताए | पेरिस एक ऐसा शहर जो पूरी दुनिया के कला प्रेमियों को रोमांचित करता है। आप जानकर आश्चर्य करेंगे कि पेरिस एक ऐसा शहर है जिसमें बच्‍चों की संख्‍या से ज्‍यादा कुत्‍तों की संख्‍या है | पेरिस के निवासी कुत्तों को बहुत पसंद करते हैं।उन्हे अपने कुत्ते को रेस्टोरेंट में ले जाने की अनुमति भी होती है। पेरिस में साइकिल चलाने का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जो वहां के पर्यावरण के लिए काफी अच्छा साबित हो सकता है। शहर में साइकिल चलाने के लिए लगभग 500 किलोमीटर के बराबर लंबी सङक है। हालांकि जर्मनी और स्विट्जर लैंड में भी रास्ते इतने शानदार थे कि, वहां बहुत लोग साइकिल , स्केटिंग या एक पैर से धक्का देकर रफ्तार देनी वाली स्कुटी चलाते दिखे। वहां भी पर्यावरण बहुत शुद्ध था। अब तक हम जिन देशों से गुजरे वहां रात के 10 बजे भी सूरज की गजब रौशनी रहती है। वहां हमलोग सुबह 8 बजे से घूमने निकलते तो रात 11 बजे ही वापस होटल आते। 
पेरिस के बाद हमलोग बैल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स के लिये निकल लिये। ग्रेंड प्लेस ब्रुसेल्स का सबसे लोकप्रिय पर्यटक स्थल है। लगभग 110 गुणें 70 वर्ग मीटर में फैले इस स्कॉयर को यूनेस्को ने हेरीटेज साइट का दर्जा दिया है। यहां की सबसे ऊंची इमारत पर संत माइकल की मूर्ति बनी हुई है। संत माइकल की मूर्ती के ठीक सामने ड्यूक ने अपने रहने के लिए इमारत बनवाई थी लेकिन वो उसमें कभी रह नही पाया। यहां की सभी इमारतों पर अद्भुत कलाकृति का अवलोकन किया जा सकता है। ये इलाका ब्रुसेल्स चॉकलेट के लिए भी प्रसिद्ध है। 
इस स्कॉयर से आगे बढने पर एक छोटे से बच्चे की मूर्ति है जिसे मानके पिस्स के नाम से जाना जाता है, डच भाषा में इसका अर्थ है सू सू करता बच्चा। इस स्मारक के लिए कहा जाता है कि, बारहवीं शताब्दी में ड्यूक अचानक चल बसे। उनका एक छोटा बालक था। गद्दी पर उत्तराधिकारी न होने पर विरोधियों ने आक्रमण कर दिया ड्यूक सेना भी लङने को तैयार थी किंतु उनकी शर्त थी कि अपने राजा को देखे बिना युद्ध नही करेंगी तब बच्चे को एक टोकरी में रखकर सैनिकों को दिखाया गया उस समय बच्चा सू सू कर रहा था। बच्चे को देखकर ड्यूक सैनिकों में जोश आ गया और ड्यूक सेना जीत गई। उसी जीत की याद में ये मूर्ती बनाई गई। 

ब्रूसेल्स घूमकर हम लोग वापस जर्मनी के कोलोन में पहुँचे। ये शहर लगभग दो हजार वर्ष पुराना है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय बमबर्षा के कारण इस नगर का दो तिहाई भाग पूर्णत: नष्ट हो गया था। जिसका निर्माण पुनः किया गया। कोलोन एक सुंदर और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध शहर है जो जर्मनी का चौथा सबसे बड़ा शहर है । कोलोन में हम लोग कैथेड्रल चर्च देखने गये जो अपने विशालकाय आकार की वजह से शहर के किसी भी कोने से दिखाई देता है। इनकी दिवारों पर उकेरे गये शिल्प बारीक कारिगरी का उदाहरण हैं। कोलोन विश्वविद्यालय यूरोप के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है। 
अगले दिन सुबह बोम्पार्ट से राइन नदी में क्रूज से घुमते हुए यूरोप को बाय बाय करते हुए फ्रैंकफर्ट हवाई अड्डा का सफर शुरु हुआ। राइन नदी के किनारों का दृष्य भी अद्भुत मनोहारी था। पूराना कोलोन शहर नदी के किनारे बसा हुआ है। रास्ते में एक जगह कई चर्च थे। राइन नदी का ये सफर भी खूबसूरत यादों के साथ समाप्त हुआ।  ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि प्रकृति ने यूरोप को अनुपम उपहार दिये हैं और वहां के लोगों ने इसे अपने हुनर के साथ बङे प्यार से सहेजा है। 



