Friday, 31 August 2012

साहस


कुछ पाकर खो देने का डर कुछ न पा सकने का भय, जिन्दगी की गाङी पटरी से उतर न जाए इन्ही छोटी-छोटी चिन्तओं के डर से घिरी रहती है जिन्दगी लेकिन जिस वक्त हम ठान लेते हैं कुछ नया करने का तभी जन्म लेता है साहस।

साहस तभी आता है जब आपके पास एक मकसद हो, एक जूनून हो। कह सकते हैं कि साहस एक जिजिविषा है। भारतमुनि ने नाट्यशास्त्र में लिखा है—

        सः चविषादशक्ति धैर्यशैर्यादिभिविर्भावैरूत्पद्यते, अर्थात साहस- अविषाद, शक्ति, शौर्य, धैर्य आदि विभावों से उत्पन्न होता है। दुनिया के सभी धर्मों में साहस को श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। इसका स्थान इसलिये भी बङा हो जाता है कि इस प्रवृत्ति से समाज एवं मानवता को लाभ पहुंचता है।

कोलम्बस अपनी सुख सुविधा छोङकर दुस्साहसिक यात्रा पर निकल पङते थे। व्हेनसाँग और फाह्यान तो पैदल ही हिमालय के मुश्किल रास्तों को, बाधाओं को लांघते भारत पहुंचे थे। वासकोडिगामा जैसे इन सभी साहसिक प्रवृत्ति वाले लोगों ने दुनिया को अनजानी जगहों से रू ब रू कराया।

साहस का सकारक्मकता से गहरा रिश्ता है। ये सकारक्मकता  ही थी कि कोपरनिकस, अरस्तु, सकुरात गैलिलीयो जैसे लोग बङे उद्देश्य के लिये साहस का प्रदर्शन कर सके।  सकारक्मकता नैतिक साहस को बढाती है। प्लेटो ने कहा कि साहस हमें डर से मुकाबला करना सिखाता है। साहसिक नेता गाँधी, नेलसेन मेंडेला, मार्टिन लूथर किंग जू. , ऑग सान सू की साहसिक पहल ने अन्याय के खिलाफ विशाल जनमत को खङा किया।

बहाव के विपरीत तैरने वाली सालमन मछली, जैसी- कई महिलाओं को आज भी उनके साहस के लिये याद किया जाता है। अफ्रिकी आयरन लेडी कहलाने वाली लाएबेरिया की राष्ट्रपति ऐलेन जॉनसन सरलिफ को शान्ति का नोबल पुरस्कार मिल चुका है। सरलिफ ने शान्ति की स्थापना के साथ ही समाजिक एवं आर्थिक विकास पर भी ध्यान दिया। रानी लक्षमीबाई ने अपने साहस के बल पर ही अंग्रेजों की विशाल सेना का डट कर मुकाबला किया।

साहस को उम्र या अनुभव से नही आंक सकते। बिरसा मुडां ने 25 वर्ष की उम्र में लोगों को एकत्र कर एक ऐसे आन्दोलन का संचालन किया जिसने देश की स्वतंत्रता में अहम योगदान दिया। आदिवासी समाज में एकता लाकर धर्मान्तरण को रोका और दमन के खिलाफ आवाज उठाई।

साहसपूर्ण जीवन केवल एक सीढी नही है वो तो अंतहीन सिलसिला है जिससे हर सीढी के बाद नया आत्मविश्वास मिलता है। पद्मश्री, अर्जुन पुरस्कार आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित पर्वतारोही बछेन्द्रीपाल का कहना है कि जैसे-जैसे चुनौतियों को स्वीकार करते हैं, साहस और हिम्मत बढती जाती है। अंदर का भय कहाँ चला जाता है पता ही नही चलता है।

संक्लपवान साहसी स्टीफन ने 1974 में ब्लैकहोल के संबन्ध में क्रान्तीकारी खोज की। स्टिफन हॉकिंग एमियोट्राफिक लैटरल स्किल ऑरेसिस बिमारी से लङ रहे हैं जिसका कोई इलाज नही है, फिर भी स्टिफन हॉकिंग अपने कार्य में तल्लीन हैं। स्टिफन ने कई किताबें भी लिखी है।

