Wednesday, 25 September 2013

श्राद्धपक्ष



श्रद्धा के साथ अपने पूर्वजों को नमन करने का पक्ष है श्राद्ध पक्ष। हमारे अपने हमेशा हम सभी के साथ रहते हैं, भले ही वो सशरीर हमारे बीच न हों किन्तु उनकी आवाज, रंगरूप और उनके द्वारा दिए संस्कार हमेशा हमारे साथ होते हैं। सम्मान और आदर के साथ याद करना ही श्राद्ध पक्ष पर सही तरपण है। जिस तरह किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेंश जी का ध्यान करते हैं उसी तरह गणेंश वंदना के पश्चात हम सभी, प्रत्येक शुभ कार्य से पहले अपने पूर्वजों का भी आर्शिवाद लेते हैं। इसी क्रमानुसार दस दिनों तक गणेंश जी के विराजने के तुरंत बाद हम सभी अपने-अपने पूर्वजों को नमन एवं वंदन करते हैं। शब्दों के माध्यम से हम अपने पूर्वजों को सादर भावांजली अर्पित करते हुए समाज में कुछ अस्वाभाविक संस्कारों पर अपने विचार रखने का प्रयास किए हैं, जिसे निचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढा जा सकता है।



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Monday, 16 September 2013

क्षमा की शक्ति


हम सब सामाजिक प्राणी हैं, जहाँ संबंधो की दुनिया में कुछ बुरा-भला आचरण स्वाभाविक है क्योंकि गलती करना मानव स्वभाव है। जिस प्रकार प्रकृति की बगिया में भाँति-भाँति के पुष्प और पौधे हैं उसी प्रकार जीवन की बगिया भी अनेक प्रकार की सोच और प्रकृति वाले लोगों से सुसज्जित है। कई बार हममें से कई लोगों का सामना नागफनी जैसे लोगों से भी होता है। वो अपनी सोच के अनुसार हमारा मुल्याकंन करते हैं जिससे हम विचलित हो जाते हैं। कहने वाला तो कह कर चला जाता है किन्तु हम हैं कि उसकी बात को दिल से लगा कर स्वयं को तकलीफ देते रहते हैं। ये जरूरी तो नही कि सबका नजरिया एक जैसा हो। हमें अपने पर विश्वास होना चाहिए तथा स्वयं को तकलीफ देने के बजाय उसे क्षमा करके उस बात को भूल जाना चाहिए।

ये भी सच है कि माफी या क्षमा भूलने के समान नही है तथा व्यक्ति कुछ चीजें कभी नही भूलता खासतौर पर जब मन पर या स्वाभिमान पर चोट लगी हो। परन्तु ये भी सच है कि गलती किससे नही होती अक्सर कहा जाता है कि गलती करना मानव स्वभाव है और क्षमा करना ईश्वरीय। किसी को क्षमा कर देने से उससे मिले कष्ट को भूलने में मदद मिलती है। जीवन तो बढने का नाम है ऐसे में यदि हम एक बात को लेकर बैठ जायेंगे तो आगे कैसे बढेगें। माफी तो एक ऐसी औषधी है जो गहराई तक जाकर घावों का इलाज करती है। ये उस जहर को खत्म कर देती है जो प्रेम तथा सोहार्द के लिए घातक है। माफी ऐसी प्रक्रिया है जिससे अपराधी से अधिक पीङित को राहत मिलती है। क्षमा कर देने वाला व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सेहत का हकदार होता है। जीवन में सुखमय शान्ति के दो ही तरीके हैं-
1- माफ कर दो उन्हे जिन्हे तुम भूल नही सकते।
2- भूल जाओ उनको जिन्हे तुम माफ नही कर सकते।