नमस्कार 






Friday, 31 May 2019

कारा की रिपोर्ट

जय हिन्द मित्रो,
आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर लिख रहे हैं, या यूं कहें कि एक खबर पढने के बाद अपने आपको लिखने से रोक नही पाये, व्यस्तता तो अभी भी है पर खबर कुछ ऐसी है कि, आभास हुआ अच्छे दिन आ गये हैं। मित्रों, केन्द्र सरकार की एजेंसी कारा की 2019 की रिपोर्ट पढकर अति प्रसन्नता हुई, खबर है कि 2018-2019 की रिपोर्ट के अनुसार 4027 बच्चे गोद लिए गए जिसमें 2398 लङकियां हैं। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 845 बच्चे गोद लिये गये इनमें 477 लङकियां हैं। ये रिपोर्ट इस बात का संकेत है कि अब लोग बेटे वाली मानसिकता से हटकर बेटियों को भी महत्व दे रहे हैं। ये वाकई खुशी की बात है।

मित्रों, एक तरफ जहां गर्भ में ही बेटियों को नष्ट करने की दुषित मानसिकता है वहीं ये पहल नए आगाज के साथ हमारी बेटियों के लिये सम्मान का सूरज लेकर आई है, जिसकी वो हकदार हैं। गौरतलब है कि, हरियाणां में जहां पैदा होते के संग बेटियों की इहलीला समाप्त कर दी जाती थी वहां भी 72 गोद लिये बच्चों में से 45 बच्चियां हैं। आज भारत में ही नही बल्की इस्लामिक देशों में भी बेटियों के लिये एक स्वतंत्र आकाश का आगाज हो रहा है।

मित्रों, इस रिपोर्ट में एक बात और खास है कि, गोद लेने की कवायद भी पहले की अपेक्षा बढी है। आज कल बिग एफ एम पर विद्याबालन का एक शो चल रहा है जिसमें नई सोच के धुन की बात होती है उसमें गोद लेने के विषय पर कई ऐसे विचार आये जिन्होने कहा कि, हम खुद का बच्चा इस दुनिया में लाने के बजाय एक अनाथ बच्चे को अपनाकर उसे नई पहचान दें। वाकई धुन तो बदल रही है, एक नये परिवर्तन का आगाज हो रहा है जो भारत के लिये शुभ संदेश है। फिलहाल बेटियों का सम्मान करने वाले अभिभावकों को नमन करते हैं। मित्रों सच तो ये है कि, बेटा बेटी दो आंखे हैं दोनों का ध्यान बराबर रखना चाहिये। आपकी दृष्टी ही इस सृष्टी का आधार है।

धन्यवाद 

बेटी है तो कल है



Monday, 31 December 2018

Happy New Year

2019 की पहली किरण के साथ आप सबको नववर्ष की हार्दिक शुभकामना 

ईश्वर  अल्लाताला  वाहेगुरू की रह़म आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे। 2019 खुशियों की सौगात लेकर आये , सबकी मनोकामना पूरी हो इसी मंगलकामना के साथ 



Happy New Year 

Tuesday, 6 November 2018

Happy Deepawali शुभ दिपावली :)


आप सभी पाठकों को दिपोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें  🙏
दिल से करते हैं मंगल कामना, दिपों का ये पावन पर्व सारे विश्व में सुख शान्ति का प्रभात लेकर आये। हर तरफ खुशियों की हो सौगात , झिलमिल झिलमिल दिपों से  रौशन  हो हर घर आँगन। दीप जलते रहें, मन से मन मिलते रहें.गिले सिकबे सब दिल से निकलते रहें। मानवता की ज्योति हर इंसान में जलती रहे। 
🌸🌷🌸सुख समृद्धी का वरदान लिये मां लक्ष्मी, मां सरस्वती की कृपा सब पर बनी रहे। 🌸🌷🌸🎇





Friday, 24 August 2018

दृष्टीबाधित लोगों को पढने के लिये किताबों का विशेष मंच है "सुगम्य पुस्तकालय"



जीवन में सफलता पाने के लिये किताबों से दोस्ती होना बहुत जरूरी है , इसी दोस्ती को आगे बढाने के लिये वॉइस फॉर ब्लाइंड द्वारा इंदौर के जीडीसी कॉलेज में 14 जुलाई 2018 को एक दिवसीय कार्य शाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का आयोजन विशेष तौर पर दृष्टी दिव्यांग लोगों के लिये रखा गया था।
कार्यशाला का उद्देश्य था, अपने दृष्टीदिव्यांग साथियों को सरकार द्वारा स्थापित सुगम्य पुस्तकालय की जानकारी देना और वहाँ अपना रजिस्ट्रेशन कैसे करें एवं पुस्तकों को कैसे डाउनलोड करें ....
इस कार्यशाला में 60 छात्र-छात्राओं ने शिरकत की। कार्यशाला की शुरूवात माँ सरस्वती वंदना से की गई। तद्पश्चात कार्यशाला के उद्देश्य को आगे बढाया गया। सर्व प्रथम ये जानना जरूरी है कि सुगम्य पुस्तकालय आखिर है क्या ?

