Saturday, 9 June 2018

बच्चों में मोबाइल की बढती आदत जिम्मेदार कौन??????

दोस्तों, फ्रांस में वहां की सरकार कानून बनाकर स्कूल में मोबाइल लाना प्रतिबंधित कर रही है। विश्व में फ्रांस पहला देश है जो अपने देश के बच्चों के भविष्य के प्रति इतनी गहराई से सोच रहा है। निःसंदेह ये सराहनिय कदम है किंतु, ये जानकर मन में विचार आया कि निश्चय ही वहाँ मोबाइल अत्यधिक आतंक मचा चुका होगा जिसके परिणाम स्वरूप ये कदम उठाया गया है।

मित्रों, विचार करने योग्य ये है कि स्थिती बदतर होनेपर ही हमसब क्यों सजग होते हैं। हम समय रहते क्यों नही उचित निर्णय लेते हैं। हम सब जानते हैं कि कोई भी टेक्नोलॉजी या कोई भी सुविधा कुछ फायदे तो कुछ दुष्परिणाम भी लाती है, पर हम उस नुकासान को अनदेखा कर देते हैं। आज अपने देश भारत की ही अगर बात करें तो एक साल के बच्चे के हांथ में मोबाइल देखा जा सकता, जिस उम्र में बच्चे अपना तो ख्याल रख नही सकते अभिभावक उनको मोबाइल थमा देते हैं। दो तीन साल के बच्चे तो मोबाइल पर गेम खेलना सीख जाते हैं। तीन चार साल के बच्चे जब मोबाइल को ऑपरेट करते हैं तो उनके अभिभावक ऐसे खुश होते हैं कि बच्चा नोबल पुरस्कार जीत गया, हर किसी से कहेंगे कि, हमसे ज्यादा इसको आता है मोबाइल के बारे में। सोचिए! जिस उम्र में शारिरीक और बौद्धिक शक्ती को मजबूत करने का समय होता तब बच्चा एक जगह बैठकर एक ही संसाधन में व्यस्त, ये व्यस्तता बच्चे की नीवं को हीला देती है जिसका आभास अभिभावकों को तब होता है जब बच्चे का विकास बाधित हो चुका होता है। गौरतलब है कि, बचपन में मोबाइल के उपयोग से बच्चों को छोटी उम्र में ही चश्में लग जाना, माशपेशियों का कमजोर होना, बौद्धिक क्षमता में कमी हो जाना, रचनात्मक और क्रियात्मक विकास का रुकना, मोटापे जैसी गंभीर बिमारी का बढना इत्यादि समस्यायें दिन प्रतिदिन बढ रही हैं। रिसर्च बताते हैं कि, मोबाइल के अधिक उपयोग से दो तीन साल के बच्चों को ब्रेन कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा है। अभी हाल में एक अध्ययन के मुताबिक बच्चों में ग्रिपिंग पॉवर कम हो रही है वो पेंसिल ही नही पकङ पा रहे हैं। मोबाइल के साथ बढने वाले बच्चे एकांकी हो जाते हैं क्योंकि उनको मोबाइल की इतनी आदत लग चुकी होती है कि किसी और के साथ तालमेल नही बैठा पाते यहाँ तक कि पढाई में भी ध्यान नही देते जिसका परिणाम वे पढाई में कमजोर हो जाते हैं फिर डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं।

मित्रों, कई अभिभावक तो आजकल बच्चे को बहला फुसलाकर खाना खिलाने के बजाय मोबाइल पर कार्टून दिखाकर खाना खिलाते हैं, बच्चे का पूरा ध्यान कार्टून पर, क्या खाया, कितना खाया कुछ पता नही पर माँ-बाप खुश बच्चा खा लिया फिर बाद में बच्चे को कार्टून की आदत इतनी लग गई की खाना खाना तो भूल गया कार्टून देखने की आदत जरूर पढ गई। आज बच्चों के साथ खेलने का वक्त नही होता अभिभावकों के पास, यदि बच्चा रोया तो उसके साथ समय व्यतीत करने की बजाय मोबाइल पकङा देते हैं। बच्चा मोबाइल पर क्या देखरहा है ये जानने का भी वक्त नही होता। हिंसक खेल बच्चे की मनोवृत्ति को किस दिशा में ले जा रहे इसका उनको अंदाज ही नही है। जब स्थिती विस्फोटक हो जाती है या बच्चा कहना नही सुनता तो इस आदत का जिम्मेदार भी उसको ही माना जाता है। विचार किजिए! एक छोटा बच्चा जो ठीक से चल भी नही पाता उसके पास मोबाइल स्वयं तो चलकर नही आता होगा। बच्चों तक मोबाइल की पहुँच माता-पिता या घर के बङे सदस्यों द्वारा ही होती है। कहने का आशय ये है कि, बच्चों में मोबाइल की आदत के जिम्मेदार पालक ही हैं जो भविष्य के दुष्परिणाम से अनिभिज्ञ अपने बच्चे को एक ऐसे जहर की आदत डाल रहे जिसका असर बच्चे की नीवं को खोखला कर रहा है और बच्चे के स्वाभाविक विकास को कुंठित कर रहा है।

मित्रो, किसी भी टेक्नोलॉजी का उपयोग गलत नही है किंतु उसका उपयोग कब, कैसे और किसको कितना करना है ये ज्ञान होना अति आवश्यक है। प्रकृति ने भी मनुष्य के विकास को उम्र के आधार पर एक संतुलन दिया है जिसका स्वाभाविक प्रवाह सम्पूर्ण विकास को सहज बनाता है।