जीत साहस नही है, बल्कि वह संर्घष साहस है, जो हम सब जीतने के लिये करते है। साहस केवल दैहिक क्षमता के हिंसक प्रर्दशन या भयानक हुंकार नही है। सफल न होने पर अगले प्रयास के लिये ऊर्जा जुटाना भी साहस ही तो है।

 दशरथ मांझी एक ऐसा नाम जिसे mountain man कहा जाता है, अपने साहस के बल पर उन्होने छेनी और हथौङी की सहायता से पहाङ को चीर कर 360 फिट लम्बा और 30 फिट चौङा रास्ता 22 वर्षो के अथक प्रयास से पूरा किया। उनके साहसी जूनून का ही फल है कि आज गया जिले के अत्री और वजीरगंज ब्लाक की दूरी 80 किलोमीटर से घटकर मात्र 3 किलोमीटर रह गई।

मित्रों कई बार हम अनजानी बातों से डरते है। हम जिन नौकरियों को पसंद नही करते, वे भी करते रहते हैं क्योंकि वो सुरक्षित एवं स्थायित्व वाली लगती हैं, इसी के चलते हम अपने सपनो को पूरा करने से डरते हैं। असल में हम अपनी जिंदगी में बदलाव से पहले यथास्थितिवादी बने रहना चाहते हैं। हम ये भूल जाते हैं कि महान आविष्कार इन्ही अन्जानी स्थितियों के प्रति साहस दिखाने से ही संभव हो सका है।

विवेकानंद जी ने कहा है कि- विश्व में अधिकांश लोग इसलिये असफल हो जाते हैं, कि उनमें समय पर साहस का संचार नही हो पाता वे भयभीत हो उठते हैं।

यदि मानव अपनी क्षमताओं के आकलन में साहस न दिखाता तो वह भी चौपाया होता। वास्तविकता तो ये है कि एक आम इंसान को कायदे की जिंदगी जीने के लिये इस जज्बे की उतनी ही जरूरत होती है, जितनी कि किसी महान व्यक्ति या योद्धा को। गाङी चलाने से लेकर दुनिया चलाने तक, कोई भी काम साहस के बिना नही हो सकता। साहस हर व्यक्ति में होता है, जरूरत बस इतनी है कि खुद को पहचाने, जाने और मंजिल की ओर एक कदम बढाने की। कहते हैं—Fortune  Favors The Brave.


Wednesday, 29 August 2012

ये कैसी आधुनिकता


                        ह कैसी आधुनिकता         

हमें वो वक्त याद आता है जब संयुक्त परिवार हुआ करते थे, हर कोई एक दूसरे के सुख-दुख का साथी था। आज जाने अनजाने में या मजबूरी में खुशियों के वो पल हम सबसे दूर हो गये हैं। आज पैसा सर्वोपरि हो गया, रिश्ते गौंण हो चुके है, मोह-माया का अर्थ  ही बदल गया, आज के परिवेश में माया-मोह कहना शायद ज्यादा उचित होगा। हम सब पता नही किस चीज के पीछे भाग रहे हैं, हमारी आवश्यकताएँ इतनी ज्यादा हो चुकी हैं कि हम ये भूल गये कि कब हम साथ बैठ कर एक दूसरे के सुख-दुख को सुनें।

परिवार के जीवन यापन हेतु पैसा भी जरूरी है, किन्तु इसकी सीमा कौन तय करेगा। आज माया-मोह के वायरस से हम सब ग्रसित होते जा रहे हैं। प्रश्न ये उठता है कि, क्या पैसा कमाने या भौतिक साधन एकत्र करने में  ही आत्मीय सुख है? आज आधुनिकता के सभी साधन बच्चों को मिल रहे हैं। बच्चे कार्टून चैनल तथा विडीयो गेम के साथ बङे हो रहें हैं। दादा-दादी तथा नाना-नानी की कहानियों से वंचित हो रहे हैं। आज लुका-छिपी, सेवन-स्टोन या आइस-वाटर जैसे खेल इतिहास बनते जा रहे हैं, जबकि ये खेल हमें मिलजुल कर रहना, संघठन में शक्ती है, इसकी शिक्षा देते हैं। ये कैसी आधुनिकता जिसने वृद्धाश्रमों की तादाद बढा दी है।

