Monday, 15 July 2013

जीवन की आपा-धापी में क्या खोया क्या पाया

समय का चक्र अपनी निर्बाध गति से चलता रहता है। आज जो बालक हैं उसे वह कल युवा बना देती है, तो परसों वृद्ध बना देती है। नियति का यही स्वभाव है किन्तु जीवन की आपा-धापी में हम ये भूल जाते हैं कि जीवन का चक्र सभी को पूरा करना है।
आज विज्ञान के आविष्कार ने दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है। कोई कहीं भी जा सकता है। किसी भी समय हजारों किलोमीटर बैठे व्यक्ति से इस तरह बात कर सकता है जैसे वो सामने बैठा हो। ये सारी आधुनिकता महज भौतिक साधनों को ही परिलाक्षित करती हैं। आज जीवन सिर्फ काम और चिन्ता है। अपनेपन का मतलब है टेलीफोन पर सुनाई देनी वाली आवाज और जुङाव का आशय है इंटरनेट पर दिये गये संदेश। ऐसे में उन बुजुर्ग माता-पिता को अकेलेपन का एहसास लाज़मी है जिन्होने ऐसी आधुनिकता के साथ अपने बच्चों को नहीं पाला था। बच्चे के बढते जीवन के हर पहले कदम में वो उनके साथ होते थे। उनका साथ और प्रोत्साहन बच्चे के साथ सदैव रहता था। हर विकट परिस्थिती में वे वटवृक्ष की छाया की तरह खङे रहे। आज समय की इस बेला में जब उन्हे साथ की दरकार है तो अपनेपन का एहसास आधुनिकता की आँधी में कहीं बह गया है। आज देखभाल का मतलब है नर्स जिसे उनकी सेवा में रखा जाता है। जिम्मेदारी का मतलब है बैंकों में जमा पैसे। बढती उम्र अपने साथ कई समस्याएं लेकर आती हैं उसपर अपनों की उपेक्षा जले पर नमक का काम करती है। बच्चों के भी अपने-अपने लॉजिक हैं साथ न रखने के। कोई विदेश में है तो किसे के पास घर छोटा है।

 यदि दो दशक पहले की बात करें तो तब शायद ही बुजूर्गों की देखभाल कोई समस्या नही थी। अत्यंत बुढे और युवा लोगों के लिए संयुक्त परिवार अच्छे होते थे। आज संयुक्त परिवार, आधुनिक जीवनयापन की भेंट चढ गया है। बाकी की कसर प्रवासी के रूप में जीवन बिताने की मजबूरी ने पूरी कर दी है। आज बुजुर्ग की देखरेख युवा पीढी के लिए एक मसला बन गया है। दफ्तर की कैंटीन से लेकर साइबर स्पेस तक हर कहीं यही बात करते हैं कि माता-पिता की देखभाल कैसे करें क्योंकि जिन बङें-बङे संस्थानों से वे प्रबंधन की डिग्री लेकर विकास की और बढ रहे हैं वहाँ सिर्फ कंपनी के प्रबंधन को ही सिखाया जाता है। परिवार के साथ अपने काम को कैसे मैनेज करें ये तालमेल बैठाने में वो कम सफल हो रहे हैं।

मातृ देवोः भवः, पितृ देवोः भवः की भावना और बुजुर्गों की देखभाल के लिए प्रसिद्ध देश भारत में आज बुजुर्गों पर अपराधों के आँकङे आसमान छू रहे हैं। पूलीस रेकार्ड खुलासा करते हैं कि पहले की अपेक्षा सुरक्षा माँगने वाले अभिभावकों की संख्या पहले से तीन गुना बढी है। उन्हे गुंडो, बिल्डरों, यहाँ तक की अपने बच्चों से भी डर लगता है। ऐसे में कुछ  सकारात्मक प्रयास भी लोगों द्वारा किये जा रहे हैं। हैदराबाद में रोज सुबह पुलिस कांस्टेबल अख़बार हाकरों के साथ फेरे लगाते हैं ताकी बुजुर्गों पर नजर रख सकें। कुछ विकसित देश बुजुर्गों के लिए काफी फिक्रमंद हैं। कनाडा में युवाओं को बुजुर्ग की देखभाल करने के लिये प्रोत्साहन स्वरूप कह गया है कि आप अपने अभिभावक की देखभाल करें और कर में छूट प्राप्त करें और छः सप्ताह अनुकंपा अवकाश भी मिल सकता है।