अतः आज के सभी अभिभावकों से मेरा निवेदन है कि, समय रहते मोबाइल जैसे जहर को बच्चों से दूर रखकर उनमें बालसुलभ मनोवृत्ति को अंकुरित करने में अपना योगदान दिजिये। कहानी सुनाकर एवं उनके साथ खेलकर उनमें उनकी बौद्धिक और शारीरिक क्षमता का विकास किजिये। रंग-बिरंगे रंगों से उनकी दुनिया को सुखद और स्वाभाविक बनाइये। बच्चे तो कुम्हार की वो मिट्टी हैं जिन्हे आप जिस आकार में ढालेंगे वो ढल जायेंगे।
बदलता बचपन जिम्मेदार कौन????  इस लेख को भी अवश्य पढें एवं अपने विचार भी अवश्य शेयर किजीये 

धन्यवाद 😊













Friday, 23 March 2018

खुशियों के अनमोल पल

"जिंदगी में अगर लक्ष्य बड़ा हो तो संघर्ष भी बड़ा करना होता है इन्ही विचारों के साथ आगे बढने वालों के सपने अवश्य सच होते हैं"
मित्रों, देवी मां की कृपा से और बङों के आशिर्वाद से हमारे परिवार के लिये खुशी का ऐसा अवसर है, जब परिवार के हर सदस्य का मन जयहिंद के नारे से गूंजायमान हो गया। वंदे मातरम् का आगाज़ करते हुए घर का बच्चा प्रांजल शर्मा, आर्मस मेडिकल कॉलेज में अपनी एमबीबीएस की पढाई पुरी करके डॉक्टर के रूप में देश की सुरक्षा में तैनात सैनिकों की स्वास्थ सेवा में अपना योगदान देंगे। लेफ्टीनेंट प्रांजल शर्मा को आर्मी की वर्दी में देखकर हमसब गौरवान्वित हुए। हम सबको गौरव पूर्ण अनुभूति प्रदान करने में प्रांजल की मेहनत को सबसे पहले सलाम करते हैं क्योंकि हमारे सुपुत्र प्रांजल को बचपन में पटाखे की आवाज से भी डर लगता था लेकिन आज गोले-बारूद के बीच में भी सैनिकों के जीवन रक्षक बनकर अपने कर्तव्य का निर्वाह करेंगे। परिवार से देश प्रेम की शिक्षा तो बचपन से उनको मिली थी परंतु जब मुंबई केन्द्रिय विद्यालय क्रमांक एक में आठंवी में अध्ययन कर रहे थे तो विद्यालय के बगल में ही स्थित नेवी आर्मी का संचालन देखकर आर्मी के प्रति सम्मान और अधिक हो गया। हालांकि डॉक्टर बनने का सपना तो कक्षा तीसरी से प्रांजल के मन में था, जिसको साकार करने में हम लोग माता-पिता के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वाह किये परंतु उस सपने को सच करने में प्रांजल ने दिल से मेहनत की जिसका परिणाम ये हुआ कि, नीट की परिक्षा में अच्छी रेंक लेकर आर्मस माडिकल कॉलेज के लिये सुचिबद्ध हुए तद्पश्चात AFMC  द्वारा आयोजित परिक्षाओं को भी सफलता पूर्वक पास करके AFMC में चयनित हो गये। 11th और 12th  की कक्षा में प्रांजल, अपने सपने को सच करने के लिए अध्यन में अत्यधिक मेहनत किये और ये सिद्ध कर दिये कि, मेहनत करने वालों के सपने साकार जरूर होते हैं। इस सपने को साकार करने में अध्यापकों के मार्गदर्शन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। अध्यापकों द्वारा अच्छे से पढाया गया पाठ और प्रांजल की दो वर्ष की मेहनत का ही परिणाम है कि, आज हम एक आर्मी डॉक्टर के अभिभावक के रूप में प्रफुल्लित हो रहे हैं क्योंकि फौज में एक डॉक्टर भी भारत माता की रक्षा हेतु चिकत्सिय अध्ययन के अलावा फौजी प्रशिक्षण से भी प्रशिक्षित होता है।
स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं, जितना कठिन संघर्ष होगा जीत उतनी शानदार होगी।आत्मा के लिए कुछ भी असंभव नही है।ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, प्रांजल जैसे कई बच्चे अपने सपने को साकार करते हुए आर्मी में अपनी सेवा देने को तद्पर हैं। हम उन सब बच्चों के जज़्बे को तहेदिल से सलाम करते हैं। हाल ही में हमें अभिभावक के रूप में प्रांजल की पासिंग आउट परेड में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ वहाँ बच्चों द्वारा किये गये सांस्कृतिक कार्यक्रम में उनके मल्टी टेलेंट को देखकर खुशी में चार चाँद लग गया। इस वर्ष पास आउट हुए डॉक्टर्स द्वारा अभिनित मूक नाटक में सीमापर गोलियों की बौछार के बीच घायल सैनिकों का डॉक्टर्स द्वारा इलाज देखकर वहाँ उपस्थित सभी अभिभावकों की आँखों से बरबस ही अश्रुधार बह निकली, हालांकी ये खुशी के आंसु थे और अभिभावकों की तालियां भारत के वीर सपूतों के जज़्बों को प्रोत्साहित कर रहीं थी। सांस्कृतिक कार्यक्रम या वर्दी में फौजी डॉक्टरों के हौसले का कोई मुकाबला नही है। दोस्तों, मन तो था कि कुछ तस्वीरें आप लोगों के साथ शेयर करें किंतु ये कर नही सकते क्योकि सुरक्षा के दृष्टीकोंण से आर्मी के अपने नियम हैं जिसका पालन करना मेरा भी कर्तव्य है। अपने फौजी बेटे एवमं उनके साथियों को कहना चाहेंगे कि,
मानवता के परचम को लहराते हुए अपनी सोच को ले जाओ उस शिखर पर जहां सितारे भी झुक जायें, ना बनाओ अपने सफर को किसी कश्ती का मोहताज, चलो इस शान से कि तुफान भी नतमस्तक हो झुक जाये। 