सुगम्य पुस्तकालय दृष्टी दिव्यांग साथियों के लिए सरकार द्वारा 24 अगस्त 2016 को स्थापित ऐसा मंच है जहाँ अनेक ऐसे पुस्तकालयो का संग्रह जो दृष्टी दिव्यांग साथियों के लिये किताबों को ध्वनी मुद्रण में अपलोड करते हैं। वहाँ मेरे द्वारा ध्वनांकित की गई पुस्तकों को अनिता दिव्याग कल्याणं समिती की लाइब्रेरी में सुना जा सकता है। इसे अलावा अन्य संस्थाओं द्वारा अपलोड की गई लगभग 11,000 पुस्तकों का लाभ लिया जा सकता है। ये ऑनलाइन पुस्तकालय है। इस पुस्तकालय में अंग्रेजी एवं हिंदी के अलावा गुजराती, मराठी, कन्नण इत्यादि भाषाओं में भी पुस्तकें उपलब्ध हैं। 

अनिता दिव्याग कल्याणं समिती की लाइब्रेरी में ज्यादतर पुस्तकें विभिन्न प्रतियोगी परिक्षाओं हेतु ही अपलोड की जाती हैं क्योकि अनिता दिव्याग कल्याणं समिती का उद्देश्य है अपने दृष्टी दिव्यांग साथियों को शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाना।

मित्रों, अनिता दिव्याग कल्याणं समिती के संरक्षण में ही वॉइस फॉर ब्लाइंड कार्य कर रहा है। कार्यशाला में पुस्तकालय के विवरण के बाद उसमें रजिस्ट्रेशन कैसे करें ये समझाया गया जो इस प्रकार था....

सबसे पहले तो रजिस्ट्रेशन हेतु आवश्यक दस्तावेज की जानकारी लेना जरूरी है अतः इच्छुक सदस्य को अपना मेडिकल सर्टीफिकेट जेपीजी फॉम में ्अपने पास रखना होगा तथा मेल आई डी, मोबाइल नम्बर, जन्मतिथी, रहवासी पता
रजिस्ट्रेशन हेतु प्रक्रिया इस प्रकार है.....

1- गुगल पर सुगम्य पुस्तकालय सर्च करें

2- उसके होम पेज पर जायें

3- होम पेज पर रजिस्टर नाऊ Register Now पर जायें

4- जब Register Now पर क्लिक करेंगे तो जो पेज खुलेगा उसमें End User Registration पर क्लिक करें

5- क्लिक करने पर एक कैपचा भरने का पॉपअप आयेगा Enter Captcha के नाम से

6- वहां जो अंक दिया होगा उसे जोङकर टोटल अंक को enter captcha answer में लिखना होगा

7. उत्तर लिखने पर पॉपअप हट जायेगा और End User Registration फॉर्म खुलेगा

9- फॉर्म में जो भी पुछा गया है उसे भरना होगा जिसे टैब बटन दबाते हुए पढा जा सकता है।

10- फॉर्म में पुछी गई जिज्ञासा इस प्रकार है

First name , Last name, Gender पर दिये ऑपशन पर टिक करना है, डेट ऑफ बर्थ , ई मेल , मोबाइल नम्बर, country, State,  city को दिये ऑपशन में चुनकर टिक करें, Address , Zip code , नाम तथा  Mobile Number or E-Mail ID में से एक को भरना अनिवार्य है।   Known language पर दी भाषाओं में से अपनी भाषा चुने, लोकल लाइब्रेरी में दी लाइब्रेरी में से लाइब्रेरी चुने ये ध्यान रखें कि चुनी हुई लाइब्रेरी के बारे में आप जनते हों क्योंकि जब तक आपके द्वारा लिखी लाइब्रेरी आपके फॉर्म को अप्रुव नही करेगी तब तक आप रजिस्टर्ड नही हो सकेंगे। मेरी लाइब्रेरी का नाम अनिता दिव्यांग कल्याणं समिति है। 
टाइप ऑफ डिसेबल्टी पर अपनी डिसेबल्टी पर टिक करना है। तद् पश्चात Disability Certificate चूज करके अपलोड करना है। Next पेज पर क्लिक करना है। 

