Thursday, 5 February 2015

वीर दामोदर सावरकर

आधुनिक भारत के इतिहास में केवल दो ही व्यक्ति ऐसे हुए जिन्हे लौह पुरुष कहा जाता है। एक सरदार वल्लभभाई पटेल और दूसरे वीर विनायक दामोदर सावरकर, जिन्होने अंग्रेजी साम्राज्यवाद से भारत को आजाद कराने हेतु इतनी कुर्बानियां दी और यातनाएं सही कि जिनकी गिनती करना भी असंभव है।  जनवरी के अंतिम सप्ताह में मुझे सेलुलर जेल देखने का अवसर मिला, जहाँ अनेक देशभक्तों के साथ अमानवीय अत्याचार किया जाता था। वही पर प्रसिद्ध देशभक्त वीर सावरकर के बारे में और अधिक जानने को मिला। सेलुलर जेल में बंद देशभक्तों में वीर सावरकर ने एक नई ऊर्जा का संचार किया था। आजादी के संघर्ष में वीर सावरकर एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्हे दो बार आजीवन कारावास की सजा दी गई थी, अर्थात उन्हे 50 वर्ष जेल में रहने की सजा हुई। ऐसे ही महान देशभक्त वीर विनायक दामोदर सावरकर के जीवन पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रहे हैं। 

वीर सावरकर जी का कहना था कि, "मातृभूमि! तेरे चरणों में पहले ही मैं अपना मन अर्पित कर चुका हुँ। देश सेवा में ईश्वर सेवा है, ये मानकर मैने तेरी सेवा के माध्यम से भगवान की सेवा की।"