प्रिय प्रांजल, अपने हौसले के बल पर आसमान की बुलंदी पर सफलता का परचम फैलाओ इसी मंगल कामना के साथ अनंत अशिर्वाद और शुभकामनायें
जय हिंद जय भारत 


Tuesday, 13 March 2018

सोशल मिडिया के माध्यम से शिक्षा की नई मुहीम


"मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया"

2011 से शिक्षा के माध्यम से दृष्टीबाधित साथियों को आत्मनिर्भर बनाने का उद्देश्य लेकर शुरू हुआ सफर अपने दृष्टीदिव्यांग साथियों को आत्मनिर्भरता की मुस्कान प्रदान करते हुए 2018 में प्रवेश कर गया है। 2011 में अकेले चले थे आज लगभग 400 कार्यकर्ताओं का कारवां बन गया है। आज भारत के विभिन्न शहरों से जुङे अनेक लोगों के निःशुल्क और निःस्वार्थ योगदान से अपने अनेक दृष्टीबाधित छात्र बैंक, रेल, अध्यापन तथा प्रशासनिक सेवा में कार्य करते हुए सम्मान से अपना और अपने परिवार का जीवन यापन कर रहे हैं।

Voice For Blind द्वारा शुरू किया गया अध्यापन कार्य सोशल मिडिया के माध्यम से भारत में ही नही वरन भारत के बाहर भी दृष्टीदिव्यांग साथियों को शिक्षित कर रहा है। 2012 से इंदौर तथा भारत के अन्य शहरों के बच्चे Voice For Blind द्वारा प्रदान किये गये सामान्य ज्ञान से अत्यधिक लाभान्वित हुए हैं। 2012 से YouTube पर अपलोड किये गये सामान्यज्ञान और करंट अफैयर से कुछ ऐसे बच्चे भी लाभान्वित हुए जिनको प्रत्यक्ष तौर पर हम लोग नही जानते। आज वाट्सएप के माध्यम से Voice For Blind अधिक से अधिक बच्चों तक सामान्य ज्ञान और प्रतिदिन समाचार को ऑडियो के माध्यम से पोस्ट कर रहा है। इस प्रयास से लगभग 10,000 बच्चों को लाभ हो रहा है। कुछ लोग Voice For Blind से प्रत्यक्ष जुङे हैं तो, कुछ हमारे दृष्टीदिव्यांग साथियों द्वारा बनाये वाट्सएप ग्रुप से समाचार तथा सामान्य ज्ञान का लाभ ले रहे हैं।

वाट्सअप के माध्यम से समाचार का प्रकाशन तो भारत में अपने आप में एक नया ही विचार है, जिसे अत्यधिक प्रोत्साहन भी मिल रहा है। ये समाचार प्रतिदिन विभिन्न समाचार पत्रों से संकलित करके ब्रॉडकास्ट के माध्यम से सुबह 8 बजे तक अपने दृष्टीबाधित साथियों तक भेज दिया जाता है। समाचार में इस बात का खयाल रखा जाता है कि कोई नकारात्मक खबर न हो और प्रतियोगी परिक्षा में क्या आ सकता है उसपर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। साथ ही कुछ रोचक तथ्य, आज का इतिहास एवं ट्वीट्स समाचार को रोचक बना देते हैं। आलम ये है कि, यदि समाचार पोस्ट करने में देरी हो जाये तो मेरे व्यक्तिगत नम्बर पर संदेश आ जाता है जानने के लिये कि, समाचार अब तक क्यों नही आया।

कुछ लोग मुझसे पूछते हैं कि, अब तक आपके द्वारा किये गये प्रयासों से कितने बच्चे लाभांवित हुए?
मित्रों प्रश्न उचित है परंतु सोशल मिडिया उस सूरज के समान है जिसे पता नही होता कि, उसकी रौशनी से किस-किस को लाभ हो रहा है। सोशल मिडिया तो उस बारिश के समान है जिसकी बूंद से कितने खेत लहलाहाते हैं उसे पता नही होता। उसी तरह मेरे द्वारा YouTube, Tweeter, Whats app, Facebook इत्यादि सोशल मिडिया के माध्यम से भेजे गये सामान्य ज्ञान और समाचार का हिसाब रखना संभव नही है क्योंकि इन माध्यम में बहुत से लोग अप्रत्यक्ष तौर से भी जुङे होते हैं। फिलहाल समाचार के लिये वाट्सएप पर तीन ब्रॉडकास्ट ग्रुप हैं जिससे प्रत्यक्ष तौर पर हजारों बच्चे जुङे हैं। इसके अलावा हमारे दृष्टीदिव्यांग साथियों द्वारा बनाये गये उनके वाट्सअप ग्रुप में भी उनके माध्यम से मेरे द्वारा रेकार्ड किया गया समाचार तथा सामान्य ज्ञान पोस्ट किया जाता है, जहाँ किसी ग्रुप में 200 तथा किसी में 250 सदस्य हैं। YouTube पर मेरी पोस्ट Publicly है जहाँ वर्तमान में लाखों         व्यू हैं तथा 17,793  सब्सक्राइबर हैं। मित्रों, कई बार मिडीया से जुङे लोग और समाज के अन्य लोग भी मुझसे पूछते हैं कि, आपने शिक्षा को ही माध्यम क्यों बनाया? मेरा मानना है कि, एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पाता है।शिक्षा तो वो सशक्त हथियार है,जिससे आप दुनिया को बदल सकते हैं। शिक्षा कारोबार और व्यपार को बढाती है। एक कहावत है कि, यदि आप किसी को एक मछली देते हो तो उसे एक दिन का भोजन देते हो, लेकिन यदि आप उसे मछली पकङना सिखाते हो तो, उसे उम्रभर का भोजन देते हो। इसी कहावत को ध्यान में रखते हुए हमने शिक्षा को माध्यम बनाया जिससे शिक्षित होकर हमारे साथी आत्मनिर्भर हो जायें और उम्रभर के लिये अपने भोजन का इंतजाम कर सकें।

