Monday, 12 January 2015

दृष्टीबाधितों की सहायता कैसे कर सकते हैं।

सामाजिक जिम्मेदारी को निभाने की इस जागरुकता में हम आपका अभिनंदन करते हैं। 

क्लब का उद्देश्यः- 
"शिक्षा के माध्यम से दृष्टीबाधित छात्रों को आत्मनिर्भर बनाना" 

मित्रोंहमारे समाज में एक विचार धारा व्याप्त है कि,  दृष्टीबाधित लोगों को एक विशेष प्रकार की शिक्षा (ब्रेल लीपी) के माध्यम से पढाया जा सकता है। ये पूरी तरह से सच नही है। कोई भी शिक्षित व्यक्ति दृष्टीबाधित बच्चों को पढा सकता हैउसके लिए ब्रेल लीपी का आना अनिवार्य नही है। उनकी शिक्षा-दिक्षा भी सरकार द्वारा चलाए गये पाठ्यक्रम के अनुसार ही होती है। सामान्यतः कक्षा आठवीं तक सरकारी पाठ्यक्रम की पुस्तकें ब्रेल में उपलब्ध हैं। कक्षा नवीं से आगे की कक्षाओं के लिए ब्रेल में पर्याप्त अध्ययन सामग्री उपलब्ध नही है। जिसके लिए पाठ्य सामग्री को दृष्टीसक्षम लोग रेकार्ड(Record) करते हैं और उस रेकार्ड की गई अधययन सामग्री को दृष्टीबाधित बच्चे सुनकर याद करते हैं।

उनकी सहायता कैसे कर सकते हैं?
 1:-  Friends,  आप उनकी पाठ्य सामग्री को रेकार्ड(Record) कर सकते हैं। 
(इस कार्य हेतु आप अपनी आवाज में एक ऑडियो हमे मेल करें या वाट्सअप पर भेंजे। हिंदी एवं अंग्रेजी जिस भी भाषा में आप रेकार्ड करना चाहते हैं)

2:-  आप उनके लिए परिक्षा के समय सहलेखक (Scribe) का कार्य कर सकते हैं। इसके अंर्तगत दृष्टीबाधित बच्चे उत्तर बोलते हैं आपको उन उत्तरों को उत्तर-पुस्तिका पर लिखना होता है और पेपर पढ कर उनको प्रश्न बताना होता है। बैंक, रेलवे तथा अन्य प्रशासनिक प्रवेश परिक्षाएं ज्यादातर रविवार को आयोजित होती हैं। इसमें भी सहलेखक (Scribe) की आवश्यकता होती है।  

मित्रों, आज का युग कम्प्युटर का युग है और हम अपने अनुभव के आधार पर कह सकते हैं कि,  हमारे दृष्टीदिव्यांग साथियों के लिये कम्प्युटर ज्ञान उनकी आंखें हैं। अतः वर्तमान मे संस्था अपने दृष्टी दिव्यांग साथियों के लिये इंदौर में निःशुल्क कम्प्युटर प्रशिक्षण के लिये एक सेंटर शुरु करना चाहती है , जहाँ से वे इसका भली भाँती प्रशिक्षण लेकर आत्मनिर्भरता की दिशा में सफल हो सकें।  इसी के साथ  पाठ्यसामग्री को रेकार्ड करने हेतु एक स्टुडियो का निर्माण करने की योजना भी है। 

आप सभी से निवेदन है कि. इस कार्य हेतु अपनी क्षमतानुसार आर्थिक मदद करें। अपने एवं अपने परिवार के जन्मदिन पर शिक्षा की इस मुहीम में आपके द्वारा दिया गया आर्थिक  सहयोग किसी दृष्टीबाधित बच्चे को आत्मनिर्भर बनाने में एक सार्थक कदम होगा। आपका सहयोग उन्हे सम्मान से जीने का उजाला दे सकता है। 
आप सहयोग राशी संस्था के अकाउंट में जमा कर सकते हैं...
Anita Divyang kalyan Samiti
Bank of India
Account number- 883210210000044
IFSC Code - BKID0008832
MICR Code - 542013004
Indore M.P.
इस कार्य हेतु यदि आपके मन में कोई जिज्ञासा(Curiosity) हो तो आप हमें मेल करके पूछ सकते हैं। मेरे द्वारा किये जा रहे प्रयासों को आप YouTube पर भी देख सकते हैं......
Mail ID:-   voiceforblind@gmail.com

                  sharmaanita207@gmail.com


Sunday, 11 January 2015

Cooperate the blind


मित्रों, स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिवस पर, आपलोगों के सहयोग की कामना लिए, 12 जनवरी 2015 को हमने Voice for blind (वाइस फॉर ब्लाइंड) क्लब का गठन किया था। क्लब की पहली सालगिरह पर आप सभी क्लब सदस्यों को बहुत-बहुत बधाई। 

क्लब अपने उद्देश्यः- शिक्षा के माध्यम से दृष्टीबाधित बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने में सार्थक प्रयास की और अग्रसर है। शिक्षा संबन्धी पाठ्य पुस्तक तथा विभिन्न प्रतियोगी परिक्षाओं हेतु जैसे कि, बैंक,रेल,आई.ए.एस., यू.जी.सी.नेट की अध्ययन सामग्री के ऑडियो को सुनकर आज अनेक बच्चे स्टेट बैंक, युनियन बैंक, आन्ध्र बैंक, ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स में सेवायें दे रहे हैं। नई टेक्नोलॉजी को अपनाते हुए क्लब की सेवायें वाट्सएप तथा स्काईप के माध्यम से भी लोगों को लाभान्वित कर रही हैं। कम्प्युटर के ज्ञान ने आज विजुअल चैलेंज लोगों की शिक्षा को आसान कर दिया है। आप सबके सहयोग से ये कारावां आगे भी अनेक दृष्टीबाधित लोगों के जीवन में सम्मान का प्रकाश फैलायेगा। आप सबको इस सहयोग के लिये बहुत बहुत धन्यवाद। 
  