चिकित्सकों के अनुसारः- जो लोग बदले की बजाय माफी में विश्वास रखते हैं वो आवेश तथा बदले की कल्पनाओं से मुक्त अच्छी नींद लेते हैं।
क्रोध तो गर्म कोयले के समान है जिसे पकङ कर हम स्वयं को ही जलाते हैं। क्षमा करके हम स्व-परिचय, विशिष्टता और वासत्विक स्व को सुरक्षित रखते हैं। समाज के लिए ही नही बल्कि आपसी रिश्ते में भी क्षमा महत्वपूर्ण आधार है जो रिश्तों की नींव को मजबूत करती है। दूसरों के लिए क्षमा भाव के साथ खुद को भी माफ करना आवश्यक पहलु है। जब हम अपनी असफलताओं और गलतियों को मान लेते हैं तो ग्लानी भाव के बोझ से निकलकर सकारात्मक वातावरण का निर्माण करते हैं तथा अपने आप से प्रेम करने लगते हैं जिससे जीवन का सफर सुखद हो जाता है।

क्षमा ऐसा मंत्र है जिसका बीज बचपन से ही बोने का काम करना चाहिए क्योंकि परिवार ही वह पहला स्कूल है जहाँ इसकी शिक्षा दी जा सकती है। जब माता पिता एक दूसरे को माफ करते हैं तो वो बच्चों को भी वास्तविक जीवन में क्षमा के महत्व समझाते हैं, यकिनन यही बच्चा आगे चलकर परिवार, समुदाय, समाज और राष्ट्र में इन मूल्यों को और एकता को बनाये रखने में सफल होता है।

हमारे सभी धर्मों में क्षमा को विषेश स्थान दिया गया है। ईद हो या होली, सभी लोग गले मिलकर एक दूसरे की गलतियों को माफ कर देते हैं और स्वस्थ भाई-चारे को बढावा देते हैं। जैन धर्म मानने वाले हर वर्ष सितंबर के महिने में एक विशेष पर्व मनाते हैं, जिसे क्षमा पर्व कहते हैं। सभी जन एक दूसरे से जाने अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रर्थना करते हैं। निःसंदेह ये सकारात्मक प्रक्रिया है जो मानवीय संबंधो में मधुरता का संचार करती है। 

शास्त्रों के अनुसारः-
क्षमावशीकृतिलोर्के क्षमया किं न साध्यते।
शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः।।
अर्थात- संसार को क्षमा वश में कर लेती है। ऐसा कौन सा कार्य है जो क्षमा से नही हो सकता जिसके हाँथ में शान्ति रूपी तलवार हो दुर्जन उसका क्या बिगाङ सकता है।

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि क्षमा पर्व जैसे सत्कर्म अगर केवल एक दिन या एक सप्ताह के लिए भी हों तो व्यक्ति का ह्रदय अपने अपराध भाव के बोझ से थोङा बहुत मुक्त हो जायेगा लेकिन यदि हम क्षमा भाव को अपनी जीवन शैली बना लें तो हम गुलाब की तरह वातावरण को खुशनुमा बना सकते हैं, जिसका काँटो के साथ रहते हुए भी महत्वपूर्ण स्थान है। माफी तो वह खुशबू है, जो एक फूल उन्ही हाँथो में छोङ जाता है, जिन हाँथो ने उसे तोङा होता है।     

Sunday, 8 September 2013

गणेंश चतुर्थी के पावन पर्व पर हार्दिक बधाई



बुद्धिदाता, विघ्नहर्ता भगवान गणेश के हर एक नाम में अपने भक्तों का उद्धार छुपा हुआ है। शारीरिक संरचना में भी विशिष्ट व गहरा अर्थ निहित है। शिवमानस में श्री गणेश को ओमकार: (ॐ) कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूँड है। गौरीसुत, महागणपति सारे ब्रह्मांड के भगवान हैं।सभी शुभ कार्य के देव प्रथमेश्वर सफलता के स्वामी हैं। देवों के देव वक्रतुण्ड ज्ञान के दाता हैं। बाधाओं को हरने वाले,  सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले सिद्दिविनायक को कोटी-कोटी प्रणाम  है।
मंगलमूर्ती गजानन के बारे में अधिक जानकारी के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