हमारे दृष्टीदिव्यांग साथियों में से जो प्रत्यक्ष जुङे हैं उनमें से अकेले इंदौर में ही सैकङों बच्चे विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं। ये वो बच्चे हैं जिनकी स्नातक से लेकर प्रतियोगि परिक्षा तक की तैयारी मेरे द्वारा कराई गई है। Mangaldas patil -Govt. high sec.school , Gorelal Kushwah-Govt. Polytechnic college (sanawad), Phoolsingh Kushwah education department (janpad), Rajesh Parma Railway (Jabalpur), Ajay Railway (Bhopal), Manoj central school kolkata, इसके अलावा.निम्न सदस्य  बैंक में राज्य भाषा अधिकारी के रुप में कार्यरत हैं।
Rajani Sharma Andhra Bank,
Shiv vankhede BOB
Shiva Wankhede BOB
Vikesh Gurjar Oriental Bank of Commerce
Sonu Chouhan
Abha Rajoriya BOI


निम्नलिखित बैंक में लिपिक के पद पर कार्यरत हैं-
Rashmi choure UNB
Kalpana choure BOI
Rashmi Gurjar Central Bank
Ankita Bargal PNB
Bilal Ahmad PNB
Geetesh Gahlot SBI
Monika BOA
Sindhu Parmar UNB assistant manager
Narendra sejkar- BOI
mulayam singh Narmada jhabua gramin bank
Jiyalal Kol- Bank of Baroda
Bilal Ahmad PNB
Geetesh gahlot SBI
Harsh SBI

इंदौर के बाहर भी भारत के अनेक राज्यों से कई दृष्टीबाधित बच्चे निःशुल्क अध्ययन सामग्री से लाभान्वित होकर आज आत्मनिर्भर हो गये हैं। । सबका विवरण देना संभव नहीं है इसलिए कुछ एक नाम यहां लिख रहे हैं-
Mitul SBI Gujarat
Kamal Sharma Lucknow
Kiran maharashtra
Sandeep Gohati
Navneet Raj.
Neelesh Gujarat
Ashish Gujarat
Sanjay Gujarat
Ajay jammu kashmir
Prince Panjab
Kishor Asam
Mahendra Hariyana
Mohammad Hedrabaad
Mangilal Raj.
Sourabh Jain Meerut
Suneel Nagpur
Mithilesh jharkhand
Agashtha Nepal
Kulvant singh Rajasthan इन्होंने तो UPSC की सभी परिक्षाएं पास की है, इंटरव्यू के रिजल्ट का इंतजार है।
हरियाणा के अजय का तो UPSC में सलेक्शन भी हो गया है।

हम लोगों का मकसद है कि अधिक से अधिक बच्चों तक ये पाठ्य सामग्री पहुँचे ताकि कोई भी प्रिंट दिव्यांग साथी पाठ्य सामग्री के अभाव में पीछे न रह जाये। Voice For Blind ने अब तक सैकङों बच्चों के लिए परिक्षा के समय स्क्राइब की व्यवस्था की है। इंदौर के बाहर भी अनेक शहरों में VFB के सदस्य अपनी सेवायें दे रहे हैं। पुस्तकों को रेकार्ड करने में भी हमारे कई साथी अपनी निरंतर सेवा दे रहे हैं। अब तक बैंक, रेल, प्रशासनिक परिक्षा, संविदा शिक्षा तथा यू.जी.सी नेट की तैयारी हेतु पाठ्य सामग्री मेरी आवाज में रेकार्ड की जा चुकी है। प्रतिदिन लगभग 4 से 5 घंटे रेकार्डिंग करने के बावजूद कार्य का आगमन इतना है कि, कई बार हम असमर्थ हो जाते हैं हालांकि मुझे मना करना अच्छा नही लगता फिरभी कार्यकर्ताओं की कमी के कारण ना भी करना पङता है। अतः मित्रों आप सबसे आह्वान करते हैं, दूर बैठकर सरकार और समाज को कोसने के बजाय आइये हम सब मिलकर समाज में नई संरचना का गठन करें, जिससे हमारे दिव्यांग साथियों को भी सम्मान का आधार मिले। आप सबके साथ से निःश्चय ही एक दिन अपने सभी प्रिंटदिव्यांग साथी शिक्षा के माध्यम से अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करने में सक्षम हो जायेंगे। 