जय भारत
धन्यवाद
अनिता शर्मा



12 जनवरी 2015 का संदेश 
आज हम एक संगठन (Club) का आधार रख रहे हैं, जिसका नाम Voiceforblind (वाइस फॉर ब्लाइंड) हैं। आप लोगों में से जो भी दृष्टीबाधित छात्र या छात्राओं की सहायता करना चाहतें हैं, वो हमारे इस संगठन का सदस्य बन सकते हैं।
दोस्तों, आप लोगों के मन में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि, हम दृष्टीबाधित छात्र या छात्राओं की सहायता किस प्रकार कर सकते हैं। हम अपने अनुभव के आधार पर यह आसानी से कह सकते हैं कि, कोई भी शिक्षित दृष्टी सक्षम व्यक्ति, दृष्टीबाधित लोगों की मदद कर सकता है। मुख्यतः, उनकी पाठ्य सामग्री को रेकार्ड करना एवं परिक्षा के समय सहलेखक (Scribe) के रूप में अपना योगदान देना। इसके अलावा आप जिस भी शहर में हैं वहाँ की दृष्टीबाधित संस्था में जाकर उन्हे पढा भी सकते हैं।
अब ये बताना चाहुँगी कि, आप ये सब कैसे कर सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों से हम भारत के कई शहरों के दृष्टीबाधित बच्चों से जुङे हैं। आप जिस भी शहर में हैं यदि वहाँ के कोई दृष्टीबाधित छात्र या छात्राएं रेकार्डिंग या सहलेखक की मदद माँगता है तो हम उसको आपका नम्बर दे सकते हैं, जिससे उन्हे उसी शहर में सहयोग मिल जाए। साथ ही आप अपने शहर के दृष्टीबाधित बच्चों के  लिए कार्य करने वाली संस्था की जानकारी नेट के माध्यम से आसानी से प्राप्त कर किसी संस्था से जुङ सकते हैं।
इस कार्य हेतु आपका दिया वक्त उनके जीवन का सबसे अनमोल तोहफा होगा। विस्तृत जानकारी के लिए आप हमें ई मेल भी कर सकते हैं।
आपके सहयोग की प्रतिक्षा में
अनिता शर्मा
धन्यवाद J


Friday, 9 January 2015

स्वामी विवेकानंद जी की मुंशी फैज अलि के साथ हुई धार्मिक चर्चा


आज देश में धर्म और जाति को लेकर अनेक विवाद विद्यमान हैं। मानवीय संवेदना धार्मिक और जातिय बंधन में इस तरह बंध गई है कि इंसानियत का अस्तित्व कहीं खोता हुआ नज़र आ रहा है। ऐसे में स्वामी विवेकानंद जी के प्रेरणादायी प्रसंग इन जातिय और धार्मिक बंधनो को खोल सकते हैं जिससे इंसानियत पुनः स्वंतत्र वातावरण में पल्लवित हो सकती है। भारत  भ्रमण के दौरान राजस्थान में स्वामी जी की मुलाकात मुंशी फैज अली  से हुई थी।  मुशी  फैज अली और स्वामी विवेकानंद जी के मध्य धर्म को लेकर जो वार्तालाप  हुई,  उसी  का एक अंश आप सबसे सांझा करने का प्रयास कर रहे हैं।

मुशीं फैज अली ने स्वामी जी से पूछा कि, स्वामी जी हमें बताया गया है कि अल्लहा एक ही है। यदि वह एक ही है, तो फिर संसार उसी ने बनाया होगा।

स्वामी जी बोले, "सत्य है।"

मुशी जी बोले ,"तो फिर इतने प्रकार के मनुष्य क्यों बनाये। जैसे कि हिन्दु, मुसलमान, सिख्ख, ईसाइ और सभी को अलग-अलग धार्मिक ग्रंथ भी दिये। एक ही जैसे इंसान बनाने में उसे यानि की अल्लाह को क्या एतराज था। सब एक होते तो न कोई लङाई और न कोई झगङा होता।"

स्वामी हँसते हुए बोले, "मुंशी जी वो सृष्टी कैसी होती जिसमें एक ही प्रकार के फूल होते। केवल गुलाब होता, कमल या रंजनिगंधा या गेंदा जैसे फूल न होते!"

फैज अली ने कहा सच कहा आपने यदि एक ही दाल होती तो खाने का स्वाद भी एक ही होता। दुनिया तो बङी फीकी सी हो जाती! 

स्वामी जी ने कहा, मुंशी जी!  इसीलिये तो ऊपर वाले ने अनेक प्रकार के जीव-जंतु और इंसान बनाए ताकि हम पिंजरे का भेद भूलकर जीव की एकता को पहचाने।


मुशी जी ने पूछा, इतने मजहब क्यों ?

स्वामी जी ने कहा, " मजहब तो मनुष्य ने बनाए हैं, प्रभु ने तो केवल धर्म बनाया है।" 

मुशी जी ने कहा कि, " ऐसा क्यों है कि एक मजहब में कहा गया है कि गाय और सुअर खाओ और दूसरे में कहा गया है कि गाय मत खाओ, सुअर खाओ एवं तीसरे में कहा गया कि गाय खाओ सुअर न खाओ;  इतना ही नही कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि मना करने पर जो इसे खाये उसे अपना दुश्मन समझो।"

स्वामी जी जोर से हँसते हुए मुंशी जी से पूछे कि,  "क्या ये सब  प्रभु ने कहा है ?"