अगले पेज पर टर्मस और कंडिशन लिखी है वहाँ Yes पर क्लिक करना है।

तीसरा पेज खुलेगा वहां आपका रजिस्ट्रेशन हो गया इसकी सूचना होगी तथा आपको संदेश मोबाइल पर या मेल पर चाहिये या दोनों पर  इसका कॉलम होगा , जिसपर संदेश चाहिये उसके बॉक्स में टिक करना होगा।

11- रजिस्टर होने के बाद आपके पास Mobile पर OTP नम्बर यूजर आई डी आयेगा  OTP मतलब वन टाइम पासवर्ड । यूजर आई डी कभी नही बदलता आप एक बार दिये पासवर्ड से लॉगिन होकर अपना पासवर्ड नया बनायें।

12- OTP नम्बर आने के बाद सुगमय पुस्तकालय के होम पेज पर जायें वहाँ यूजर आई डी तथा पासवर्ड लिखें तथा कैपचा को जोङकर लिखें। अपना सरल पासवर्ड बनायें जिससे हमेशा लॉगिन कर सकते हैं और पुस्तकालय से अपनी जरूरतों की किताबों को डाउनलोड कर सकते हैं। 

आशा करते हैं कि पुस्तकालय से प्राप्त पुस्तकों से आप लाभांवित होंगे और अपने लक्ष्य को सफलता पूर्वक अर्जित करेंगे।  पुस्तकालय से संबन्धित कोई समस्या हो तो मेल करें, 



Wednesday, 15 August 2018

प्यारी कायरा को जन्मदिन पर अनंत आर्शिवाद

आज मेरी जिंदगी में खुशी का एक ऐसा पल है जो अनमोल है। आज मेरी प्यारी नातिन कायरा एक वर्ष की हो गई , ये एक वर्ष पलक झपकते कब बीत गया पता ही नही चला। कायरा के संग बिता हर पल मेरे लिए सुखद एहसास है। अपने इस एहसास को शब्दों में व्यक्त करना संभव नही है। फिरभी कायरा को ब्लॉग के माध्यम से पत्र लिखकर अपने एहसास को शब्दों में ढालने का प्रयास है। 

प्रिय कायरा
अनंत आशीर्वाद संग तुमको जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं,
आप जबसे ज़िंदगी में आई हो वक्त का कुछ पता ही नहीं चलता। आज तुम एक वर्ष की हो गई , ये 365 दिन तुम्हारी प्यारी सी मुस्कान के साथ कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। इस एक साल में तुम्हारे संग बिताया हर वक्त, सुनहरी याद बन गया। तुम्हारी आवाज़ बहुत प्यारी है। तुम्हारी प्यारी सी मीठी आवाज़ ताउम्र ऐसी मधुर बनी रहे। किसी की नज़र न लगे। तुम्हारी प्यारी सी मुस्कान को चांद तारों की उम्र लग जाये। सूरज की किरणों से भी आगे तुम सफलता की इबारत लिखो। हम सबके आशीर्वाद और‌ दुलार की छांव में जीवन का हर पल बिंदास जीयो, ये दिन तुम्हारे जीवन में अनेकों अनेक बार आए। मेरी लाडो खुश रहो मस्त रहो, स्वस्थ रहो। जल्दी से हमें अपनी प्यारी सी आवाज में नानी बुलाओ
कैला मैया की कृपा तुम पर सदैव बनी रहे यही प्रार्थना करते हैं। अपनी एक खूबसूरत पहचान के साथ हम सबको गौरवान्वित करो । इन्हीं दुआओं के साथ एक बार फिर से जन्म दिन पर ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद।



फूलों सी प्यारी , रंगों सी न्यारी ,मेरी लाडली.....
नाज़ुक सी कली,बड़े नाजों से पली , मेरी लाडली .....
तितलियों सी चंचल ,चुलबुली और नटखट , मेरी लाडली ......