आज त्यौहार पहले से ज्यादा धूम-धाम से मनाते हैं, शादियों में दिल खोल कर खर्च करते हैं। पर वो अपनापन कहीं खो गया है, सब एक छलावा सा नजर आता है। आत्मीयता कहीं खो गई है।

काश आधुनिकता के युग में कुछ ऐसा हो जाए हर जगह भाई-चारा, अमन एवं शान्ति कायम हो जाए। दादा-दादी की कहानियाँ हर बच्चे को नसीब हो जाए। कबीर दास की सीख याद आती है,

साईं इतना दीजिये, जामें कुटुम्ब समायें।

मै भी भूखा न रहूँ, साधू भी भूखा न जाए।।

                                                                                                                         

Tuesday, 28 August 2012

हँसने के फायदे

आज की भाग दौङ भरी जिंदगी, ऊपर से काम का प्रेशर हममे में से कई लोगों को तो याद भी न होगा कि पिछली बार कब खिलखिला कर हँसे थे। जबकी हँसना हम सभी के लिये अति महत्वपूर्ण है किन्तु हम उसे नजर अंदाज कर देते हैं। मित्रों हँसने से हमारी जिंदगी किस तरह स्वस्थ एवं खुशनुमा हो सकती है उसी के बारे में थोङी सी जानकारी शेयर करने की कोशिश कर रही हूँ , पसन्द आए तो हँसियेगा जरूर. तो आइये जानते हैं हंसने के पाँच फायदे:
1) हंसने से हद्रय की एक्सरसाइज हो जाती है। रक्त का संचार अच्छीतरह होता है। हँसने पर शरीर से एंडोर्फिन रसायन निकलता है, ये द्रव्य ह्रदय को मजबूत बनाता है। हँसने से हार्ट-अटैक की संभावना कम हो जाती है।

2) एक रिसर्च के अनुसार ऑक्सीजन की उपस्थिती में कैंसर कोशिका और कई प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया एवं वायरस नष्ट हो जाते हैं। ऑक्सीजन हमें हँसने से अधिक मात्रा में मिलती है और शरीर का प्रतिरक्षातंत्र भी मजबूत हो जाता है।

3) य़दि सुबह के समय हास्य ध्यान योग किया जाए तो दिन भर प्रसन्नता रहती है। यदि रात में ये योग किया जाये तो नींद अच्छी आती है। हास्य योग से हमारे शरीर में कई प्रकार के हारमोंस का स्राव होता है, जिससे मधुमेह, पीठ-दर्द एवं तनाव से पीङित व्यक्तियों को लाभ होता है।

4) हँसने से सकारत्मक ऊर्जा भी बढती है, खुशहाल सुबह से ऑफिस का माहौल भी खुशनुमा होता है। तो दोस्तों, क्यों न हम सब दो चार चुटकुले पढ कर या सुनकर अपने दिन की शुरुवात जोरदार हँसी के साथ करें।

5) रोज एक घंटा हँसने से 400 कैलोरी ऊर्जा की खपत होती है, जिससे मोटापा भी काबू में रहता है। आज कल कई हास्य क्लब भी तनाव भरी जिंदगी को हँसी के माध्यम से दूर करने का कार्य कर रहे हैं।

दोस्तों प्रकृति भी हमें संदेश देती है- बारिश के बाद खिली धूप, खिला हुआ फूल, लहलहाते हरे भरे पेङ अपनी खुशी का एहसास दिलाते हैं। उनकी इसी खुशी को देख कर हम सब का मन भी खुश होता है, उसी तरह जब हम सब खुश एवं स्वस्थ रहेंगे तो अपने आसपास का वातावरण भी खुशनुमा बना सकते हैं। कहते हैं—“Health is above wealth”.