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Wednesday, 4 September 2013

जीवन में शिक्षा का महत्व



जीवन एक पाठशाला है। जिसमें अनुभवों के आधार पर हम शिक्षा पाते हैं। शिक्षा का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। शिक्षा हमारी समृद्धि में आभूषण, विपत्ति में शरण स्थान और समस्त कालों में आनंद स्थान होती है। जीवन लक्ष्य की पूर्ती के लिए शिक्षा आवश्यक है। महान दार्शनिक एवं शिक्षाविद् डॉ. राधाकृष्णन भी मनुष्य को सही अर्थों में मनुष्य बनाने के लिए शिक्षा को सर्वाधिक आवश्यक मानते थे। उनके अनुसार- शिक्षा वह है, जो मनुष्य को ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ उसके ह्रदय एवं आत्मा का विकास करती है। शिक्षा व्यक्ति को स्वंय के विकास के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के विकास के लिए भी प्रेरित करती है। महामहीम सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचार से शिक्षा का माध्यम मातृभाषा में होना चाहिए क्योंकि विदेशी भाषा में भारतीय मौलिक चिंतन नही कर सकते।
शिक्षा के महत्व को परिलाक्षित करते हुए स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं कि, जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें और विचारों का सामजस्य कर सकें यर्थाथ में यही वास्तविक शिक्षा होगी। स्वामी जी भारत में ऐसी शिक्षा चाहते थे, जिसमें उसके अपने आदर्शवाद के साथ पाश्चात्य कुशलता का सामंजस्य हो। उनका कहना था कि लोगों को आत्मनिर्भर बनना अति आवश्यक है वरना सारे संसार की दौलत से भी भारत के एक गाँव की सहायता नही  की जा सकती। अतः नैतिक तथा बौद्धिक, दोनों ही प्रकार की शिक्षा प्रदान करना देश व समाज का पहला कार्य होना चाहिए।
ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, आज जिस तरह का वातावरण चारो तरफ व्याप्त है ऐसे में ऐसी शिक्षा ही आवश्यक है जिससे बच्चों का चरित्र-निर्माण हो सके, उनकी मानसिक शक्ति बढे, बुद्धि विकसित हो और देश के युवक अपने पैरों पर खङा होना सीखें। भौतिकवादी स्वार्थपरक सोच के फैलते प्रभाव को कम करने के लिए आवश्यक है कि स्कुली शिक्षा के साथ-साथ नैतिक शिक्षा की भी नींव मजबूत की जाए।
शिक्षक दिवस के पावन दिन पर सार्थक शिक्षा को आत्मसात करते हुए खुद से वादा करें कि जो शिक्षा मनुष्य को सही अर्थों में मनुष्य बना सके ऐसी मूल्यवान शिक्षा की अलख हम विपरीत वातावरण में भी जलाए रखेंगे। इसी प्रण के साथ आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई।


Friday, 30 August 2013

जिंदगी की पाठशाला



जीवन में हम सभी को अपने आस-पास के वातावरण से कई ऐसी बातें सीखने को मिलती हैं जो जीवन को नया आयाम देती है। कभी-कभी तो बच्चे भी हमें ऐसी सामाजिक भावना की सीख दे जातें हैं जिससे ये प्रमाणित हो जाता है कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं, वो तो वाकई भगवान का रूप होते हैं। ऐसी ही एक बच्ची की बातें आप सभी से Share कर रहें हैं। उसकी बातों से हम बहुत प्रभावित हुए।