तुम मां का सुंदर सपना और पापा के दिल का अरमान हो
हम सबके जीवन की पूंजी और घर की रौनक हो

मेरी लाडली, नाना नानी की प्यारी सी लाडो हो तुम,
दादी की लड्डु और दादा की रौनक हो तुम,
मां का सपना और पापा का अरमान हो तुम ,

चाचा चाची की प्यारी क्युटी पाई हो तुम ,
माना की, मां पापा का अक्स है तुममें फिर भी,
अपनी खूबसूरत पहचान का आगाज हो तुम
जूग जुग जियो तुम 

सभी पाठकों से अभिलाषा है कि, प्यारी कायरा को अपने आशीष वचनों का उपहार प्रदान करें
धन्यवाद 








Tuesday, 14 August 2018

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई



आओ झुककर सलाम करें उनको, जिन्होने हमसबको एक स्वतंत्र आकाश दिया। जिनके लहु ने हम सबको आज़ाद हवा में जीने का जह़ान दिया। ऐसे अनगिनत शहीद देश पर कुर्बान हो गये जिनका जिक्र इतिहास के पन्नों की नीव में समा गये हैं उन महान देशभक्तों शत् शत् नमन करते हैं। 



आप सबको  71वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई


Thursday, 2 August 2018

दृष्टी दिव्यांग साथियों के लिये एक नया प्रयास (आज का समाचार)

मित्रों, विगत 2016 से समाचार का प्रसारण वाट्सअप के माध्यम से दृष्टी दिव्यांग साथियों के लिये प्रसारित कर रहे हैं। देश में इस तरह का ये पहला प्रयास है। मुझे खुशी है कि, इस प्रयास से आज लगभग 10,000 प्रिंट दिव्यांग लोग समाचार का लाभ ले रहे हैं। इस प्रयास का लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में अनेक समाचार पत्र भी अपना योगदान दे रहे हैं. उन्ही में एक है रिलांयस दृष्टी पत्रिका जो ब्रेल में प्रकाशित होती है। उसमें छपा ये लेख इस प्रयास को और भी अधिक लोगों तक पहुँचा रहा है। रिलायंस की दृष्टी पत्रिका में छपा लेख यहां सांझा कर रहे हैं।

संपादकीय

सस्नेह प्रणाम.
“गुडमॉर्निंग::: वॉयस फॉर ब्‍लाइंड में आपका स्‍वागत है:::” हर सुबह देशभर के 10 हजार से अधिक दृष्टिहीन दिव्‍यांगों के व्‍हाट्सऐप और सोशल मीडिया अकाउंट्स पर एक कशिश भरी आवाज गूंज उठती है और फिर सुनाई पड़ते हैं देश--विदेश, शहर--गांव के सारे समाचार. ‘वॉयस फॉर ब्‍लाइंड’ (दृष्टिहीनों की आवाज) में हिंदी भाषा में सुनाए जाने वाले इन समाचारों को सुनकर हजारों दृष्टिहीन दिव्‍यांग रोजमर्रा की घटनाओं और समाचारों का ज्ञान प्राप्त करते हैं. जो लोग प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, उनके लिए तो ये समाचार और भी महत्वपूर्ण होते हैं.
साथ ही इसमें दृष्टिहीनों से जुड़ी सरकारी नीतियों, परीक्षाओं, नौकरी के अवसर और अन्‍य जानकारी व प्रेरणा देने वाले सकारात्‍मक समाचारों को विशेष रूप से सम्मिलित किया जाता है. निःशुल्‍क सेवा का यह अनूठा सिलसिला पिछले तीन वर्षों से शुरू है. इंदौर की अनीता शर्मा पेशे से उद्घोषक हैं और अपने इसी कौशल को उन्‍होंने इस सेवा का भी माध्यम बना लिया है. वर्ष 2011—वर्ष 2012 में एक दोस्‍त के जरिए वह इंदौर की संस्‍था ‘महेश दृष्टिहीन कल्‍याण संघ’ से जुड़ीं. यहां उन्हें दृष्टिहीन दिव्‍यांगों को निःशुल्‍क हिंदी, विज्ञान और इतिहास पढ़ाने का अवसर मिला. वहां उन्होंने महसूस किया कि ये बच्‍चे बहुत होशियार हैं मगर ब्रेल पुस्तकों (स्‍टडी मटेरियल), आवश्‍यक जानकारी और रोजमर्रा की सामान्‍य जानकारी के अभाव के कारण कई बार ये सामान्‍य लोगों के मुकाबले पीछे रह जाते हैं. तब उन्होंने कुछ दिव्‍यांगों को फोन पर रोजाना नई--नई जानकारियों और खबरों से जोड़ने की कोशिश शुरू की. व्‍हाट्सऐप आने के बाद उनका काम आसान हो गया. वो हर रोज़ सुबह तीन—चार, हिंदी--अंग्रेजी अखबार पढ़कर खबरों का चुनाव करती हैं.

