Thursday, 6 February 2014

बेटी है तो कल है



हमारे देश में दिन-प्रतिदिन कन्याभ्रूण हत्या में इजाफा हो रहा है। सेंटरफॉर रिसर्च के अनुसार लगभग बीते 20 वर्षों में भारत में कन्याभ्रूण हत्या के कारण एक करोङ बच्चियां जन्म से पहले काल की बली चढा दी गईं हैं। लङकियों के प्रति अवहेलना की मानसिकता सिर्फ अनपढ लोगों में नही है बल्की पढे-लिखे वर्ग में भी व्याप्त है। कुछ समय पूर्व स्टार प्लस पर सत्यमेव जयते नामक कार्यक्रम प्रदर्शित हुआ था जिसमें कन्याभ्रूण पर भी एक परिचर्चा थी। उसमें कई ऐसी महिलाओं की आपबीती थी जिससे पता चला कि बेटी पैदा होने पर एक माँ के साथ हैवानियत जैसा व्यवहार किया गया। पेशे से डॉ. महिला को भी कन्याभ्रूण हत्या जैसी क्रूर मानसिकता का शिकार होना पङा। बालिकाओं के प्रति संवेदनाहीन एवं तिरस्कार जैसी भावना किसी भी देश के लिए चिंताजनक है।

युनिसेफ के अनुसार 10%  महिलाएं विश्व जनसंख्या से लुप्त हो चुकी हैं। भारत एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ भी बेटियों की हो रही कमी से चिंतित है। भारत सरकार द्वारा देशभर में 24 जनवरी  को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने 11 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा वर्ष 2012 में की। बच्चियों के प्रति समाज में जागरूकता और चेतना पैदा करने के लिए यह दिवस प्रति वर्ष मनाया जाता है। इन दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि समाज में हर बालिका का सम्मान हो, उसका भी महत्व हो और उसके साथ बराबरी का व्यवहार किया जाए।

वर्ष 1991 मे हुई जनगणना से लिंग-अनुपात की बिगड़ती प्रवृत्ति को देखते हुए, कई राज्यों ने बेटीयों के हित के लिये योजनाएं शुरू की। जैसे कि- मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना एवं लाडली लक्ष्मी योजना,  भारत सरकार द्वारा धन लक्ष्मी योजना, आंध्र प्रदेश  द्वारा बालिका संरक्षण योजना, हिमाचल प्रदेश  ने बेटी है अनमोल योजना शुरू की तो पंजाब में बेटियों के लिए रक्षक योजना की शुरूवात की गई। ऐसी और भी योजनाएं अन्य राज्यों में चलाई जा रही है। बेशक आज बेटियों के हित में अनेक योजनाएं चलाईं जा रही हैं,  किंतु भारतीय परिवेश में बेटियों के प्रति विपरीत सामाजिक मनोवृत्तियों ने बच्चियों के लिए असुरक्षित और असुविधाजनक माहौल का ही निर्माण किया है। योजनाएं तो बन जाती हैं परन्तु उनका क्रियान्वन जागरुकता के अभाव में सिर्फ कागजी पन्नो में ही सिमट कर रह जाता है। बेटीयों का अस्तित्व, शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास, सुरक्षा और कल्याण, समाज में व्याप्त रुढीवादिता और संकीर्ण सोच की बली चढ जाता है।

मंदिरों में देवी पूजा, नवरात्रों में कन्या पूजा महज चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात को ही चरितार्थ करती है क्योंकि अधिकांशतः तो बेटीयाँ उपेक्षा की ही शिकार होती हैं। आज हम चाँद से भी आगे जाने की बात करते हैं, दुनिया को मुठ्ठी में बंद करने की तकनिक का इजात कर रहे हैं। आधुनिक सोच का ढोल बजाते हैं लेकिन जब बेटे और बेटी की बात आती है तो, सारी उम्मीद बेटे से लगाते हैं। अपनी सारी जमापूंजी बेटे की शिक्षा ओर विकास पर खर्च कर देते हैं। बेटी को पराया धन कहकर उसकी शिक्षा पर अंकुश लगा देते हैं। ये दोहरा मापदंड बेटीयों के लिए किसी त्रासदी से कम नही है।  

कई बुद्धीजीवी वर्ग बेटी बचाओ का अभियान चला रहे हैं, जो नुक्कङ नाटकों के माध्यम से समाज में जागरुकता लाने का प्रयास कर रहे हैं। अभी हाल में अमर उजाला समाचार पत्र के माध्यम से एक नये नारे के आगाज हुआ बेटी ही बचायेगी इसमें कोई शक नही क्योंकि आज शिक्षा और हुनर को हथियार बनाकर बेटीयां भारतीय प्रशासनिक सेवा से लेकर सेना में, शिक्षा के क्षेत्र से लेकर अंतरिक्ष तक में अपना एवं देश का नाम रौशन कर रही हैं। यहाँ तक कि पुरूष प्रधान क्षेत्र जैसे कि- रेलवे चालक, बस चालक एवं ऑटो चालक में भी अपनी उपस्थिती दर्ज करा रहीं हैं। फिरभी कुछ विपरीत सोच उसके अस्तित्व को ही नष्ट कर रहीं हैं।  