एक बार की बात है। एक बच्ची खाना नही खा रही थी, उसकी माँ कई प्रकार से समझा रही थी फिर भी वो खाना नही खा रह थी। आखिर में उसके पिता ने उसे समझाया कि तुम खाना खा लो उसके बाद तुम जो चाहोगी तुम्हे दिला देंगे। बच्ची ने पक्का करने के लिए पुनः अपने पिता से पुछा कि जो मैं माँगुगी आप दिलाएंगे। पिता ने पुनः आश्वासन दिया और साथ ही ये हिदायत भी दे दी कि कुछ मंहगा न माँगना। बच्ची ने भी मुस्कराते हुए अपने पापा को कहा कि वो मंहगी चीज नही लेगी। खाना खाने के बाद उसके पापा ने उससे पुछा कि तुम्हे क्या चाहिए? थोङा सहमते हुए बच्ची बोली पापा मुझे अपना सर मुंडवाना है, पूरे बाल कटवाने हैं! पिता ने आश्चर्य से पूछा, माँ तो नाराज ही हो गई कि इतने अच्छे लम्बे बाल हैं क्यों कटवाना चाहती हो। बच्ची अपनी बात पर अढी रही, आखिरकार उसके पापा ने उसका बाल कटवा दिया किन्तु उसकी माँ उससे बहुत नाराज रही यहाँ तक की दूसरे दिन स्कूल जाने के लिए तैयार भी नही की। उसके पापा उसे तैयार करके स्कूल छोङने गए। वहाँ वे उसके एक ऐसे दोस्त से मिले जिसके सर पर बिलकुल भी बाल नही था। वे कुछ सोचते उसके पहले ही उस बच्चे की माँ उनके पास आई और बोली, "सर आपकी बेटी का दिल बहुत बङा है। जिस बच्चे को इतने ध्यान से देख रहे हैं वो मेरा बेटा है,उसे ल्यूकेमिया है, किमोथैरिपी की वजह से उसके पूरे बाल झङ गए हैं। क्लास के बच्चे उसका मजाक न उङाएं इसलिए वो एक महिने से स्कूल नही आ रहा था। पिछले सप्ताह आपकी बेटी मेरे घर आई थी। उसने मेरे बेटे से वादा किया था कि सोमवार से स्कूल आए उसे कोई परेशान नही करेगा। मैने कभी सोचा भी न था कि वो अपने खूबसूरत बालों का बलिदान कर देगी। आप बहुत भाग्यशाली हैं कि आपको इतनी सुंदर आत्मा वाली बेटी मिली है।"

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि उस नन्ही परी ने अपने पापा को ही नही बल्की हम सबको ये सीख दी कि इस दुनिया में खुशी उन्हे नही मिलती जो अपनी शर्तो पर जिंदगी जीते हैं बल्की उन्हे मिलती है, जो दूसरों की खुशी के लिए जिंदगी की शर्तों को बदल देते हैं।

Tuesday, 27 August 2013

जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई





राधा की भक्ति, मुरली की मिठास,
माखन का स्वाद और गोपियों का रास,
असुरों का नास, यशोदा का विश्वास,
गीता का ज्ञान, गोकुल की आस,
पूरी करें सबकी आस,
इन सब से मिलकर बनता है, 
जन्माष्टमी का दिन खास।
वो सबको राह दिखाते, सबकी बिगङी बनाते।
ऐसे मुरलीधर गोपाल की, जय हो कन्हैया लाल की

 






Sunday, 25 August 2013

जीवन का खुशनुमा पल


हम सभी अपने जीवन काल में अनेक रिश्तों को जीवंत करते हैं। सभी रिश्तों का अपना महत्व भी होता है जिसे हम सभी पूरी ईमानदारी से निभाने का प्रयास भी करते हैं। ऐसे ही इन्द्रधनुषी रिश्तों की डोर में माँ और बच्चे का रिश्ता सर्वोपरि होता है। सभी रंगो से चटख(तेज) होता है। जब बच्चे कुछ ऐसा करें कि माँ-बाप का सर गर्व से ऊँचा हो जाये तो सोने पे सुहागा हो जाता है। हमें भी अपने बच्चों पर नाज है और हो भी क्यूं नही जब बच्चे पढाई के साथ-साथ संस्कारों को भी अपनाते हुए आगे बढें तो उन पर हर माँ को गर्व होता है।