दृष्टिहीन दिव्‍यांगों के लिए उपयुक्त ‘वॉयस फॉर ब्‍लाइंड’ सेवा आरंभ करने के लिए अनीता शर्मा जी का रिलायंस दृष्टि परिवार की ओर से हार्दिक अभिनंदन. अधिक जानकारी के लिए voiceforblind@gmail.com पर मेल करके संपर्क कर सकते हैं.

स्वागत थोरात
प्रमुख संपादक

दोस्तों, रिलायंस दृष्टी में समाचार की खबर प्रकाशित होने पर भारत के उन लोगों तक भी खबर पहुँची जिनको वॉइस फॉर ब्लाइंड के कार्यों का पता नहीं था। नित नये श्रोता इससे जुङ रहे हैं और समाचार का लाभ ले रहे हैं। ये मेरे लिये सौभाग्य की बात है कि, मेरा प्रयास लोगों को पसंद आ रहा है। मुझे खुशी हो रही है ये बताते हुए कि, इस प्रयास को बहुत अधिक शुभकामनायें मिल रही है। आज तो मेरे पास पंजाब से एक रिटायर अध्यापिका का फोन आया उन्होने दृष्टी में मेरे बारे में पढा था। उन्होने ने मुझे इतना आशिर्वाद दिया की रोम-रोम पुलकित हो गया। कार्य के प्रति और अधिक उत्साह का एहसास हुआ। रिलायंस दृष्टी के संपादक स्वागत जी का तहे दिल से आभार व्यक्त करते हैं, जिनके प्रयास से समाचार के ध्वनांकन का प्रयास और भी सार्थक हो गया। 


आप लोगों के साथ आज का समाचार शेयर कर रहे हैं। अपने सुझाव अवश्य दिजीयेगा। स्वतंत्रता का वातावरण है इसलिये अगस्त के पूरे महिने में सारे जहां से अच्छा की धुन बजेगी।








Saturday, 9 June 2018

बच्चों में मोबाइल की बढती आदत जिम्मेदार कौन??????

दोस्तों, फ्रांस में वहां की सरकार कानून बनाकर स्कूल में मोबाइल लाना प्रतिबंधित कर रही है। विश्व में फ्रांस पहला देश है जो अपने देश के बच्चों के भविष्य के प्रति इतनी गहराई से सोच रहा है। निःसंदेह ये सराहनिय कदम है किंतु, ये जानकर मन में विचार आया कि निश्चय ही वहाँ मोबाइल अत्यधिक आतंक मचा चुका होगा जिसके परिणाम स्वरूप ये कदम उठाया गया है।

मित्रों, विचार करने योग्य ये है कि स्थिती बदतर होनेपर ही हमसब क्यों सजग होते हैं। हम समय रहते क्यों नही उचित निर्णय लेते हैं। हम सब जानते हैं कि कोई भी टेक्नोलॉजी या कोई भी सुविधा कुछ फायदे तो कुछ दुष्परिणाम भी लाती है, पर हम उस नुकासान को अनदेखा कर देते हैं। आज अपने देश भारत की ही अगर बात करें तो एक साल के बच्चे के हांथ में मोबाइल देखा जा सकता, जिस उम्र में बच्चे अपना तो ख्याल रख नही सकते अभिभावक उनको मोबाइल थमा देते हैं। दो तीन साल के बच्चे तो मोबाइल पर गेम खेलना सीख जाते हैं। तीन चार साल के बच्चे जब मोबाइल को ऑपरेट करते हैं तो उनके अभिभावक ऐसे खुश होते हैं कि बच्चा नोबल पुरस्कार जीत गया, हर किसी से कहेंगे कि, हमसे ज्यादा इसको आता है मोबाइल के बारे में। सोचिए! जिस उम्र में शारिरीक और बौद्धिक शक्ती को मजबूत करने का समय होता तब बच्चा एक जगह बैठकर एक ही संसाधन में व्यस्त, ये व्यस्तता बच्चे की नीवं को हीला देती है जिसका आभास अभिभावकों को तब होता है जब बच्चे का विकास बाधित हो चुका होता है। गौरतलब है कि, बचपन में मोबाइल के उपयोग से बच्चों को छोटी उम्र में ही चश्में लग जाना, माशपेशियों का कमजोर होना, बौद्धिक क्षमता में कमी हो जाना, रचनात्मक और क्रियात्मक विकास का रुकना, मोटापे जैसी गंभीर बिमारी का बढना इत्यादि समस्यायें दिन प्रतिदिन बढ रही हैं। रिसर्च बताते हैं कि, मोबाइल के अधिक उपयोग से दो तीन साल के बच्चों को ब्रेन कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा है। अभी हाल में एक अध्ययन के मुताबिक बच्चों में ग्रिपिंग पॉवर कम हो रही है वो पेंसिल ही नही पकङ पा रहे हैं। मोबाइल के साथ बढने वाले बच्चे एकांकी हो जाते हैं क्योंकि उनको मोबाइल की इतनी आदत लग चुकी होती है कि किसी और के साथ तालमेल नही बैठा पाते यहाँ तक कि पढाई में भी ध्यान नही देते जिसका परिणाम वे पढाई में कमजोर हो जाते हैं फिर डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं।