मित्रों जैसा कि, आप लोगों को विदित है कि Voice For Blind द्वारा पाठ्य सामग्री निःशुल्क प्रदान की जाती है, किंतु हम लोग बच्चों से ये वादा जरूर लेते हैं कि आप सफल होने के लिये ईमानदारी से मेहनत करेंगे। ऑडियो पुस्तक हम दे दिये अब याद करने की बारी आपकी है। यकीन मानिये बच्चे भी पूरी शिद्दत से पढाई करते हैं और अच्चे नम्बरों से पास होते हैं। उनकी सफलता ही हम लोगों का अमूल्य पारिश्रमिक है। उनके चेहरे पर सफलता की जो मुस्कान होती है वो हम लोगों की सबसे बङी पूंजी है। 

समाज से मेरी एक और अपील है कि, हमारे जो साथी कम्प्युटर में दक्ष हैं उनको अपने यहाँ नौकरी दें, आज कम्प्युटर हर जगह है और उसपर काम प्रिंट दिव्यांग साथी आराम से कर सकते हैं। मेरा मानना है कि कम्प्युटर उनकी आँखें हैं इसलिये इंदौर में हम एक कम्प्युटर सेंटर खोलना चाहते हैं जहाँ दृष्टीबाधित छात्र-छात्राओं को निःशुल्क कम्प्युटर सिखाया जा सके, इसके लिये हम समाज के प्रतिष्ठित लोगों से आर्थिक सहयोग की अपील करते हैं। हमने तो अपना उद्देश्य बना लिया है इन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का। आप लोगों का सहयोग मिलेगा तो अधिक से अधिक दृष्टीबाधित बच्चों को ज्ञान के प्रकाश से रौशन कर सकेगें। आपके सहयोग की कामना रखते हुए निम्न शब्दों से कलम को विराम देते हैं।

ना पूछो कि मेरी मंजिल कहाँ है

अभी तो सफर का इरादा किया है

ना हारूंगा हौंसला उम्र भर

ये मैंने किसी से नहीं खुद से वादा किया है


(लिंक पर क्लिक करके मेरा इंटरव्यु देखें.......)

सोशल मिडिया के माध्यम से शिक्षा की नई मुहीम

धन्यवाद 😊

Saturday, 30 December 2017

Happy new year 2018





Dear All,

May this New year illuminate your life and bless you with prosperity and joy, today and always 
Happy New year 2018 
Voice for blind 

Wednesday, 18 October 2017

Happy Dipawali


मित्रों, रौशनी के पावन पर्व दिपावली पर आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं💫💫💫😊😊

भारतीय संस्कृति में दीपावली यानि हर्ष उल्लास एवं आपसी प्रेम का त्योहार है, जिसमें पूजन के साथ रौशनी का विशेष महत्व है। रौशनी के इस पावन पर्व पर आइये हम और आप मिलकर सहयोग का ऐसा दिया जलाएं, जिससे रौशनी  न देखने वाले लोगों  के जीवन में सम्मान का  प्रकाश रौशन हो। हमसब मिलकर ये संकल्प करें कि,  हमारे और आपके सहयोग से दृष्टीबाधित साथी आत्मनिर्भरता के प्रकाश से अपने जीवन के अंधकार को दूर करके जीवन को हर्ष उल्लास के प्रकाश से रौशन करें💥💥💫💫 

धन्यवाद 
अनिता शर्मा 
अध्यक्ष
VOICE FOR BLIND 

  

Sunday, 17 September 2017

मेरी लाडली कायरा



मित्रों, आज हम आप सबसे अपनी खुशी के ऐसे पल को शेयर कर रहे हैं जिसे शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त करना आसान नही है फिरभी मेरा प्रयास होगा कि हम अपनी भावनाओं को शब्द प्रदान कर सकें। खुशी के उस लम्हे को  16 सितंबर को एक माह पुरा हो गया। ये एक माह कब और कैसे बीत गया पता ही नही चला।  मित्रो,  16 अगस्त 2017 की सुबह  सूरज की किरणों पर सवार मेरे घर-आँगन में मुझे  नानी कहने वाली एक परी का आगमन हुआ। गोद में लेते ही, उसके सुंदर नाजुक और कोमल हांथों के स्पर्श से अनुठे आनंद का एहसास अंतरमन को अद्भुत खुशी में रंग गया। उसकी किलकरी से मन के तार  झूम झूम कर गुनगुनाने लगे........छोटी सी प्यारी सी नन्ही सी आई कोई परी, भोली सी न्यारी सी, अच्छी सी आई कोई परी। उसे देखकर दुआओं की सरिता का प्रवाह स्वतः ही प्रस्फुटित हो कहने लगा... गाते मुस्कुराते  खुशियों की बहारों में स्वस्थ रहे मस्त रहे और झूमती रहे संगीत की तरह। उसकी बंद खुलती आँखें और अलसाई सी मुस्कान को देखकर, हमें अपनी बिटिया का बचपन बरबरस ही याद आ गया।  माँ से नानी माँ बनकर मेरी खुशी को चार चाँद लग गया। अपने आदरणिय बुजर्गों द्वारा कही बात कि, "मूल से ज्यादा सूद प्यारा होता है" इसके अर्थ का स्वतः ही एहसास हो गया। अभी मेरी लाडली परी कायरा सिर्फ एक माह की है, मन नानी माँ सुनने के लिये व्याकुल है जबकी पता है बच्चे 9माह के बाद ही बोलते हैं फिरभी 😊

सच्चाई तो यही है दोस्तों, बच्चों की प्यारी प्यारी हरकतें स्वयं को भी बच्चा बना देती हैं, जो प्राकृतिक नियम को दरकिनार करके बच्चों संग बातें करने और खेलने के लिये हर पल उत्सुक रहता है। विगत एक माह का समय लाडली कायरा की बालसुलभ हरकतों में यूँ खो गया कि पता ही नही चला। नानी के पद पर आसीन मन! कायारा की मुस्कान पर प्रफुल्लित हो हर पल यह गुनगुनाता है ...