अभी हाल ही में हमारे बेटे (प्रांजल शर्मा) ने श्रेष्ठ गुरुजनों के संरक्षण में पूरी ईमानदारी से मेहनत की, जिसका परिणाम ये हुआ कि उनका डॉक्टर बनने का सपना साकार हो गया। उनका चयन(Selection ) पहली बार में ही देश के दूसरे नम्बर के संस्थान AFMC (Armed Force  Medical College, Pune ) में हो गया। ईश्वर की कृपा से लगभग सभी प्रवेश परिक्षाओं में उन्हे सफलता प्राप्त हुई। उसकी मेहनत रंग लाई और उसे मनपसंद विद्यालय चयन करने का अवसर प्राप्त हुआ। एक माँ होने के नाते उसकी उपलब्धी, मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नही है। मेरी बेटी (आकांक्षा) ने भी सदैव मेरा मान बढाया। उसकी उपलब्धियों ने हमेशा गौरवान्वित किया। अच्छे अंको के साथ आगे बढते हुए प्रथम प्रयास में ही C.A. (Charter Accountant)  बन गई। मेरी खुशियों को तब चार चाँद लग गया जब हम दामाद(चिराग) के रूप में ऐसे बेटे को पाए जिस पर हमें तो गर्व है ही, साथ में हमारी सासु माँ के लिए कृष्ण कन्हैया का रूप है वो। चिराग भी पहले प्रयास में C.A. (Charter Accountant)  बन गया था।
ऐसे बच्चों की माँ होना मेरे लिए उस गौरव की बात है, जो हमें यशोदा और देवकी की अनुभूति दिलाता है।
खुशी का ये पल आप सभी से Share कर के हमें हर्ष हो रहा है। खुशी का ये इजहार मेरे बच्चों के साथ-साथ उन सभी बच्चों के लिए आर्शिवाद स्वरूप है जो अपनी मेहनत से अपने सपने को साकार करते हैं।

किसी ने सच ही कहा है- “Relation can’t be  understood by Language of money because some investment never gain profit, But they make us rich.


Tuesday, 20 August 2013

HAPPY RAKSHABANDHAN


कच्चे धागों का मजबूत बंधन है राखी
जांत-पांत और भेदभाव से दूर
एकता का पाठ है राखी
रिश्तों की मिठास लिए,
भाई-बहन का परस्पर विश्वास है राखी
शब्दों की नहीं पवित्र दिलों की बात है राखी
रक्षा का वादा लिए बहन का अधिकार है राखी।






Tuesday, 13 August 2013

आजादी के 66 वर्षों बाद भी क्या हम आजाद हैं ?



आजादी स्वतंत्र आकाश में पंक्षी की उङान जैसी अनुभूति है। स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ आर्थिक और सामाजिक नही बल्की सोच-समझ में भी आजादी का आगाज है। क्या हम वाकई आजादी के 66 वर्षों बाद भी उन विचारों से आजाद हो पाए हैं, जिनकी नींव अंग्रेजों ने डाली थी। हम आजाद हैं इसका अर्थ क्या है? देश को दूसरे देश से मिली आजादी, आर्थिक कर्जों से छुटकारे की आजादी, पुराने रीति-रिवाज को तोङकर आगे बढने की आजादी या एक इंसान होने के नाते स्वतंत्रता से सोचने, विचार करने तथा अपने फैसले स्वयं लेने की आजादी!
यदि विचार करें तो देश की सर्वोच्च संस्था न्यायपालिका आज भी आजाद भारत में अंग्रेजों के द्वारा बनाई परिपाटी पर चल रही है। न्याय की मूर्ती आँख पर पट्टी बाँधे हुए, हाँथ में तराजू लिए खङी है जिसे अंग्रेजों ने न्याय की देवी कहा। संभवतः उनका आशय रहा हो कि न्याय में किसी का चेहरा या रिश्ता न देखें, निष्पक्ष रहें किन्तु क्या कभी उन्होने भारतियों के साथ न्याय किया। जग जाहिर है कि 1857 के बाद भारतियों पर जो कहर बरपा उसमें कितना न्याय हमें मिला! हमारे देश में आँखे बन्द करना अच्छा नही मानते क्योंकि इतिहास गवाह है कि, धृतराष्ट्र तो अंधे थे पर गांधारी ने अपने आँखों पर पट्टी बाँध ली थी। जिसका दुष्परिणाम था, महाभारत का युद्ध। अतः हमारे यहाँ आँखों पर पट्टी बाँधना कभी भी स्वस्थ परंपरा नही मानी जाती फिर भी हमारी न्याय व्यवस्था उसी के अनुसार चल रही है।