मित्रों, कई अभिभावक तो आजकल बच्चे को बहला फुसलाकर खाना खिलाने के बजाय मोबाइल पर कार्टून दिखाकर खाना खिलाते हैं, बच्चे का पूरा ध्यान कार्टून पर, क्या खाया, कितना खाया कुछ पता नही पर माँ-बाप खुश बच्चा खा लिया फिर बाद में बच्चे को कार्टून की आदत इतनी लग गई की खाना खाना तो भूल गया कार्टून देखने की आदत जरूर पढ गई। आज बच्चों के साथ खेलने का वक्त नही होता अभिभावकों के पास, यदि बच्चा रोया तो उसके साथ समय व्यतीत करने की बजाय मोबाइल पकङा देते हैं। बच्चा मोबाइल पर क्या देखरहा है ये जानने का भी वक्त नही होता। हिंसक खेल बच्चे की मनोवृत्ति को किस दिशा में ले जा रहे इसका उनको अंदाज ही नही है। जब स्थिती विस्फोटक हो जाती है या बच्चा कहना नही सुनता तो इस आदत का जिम्मेदार भी उसको ही माना जाता है। विचार किजिए! एक छोटा बच्चा जो ठीक से चल भी नही पाता उसके पास मोबाइल स्वयं तो चलकर नही आता होगा। बच्चों तक मोबाइल की पहुँच माता-पिता या घर के बङे सदस्यों द्वारा ही होती है। कहने का आशय ये है कि, बच्चों में मोबाइल की आदत के जिम्मेदार पालक ही हैं जो भविष्य के दुष्परिणाम से अनिभिज्ञ अपने बच्चे को एक ऐसे जहर की आदत डाल रहे जिसका असर बच्चे की नीवं को खोखला कर रहा है और बच्चे के स्वाभाविक विकास को कुंठित कर रहा है।

मित्रो, किसी भी टेक्नोलॉजी का उपयोग गलत नही है किंतु उसका उपयोग कब, कैसे और किसको कितना करना है ये ज्ञान होना अति आवश्यक है। प्रकृति ने भी मनुष्य के विकास को उम्र के आधार पर एक संतुलन दिया है जिसका स्वाभाविक प्रवाह सम्पूर्ण विकास को सहज बनाता है।

अतः आज के सभी अभिभावकों से मेरा निवेदन है कि, समय रहते मोबाइल जैसे जहर को बच्चों से दूर रखकर उनमें बालसुलभ मनोवृत्ति को अंकुरित करने में अपना योगदान दिजिये। कहानी सुनाकर एवं उनके साथ खेलकर उनमें उनकी बौद्धिक और शारीरिक क्षमता का विकास किजिये। रंग-बिरंगे रंगों से उनकी दुनिया को सुखद और स्वाभाविक बनाइये। बच्चे तो कुम्हार की वो मिट्टी हैं जिन्हे आप जिस आकार में ढालेंगे वो ढल जायेंगे।
बदलता बचपन जिम्मेदार कौन????  इस लेख को भी अवश्य पढें एवं अपने विचार भी अवश्य शेयर किजीये 