बेटी बचाओ जैसी योजनाएं और अनेक कार्यक्रम इस बात की पुष्टी करते हैं कि आज अत्याधुनिक 21वीं सदी में भी हम लिंगानुपात के बिगङते आँकङे को सुधार नही पा रहे हैं। पोलियो, कैंसर, एड्स जैसी बिमारियों को तो मात दे रहे हैं किन्तु बेटीयों के हित में बाधा बनी संकीर्ण सोच को मात नही दे पा रहे हैं। आज भी सम्पन्न एवं सुशिक्षित परिवारों में लङकी होने पर जितनी भी खुशी मनाई जाती हो, लेकिन लङके की ख्वाइश उनके मन से खत्म नही होती। जबकी आज माँ-बाप को कंधे देने का काम बेटी भी कर सकती है, अन्त समय में माँ-पिता के मुँह में वो भी गंगाजल डाल सकती है। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि ऐसा कोई काम नही है जो बेटी नही कर सकती।

वक्त के साथ यदि हम सब अपनी सोच में भी परिवर्तन लांए, बेटी को भी बेटे जैसा अवसर दें तो यकिनन बेटी ही बचाएगी हमारी संस्कृति को एवं आने वाले कल को क्योंकि वे न केवल समाज को शिक्षा देने में सबल है बल्कि देश सम्भालने की भी हिम्मत रखती है। हम सब यदि ये प्रण करें कि लिंग भेद को मिटाकर बेटे को भी ऐसे संस्कार देंगे जिससे वे बहनों का सम्मान करें, दहेज जैसी कुप्रथाओं का अंत करें, बचपन से ही बेटों को नारी के सम्मान और आदर की घुट्टी पिलाएं जिससे बेटीयों के प्रति हो रही विभत्स घटनाओं का अन्त हो सके।
सोचिये! यदि बेटी न होगी तो बहन नही होगी, न माँ, न समाज, न देश होगा, न दुनिया होगी, फिर किस चाँद पर जायेंगे और और कौन सी दुनिया बसाएगें ????
मित्रों, सच तो ये है कि, बेटी है तो कल है, वरना विराना पल है। 



7 comments:

  1. यदि बेटी न होगी, तो बहन नही होगी, न माँ, न समाज, न देश होगा, न दुनिया होगी, फिर किस चाँद पर जायेंगे और और कौन सी दुनिया बसाएगें |

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  2. Very nicely written article mummy. Kaash Ki aapke jaisi soch aur bhi logon Ki ho to is mansikta me kuchh kami aaye. Love u mom for giving me everything i wanted. Whatever i have achieved in my life is because of u, ur inspiration and ur support.

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  3. isme koi doubt nahi hai ki Beti hai to kal hai.... dukh hota hai jab aaj ke yug me bhi aisi ghatnaein dekhne -sunne ko milti hain...

    hame apne apne star se logon ko jagruk karne kii zaroorat hai.. thanks.

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  4. बिलकुल सही बेटी है तो कल है

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  5. मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो गई है
    कुछ जिद्दी, कुछ नक् चढ़ी हो गई है
    मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो गई है

    अब अपनी हर बात मनवाने लगी है
    हमको ही अब वो समझाने लगी है
    हर दिन नई नई फरमाइशें होती है
    लगता है कि फरमाइशों की झड़ी हो गई है
    मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो गई है

    अगर डाटता हूँ तो आखें दिखाती है
    खुद ही गुस्सा करके रूठ जाती है
    उसको मनाना बहुत मुश्किल होता है
    गुस्से में कभी पटाखा कभी फूलझड़ी हो गई है
    मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो गई है

    जब वो हस्ती है तो मन को मोह लेती है
    घर के कोने कोने मे उसकी महक होती है
    कई बार उसके अजीब से सवाल भी होते हैं
    बस अब तो वो जादू की छड़ी हो गई है
    मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो गई है

    घर आते ही दिल उसी को पुकारता है
    "राज" सपने सारे अब उसी के संवारता है
    दुनियाँ में उसको अलग पहचान दिलानी है
    मेरे कदम से कदम मिलाकर वो खड़ी हो गई है
    मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो गई है

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  6. हमारे देश में दिन-प्रतिदिन कन्याभ्रूण हत्या में इजाफा हो रहा है। सेंटरफॉर रिसर्च के अनुसार लगभग बीते 20 वर्षों में भारत में कन्याभ्रू..

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  7. हमारे देश में दिन-प्रतिदिन कन्याभ्रूण हत्या में इजाफा हो रहा है। सेंटरफॉर रिसर्च के अनुसार लगभग बीते 20 वर्षों में भारत में कन्याभ्रू..10 जुलाई को 2014 के आम बजट में वित्तमंत्री ने घोषङा की कि, 100 करोङ रूपये बेटी बचाओ, बेटी पढाओ पर खर्च किया जायेगा।

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