आज भी शिक्षा प्रणाली मैकाले की शिक्षा प्रणाली पर चल रही है। मैकाले ने कहा था कि मै वो काम कर रहा हुँ जो भारतियों को सदियों तक गुलाम बना कर रखेगा। शिक्षा व्यवस्था को देखें तो मैकाले की बात सौ फीसदी सच नजर आती है। हमने अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी मान ली किन्तु वो सिर्फ नाम की राष्ट्रभाषा रह गई है। आलम तो ये है कि अंग्रेजों की अंग्रेजी के हम सभी गुलाम हैं। स्वतंत्रता दिवस का भाषण भी अंग्रेजी में देते हैं। महाविद्यालयों में दिक्षांत समारोह में दिक्षा काले कोट पहन कर लेते हैं। जबकि शिक्षालय, शुभ्रवसना हंसवाहनी का मंदिर है, जहाँ अज्ञान के अंधेरों को ज्ञान का प्रकाश मिलता है। ऐसे सुखद अवसर पर भी गुलामी को याद दिलाते काले वस्त्र पहनते हैं। जन्मदिन की खुशी पर भी दिये को बुझाकर फक्र महसूस करते हैं। हम किस आजादी की बात करते हैं जहाँ सोच तो आज भी गुलाम है।

अंग्रेज जाते-जाते भारत का त्रासदी भरा विभाजन कर गये। फूट डालो शासन करो का बीज बो गये जिसकी फसल आज भी राज्यों के बंटवारे और जाति के नाम पर आरक्षण के रूप में लहलहा रही है। अंग्रेजों के शासन काल में पूँजीवादी अर्थव्यवस्था लकावाग्रस्त (Paralysis) हो गई थी। भारतीय अपने ही देश में इतने अपमानित होते थे कि कुछ जगहों पर लिखा होता था, हिन्दुस्तानियों और कुत्तों के आने पर पाबंदि है। हमारे स्वाभीमान को गुलाम बनाया गया था। क्या आज हम अपने स्वाभिमान को आजाद कर पाए हैं?
हम आजाद तो हुए किन्तु अपनी सोच को आजाद अभी भी नही कर पाए। आंशिक आजादी से भारत की फिजा में आज भी स्वतंत्र शुद्ध हवा के अभाव का एहसास है। जब हम सभी अपनी सभ्यता और अपने विचारों के साथ सशक्त-सम्पन्न भारत का निर्माण करेंगे तभी हम वास्तविक स्वाभीमान के साथ आजाद होंगे। यही सच्ची श्रद्धांजली होगी उन असंख्य देशभक्तों को जिन्होने अपने बलिदान से हमें आजादी दिलाई।
जय हिन्द जय भारत   


  