सोचिये अगर जरा सी मुस्कान से फोटो अच्छी आ सकती है तो खुलकर हँसने से जिंदगी की तस्वीर कितनी खूबसूरत हो सकती है। मित्रों जब स्वास्थ और सामाजिक क्षेत्र में हँसी के अनगिनत फायदें हैं, तो हँसना तो लाजमी है।

Keep Smiling

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत


        

मनुष्य के जीवन में पल-पल परिस्थितीयाँ बदलती रहती है। जीवन में सफलता-असफलता, हानि-लाभ, जय-पराजय के अवसर मौसम के समान है, कभी कुछ स्थिर नहीं रहता। रात है तो दिन भी है।
इंद्रधनुष के बनने के लिये बारिश और धूप दोनों की जरूरत होती है। हमारी ज़िन्दगी भी कुछ ऐसी ही है। उसमें सुख भी है दुःख भी है, अच्छाई भी है बुराई भी है। जहाँ अच्छा वक्त हमें खुशी देता है, वहीं बुरा वक्त हमें मजबूत बनाता है। हम अपनी जिन्दगी की सभी घटनाओं पर नियंत्रण नही रख सकते, पर उनसे निपटने के लिये सकारात्मक सोच के साथ सही तरीका तो अपना ही सकते हैं। कई लोग अपनी पहली असफलता से इतना परेशान हो जाते हैं कि अपने लक्ष्य को ही छोङ देते हैं। कभी-कभी तो अवसाद में चले जाते हैं। मित्रों, अब्राहम लिंकन अपने जीवन में कई बार असफल हुए और अवसाद में भी गए, किन्तु उनके साहस और सहनशीलता के गुण ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ सफलता दिलाई। अनेक चुनाव हारने के बाद 52 वर्ष की उम्र में अमेरिका के राष्ट्रपती चुने गए। ऐसी अनेक हस्तियों ने असफलता के बाद सफलता के स्वाद को चखा।
दोस्तों, हर रात के बाद सुबह होती है। जिन्दगी हँसाती भी है रुलाती भी है,जो हर हाल में आगे बढने की चाह रखते हैं जिन्दगी उसी के आगे सर झुकाती है। हम जो भी कार्य करना चाहते हैं उसकी शुरुवात करें, आने वाली बाधाओं को सोच कर बैठ न जाएं। कई लोग सफल तो होना चाहते हैं किन्तु थोङी सी असफलता से परेशान हो जाते हैं और कहने लगते हैं कि हम तो ये नही कर सकते या ये मुझसे नही हो सकता। भाई, ऐसा कौन सा काम है जो इंसान नही कर सकता। हम ये क्यों नही सोचते कि हम ये काम कर सकते हैं, आज नही तो कल लक्ष्य जरूर हासिल करेंगे।

यदि हम बीच में रुक गए तो हमेशा मन में अफसोस रहेगा कि काश कोशिश किये होते। अधूरे छूटे कार्य हमें हमेशा कमजोर होने का एहसास दिलाते हैं। जो लोग ईमानदारी से सोचते हैं वे बाधाओं से उबरने के तरीके तलाशते हैं। वे भले ही असफल हो जाएं पर सफल होने की चाह उनको नए तरीकों से आगे बढने की प्रेरणा देती है।

विझान के क्षेत्र में थॉमस अल्वा एडिसन एक ऐसा नाम है जिन्हें न केवल एक आविष्कारक के रूप में बल्कि एक उद्यमी के रूप में भी जाना जाता है। उनके नाम एक हजार से भी ज्यादा पेटेंट है। प्रकाश बल्ब का आविष्कार करके घर-घर रौशनी पहुँचाने वाले एडिसन कई बार अपने कार्य में असफल हुए। एक बार स्टोरेज बैटरी के आविष्कार में करीब 10,000 बार फेल हुए पर उनका कहना था कि मैं फेल नही हुए बल्कि मैंने 10,000 ऐसे तरीके खोज लिये जो काम नही करते। ऐसी सकरात्मक सोच की वजह से ही अनेक आविष्कारों का सृजन कर सके।