जूही की कली मेरी लाडली नाज़ों की पली मेरी लाडली। कोमल तितली सी मेरी लाडली, हीरे की कनी मेरी लाडली, गुड़िया-सी ढली मेरी लाड़ली, मोहे लागे भली मेरी लाडली। चिराग आकांक्षा की लाडली कायरा जुग-जुग तू जिये, मेरी लाडली नन्ही-सी परी ओ मेरी लाडली...


मुझे नानी बनाकर दुनिया की सबसे बङी खुशी देने के लिये चिराग और आकांक्षा तुम दोनों को दिल से अंनत आशिर्वाद। हमें विश्वास है कि, तुम दोनों हमसे भी बेहतर अभिभावक बनकर, अपनी कायारा को ऊँचाइयों का एक नया आसमान दोगे। कायरा के सुखद भविष्य को अपने प्यार और दुलार के रंग से पल्लवित करोगे। नाना-नानी और दादा-दादी के  आशिर्वाद संग कायरा तुमको ढेरसारा प्यार और दुलार 😊😊

Thank you God for all your blessing to me and my family





Wednesday, 13 September 2017

हिंदी दिवस पर विशेष.........हिंदी अपनी पहचान है


सत्तर वर्ष बीत गये, ये कैसा जनतंत्र है मित्रों, अब भी जनता अंग्रेजी की गुलाम है।  अंग्रेजी में सारा तंत्र चल रहा है। स्वभाषा के बिना ये कैसी स्वतंत्रता है और जन भाषा के बिना ये कैसा जनतंत्र है।  स्वतंत्र भारत में आज हिंदी की स्थिती को देखकर कौन कह सकता है कि भारत वास्तव में स्वतंत्र है। संविधान में राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त हिंदी आज भी एकराष्ट्र एकभाषा के रूप में जनमानस की आवाज नही बन सकी है।  क्षैत्रिय राजनीति, एकराष्ट्र एकभाषा के विकास में सबसे बङा अवरोध है। अपनी भाषाओं की उपेक्षा का दुष्परिणाम यह भी है कि, हम अपनी भाषाओं के माध्यम से अनुसंधान नहीं करते।  भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान का खजाना उपलब्ध है लेकिन हम लोग उसकी तरफ से बेखबर हैं।  हम प्लेटो और चोम्सकी के बारे में तो खूब जानते हैं लेकिन हमें पाणिनी, चरक, कौटिल्य, भर्तृहरि और लीलावती के बारे में कुछ पता नहीं। हमारे ज्ञानार्जन के तरीके अभी तक वही हैं, जो गुलामी के दिनों में थे। जब तक हमारे देश की सरकारी भर्तियों, पढ़ाई के माध्यम, सरकारी काम-काज और अदालातों से अंग्रेजी की अनिवार्यता और वर्चस्व नहीं हटेगा,  तबतक भारत का विकास श्रेष्ठता के शिखर पर नही पहुंच सकता।

एकबार महात्मा गाँधी जी ने कहा था कि, "ये क्या किसी जुल्म से कम है कि अपने देश में मुझे इंसाफ पाना हो, तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना पङता है। बैरिस्टर होने पर मैं स्वभाषा न बोल सकुँ! ये गुलामी नही है तो क्या है?  इसमें मैं अंग्रेजों का दोष निकालुं या अपना ? हिंदुस्तान को गुलाम बनाने वाले हम अंग्रेजी बोलने वाले लोग ही हैं।"

मित्रों, राष्ट्रभाषा से ही राष्ट्र की पहचान बनती है। भाषा में हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति समाहित होती है। हम सब की आकांक्षाओं के स्वप्न भाषा में ही अपनी आंखें खोलते हैं। गौरतलब है कि, किसी भी दूसरे देश की वास्तविक नागरिकता उस देश की भाषा के जानकार होने पर ही संभव होती है। यही कारण है कि किसी भी दूसरे देश की संस्कृति को जीने और जीतने का सुख उस देश की भाषा सीखने पर ही संभव हो पाता है। जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, नार्वे, डेनमार्क और पोलैंड जैसे देशों की अपनी राष्ट्रभाषा है और उन्हीं भाषाओं में इन देशों का राजकाज और शिक्षा संचालित होती है। यद्यपि इन देशों में विश्व के कई देशों के धर्म, जाति, संप्रदाय और संस्कृति के लोग रह रहे हैं फिरभी वह उसी देश की राष्ट्रभाषा को अपनाए हुए अपना जीवन जीते हैं, इसलिए वह राष्ट्र भी अपने राष्ट्र परिवार के नागरिक की तरह उन्हें अपनाए रहता है। नीदरलैंड सहित यूरोप के किसी भी देश में अंग्रेजी का कोई प्रवेश नहीं है। कोई अख़बार और पत्रिका अंग्रेजी में प्रकाशित नहीं होती है। सड़क, बस, रेल यात्रा आदि की सारी सूचनाएं उस देश की अपनी राष्ट्रभाषा में लिखी रहती हैं। कई राष्ट्रों के नाम में ही वहाँ की भाषा समाहित है। उदाहरण के लिए स्पेन की स्पेनिश, फ्रांस की फ्रेंच, जर्मनी की जर्मन रूस की रशियन। स्थिति यह है कि राष्ट्र भाषा से ही राष्ट्र की पहचान होती है। लेकिन हिंदुस्तान ने अपना नाम इंडिया रख कर अपनी राष्ट्रभाषा की पहचान भी खो दी है।

स्वामी विवेकानंद जी ने तो, अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को माँ का सम्मान दिया है। उनका कहना था कि, यदि किसी भी भाई बहन को अंग्रेजी बोलना या लिखना नहीं आता है तो उन्हें किसी के भी सामने शर्मिंदा होने की जरुरत नहीं है बल्कि शर्मिंदा तो उन्हें होना चाहिए जिन्हें हिंदी नहीं आती है क्योंकि हिंदी ही हमारी राष्ट्र भाषा है, हमें तो इस बात पर गर्व होना चाहिए की हमें हिंदी आती है.....