मुंशी जी बोले नही, "मजहबी लोग यही कहते हैं।" 

स्वामी जी बोले,  "मित्र! किसी भी देश या प्रदेश का भोजन वहाँ की जलवायु की देन है।  सागर तट पर बसने वाला व्यक्ति वहाँ खेती नही कर सकता, वह सागर से पकङ कर मछलियां ही खायेगा।  उपजाऊ भूमि के प्रदेश में खेती हो सकती है।  वहाँ अन्न फल एवं शाक-भाजी उगाई जा सकती है। उन्हे अपनी खेती के लिए गाय और बैल बहुत उपयोगी लगे।  उन्होने गाय को अपनी माता माना, धरती को अपनी माता माना और नदी को माता माना क्योंकि ये सब उनका पालन पोषण माता के समान ही करती हैं।"  

"अब जहाँ मरुभूमि है वहाँ खेती कैसे होगी? खेती नही होगी तो वे गाय और बैल का क्या करेंगे?  अन्न है नही तो खाद्य के रूप में पशु को ही खायेंगे। तिब्बत में कोई शाकाहारी कैसे हो सकता है? वही स्थिति अरब देशों में है।  जापान में भी इतनी भूमि नही है कि कृषि पर निर्भर रह सकें।" 

स्वामी जी फैज अलि की तरफ मुखातिब होते हुए बोले, " हिन्दु कहते हैं कि मंदिर में जाने से पहले या पूजा करने से पहले स्नान करो। मुसलमान नमाज पढने से पहले वाजु करते हैं। क्या अल्लहा ने कहा है कि नहाओ मत, केवल लोटे भर पानी से हांथ-मुँह धो लो?" 

फैज अलि बोला, क्या पता कहा ही होगा! 

स्वामी जी ने आगे कहा, नहीं, अल्लहा ने नही कहा! अरब देश में इतना पानी कहाँ है कि वहाँ पाँच समय नहाया जाए।  जहाँ पीने के लिए पानी बङी मुश्किल से मिलता हो वहाँ कोई पाँच समय कैसे नहा सकता है।  यह तो भारत में ही संभव है, जहाँ नदियां बहती हैं, झरने बहते हैं, कुएँ जल देते हैं। तिब्बत में यदि पानी हो तो वहाँ पाँच बार व्यक्ति यदि नहाता है तो ठंड के कारण ही मर जायेगा। यह सब प्रकृति ने सबको समझाने के लिये किया है।"

स्वामी विवेका नंद जी ने आगे समझाते हुए कहा कि, " मनुष्य की मृत्यु होती है।  उसके शव का अंतिम संस्कार करना होता है। अरब देशों में वृक्ष नही होते थे, केवल रेत थी अतः वहाँ मृतिका समाधी का प्रचलन हुआ, जिसे आप दफनाना कहते हैं। भारत में वृक्ष बहुत बङी संख्या में थे, लकडी. पर्याप्त उपलब्ध थी अतः भारत में अग्निसंस्कार का प्रचलन हुआ।  जिस देश में जो सुविधा थी वहाँ उसी का प्रचलन बढा।  वहाँ जो मजहब पनपा उसने उसे अपने दर्शन से जोङ लिया।"

फैज अलि   विस्मित होते हुए   बोला!  "स्वामी जी इसका मतलब है कि हमें शव का अंतिम संस्कार  प्रदेश और देश के अनुसार करना चाहिये। मजहब के अनुसार नही।" 

स्वामी जी बोले , "हाँ!  यही उचित है।" किन्तु अब लोगों ने उसके साथ धर्म को जोङ दिया। मुसलमान ये मानता है कि उसका ये शरीर कयामत के दिन उठेगा इसलिए वह शरीर को जलाकर समाप्त नही करना चाहता। हिन्दु मानता है कि  उसकी आत्मा फिर से नया शरीर धारण करेगी इसलिए उसे मृत शरीर से एक क्षंण भी मोह नही होता।"  

फैज अलि ने पूछा कि, "एक मुसलमान के शव को जलाया जाए और एक हिन्दु के शव को दफनाया जाए तो क्या प्रभु नाराज नही होंगे?"

स्वामी जी ने कहा," प्रकृति के नियम ही प्रभु का आदेश हैं।  वैसे प्रभु कभी रुष्ट नही होते वे प्रेम सागर हैं, करुणा सागर है।"

फैज अलि ने पूछा तो हमें उनसे डरना नही चाहिए?  

स्वामी जी बोले, "नही!  हमें तो ईश्वर से प्रेम करना चाहिए वो तो पिता समान है, दया का सागर है फिर उससे भय कैसा। डरते तो उससे हैं हम जिससे हम प्यार नही करते।"

मुंशी जी को समझाते हुए स्वामी विवेकानंद जी की पलकें बंद थीं और अश्रु टपक रहे थे। फैज अली स्वामी जी का ये रूप देखकर स्तब्ध रह गए।  प्रेम का ये स्वरूप तो उन्होने पहली बार देखा था। वे वहीं आश्चर्य से खङे रहे और स्वामी जी के पलक खोलने का इंतजार करने लगे। स्वामी जी ये कहते हुए अपनी आँखे खोले कि, "उस परम् पिता को कठोर मानना अपराध है। "

फैज अलि ने हाँथ जोङकर स्वामी विवेकानंद जी से पूछा, "तो फिर मजहबों के कठघरों से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है?" 

स्वामी जी ने फैज अलि की तरफ  देखते हुए मुस्कराकर कहा, "क्या तुम सचमुच कठघरों से मुक्त होना चाहते हो?" फैज अलि ने स्वीकार करने की स्थिति में अपना सर हिला दिया। 

स्वामी जी ने आगे समझाते हुए कहा, "फल की दुकान पर जाओ, तुम  देखोगे वहाँ आम, नारियल, केले, संतरे, अंगूर आदि अनेक फल बिकते हैं; किंतु वो दुकान तो फल की दुकान ही कहलाती है। वहाँ अलग-अलग नाम से फल ही रखे होते हैं। " फैज अलि ने हाँ में सर हिला दिया। 

स्वामी विवेकानंद जी ने आगे कहा कि, "अंश से अंशी की ओर चलो। तुम पाओगे कि सब उसी प्रभु के रूप हैं।" 

फैज अलि अविरल आश्चर्य से स्वामी विवेकानंद जी को देखते रहे और बोले "स्वामी जी मनुष्य ये सब क्यों नही समझता?"