Friday, 26 July 2013

कल्पनाओं से परे नये शहर


इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि मोहनजोदङो और हङप्पा की सम्पूर्ण नगर योजना एक विकसित नगर सभ्यता थी। शहरों का निर्माण मानव-जाति ने हजारों साल पहले कर लिया था किन्तु शहर इतने बदल जायेंगे शायद ही किसी ने इतनी कल्पना की हो। आज महानगरों ने शहरों को और शहरों ने गाँवों को अपने में समेट लिया है। लोगों की सोच और जीवन शैली आधुनिकता के रंग में रंग चुकी है। प्रेमचन्द, शुक्ल और भारतेन्दु की काशी या निराला और महादेवी वर्मा का इलाहबाद सब कुछ बदल गया है। ताजमहल की पहचान लिए आगरा शहर आज ताज-एक्सप्रेस-वे से मशहूर हो रहा है। आज छोटे से छोटे शहर ने भी अपनी पहचान बना ली है। बढती आबादी और घटती जमीनों ने गगन चुंबी इमारतों को घरौंदा बना दिया है।असली भारत गांवों में बसता है ये कहानियों के किस्से रह गये। गांधी की संकल्पना को आधुनिकता की नजर लग गई।
आधुनिक आविष्कारों ने वसुधैव-कुटुंबकम की परिभाषा ही बदल दी है। पलक झपकते लोगों से फेस टू फेस बात करने की खुशी तो है पर साथ बैठकर खाना कब खाये, ये याद करने के लिए माथे पर सिकन पङ जाती है। आज समिकरण थोङे बदल गये हैं। गाँवों का भारत तो पंत जी की कविताओं में सिमट गया क्योंकि अब गाँव भी शहरों में बसते हैं। टेलीविजन, सैकङों चैनलों के घोङे पर सवार कब गाँवों में पहुँच गया पता ही नही चला। मोबाइल इस कदर सांसो में बस गया कि इसके बिना जीवन आज असंभव सा प्रतीत हो रहा है।
भारतीय शहर के सामाजिक परिवर्तन किसी प्रयोगशाला से कम नहीं हैं। जातिवाद, स्त्री-पुरूष समानता, वैश्विक स्वतंत्रता और वैचारिक स्वतंत्रता नये शहरों को नया आयाम दे रहीं हैं। कभी क्रांति के लिए स्वतः ही जुटने वाली भीङ अब राजनेताओं के पैसे पर इक्कठी हो रही है। ट्रैफिक जाम का आलम तो क्या कहिए! एक घंटे का सफर तीन घंटे में पूरा हो जाए अपनी खुश नसीबी समझें। अगर फिल्मों की तरफ देखें तो पहले डॉक्टर हो या इंजीनीयर सब साइकिल चलाते दिख जाते थे विकास ने साइकिल में मोटर लगा दी और बन गई हवा से बातें करती मोटर साइकिल। अब तो कारों का कारवां इस कदर छा गया कि ऑफिस टाइम यानि सुबह 9-10 का समय कारें भी चींटी की चाल से चलती नजर आती हैं। मंजिल एक पर यात्रा एकांकी ये हमारे विकास की पहचान है। घरों में लोगों से ज्यादा वाहन हैं तो जाहिर सी बात है पैट्रोल की किमत अधिक होगी ही होगी। मोहन जोदङो और हङप्पा के शहर पुराने जरूर हैं किन्तु वहाँ उन्नत मानव जाति निवास करती थी। आज का आलम तो ये है कि हर तरफ हर जगह, बेशुमार आदमी फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी। कुछ समय पहले हम यूरोपिय दुनिया को भौतिक चमक में खोई दुनिया कहते थे और अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता पर गर्व करते थे।
ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि आज हम उसी भौतिक चमक-दमक के पीछे भाग रहे हैं। सिकुङते समुंद्र और विलुप्त होते जंगल, तो कहीं कस्बों के शहरीकरण ने सामाजिक ढाँचे पर अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। वो दिन दूर नही जब यात्राओं में दिखने वाले लहलहाते खेत और खुली जमीन की जगह कंक्रीट की आकाश को छूती इमारतें नजर आयेंगी। प्राकृतिक सुन्दरता केवल कवियों की कविताओं में ही दिखाई देंगी। किसीने सच ही कहा हैः-
गाँव से शहर को आये
बीत गये हैं कई वर्ष
पर आज तक ना मिल सका
गाँव जैसा स्पर्श।
काश! लौट पाना होता मुमकिन
तो दौड़ आता गाँव में
नींद आती सालों बाद
पीपल की छाँव में।