मित्रों, वास्तविकता तो यही है कि, राष्ट्रभाषा के वजूद से ही राष्ट्र के एकत्व की छवि बनती है। भाषा के दर्पण में संगठित राष्ट्र का दिव्य स्वरूप उभरता है। अनेकता में एकता की पहचान लिये अपने देश में हिंदी भाषा ही पूरे राष्ट्र को एक संस्कृति प्रदान कर सकती है। आज देश को एकरूपता के बंधन में बाँधने के लिये एक राष्ट्रभाषा हिंदी को वास्तविक बोलचाल और प्रशासनिक कार्यों में अधिकाधिक प्रयोग करने की आवश्यकता है।देश के विकास में आज हम सबका ये कर्तव्य बनता है कि, हम हिंदी को एक दिवस की जंजिरो से मुक्त करके जीवन भर के संवाद का माध्यम बनायें। सब मिलकर प्रण करें, भारत के भाल पर हिंदी की बिंदी सदा चमकती रहे। हम सब मिलकर हिंदी का वंदन करें, हिंद और हिंदी की जय-जयकार करें, भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें.........

धन्यवाद 😊

पूर्व के लेख पढने हेतु ...

Monday, 14 August 2017

आजादी के सत्तर वर्ष! क्या खोया क्या पाया

भारत के नागरिक होने के नाते हम आज आजादी के 70 वर्ष का सफर पूरा कर चुके हैं। हमें 200 साल पुरानी अंग्रेजों की दासता से मुक्ति मिल गई लेकिन क्या हम अपनी रुढीवादी सोच से आजाद हो सके?  क्या हम मैकाले द्वारा रोपित अंग्रेजी मानसिकता से मुक्त हो सके हैं?
  
हम विकासशील देश से उन्नति करके विकसित देश के साथ कदम मिलाने को तत्पर हैं। मंगल पर पहुँचकर इतिहास बनाने की क्षमता रखते हैं। नई टेक्नोलॉजी के साथ विकास के नित नये पन्ने लिखे जा रहे हैं,  लेकिन ऑनर किलिंग के पन्नों से देश में आज भी दहशत पढाई जा रही है। बेटी बचाओ - बेटी पढाओ जैसे अभियान भी बेटियों को वो सम्मान नही दिला सके जहाँ बेटीयां निडर होकर स्वछंद आकाश में विचरण कर सकें। निर्भया कांड के बाद लगा था कि, ऐसा कानून बनेगा जिसकी दहशत से बेटियों तथा महिलाओं का मान सम्मान सुरक्षित रहेगा किंतु आज भी बेटियों को सरे राह रोकना, उन पर भद्दे कमेंट करना तथा उनके मान सम्मान पर कुठाराघात करना  फैशन सा बन गया है, गलती किसी और की, किंतु अंगुलियां बेटियों के परिधान एवं रात्री विचरण पर ही ऊठती  हैं। 

प्रथम महिला आई पी एस  किरण बेदी कहती हैं, "आज़ादी का मतलब है मैं बिना डरे कहीं भी घूम सकूं, मर्ज़ी से अपना जीवनसाथी चुन सकूं. ऑनर किलिंग जैसी घटनाएं युवाओं को डरा देती हैं. मानसिकता को ग़ुलाम बना देती हैं और डरा हुआ आदमी भला देश के किस काम आएगा?"

दक्षिण अफ्रिका के पूर्व राष्ट्रपति नेलसंन मंडेला का कहना है कि, "स्वतंत्र होने का मतलब सिर्फ जंजीरों से मुक्ति पाना नही है बल्की इस तरह जीवन जीना है जिसमें दूसरों की स्वतंत्रता का भी सम्मान हो और उसे बढावा मिले।" 

हम आज मेक इन इंडिया, स्वच्छ एवं भ्रष्टाचार मुक्त भारत को नई दिशा देने का प्रयास कर रहे हैं। नोटबंदी , तो कहीं एक राष्ट्र एक टैक्स यानि जीएसटी का अनुमोदन कर रहे हैं। लेकिन इससे इतर भ्रष्टाचार की वजह से  कई मासूम परलोक सिधार गये। स्वच्छता का असर दिख रहा है 2017 की लिस्ट में मध्य प्रदेश  का इंदौर शहर स्वच्छता अभियान  में नम्बर एक पर रहा किंतु इंदौर जैसे तमाम शहरों में आज भी कचरे के निपटारे का सुचारु प्रबंध एक बङी समस्या है।  ट्रैफिक सिंगनल पर विदेशी कैमरों की नज़र मेक इन इंडिया के सपनों को साकार होने से रोक रही हैं। 

आज हम इतनी आजादी तो महसूस कर सकते हैं कि राष्टध्वज, राष्ट्र गान तथा राष्ट्र गीत का सम्मान आधुनिक माहौल में भी कर सकते हैं। लेकिन इससे इतर विशेष अवसर पर  राष्ट्र ध्वज को उलटा दिखाने तथा ज़मीन पर बिखेरने जैसी मानसिकता वाले लोग भी नज़र आते हैं।