स्वामी विवेकानंद जी ने शांत स्वर में कहा, मित्र! प्रभु की माया को कोई नही समझता। मेरा मानना तो यही है कि, "सभी धर्मों का गंतव्य स्थान एक है। जिस प्रकार विभिन्न मार्गो से बहती हुई नदियां समुंद्र में जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार सब मत मतान्तर परमात्मा की ओर ले जाते हैं। मानव धर्म एक है, मानव जाति एक है।" 

मित्रों! हम सबको धर्म और जाति से परे मानवीय संवेदनाओं को यर्थात में अपनाना चाहिये क्योंकि प्रत्येक सजीव जगत में उस सर्व शक्तिमान का वास है; जिसे हम सब ईश्वर, अल्लाह, गुरुनानक या ईशा कहते हैं। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि,  हमें मानव सेवा में ही ईश्वर सेवा की भावना को वास्तविक रूप में अपनाना चाहिए और यही भावांजली स्वामी विवेकानंद जी के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी। 

जय भारत 

युवा शक्ति









Friday, 2 January 2015

आशाओं का दीप जलाएं


मित्रों, हम सब नये वर्ष का स्वागत नई उम्मीद और नई आशाओं के साथ पूरे जोश एवं उत्साह से करते हैं। तारीखें बदल जाती है, कलेंडर बदल जाते हैं किन्तु मन में ये आशा बरकरार रहती है कि, क्या पता आने वाला वर्ष हमारे जीवन को एक सुनहरा यादगार पल दे जाये। ये सच भी है दोस्तों, क्योंकि उम्मीद पर ही दुनिया टिकी है। जब भी हम लोग हताश या परेशान होते हैं, तो हमारे शुभचिंतक हमें यही कहकर समझाते हैं कि उम्मीद रखो सब अच्छा होगा।  उम्मीद के इस दिये की रौशनी में हम सब अपनो की आशाओं और सपनो को, दुआओं और शुभकामनाओं से प्रकाशित करते हैं।

मित्रों, उम्मीद या आशा तो जीवन का वो अंग है जिसको अपनाने से सकारात्मक परिणामों का आगाज होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टी से तो आशाए या उम्मीद तो एक ऐसा उपचार है, जो अवसाद में चले गये लोगों के लिये रामबांण दवा का काम करता है। 
आज हमारी तरक्की  आशावादी दृष्टीकोंण से ही संभव हुई है। दोस्तों,  लक्ष्य तक पहुँचने में अनेक बाधाएं आती हैं लेकिन आशा की किरण हर मुश्किलों को पार करने की ऊर्जा देती है। उम्मीदें नई ऊर्जा का संचार करती है। मित्रों, उम्मीद कोई सपना नही है उसमें तो आशावादी सपने को हकिकत में बदलने का हुनर होता है। यदि Hope को ध्यान से देखते हैं तो उसका प्रत्येक अक्षर कहता है Have only positive expectations.

मित्रों, आज हम मंगल पर पहुँच गये। नित नई सफलता का कीर्तिमान रच रहे हैं।  क्या कभी सोचे थे कि एक बङा बाजार हमारे हाँथ में होगा जिस पर  क्लिक करते ही हम घर बैठे ही दुनिया भर से शॉपिगं कर सकते हैं?  परंतु इसे स्नेपडील, फ्लिपकार्ड, जबांग, अमेजन डॉट कॉम जैसे ऑनलाइन कारोबार ने संभव कर दिया।  दोस्तों, ये  बाजार की नई तकनिक रातोंरात नही इजाद हुई। इसको बनाने वालों के नए आइडियाज और आशावादी सोच ने  मुश्किलों के भंवर को पार करते हुए इसे संभव किया। आज की युवा पीढी तो ज्यादा क्रिएटिव और इनोवेटिव है। आइडियाज की भी कमी नही है, बस उसे नई उम्मीद के साथ इम्पलीमेंट करने की जरूरत है। हर असफलताएं एक नई सफलता का रास्ता भी दिखाती हैं और निराशाओं में भी आशाओं का एहसास कराती हैं। जिस तरह रात के बाद सुबह की किरण इस बात का आगाज करती हैं कि सब संभव है। उसी तरह निराशाओं के घनघोर अंधकार के छटने पर आशाओं और उम्मीदों के उजाले हमें लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। 

मित्रों, तस्वीर के दूसरे पहलु पर भी ध्यान देना चाहिये।  जिंदगी के सफर में जब हम आगे बढने का प्रयास करते हैं और अपनी सफलता के लिए दूसरों से उम्मीद लगाते हैं, तब हम अपने पैर पर कुल्हाडी मारना जैसी कहावत को ही चरितार्थ करते हैं क्योंकि दूसरों से की गई आशाएं और उम्मीदें अक्सर दुःख का कारण बनती है

अतः हमें आशाओं की ऊर्जा से अपनी काबलियत और कार्यशैली को रिचार्ज करना चाहिये। पुरानी निराशावादी यादों को अपनी मेमोरीकार्ड से डिलिट कर देना चाहिये। जिससे हम सब नये मेमोरीकार्ड में नई उम्मीद के साथ आने वाले सुनहरे पल को संभव कर सकें। मित्रों, उम्मीद तो वर्षों से दरवाजे पर खङी वो मुस्कान है, जो हमारे कानो में धीरे से कहती है सब अच्छा होगा। 



"मन की अलसाई सरिता में, नई उम्मीदों की नाव चलाए।
            नभ की सिमाओं पर, आशाओं का दीप जलाएं।।" 

Have a Successful Year  



Monday, 29 December 2014

अलविदा 2014, स्वागतम् 2015


मैं 2014 अपने 12 महिने के जीवन से विदा हो रहा हुँ। आज मैं अपने भारतीय परिवेश के अस्तित्व को आप सबसे शेयर करुँगा। मेरे इस जीवन में मुझे मंगल पर पहुँचने का कीर्तिमान मिला तो कहीं मेरी छवि को कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा लहुलूहान होना पङा। मेरा 365 दिनों का जीवन समुन्द्र की तरह उथल-पुथल भरा था। कभी ज्वार तो कभी भाटे की तरह कुछ पाया तो कुछ खोया। राजनीति के गलियारे में मैने राष्ट्रीय फूल को खिलते देखा, जिसकी पंखुङियां लगातार खिलती हुई, अपनी राष्ट्रीयता और भारतीयता को प्रस्फुटित कर रही हैं।