भारत में भी कई कानून और उनके संरक्षण के लिये प्रयास किये जा रहे हैं देश में बुजुर्गो की समुचित देखभाल न होने की घटनाओं से चिंतित संसद ने इससे संबंधित बिल को पास कर उन लोगों पर कानून की लगाम कसने की कोशिश की है, जो अपने ही माता-पिता या घर के बड़े-बूढ़े को बेसहारा छोड़ देते हैं किन्तु ये प्रयास व्यवहारिक दुनिया में पूरी तरह कारगर नहीं हो रहे हैं। आत्मियता से परिपूर्ण सामाजिक भावना से बुजुर्गों के लिए किये प्रयास जरूर सफलता दे सकते हैं।। कहावत है कि "बेटे ही बुढापे की लाठी" होते हैं। इस बात को नकारते हुए कुछ बहु-बेटियाँ उनके साथ हाँथ में हाँथ मिलाकर खङीं हो रहीं हैं। इसको अंजाम दे रही है जयपुर की संस्था "इंडियन जेरोंटोलॉजिकल एसोसिएशन"। बुजुर्गों की देखभाल करने वाली इन महिलाओं को बाकायदा "फैमिली केयर गिवर्स" का टाइटल दिया जाता है। चयनित महिलाओं को बुजुर्गों की छोटी-बड़ी परेशानियों को बारीकी से समझने वाले स्वास्थ्य विशेषज्ञों एवं दक्ष लोगों द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है। इस कॉन्सेप्ट की ना केवल देश स्तर पर बल्कि कनाडा में भी पुरजोर तारीफ की गई।

कई बार ऐसा भी होता है कि पुरानी पीढी आज की युवा पीढी से तालमेल नही बैठा पाती और वे स्वेच्छा से वृद्ध आश्रम चली जाती है। आज वक्त की माँग है पुरानी पीढी को नई नई मान्यताओं को भी स्वीकार करना चाहीए क्योंकि नई पीढी को भी पता है कि आज का विकसित वृक्ष रुपी युवा जङों से दूर रह कर कैसे हरा-भरा रह सकता है।

आज की युवा पीढी सभी के सपने साकार कर सकती है। केवल आवश्यकता है इस तूफानी नदी को सही दिशा देने की जो  अपने अभिभावकों के आर्शिवाद से ही संभव है। अतः माता-पिता को भगवान मानने वाले भारत में हम सभी को अपने बुजुर्गो के साथ अपनेपन और प्यार का नाता रखना होगा तभी हम स्वच्छ और महान राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।

4 comments:

  1. Ma'am aaapne aise mudde kii taraf dhyan dilaya hai jise log is bhaag-daud me bhool hii jaate hain....hame apne vriddh maata-pita ke liye samay zaroor nikaalna chahiye aur unme kabhi neglect hone kii feeling nahi aane deni chahiye. heart-touching article.

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  2. Aadrniya Anita Ji, aapke shikhaprad avm margdarshak lekh ke liye dhanyvaad. issmain koi 2 raay nahin ki बढती उम्र अपने साथ कई समस्याएं लेकर आती हैं par hamain apni jimmedaryoan avm sanskaroan ko nahin bhulna chahiye. Hamain yah yaad rakhnaa chahiye ki hamari bhee kal yahi sthiti honi hai.
    Ham aapko avagat karaa dain ki yah sach hai ki ab बहु-बोटियाँ उनके साथ हाँथ में हाँथ मिलाकर खङीं हो रहीं हैं। Ham isske udahar hain, harami Mataji ka dehant 3 varsh purv ho gayaa. Aaj hamare PitaJi 81 year , ab saririk aswastha ke karan, ham Bhaiyoan ki anupasthiti main hamare PitaJi ka, ghar ki mahilayain, ham bhaiyoan ki tarah avm hamse jayadaa dhayaan rakhati hai. Aur unt main yahi kahenge ki संयुक्त परिवार अच्छे होते हैं।
    Brij Bhushan Gupta, New Dlhi, 9810360393

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