धन्यवाद 😊













Friday, 23 March 2018

खुशियों के अनमोल पल

"जिंदगी में अगर लक्ष्य बड़ा हो तो संघर्ष भी बड़ा करना होता है इन्ही विचारों के साथ आगे बढने वालों के सपने अवश्य सच होते हैं"
मित्रों, देवी मां की कृपा से और बङों के आशिर्वाद से हमारे परिवार के लिये खुशी का ऐसा अवसर है, जब परिवार के हर सदस्य का मन जयहिंद के नारे से गूंजायमान हो गया। वंदे मातरम् का आगाज़ करते हुए घर का बच्चा प्रांजल शर्मा, आर्मस मेडिकल कॉलेज में अपनी एमबीबीएस की पढाई पुरी करके डॉक्टर के रूप में देश की सुरक्षा में तैनात सैनिकों की स्वास्थ सेवा में अपना योगदान देंगे। लेफ्टीनेंट प्रांजल शर्मा को आर्मी की वर्दी में देखकर हमसब गौरवान्वित हुए। हम सबको गौरव पूर्ण अनुभूति प्रदान करने में प्रांजल की मेहनत को सबसे पहले सलाम करते हैं क्योंकि हमारे सुपुत्र प्रांजल को बचपन में पटाखे की आवाज से भी डर लगता था लेकिन आज गोले-बारूद के बीच में भी सैनिकों के जीवन रक्षक बनकर अपने कर्तव्य का निर्वाह करेंगे। परिवार से देश प्रेम की शिक्षा तो बचपन से उनको मिली थी परंतु जब मुंबई केन्द्रिय विद्यालय क्रमांक एक में आठंवी में अध्ययन कर रहे थे तो विद्यालय के बगल में ही स्थित नेवी आर्मी का संचालन देखकर आर्मी के प्रति सम्मान और अधिक हो गया। हालांकि डॉक्टर बनने का सपना तो कक्षा तीसरी से प्रांजल के मन में था, जिसको साकार करने में हम लोग माता-पिता के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वाह किये परंतु उस सपने को सच करने में प्रांजल ने दिल से मेहनत की जिसका परिणाम ये हुआ कि, नीट की परिक्षा में अच्छी रेंक लेकर आर्मस माडिकल कॉलेज के लिये सुचिबद्ध हुए तद्पश्चात AFMC  द्वारा आयोजित परिक्षाओं को भी सफलता पूर्वक पास करके AFMC में चयनित हो गये। 11th और 12th  की कक्षा में प्रांजल, अपने सपने को सच करने के लिए अध्यन में अत्यधिक मेहनत किये और ये सिद्ध कर दिये कि, मेहनत करने वालों के सपने साकार जरूर होते हैं। इस सपने को साकार करने में अध्यापकों के मार्गदर्शन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। अध्यापकों द्वारा अच्छे से पढाया गया पाठ और प्रांजल की दो वर्ष की मेहनत का ही परिणाम है कि, आज हम एक आर्मी डॉक्टर के अभिभावक के रूप में प्रफुल्लित हो रहे हैं क्योंकि फौज में एक डॉक्टर भी भारत माता की रक्षा हेतु चिकत्सिय अध्ययन के अलावा फौजी प्रशिक्षण से भी प्रशिक्षित होता है।
स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं, जितना कठिन संघर्ष होगा जीत उतनी शानदार होगी।आत्मा के लिए कुछ भी असंभव नही है।ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, प्रांजल जैसे कई बच्चे अपने सपने को साकार करते हुए आर्मी में अपनी सेवा देने को तद्पर हैं। हम उन सब बच्चों के जज़्बे को तहेदिल से सलाम करते हैं। हाल ही में हमें अभिभावक के रूप में प्रांजल की पासिंग आउट परेड में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ वहाँ बच्चों द्वारा किये गये सांस्कृतिक कार्यक्रम में उनके मल्टी टेलेंट को देखकर खुशी में चार चाँद लग गया। इस वर्ष पास आउट हुए डॉक्टर्स द्वारा अभिनित मूक नाटक में सीमापर गोलियों की बौछार के बीच घायल सैनिकों का डॉक्टर्स द्वारा इलाज देखकर वहाँ उपस्थित सभी अभिभावकों की आँखों से बरबस ही अश्रुधार बह निकली, हालांकी ये खुशी के आंसु थे और अभिभावकों की तालियां भारत के वीर सपूतों के जज़्बों को प्रोत्साहित कर रहीं थी। सांस्कृतिक कार्यक्रम या वर्दी में फौजी डॉक्टरों के हौसले का कोई मुकाबला नही है। दोस्तों, मन तो था कि कुछ तस्वीरें आप लोगों के साथ शेयर करें किंतु ये कर नही सकते क्योकि सुरक्षा के दृष्टीकोंण से आर्मी के अपने नियम हैं जिसका पालन करना मेरा भी कर्तव्य है। अपने फौजी बेटे एवमं उनके साथियों को कहना चाहेंगे कि,
मानवता के परचम को लहराते हुए अपनी सोच को ले जाओ उस शिखर पर जहां सितारे भी झुक जायें, ना बनाओ अपने सफर को किसी कश्ती का मोहताज, चलो इस शान से कि तुफान भी नतमस्तक हो झुक जाये। 

प्रिय प्रांजल, अपने हौसले के बल पर आसमान की बुलंदी पर सफलता का परचम फैलाओ इसी मंगल कामना के साथ अनंत अशिर्वाद और शुभकामनायें
जय हिंद जय भारत