मित्रों, गाँधी के स्वच्छ भारत के जोश को देखकर  मेरे मन में ये प्रश्न उठना लाजमी है कि, स्वच्छ मानसिकता के समाज का आगाज कब होगा जहाँ बेटियां निर्भय होकर आवागमन कर सकें क्योंकि मेरे जीवन के आखरी महिने में पुनः नारी की छवि पर विभत्स मानसिकता का तेजाबी प्रहार हुआ। जिसने मुझे इस बात पर सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि आखिर हम कब नारि के लिये सम्मानित संसार की रचना कर सकेगें।
आज हम प्रगति का मापदंड भौतिक सुख-सुविधा के  तराजू में तौल रहे हैं। कभी रेडियो भी बमुश्किल लोगों के पास होता था, किन्तु आज घर की छत भले ही प्लास्टिक या खपरैल की हों लेकिन उस पर  टाटा स्काई या डिश टीवी की छत्रछाया जरूर नजर आयेगी। प्रगति की दौङ में, मैं आज काफी आगे हुँ। आधुनिक हथियारों और विज्ञान की नई उपलब्धियों से मालामाल हुँ। अपनी इस कामयाबी पर मैं जश्न मनाऊँ या खौफजदा छोटी बच्चियों को देखकर मरती इंसानियत पर आंसु बहाऊँ।

जाते-जाते मेरे जीवन के आखरी पलो ने मुझे मेरे पङोसी का ऐसा दर्द दिखाया कि अश्रु की धारा अविलंब निकल पडी। जिसमे पङोसी द्वारा मेरे भाई 2008 पर हुए दर्द को भी हम भूलकर उसके गम में शामिल हुए, क्योकिं पडोस में जो हुआ वो भी इंसानियत का क्रूर संहार था। जो इतिहास में दफन हो गया था वो पुनः हरा हो गया।

मित्रों, जहाँ मैने इतने व्यथित और मन को विहल करने वाले क्षंण देखे तो वहीं कुछ पल खुशियाँ भी दे गए।   गमों की रात के बाद मेरे जीवन में कुछ खुशियाँ भी रौशन हुईं।  राजनीति और शिक्षा के ध्रुव को भारत रत्न से अलंकृत होते देखने का सपना साकार हुआ तो कहीं बच्चों की मासूमियत को समझने वालों को विश्व के सर्वोच्च सम्मान नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। जन-जन की भाषा हिन्दी का सम्मान हुआ। गूगल जैसे सर्च इंजन को भी हिन्दी की शरण में आना पडा।

मित्रों दुःख और खुशी की दरिया में गोते लगाते हुए अब मैं आप सबसे विदा हो रहा हुँ। जाते-जाते अपने भाई 2015 का  स्वागत अंनत मंगल कामनाओं के साथ करता हुँ।

मेरे भाई 2015 का सफर खुशियों और सफलताओं से भरा हो,  मजहबी अंतर को भूलकर अनेकता में एकता की पहचान का सम्मान हो, बेटियों के लिये बेकौफ आसमान की छाया हो, क्रूर मानसिकता को ऐसा दंड दिया जाए कि फिर कोई  विभत्स मानसिकता अपना फन न फैला सके। नये वर्ष की अगवानी में आत्मविश्वास का आगाज लिये सभी के लबों पर हो, नव वर्ष मंगलमय हो। 







Wednesday, 24 December 2014

संसदिय गरिमा को आत्मसात करने वाले, आदरणीय अटल जी


प्रखर राष्ट्रवादी भारतमाता के सपूत पं. अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म दिवस '25 दिसंबर' को 'सुशासन दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय अति प्रशंसनिय है। आदरणीय अटल जी अनुशासन के परिचायक हैं। साथ ही वर्तमान सरकार द्वारा आदरणीय अटल जी को गणतंत्र दिवस पर भारत रत्न से अलंकृत करने की घोषणा अत्यधिक हर्ष का विषय है। संसदिय गरिमा को आत्मसात करने वाले आदरणीय अटल जी श्रेष्ठ सांसदो में से एक हैं। अटल जी को बाल्यकाल से ही अनुशासन प्रिय पिता के सानिध्य में नैतिकता की शिक्षा प्राप्त हुई थी। जनसंघ के संस्थापक सदस्य आदरणीय अटल जी ने सांसद के रूप में अभूतपूर्व सफलता का अवदान देकर भारतीय राजनीति में पर्याप्त सफलता अर्जित की है।

कवि और प्रभावशील लेखन के धनी अटल जी का राजनीति सफर भारत की आजादी से पहले ही शुरु हो गया था। परंतु सांसद के रूप में अटल जी का सफर 1957 से शुरू हुआ। जब कांग्रेस सरकार, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के सभी लोगों को जेल के सिकंजो के पीछे भेज दी थी, तब उस समय संसद में संघ की बात कहने वाला कोई नही था। संघ के वरीष्ठ नेताओं ने निर्णय लिया कि राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ भी अपनी एक पार्टी बनाये, जो चुनाव में भाग ले। तब अनुभवी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ पार्टी बनाई गई। 21 अक्टुबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ पार्टी का पहला अधिवेशन हुआ। 1952 में कश्मीर की जेल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुर्खजी की संदिग्ध अवस्था में मृत्यु हो गई। अटल जी उनके व्यक्तिगत सचिव थे। मुर्खजी की अचानक मृत्यु से अटल जी को बहुत दुःख हुआ, देशभक्ति के ज्वार ने अटल जी को विहल कर दिया और वे राजनीति में प्रवेश किये। 