विनायक दामोदर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे, हिन्दु राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा को विकसित करने का श्रेय वीर सावरकर जी को जाता है। सावरकर जी को देशभक्ति और क्रान्तिकारी विचारधारा अपने परिवार से विरासत में मिली थी। उनके बङे भाई गणेंश दामोदर सावरकर  को भी आजीवन कारावास की सजा दी गई थी। छोटे भाई नारायण दामोदर सावरकर भी भारतमाता की आजादी हेतु कई बार जेल गए थे। तीनो भाईयों में देशभक्ति का जज़बा कूट-कूट कर भरा हुआ था। विनायक दामोदर सावरकर जिन्हे संक्षिप्त में वीर सावरकर के रूप में जाना जाता है, उनका जन्म 18 मई 1883 को महाराष्ट्र में हुआ था। पिता का नाम दामोदर पंत और माता का नाम राधाबाई था। प्रथमिक शिक्षा के बाद वीर सावरकर का दाखिला पूना के फरग्युसन कॉलेज में हुआ किन्तु अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण उन्हे कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया। फिर भी मुंबई विश्वविद्यालय से बी.ए. की परिक्षा पास करने में वे सफल हुए। कानून की शिक्षा प्राप्त करने के लिए 1905 में लंदन गये और बैरिस्ट्री की शिक्षा सफलता पूर्वक प्राप्त किए। लंदन में भी उनकी क्रान्तिकारी गतिविधियाँ जारी रहीं, जिसका प्रमुख केन्द्र था इण्डिया हाउस। अपने लंदन प्रवास के समय सावरकर जी ने भारतवासियों और अंग्रेजों के बीच सन् 1857 में हुए संर्घष पर एक पुस्तक, "भारत का स्वतंत्रता संग्राम 1857" लिखी। इस पुस्तक के माध्यम से सावरकर जी ने ये सिद्ध किया कि ये युद्ध भारतमाता की स्वतंत्रता के लिए हुआ था। ब्रिटिश सरकार ने ये पुस्तक कहीं भी प्रकाशित नही होने दी। छपने से पूर्व ही उसे जब्त कर लिया गया। इंग्लैंड के बाहर ये पुस्तक प्रकाशित हो सकी। भारत में भी इसपर रोक लगा दी गई थी। भारत में ये पुस्तक चोरी-छिपे पहुँची और भारत में इसको पढने वालों का आलम ये था कि इसको पढने के अपराध में उन्हे जेल जाना भी स्वीकार था। सावरकर पहले व्यक्ति थे जिन्होने ब्रिटिश साम्राज्य के केन्द्र लंदन में अंग्रेजों के खिलाफ क्रान्तिकारी आंदोलन शुरु किया था। वीर सावरकर जब लंदन में थे तभी भारत में उनकी गिरफ्तारी का वारंट जारी हुआ था, जिससे उन्हे गिरफ्तार करके उनपर सरकार के खिलाफ विद्रोहात्मक मुकदमा चलाया जा सके। सावरकर भारत जाना नही चाहते थे किन्तु उन्हे गिरफ्तार करके भारत भेजने का प्रबंध किया गया। जिस जहाज से उन्हे भारत भेजा जा रहा था, जब वे जहाज फ्रांस के पास से गुजर रहा था तब जहाज के इंजन में कुछ खराबी के कारण उसे फ्रांस के बंदरगाह की ओर जाना पङा। जहाज जब बंदरगाह से दूर ही था तब सावरकर शौचालय के रास्ते से समुंद्र में कूद गए तथा तैरते हुए मार्शल्स बंदरगाह तक पहुँचने का प्रयास किए, उनके भागने से जहाज पर हङकम मच गई और समुंद्र में उन पर कई गोलियां चलाई गई परंतु सावरकर बंदरगाह पर पहुँचने में सफल हो गये। उन्हे विश्वास था कि फ्रांस की पुलिस उन्हे अंग्रेजों को नही सौपेगी परंतु दुर्भाग्य से ऐसा नही हुआ। इंग्लैंड की पुलिस उन्हे वापस जहाज पर लाने में सफल रही और अत्यधिक सुरक्षा घेरे में सावरकर को भारत लाया गया। भारत में उनपर अनेक मुकदमें चलाए गए और आजीवन कारावास की सजा दी गई। दूसरे मुकदमे में भी आजीवन कारावास की सजा दी गई। इस प्रकार उन्हे 50 वर्ष की सजा सुनाई गई। सावरकर जी को 1911 में अंडमान यानी की कालापानी भेज दिया गया जहाँ उनके बङे भाई पहले से ही आजीवन कारावास की सजा में बंदी थे,यद्यपि दोनो सावरकर बंधु एक ही जेल में थे किन्तु वे आपस में मिल नही पाते थे।  कालापानी अर्थात सेलुलर जेल में सभी क्रांतिकारियों के साथ अत्यंत कठोर अमानवीय व्यवहार किया जाता था। सजा ऐसी कि जिसका इंसानियत से कोई नाता नही था। वहाँ निम्न श्रेंणी का खाना और बदबुदार पानी पीने को दिया जाता था। जिसको खाने से प्रायः अधिकांश कैदी बिमार हो जाते थे। बिमारी के बावजूद कैदियों से नारियल के छिलके कुटवाने का काम करवाया जाता था, जिससे हाँथो में छाले पङ जाते थे। कोल्हु में बैल की जगह क्रांतिकारियों को बाँधा जाता था और तेल निकलवाने का कार्य किया जाता था। अंग्रेजो के अत्याचार से त्रस्त होकर उनके मन में आत्महत्या का विचार भी आया किन्तु  अपनी इस भावना को दूर करने के लिए जेल की दिवारों पर कविताएं लिखते थे। सावरकर जी अपनी बात मनवाने हेतु भूख हङताल करते थे, उनके साथ अन्य कैदी भी भूख हङताल करने लगे। अनेक बार अंग्रेज जेलर ने उनकी भूख हङताल को तोङने की कोशिश की किन्तु जेलर असफल हो गए। सेलुलर जेल में वंदेमातरम् की गूँज के साथ सभी क्रांतिकारी  सावरकर जी के आत्मविश्वास से ऊर्जावान हुए।  जेल में हो रहे अमानुषिक व्यवहार के विरोध में भारत में अनेक सार्वजनिक सभाएं भी हुईं, जिसमें सावरकर बंधुओं को वापस बुलाने की माँग की जाती थी। आंदोलन की तीव्रता की वजह से तत्कालीन भारत सरकार ने दोनों सावरकर बंधुओं को वापस बुलाया। गणेंश सावरकर कालापानी में रहकर इतने बिमार हो गए थे कि उन्हे सजा पूरी होने से पूर्व ही रिहा कर दिया गया। दामोदर सावरकर को कालापानी से वापस लाकर रत्नगिरी जेल में रखा गया। इसके बाद उन्हे यरवदा जेल पूना में भेज दिया गया। उनकी रिहाई की माँग बहुत जोर-शोर से की जा रही थी। अंततः 6 जनवरी 1924 को इस शर्त पर उन्हे रिहा कर दिया गया कि वे पाँच वर्षों तक रत्नागीरी से बाहर नही जाएंगे और किसी भी राजनैतिक गतिविधियों में भाग नही लेंगे। सावरकर दुनिया के पहले राजनैतिक कैदी थे जिनका मुकदमा हेग के अंर्तराष्ट्रीय न्यायालय में चला था। जर्मनी में 1907 की अंर्तराष्ट्रीय सोशलिष्ट कांग्रेस में मैडम भिकाजी कामा ने जो झंडा फैराया था उसको वीर दामोदर सावरकर जी ने ही बनाया था। कट्टर हिन्दुवादी वीर दामोदर सावरकर पर गाँधी जी की हत्या के षडयंत्र का भी आरोप लगा किन्तु साक्ष्य के अभाव में उनपर आरोप सिद्ध नही हुआ। स्वतंत्र भारत में उनपर झूठा आरोप लगाने पर भारत   सरकार ने उनसे माफी माँगी थी।  सावरकर जी का निधन 26 फरवरी 1966 को मुंबई में हुआ।  उनकी शवयात्रा में हजारों लोग शामिल हुए। वीर विनायक दामोदर सावरकर जी की अंतेयष्टी सम्मान पूर्वक की गई। ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, आज हम लोग जो स्वतंत्र वातावरण में सांस ले रहे हैं, उसमें वीर सावरकर जी का महत्वपूर्ण योगदान था। 
वंदे मातरम्




3 comments:

  1. ji bohot achha lekh hai

    muze aapki thodi help chahiye pl...

    my email address is
    akshaymarkandwar214@gmail.com

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  2. very interesting info about the great patriot. Thanks.

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