आज राजनीति के इतिहास में देश के उच्च पदों पर (राष्ट्पति, उप राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री तथा लोक सभा अध्यक्ष ) ऐसी पार्टी विद्यमान है जिनके कभी सिर्फ तीन सांसद थे। विकास की इस बेला में यदि ये पदाधिकारी लोक प्रशासन को स्वच्छता और कर्तव्य का बोध कराने में सफल होते हैं तो काफी हदतक भ्रष्टाचार से भारत को आजादी मिल सकेगी। एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का सपना साकार हो सकेगा। 

आइये हम सब मिलकर 70 वर्ष पूर्ण किये आजाद भारत में नई उमंग और नये जोश का शंखनाद करें। जहाँ नारी सिर्फ देवी रूप में मंदिरो में ही सम्मानित न हो बल्की भारत की सम्पूर्ण धरा पर सम्मानित हों। आजादी के इस पर्व को गौरव के शिखर पर ले जायें।  शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करें। स्वर्ण दिवस के लिए आज से संकल्प करें जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका नूतन  निर्माण करें। 
आप सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई 
पूर्व के लेख अवश्य पढेंः-----

Women in Freedom Struggle




Sunday, 13 August 2017

जन्माष्टमी की शुभकामनाएं



कृष्ण जहां भी होते हैं, आशा की एक लहर चलती है जो सबको छूती है और सबका जीवन बदल देती है। कृष्ण की मुरली की धुन जीवन के सुर को मधुर कर देती है। ऐसे मुरली मनोहर श्याम को नमन करते हुए प्रार्थना करते हैं कि श्री कुष्ण की कृपा हम सबपर सदैव बनी रहे। 

आप सबको जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं

Monday, 3 July 2017

Vivekanand ji thoughts (Strength is life , Weakness is Death)



विश्व धर्म सभा में भारत को गौरवान्वित करने वाले स्वामी विवेकानंद जी के विचार आज भी हम सभी के लिये महत्वपूर्ण हैं। अपने लक्ष्य को हासिल करने में स्वामी जी के विचार ऑक्सीजन की तरह हैं जो विपरीत परिस्थिती में जीवन को उर्जा प्रदान करते हैं। स्वामी जी कहते हैं...

"यदि परिस्थितियों पर आपकी मजबूत पकङ है तो , जहर उगलने वाले भी आपका कुछ नही बिगाङ सकते।"

विचारों में बहुत शक्ति है. विचार करते समय हम जिन भावों का चयन करते हैं , उनका हमारे जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव पडता है. मनोवैज्ञानिक भी निराशा के छणों में स्वयं से सकारत्मक संवाद करने पर जोर देते हैं ।
Talk to yourself Once in a day ... otherwise you have missing meeting an Excellent person in this world.

आप अपने लक्ष्य को अपनी काबलियत के स्तर से नीचे न रखें, बल्की अपनी काबलियत के स्तर को अपने लक्ष्य के जितना बङा बनाइये क्योंकि संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरिका है, असंभव से आगे निकल जाना।

मित्रों, हम जो बोते हैं वही काटते हैं, हम स्वंय अपने भाग्य के विधाता हैं। हवा का कार्य तो बहना है, जिन नावों के पाल खुल जाते हैं हवा उनकी दिशा अपने अनुसार बदल देती है, लेकिन जिनके पाल बंधे होते हैं वो अपनी मर्जी से अपनी दिशा में बढते हैं और सफलता पूर्वक अपने गंतव्य पर पहुँचते हैं इसलिये भाग्य भरोसे न रहते हुए अपनी मदद स्वंय करो तुम्हारी मदद कोई और नही कर सकता। तुम खुद के सबसे बङे दुश्मन हो और खुद के ही सबसे अच्छे मित्र हो। अतः Believe in yourself and the world will be at your feet.

एकबार स्वामी जी से किसी ने पुछा कि, सब कुछ खो देने से भी बुरा क्या है, स्वामी जी ने उत्तर दिया , "उस उम्मीद को खो देना जिसके भरोसे हम सब कुछ वापस पा सकते हैं।" इसलिये उम्मीद का दिया हमेशा जलना चाहिये और दृण इच्छाशक्ति के साथ एक समय में एक काम करो , ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ। उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जायें। सभी शक्ति तुम्हारे अंदर है, तुम सब कुछ कर सकते हो।

Strength is life , Weakness is Death

प्रिय पाठकों नमस्कार, आप सब मंगलमय होगें और आशा करते हैं कि मेरे द्वारा लिखे लेख आप लोगों को रोचक लग रहे होंगे। इधर कुछ समय से समय अभाव के कारण लेख लिखने का समय कम मिल रहा है क्योकि जैसा कि आप लोगों को ज्ञात ही है कि, स्वामी विवेकानंद जी के दिये संदेश को आत्मसात करते हुए  दृष्टीबाधित बच्चों को शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके अंर्तगत उनकी पाठ्यपुस्तकों को ध्वनांकित करना सबसे महत्वपूर्ण है। वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा 9वीं तथा 11वीं का पाठ्यक्रम बदल जाने से पूर्व की ध्वनांकित पाठ्यपुस्तक अब काम नही आयेगी। अतः वर्तमान में नई पुस्तकों का ध्वनांकन समय पर पूरा करना अहम कार्य है। आप सबसे निवेदन है कि जो पाठक इस कार्य में अपना योगदान देना चाहते हैं वो हमें मेल करें। शिक्षा सबसे सशक्त हथियार है जिससे दुनिया को बदला जा सकता है। 
धन्यवाद