अपनी अप्रतिम भाषा कौशल और आकर्षण व्यक्तित्व के कारण अटल जी भारतीय जनसंघ के सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता बन गये। अटल जी के काव्यात्मक, सरल, सरस भाषणों ने उन्हे व्यापक लोकप्रियता दिलाई। 1957 का जब चुनाव हुआ तब पार्टी ने अटल जी को लखनऊ, बलरामपुर और मथुरा से प्रत्याशी बनाया। नई पार्टी, नया नेता, नया चुनाव सबकुछ नया था। अटल जी बलरामपुर सीट से जीत गये किन्तु लखनऊ और मथुरा से हार गये थे। 1957 के लोकसभा के चुनाव में अटल जी के अलावा तीन सदस्य और चुने गये थे। लोकसभा के अपने शुरुवाती दिनों के बारे में
अटल जी कहते हैं कि
"हम सभी विधाई कार्य के लिये नए थे। न कोई पूर्व अनुभव था और ना कोई पूर्व पार्टी का सदस्य था, जो हम लोगों का मार्ग-दर्शन करता। संख्या कम होने की वजह से सभी सांसद को संसद में पिछली सीट पर स्थान मिला था। ऐसी स्थिती में लोकसभा अध्यक्ष का ध्यान अपनी ओर खींचना बहुत मुश्किल था।"

उस दौरान जवाहर लाल नेहरु प्रधानमंत्री के साथ विदेश मंत्री भी थे। अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर सदन में गम्भीर चर्चा होती थी। जब विदेश मंत्रालय की चर्चा होती थी तो सदन खचाखच भरा होता था और दर्शक दीर्घा में भारी भीङ होती थी। विदेश नीति अटल जी का प्रिय विषय था। उन्होने एम.ए. राजनीति में विशेष विषय के अंर्तगत विदेश नीति ही लिया था। अपने विदेश नीति के भाषण के बारे में अटल जी कहते हैं कि

"विदेश नीति पर मेरे पहले भाषण ने ही सदन का ध्यान आकृष्ट किया था। मेरी प्रांजल भाषा और धारा प्रवाह शैली सबको पसंद आती थी। 20 अगस्त 1958 को प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु जी ने अपना अंग्रेजी भांषण समाप्त करने के बाद अध्यक्ष जी से हिन्दी में कहने की अनुमति माँगी, सदस्यों ने तालियों से उनका स्वागत किया। नेहरु जी ने मेरा नाम लेकर हिन्दी में बोलना शुरु किया" 

नेहरु जी ने कहा,  "कल जो भाषण हुए उनमें से एक भाषण श्री वाजपेयी जी का हुआ। अपने भाषण में उन्होने एक बात कह थी, वो ये कि मेरे ख्याल से जो मेरी विदेश नीति है, मेरी राय में सही है। मैं उनका मसगूर हुँ की उन्होने ये बात कही किन्तु एक बात उन्होने और भी कही कि, बोलने के लिये वांणी चाहिये लेकिन चुप होने के लिये वाणी और विवेक दोनो चाहिये। इस बात से मैं पुरी तरह सहमत हुँ। कम से कम जहाँ तक हमारी विदेश नीति का संबंध है, कभी-कभी हम जोश में आ सकते हैं, कभी धोका भी हो सकता है।"

समय के साथ अनेक कारणों से जनसंघ पार्टी का दिपक बुझ गया और जनता पार्टी का उदय हुआ। मोरार जी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनी जिसमें अटल जी विदेश मंत्री बनाये गये। विदेश मंत्री के रूप में अटल जी ने जो कार्य़ किये वो किसी कीर्तिमान से कम नही है। विदेश मंत्री के रूप में अटल जी ने चीन और पाकिस्तान की यात्राएं की थी। पासपोर्ट की नीति में काफी उदारता दिखाई थी। जनता पार्टी की सरकार सुचारु रूप से कार्य कर रही थी किन्तु कुछ राजनेताओं द्वारा दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठाया गया और जनता सरकार भंग हो गई तथा इसी के साथ जनता पार्टी टूट गई। तब अडवानी जी और अटल जी ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। अटल जी के नेतृत्व में नये उत्साह के साथ पार्टी को गति मिली। पार्टी का भले ही नाम बदला किन्तु अटल जी का राजनीति सफर वसुधैव कुटुंबकम की भावना लिये अनवरत चलता रहा। 

राष्ट्रीय एकता और अखंडता के प्रहरी अादरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी को 1994 में सर्वश्रेष्ठ सांसद’ एवं 1998 में सबसे ईमानदार व्यक्ति के रूप में सम्मानित किया गया है। अटल बिहारी वाजपेयी ने सन् 1997 में पहली बार प्रधानमन्त्री के रूप में देश की बागडोर संभाली। 19 अप्रैल, 1998 को पुनः प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली और उनके नेतृत्व में 13 दलों की गठबन्धन सरकार ने पाँच वर्षों में देश के अन्दर प्रगति के अनेक आयाम छुए।

आज भले ही आदरणीय अटल जी राजनीति जीवन से दूर हैं। परंतु देश के अंदर जागरण का शंखनाद करने वाले अटल जी का व्यक्तित्व, विरोधी को भी साथ लेकर चलने की भावना और उनके ओजस्वी भांषण का कोई विकल्प नही है। आदरणीय अटल की कही पंक्तियों से कलम को विराम देते हैं और उनका शत्-शत् वंदन तथा अभिनंदन करते हैं।

"मेरी कविता जंग का एलान है, पराजय की प्रस्तावना नही। वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य-निनाद नही, जूझते योद्धा का जय-संकल्प है। वह निराशा का स्वर नही, आत्मविश्वास का जयघोष है।" 

वंदे मातरम् 
सभी पाठकों को क्रिसमस की हार्दिक बधाई

नोट- पूर्व पोस्ट पढने के लिए निचे दिये लिंक पर क्लिक करें
उच्च कोटी के वक्ता (अटल बिहारी वाजपेयी)