मित्रों, अपना लक्ष्य निर्धारित करो और फिर उसमें जुट जाओ। कहते हैं- लहरों के डर से नौका पार नही होती, कोशिश करने वालों की हार नही होती। इस मूलमंत्र को जीवन में उतार लें तो हर समस्या का समाधान संभव है। मजबूत इच्छा हर उपलब्धि का शुरुवाती बिन्दु होती है। जिस तरह आग की छोटी लपटें अधिक गर्मी नही दे सकती वैसे ही कमज़ोर इच्छा बङे नतीजे नही दे सकती। मेरा संदेश उन सभी युवा वर्ग को है जो कामयाबी का परचम फैलाना चाहते हैं।

हर दिन अपनी जिन्दगी को एक नया ख्वाब दो, चाहे पूरा ना हो पर आवाज तो दो।

एक दिन पूरे हो जायेंगे सारे ख्वाब आपके, सिर्फ एक शुरुवात तो दो।।

शिष्टाचार

 
 स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है कि--विश्व में अधिकांश लोग इसलिए असफल हो जाते हैं, क्योंकि उनमें समय पर साहस का संचार नही हो पाता और वे भयभीत हो उठते हैं।
स्वामीजी की कही सभी बातें हमें उनके जीवन काल की घटनाओं में सजीव दिखाई देती हैं। उपरोक्त लिखे वाक्य को शिकागो की घटना ने सजीव  कर दिया, किस तरह विपरीत परिस्थिती में भी उन्होने भारत को गौरवान्वित किया। हमें बहुत गर्व होता है कि हम इस देश के निवासी हैं जहाँ विवेकानंद जी जैसे महान संतो का मार्ग-दशर्न  मिला।      

                                                शिष्टाचार

1893 में शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन चल रहा था। स्वामी विवेकानंद भी उसमें बोलने के लिए गये हुए थे। 11सितंबर को स्वामी जी का व्याखान होना था। मंच पर ब्लैक बोर्ड पर लिखा हुआ था- हिन्दू धर्म – मुर्दा धर्म।

स्वामीजी बोलने के लिये खङे हुए और उन्होने सबसे पहले (अमरीकावासी बहिनों और भाईयों) शब्दों के साथ श्रोताओं को संबोधित किया। स्वामीजी के शब्द ने जादू कर दिया, पूरी सभा ने करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया। इस हर्ष का कारण था, स्त्रियों को पहला स्थान देना। स्वामी जी ने सारी वसुधा को अपना कुटुबं मानकर सबका स्वागत किया था। भारतीय संस्कृति में निहित शिष्टाचार का यह तरीका किसी को न सुझा था। इस बात का अच्छा प्रभाव पङा। श्रोता मंत्र मुग्ध उनको सुनते रहे, निर्धारित 5 मिनट कब बीत गया पता ही न चला। अध्यक्ष कार्डिनल गिबन्स ने और आगे बोलने का अनुरोध किया। स्वामीजी 20 मिनट से भी अधिक देर तक बोलते रहे। स्वामीजी की धूम सारे अमेरिका में मच गई। देखते ही देखते हजारों उनके शिष्य बन गए। और तो और, सम्मेलन में कभी शोर मचता तो यह कहकर श्रोताओं को शान्त कराया जाता कि यदि आप चुप रहेंगे तो स्वामी विवेकानंद जी का व्याखान सुनने का अवसर दिया जायेगा। सुनते ही सारी जनता शान्त हो कर बैठ जाती।

अपने व्याख्यान से स्वामीजी ने यह सिद्ध कर दिया कि  हिन्दू धर्म भी श्रेष्ठ है, जिसमें सभी धर्मो को अपने अंदर समाहित करने की क्षमता है। भारतिय संसकृति, किसी की अवमानना या निंदा नही करती। इस तरह स्वामी विवेकानंद जी ने सात समंदर पार भारतीय संसकृति की ध्वजा फहराई।

जय भारत 
अनिता शर्मा