जन जन के प्रिय नेता संवेदनशील अटल जी
  







Friday, 19 December 2014

कोशिश करने वालों की हार नही होती



आज भले ही प्राइवेट क्षेत्र में अच्छे वेतन के ऑपशन्स हैं फिर भी आईएएस या अन्य उच्च पदों के प्रति आकर्षण बरकरार है। अक्सर मुझसे कई विद्यार्थी ये पूछते हैं कि, हमें सफलता कैसे मिले या हम क्या करें कि एक्जाम(Exam) क्लियर(Clear) करलें। बात विद्यार्थी की करें या किसी भी क्षेत्र में कामयाबी की। मित्रो, सच तो ये है कि,  हम सब अपने-अपने क्षेत्र में कामयाब होना चाहते हैं। उसके लिये हमें सबसे पहले अपने लक्ष्य को निर्धारित करना होगा और साथ ही आसमान छुने का हौसला रखना होगा क्योकि सफलता सरलता से नही मिलती।  रास्ते में जानी अनजानी अनेक बाधाएं सूरसा के मुहँ की तरह आपकी बुद्धिमता और धैर्य की परिक्षा लेने के लिये मिलती रहेंगी। समस्याओं का सामना करने का हौसला रखें और चल पङिये अपनी मंजिल की ओर।

जिस तरह पानी में रहने के लिये तैरना आना अनिवार्य शर्त है उसी तरह हम जिस क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उसके विषय ज्ञान का पूर्णता से अध्ययन करना सफलता की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।  लक्ष्य पाने के लिये लगातार परिश्रम करने का जज़बा इतना स्ट्रॉग(Strong) हो कि, आपके द्वारा किये गये प्रयासों से लक्ष्य करीब आ जाये। 

स्वामी विवेकानंद ने कहा है, "उठो जागो और तब तक मत रुको,
                                         जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।" 

मित्रों, जिंदगी की सामान्य धारा में बहकर कोई सफल नही होता। धारा चाहे जिस भी दिशा में बहे हमें अपने लक्ष्य के अनुसार बहने की ही कोशिश करनी चाहिये। स्वंय को परिस्थिती की दुहाई देकर धारा के हवाले करना कायरता है। अच्छे प्रयोजन में आनेवाली बाधाएं तो हमें अपने लक्ष्य के प्रति और दृणता प्रदान करती हैं क्योकि जितना कठिन परिश्रम होगा जीत उतनी ही शानदार होगी। नकारात्मक आदतें हमारी सफलता की सबसे बङी दुश्मन है। थोङी सी असफलता से डरकर  कुछ लोग पहले से ही मन बना लेते हैं कि उनका लक्ष्य पूरा हो ही नही सकता। उन्हे विश्वास होता है कि, वो चाहे कुछ भी करें उनका परिश्रम काम नही आयेगा। ऐसे लोग मैदान में जाने से पहले ही हार मान लेते हैं लेकिन सफलता के सपने देखते
 हैं। सोचिये!  रात में कभी सूरज उग सकता है इसलिये सफलता को रौशन करने के लिये सबसे पहले नकारात्मक सोच को अलविदा कहें क्योकि असफलता में भी सफलता का पैगाम होता है। कार्य के दौरान कभी-कभी गलतियाँ हो जाती है, ये गलतियाँ तो हमें ये एहसास कराती हैं कि हमने कोशिश की। 

मित्रों, दौङ प्रतियोगिता में जब हम किसी खिलाङी को स्वर्ण पदक लेते देखते हैं, तो सोचते हैं कि 10 -15 मिनट की दौङ से इसे ये सम्मान मिल गया किन्तु सच्चाई में उसके 10-15 वर्षो की कङी मेहनत का परिणाम होता है स्वर्ण पदक, जिसको पाने के लिये वो दौङते समय कितनी बार गिरा होगा और फिर लक्ष्य को याद करके पुनः दौङा होगा। ऐसे ही लगातार कोशिश से ही लक्ष्य प्राप्त होता है। इसलिये सफलता के बारे में सोचें, अपना लक्ष्य निर्धारित करें और उसके लिये मेहनत करें। धारा के अनुकूल न बहें, बल्कि धारा में बहने का हौसला रखें क्योकि........

"लहरों के डर से नौका पार नही होती, 
कोशिश करने वालों की हार नही होती। 
असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकीर करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो। 
कुछ किये बिना ही, जय जयकार नही होती। 
कोशिश करने वालों की हार नही होती।" 
आदरणिय हरिवंश राय बच्चन जी की कविता की कुछ पंक्तियों से कलम को विराम देते हैं। 
Best of  Luck

Friday, 12 December 2014

मानवता मेरा धर्म है (Humanity is my Religion)


आजकल किसी भी न्यूज चैनल को देखें हर चैनल पर धर्म और जाति के विषय पर गरमा-गरम बहस देखी जा सकती है। मन में ये प्रश्न उठता है कि, जिस धर्म में मानविय गुणं न हो और इंसान का इंसान के प्रति सम्मान न हो, ऐसी जाति एवं धर्म से किसका भला होगा। किसी भी समाज या देश का विकास सबके सहयोग पर निर्भर है, फिर हम क्यों धर्म और जाति के नाम पर अपने विकास पर कुठाराघात कर रहे हैं ????

इतिहास गवाह है कि, ऊची जाति की अस्पृश्यता, आडम्बर, अनेक देवी-देवता, इस्लाम और ईसाइयों के कट्टर अत्याचार की नीति तथा क्रूर व्यवहार के कारण लाखों स्त्री-पुरुष धर्म परिर्वतन के लिये मजबूर हुए। भारत पर धर्म और जाति के नाम पर अनेक अमानविय आक्रमण हुए, जिसने भारत की आत्मा को तार-तार कर दिया। आज भारत ही नही विश्व के कई देश धर्म और जाति के वायरस से ग्रसित हैं और विनाश की ओर अग्रसर हैं। यहाँ तक कि एक ही धर्म इस्लाम में सिया सुन्नी का झगङा तो कहीं देवी-देवताओं के नाम पर हिन्दुओं में विवाद। आज वक्त का तकाज़ा है कि, इतिहास से सबक लेकर हमें धर्म और और जाति के चक्कर में न पङते हुए मानवीय सोच का संचार करना चाहिये। 

जाति और धर्म के नाम पर की गई व्यवस्था अप्रजातांत्रिक है, इससे समानता की भावना पर कुठाराघात होता है। कहने को तो  कोई भी सरकार जाति व्यवस्था और धार्मिक उन्मादों को भारत से दूर करना चाहती है, ताकि सभी लोग समान रूप से जीवन व्यतीत करें किन्तु जाति के नाम पर आरक्षण की नीति अपने आप में बहुत बङी त्रासदी है। सच तो ये है कि, धर्म और जाति के नाम पर टकराव सिर्फ विभिन्न राजनैतिक दलों की वोट नीति है और दंगो की उपज का एक विभत्स कारण मात्र है। 

"Every Religion that has come into the world has brought the message of love & brotherhood. Those who are indifferent to the welfare of their fellowmen, whose heart are empty of love, humanity & kindness, they do not know the meaning of Religion." 

अनंततः यही कहना चाहते हैं कि, विकास के इस दौर में परिवर्तन के बिना प्रगति की आशा करना व्यर्थ है अतः हमें अपनी सोच और विचार में परिवर्तन का आगाज करना होगा, जहाँ हम सबको इंसानियत की जाति और मानवता के धर्म में इस तरह रच-बस जाना है कि, हर ओर सुख-शान्ति की बयार बहे, बेटियाँ सुरक्षित हों और देश का चहुमुखी विकास हो। कवि प्रदीप की पंक्तियाँ साकार हो जाये....


"इन्सान से इन्सान का हो भाई चारा, यही पैगाम हमारा

संसार में गूँजे समता का इकतारा, यही पैगाम हमारा।"



Wednesday, 10 December 2014

कैलाश सत्यार्थी एवं मलाला को बधाई



साहस के प्रतीक मलाला एवं कैलाश सत्यार्थी को शांती के नोबल पुरस्कार की हार्दिक बधाई। ये वो नायक हैं जिन्होने अपनी जिंदगी की परवाह किये बिना समाज को एक नई दिशा दी है। कम उम्र के बावजूद मलाला लङकियों की शिक्षा के लिये लगातार प्रयास कर रहीं हैं। मलाला ने पाकिस्तान जैसे देश में बाल अधिकारों एव बालिका शिक्षा के लिये अपना संर्घष जारी रखा है। अक्टुबर 2012 में मात्र 14 वर्ष की अल्पआयु में अपने उदारवादी प्रयासों के कारण वे तालिबानी फरमान की शिकार बनी। आँखों में डॉक्टर बनने का सपना लिये मलाला स्कूल जाती थी परंतु उसके सपने को तालिबानियों के फतवे ने विराम लगा दिया। तालिबानियों ने लङकियों के लगभग 200 स्कूलों तोङ  दिये किन्तु मलाला के इरादों को वे रोक न सके। जानलेवा हमले के बावजूद मलाला आज भी हिमालय की तरह अपने इरादे पर मजबूती से खङी है। आज भी वे बालिका शिक्षा की पक्षधर है और समाज में शिक्षा के नये आयाम को चरितार्थ कर रही हैं। सबसे कम उम्र में नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाली मलाला ने सिद्ध कर दिया है कि, 
मुश्किलों से भाग जाना आसान होता है, 
हर पहलु जिंदगी का इम्तिहान होता है,
डरने वालों को मिलता नही कुछ ज़िंदगी में,
लङने वालों के कदमों में ज़हान होता है। 

तंग गलियों से निकलकर विश्व पटल पर छा जाने वाले कैलाश सत्यार्थी बाल अधिकारों के लिये 1980 में इलेक्ट्रीकल इंजिनियर की नौकरी छोङकर अब तक 80 हजार बाल मजदूरों को रिहा करा चुके हैं। कई बार असामाजिक तत्वों ने उनपर जानलेवा हमला किया और धमकाया भी परंतु दृण इच्छाशक्ति लिये कैलाश सत्यार्थी अपने मिशन को आगे बढाते रहे। बाल मजदूरी के समाप्ति हेतु अनेक पद यात्राएं करके जनमानस को जागृत करने का प्रयास किये। मजबूत कानून की माँग करते हुए 1993 में बिहार से दिल्ली तक की पदयात्रा, 1994 में कन्याकुमारी से दिल्ली तक की यात्रा, 1995 में कोलकता से काठमांडू तक की यात्रा और 2007 में बाल व्यपार विरोधी दक्षिण एशियाई यात्रा प्रमुख है। शिक्षा को मौलिक अधिकार दिलाने में भी कैलाश सत्यार्थी का महत्वपूर्ण योगदान है। 

मध्यप्रदेश के गौरव कैलाश सत्यार्थी पहले गैर सरकारी व्यक्ति हैं जिन्हे संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन को संबोधित करने का अवसर प्राप्त हुआ था। कैलाश सत्यार्थी का एनजीओ बाल श्रम और बाल तस्करी में फंसे बच्चों को मुक्त कराने का मानवीय प्रयास कर रहा है। नोबल कमेटी के अनुसार 'बचपन बचाओ आंदोलन' चलाने वाले सत्यार्थी ने गाँधी जी की परंपरा को कायम रखा है। भारत को विशवपटल पर गौरवान्वित करने वाले कैलाश सत्यार्थी के लिये ये कहना उचित होगा कि, 

आँधियों को जिद्द है जहाँ बिजली गिराने की,
कैलाश सत्यार्थी को जिद्द है वहाँ आशियाँ बसाने की।
हिम्मत और हौसले बुलंद हैं,
मानवता की मशाल जलाने के लिये जंग अभी जारी है। 

ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, 2014 का शांति के लिये नोबल पुरस्कार सौहार्द का प्रतीक है। मलाला और कैलाश सत्यार्थी के मिशन में मानवता की इस मशाल को प्रज्वलित रखना हम सबकी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी है।     

धन्यवाद